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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 63

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४५

कर्तव्यं कुरुते, वाक्यं ब्रूते, धार्यस्य धारणम् ।
इत्यादिवासनाविष्टं प्रत्यासीत् सदितीरणम् ॥३७॥
देखो, 'कर्तव्य को करता है' 'वाक्य को बोलता है,' 'धार्य
को धारण करता है' इत्यादि समानार्थक दो दो शब्दों का
प्रयोग करने की वासना जिन [अधिकारियों] के मन में बैठी
हुई है उनसे [उनके ही मुहावरे में] श्रुति ने यह कह दिया है कि
उस समय सत् ही था ।
कालाभावे पुरेत्युक्तिः कालवासनया युतम् ।
शिष्यं प्रत्येव, तेनात्र द्वितीयं नहि शंक्यते ॥३८॥
[आसीत् का मतलब है भूतकाल में विद्यमान होना] जब
कि काल नाम का कोई सत्य पदार्थ नहीं है, फिर 'अग्रेआसीत्=
पहले था' यह कथन काल की वासना से युक्त शिष्य के लिये
किया गया है [द्वैत वासनाओं से दबे हुए श्रोताओं को समझाना
ही तो श्रुति का अभिप्राय है। वे श्रोता जैसी टूटी फूटी अधूरी
भाषा में बोलने के आदी हैं, उसी भाषा में श्रुति ने उनके हित
की बात उनसे कह दी है।] इस मुहावरे के कारण द्वितीय के
होने की शंका नहीं की जा सकती ।
चोद्यं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभाषया ।
अद्वैतभाषया चोद्यं नास्ति नापि तदुत्तरम् ॥३९॥
आक्षेप या परिहार द्वैत की बोली में ही तो किया जा
सकता है। [व्यवहार दशा के रहते रहते ही 'चोद्य' या 'परिहार'
आदि करना चाहिये] । अद्वैत [की नीरव भाषा] में तो
न कुछ आक्षेप ही बनता है और न उसका कुछ उत्तर ही
होता है ।