पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३
प्रतिवादी को नरक मिलता है तथा अनेक योनियों में दोष देखने
पड़ते हैं [उसे अनेक तिर्यगादि जन्मों में कभी इष्ट का वियोग
होगा और कभी अनिष्ट की प्राप्ति होगी। यही शाप ज्ञानी लोग
दिया करते हैं। उनके 'प्रियं त्वां रोत्स्यति' कहने का यही अभिप्राय
होता है।]
ब्रह्मविद् ब्रह्मरूपत्वादीश्वर स्तेन वर्णितम् ।
यद्यत् तत्तत् तथैव स्यात् तच्छिष्यप्रतिवादिनोः ॥७०॥
[ईश्वरोह तथैव स्यात् बृ-१-४-८ इस वाक्य में कहा गया है
कि] ब्रह्मज्ञानी को अपने ब्रह्मत्व का अनुभव हो गया है। इस
से वह ईश्वर पद को पाचुका है। अब वह अपने शिष्यादि के
प्रति जो [भली या बुरी] बात कहता है, उस ज्ञानी का जो शिष्य
है, या जो प्रतिवादी है, उन दोनों को उसका कहा हुआ इष्ट
या अनिष्ट अवश्य ही प्राप्त हो जाता है। [यों ज्ञानी का कहा
हुआ एक ही वाक्य शिष्य के लिये उपदेश और वादी के लिये
शाप रूप हो जाता है]
यस्तु साक्षिणमात्मानं सेवते प्रियमुत्तमम् ।
तस्य प्रेयानसावात्मा न नश्यति कदाचन ॥७१॥
['आत्मानमेव प्रियमुपासीत, स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य
प्रियं प्रमायुकं भवति' (बृ-१-४-८) इस वाक्य में कहा गया है
कि] जो शिष्य आत्मा को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ
कर सदा आत्मा की सेवा करता है [किंचा सदा आत्मस्मरण
रखने लगता है] उसका प्रिय माना हुआ यह आत्मा, वैसे कभी
भी नष्ट नहीं हो जाता, जैसे प्रतिवादी का माना हुआ प्रिय नष्ट
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हो जाता है [ किन्तु वह तो सदानन्द रूप हो कर भासने
लगता है ]
परप्रेमास्पदत्वेन परमानन्दरूपता ।
सुखवृद्धिः प्रीतिवृद्धौ सार्वभौमादिषु श्रुता ॥७२॥
[यों यहां तक यह सिद्ध हो चुका कि] निरतिशय प्रेम का
विषय होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है । [ तैत्तिरीय और
बृहदारण्यक श्रुतियों में बताया गया है कि] चक्रवर्ती राजा से
लेकर हिरण्यगर्भपर्यन्त पदों में जहां जहां प्रीति की वृद्धि
होती है, वहां वहां सुख की भी वृद्धि होती है । यों जब प्रीति
की निरतिशयता भी समझ में आसकती है तब आनन्द की
निरतिशयता भी समझी जा सकती है । [ राजा को अपने
उपकरणों (साधनों) में प्रीति अधिक होती है तो उसे सुख भी
अधिक ही होता है ]
चैतन्यवत् सुखं चास्य स्वभावश्चेच्चिदात्मनः ।
धीवृत्तिष्वनुवर्तेत सर्वास्वपि चितिर्यथा ॥७३॥
शंका यह होती है कि—यदि चैतन्य के समान सुख या
आनन्द भी चिदात्मा का स्वभाव हो, तो जैसे सब बुद्धिवृत्तियों
में चैतन्य की अनुवृत्ति होती है वैसे सब बुद्धिवृत्तियों में
आनन्द की भी अनुवृत्ति होनी चाहिये ।
मैव मुष्णप्रकाशात्मा दीपस्तस्य प्रभा गृहे ।
व्याप्नोति नोष्णता तद्वच्चित्तेरेवानुवर्तनम् ॥७४॥
यह शंका न करनी चाहिये । दृष्टान्त में देख लो कि—
दीप के दो स्वरूप हैं एक 'उष्ण' दूसरा 'प्रकाश' । घर में जब
दीपक जलता है तब उसकी प्रभा तो घर को व्याप्त कर लेती
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९५
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९५
है परन्तु उसकी उष्णता व्याप्त नहीं करती। ठीक इसी प्रकार
बुद्धिवृत्तियों में चैतन्य की तो अनुवृत्ति हो जाती है परन्तु आनन्द
की अनुवृत्ति नहीं होती।
गन्धरूपरसस्पर्शेष्वपि सत्सु यथा पृथक् ।
एकाक्षेणैक एवार्थो गृह्यते नेतरस्तथा ॥७५॥
एक द्रव्य में गन्ध, रूप, रस और स्पर्श सभी रहते हैं,
परन्तु एक इन्द्रिय, इनमें से एक ही गुण को ग्रहण करती है,
दूसरे को नहीं। ठीक इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द इन
दोनों में से, केवल चैतन्य का भान लोगों को होता है, आनन्द
का नहीं होता।
चिदानन्दौ नैव भिन्नौ गन्धाद्यास्तु विलक्षणाः ।
इति चेत् तदभेदोऽपि साक्ष्यन्यत्र वा वद ॥७६॥
यदि कहा जाय कि—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में तो बड़ी
विषमता है। क्योंकि चित् और आनन्द तो भिन्न नहीं हैं,
गन्धादि तो परस्पर भिन्न भिन्न हैं। तो उत्तर देने से पहले यह
बताओ कि—चित् और आनन्द का जो अभेद है वह साक्षी
आत्मस्वरूप में है ? या कहीं अन्यत्र है [ या यह भेद उसकी
उपाधि कहाने वाली वृत्तियों में है। पूछने का तात्पर्य यह है
कि चिदानन्द का अभेद स्वाभाविक है या औपाधिक है ?]
आद्ये गन्धाद्योऽप्येवमभिन्नाः पुष्पवर्तिनः ।
अक्षभेदेन तद्भेदे वृत्तिभेदात् तयोर्भिदा ॥७७॥
चित् और आनन्द का साक्षी में कोई भेद नहीं है, इस
पक्ष में, पुष्प में रहने वाले गन्धादि भी इसी तरह [साक्षी में]
परस्पर भेद रहित हैं। क्योंकि एक को छोड़कर एक को उस
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में से लाया ही नहीं जा सकता। अब यदि भेद को औपाधिक
मानें, अर्थात् गन्धादि को ग्रहण करने वाली घ्राणादि इन्द्रियों के
भेद से ही, उन गन्धादि में भी भेद मान लें तब तो ठीक उसी
तरह वृत्ति भेद के कारण [ क्रमानुसार चित् और आनन्द को
अभिव्यक्त करने वाली राजस और सात्विक वृत्तियों के भिन्न
भिन्न होने से ] उन चिदानन्दों का भी औपाधिक भेद हो ही
जायगा।
सत्ववृत्तौ चित्सुखैक्यं तद्वृत्तेर्निर्मलत्वतः ।
रजोवृत्तेस्तु मालिन्यात् सुखांशोऽत्र तिरस्कृतः॥७८॥
[चित् और आनन्द की एकता देखनी हो तो सात्विक
वृत्तियों में देखो] पुण्य कर्मों के प्रताप से जब बुद्धिवृत्ति का
सात्विक परिणाम होता है तब चित् और आनन्द की एकता
भासने लग पड़ती है। क्योंकि सात्विक वृत्तियें निर्मल होती
हैं। [इन दोनों के भेद के भासने का कारण भी सुन लो कि]
रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण इनमें सुखभाग दीखना
बन्द हो जाता है। [तब भूल से यह समझा जाता है कि हम
चित् ही चित् हैं सुख हम में है ही नहीं, सुख तो कहीं से लाना होगा]
तिंतिणीफल मत्यम्लं लवणेन युतं यदा।
तदाम्लस्य तिरस्कारा दीषदम्लं यथा तथा ॥७९॥
[होता हुआ भी सुखभाग कैसे ढक जाता है ? क्यों नहीं
दीखता ? इसके लिये दृष्टान्त देख लो] जैसे कि इमली का फल
बहुत खट्टा होता है, जब उसमें नमक मिला दिया जाता है तब
उसकी खटाई छिप जाती है और बहुत कम हो जाती है।
इसी प्रकार रजोवृत्तियों में भी आनन्द का तिरोभाव हो जाता है।
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९७
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९७
ननु प्रियतमत्वेन परमानन्दतात्मनि ।
विवेक्तुं शक्यतामेवं विना योगेन किं भवेत् ॥८०॥
[रहस्य बात पूछता है कि] ऊपर जिस रीति से समझाया
गया है, उस रीति से परम प्रेम का स्थान होने के कारण आत्मा
की परमानन्दता का विवेक हो भी सकता हो, तो भी ऐसे थोथे
विवेक से क्या होना है ? मुक्ति के साधन योग के विना क्या
होगा ? [क्योंकि मुक्ति का साधन अपरोक्ष ज्ञान तो योग से
होता है]
यद्योगेन तदेवेति वदामो, ज्ञानसिद्धये ।
योगः प्रोक्तो, विवेकेन ज्ञानं किं नोपजायते ॥८१॥
[इस का उत्तर हम यह देते हैं कि] जो योग से होना है,
वही इस विवेक से हाथ आ जायगा [भाव यह है कि जैसे
योग अपरोक्ष ज्ञान का कारण है वैसे विवेक से भी अपरोक्ष
ज्ञान हो जाता है ] पहले अध्याय में अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि
के लिये जैसे योग बताया है इसी प्रकार [इस अध्याय में दिखाये
हुए गौण आदि आत्माओं के विवेक के द्वारा पांच कोषों के]
विवेक से भी ज्ञान उत्पन्न हो ही जाता है ।
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
इति स्मृतं फलैकत्वं योगिनां च विवेकिनाम् ॥८२॥
[गीता स्मृति में कहा भी है कि] सांख्य [अर्थात् आत्मा-
नात्मविवेकी] लोग जिस मोक्षरूप स्थान को पा लेते हैं योगी
लोग भी उसी को पा लेते हैं। यों गीता में 'योगी' और 'विवेकी'
दोनों के फलों की एकता बतायी गयी है [ज्ञान के द्वारा मोक्ष-
रूपी एक ही फल दोनों के हाथ लग जाता है ]
३२
४९८ पञ्चदशी
असाध्यः कस्यचिद् योगः कस्यचिज्ज्ञाननिश्चयः ।
इत्थं विचार्य मार्गौ द्वौ जगाद परमेश्वरः ॥८३॥
कोई अधिकारी ऐसे होते हैं कि उनके लिये 'योग' असाध्य
होता है । किन्हीं को तो ज्ञान का निश्चय होना कठिन हो जाता
है । यों अधिकारियों की विचित्रता के कारण, परमेश्वर ने 'ज्ञान'
और 'योग' दोनों मार्गों को कहा है ।
योगे कोतिशयस्तेऽत्र ज्ञानमुक्तं समं द्वयोः ।
रागद्वेषाद्यभावश्च तुल्यो योगिविवेकिनोः ॥८४॥
आपके योग में तो इस ज्ञान से कोई भी उल्लेखयोग्य विशे-
षता नहीं पायी जाती । देख लो कि—'विवेक' और 'योग' दोनों
का ज्ञानरूपी एक ही फल होता है । जैसे योगी लोग रागद्वेष
से रहित होते हैं वैसे ही विवेकी लोग भी रागद्वेष से हीन पाये
जाते हैं ।
न प्रीति र्विषयेष्वस्ति प्रेयानात्मेति जानतः ।
कुतो रागः कुतो द्वेषः प्रातिकूल्यमपश्यतः ॥८५॥
जिस विवेकी को यह मालूम हो जाता है कि—आत्मा ही
एक प्रियतम पदार्थ है, उसे फिर विषयों में प्रीति ही नहीं रहती
यही कारण है कि फिर उसे किन्हीं विषयों में राग भी नहीं
होता । क्योंकि वह किसी विषय को अनुकूल ही नहीं मानता ।
फिर उसे किसी से द्वेष भी नहीं होता । क्योंकि वह किसी विषय
को अपने प्रतिकूल ही नहीं समझता ।
देहादेः प्रतिकूलेषु द्वेषस्तुल्यो द्वयोरपि ।
द्वेषं कुर्वन्न योगी चेद्विवेक्यपि तादृशः ॥८६॥
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९९
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९९
देहादि के प्रतिकूल जितने पदार्थ होते हैं, उनसे जैसे
विवेकी लोग द्वेष करते हैं, वैसे योगी भी करते हैं। यदि कहो
कि [प्रतिकूल विच्छू सांप आदि से] द्वेष करने वाले को तो हम
योगी ही नहीं मानते, तो हम कहेंगे कि वैसे द्वेषी को हम विवेकी
भी कब कहते हैं ? [वैसा द्वेष करने वाला तो विवेकवान् भी
नहीं माना जा सकता]
द्वैतस्य प्रतिभानं तु व्यवहारे द्वयोः समम् ।
समाधौ नेति चेत् तद्वन्नाद्वैतत्वविवेकिनः ॥८७॥
व्यवहार काल में जैसे योगी को द्वैत का प्रतिभान होता
रहता है, वैसे ही विवेकी को भी हुआ करता है। यदि कहो
कि—योगी को समाधि करते समय द्वैत का भान नहीं होता,
[यही योगी में विवेकी से विशेषता है] तो हम कहेंगे कि उसी
तरह विवेकी को भी जब वह अद्वैत आत्मतत्वका विवेक करने
बैठता है, तब द्वैत का प्रतिभान नहीं रहता ।
विवक्ष्यते तदस्माभि रद्वैतानन्दनामके ।
अध्याये हि तृतीयेऽतः सर्वमप्यतिमङ्गलम् ॥८८॥
विवेकी को जैसे द्वैत का भान नहीं रहता है सो तो हम
अद्वैतानन्द नाम के अगले तीसरे अध्याय में कहेंगे। यों सभी
कुछ मङ्गल ही मङ्गल है।
सदा पश्यन्निजानन्द मपश्यन्निखिलं जगत् ।
अर्थाद् योगीति चेत् तर्हि संतुष्टो वर्धतां भवान् ॥८९॥
जो सदा आत्मानन्द को देखता रहता है, जिसे यह सम्पूर्ण
जगत् नहीं दीखता [जिसको द्वैत का दर्शन बन्द हो जाता है]
वह तो एक प्रकार से योगी ही हो गया है, ऐसा यदि तुम कहो
५०० पञ्चदशी
तो अच्छा तुम ऐसे ही सन्तुष्ट हो जाओ और वृद्धि पाओ।
हम कब कहते हैं कि उपासना करनी ही चाहिये। ब्रह्मज्ञान से
बढ़कर और है ही क्या ।
ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे मन्दानुग्रहसिद्धये ।
द्वितीयाध्याय एतस्मिन्नात्मानन्दो विवेचितः ॥९०॥
ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ के इस द्वितीयाध्याय में मन्दाधि-
कारी पर अनुग्रह करने के लिए 'आत्मानन्द' का विवेचन किया
गया।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दः
13. Advaitananda
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम्
योगानन्दः पुरोक्तो यः स आत्मानन्द इष्यताम् ।
कथं ब्रह्मत्वमेतस्य सद्धयस्येति चेच्छृणु ॥१॥
जिसको पहले 'योगानन्द' कहा है उसी को 'आत्मानन्द'
समझलो—[उसमें और उसमें कोई भेद नहीं है] यह सद्वितीय
आत्मानन्द ब्रह्मानन्द कैसे हो सकता है सो भी सुन लो ।
प्रथमाध्याय में 'ब्रह्मानन्द' 'विद्यानन्द' तथा 'विषयानन्द'
इन तीन तरह का आनन्द बताया था । द्वितीयाध्याय में उन
तीनों आनन्दों से अधिक एक और आत्मानन्द का वर्णन कर
चुके हैं । उसका अभिप्राय यह है कि—जिसको प्रथमाध्याय
में योगानन्द कहा था उसी को आत्मानन्द समझो । उसमें और
उसमें कोई भी भेद नहीं है । भाव यह है कि—योग के द्वारा
साक्षात्कार होने के कारण उसी ब्रह्मानन्द को योगानन्द कह
देते हैं । जब तो इस योगरूपी उपाधि की विवक्षा नहीं रहती
तब उसे सीधे शब्दों में ब्रह्मानन्द या निजानन्द ही कहने लगते
हैं । इसी प्रकार गौण आत्मा कौन है ? मिथ्या आत्मा कौन
से हैं ? मुख्य आत्मा किसे कहते हैं ? इस आत्मविवेचन के
बाद जिस आनन्द की प्राप्ति होती है उसे 'आत्मानन्द' कह
दिया है । असल में योगानन्द और आत्मानन्द एक ही बात
है । जिस द्वारा वह आनन्द प्रकट होता है, उसी के नाम से
५०२ पञ्चदशी
उसका नाम रख लिया जाता है। फिर प्रश्न यह होता है कि
जिस आत्मानन्द का वर्णन हो चुका है, वह तो सद्वितीय है।
उसके साथ तो, उसके सजातीय पुत्र स्त्री आदि गौण आत्मा
देहादि मिथ्या आत्मा, तथा उसके विजातीय आकाशादि पदार्थ
विद्यमान रहते हैं, फिर ऐसे आत्मानन्द को ब्रह्मानन्द कैसे
मान लें ? इसका उत्तर अगले श्लोक में दिया है।
आकाशादिस्वदेहान्तं तैत्तिरीयश्रुतीरितम् ।
जगन्नास्त्यन्यदानन्दादद्वैतब्रह्मता ततः ॥२॥
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः (तै० २-१) इस
तैत्तिरीय श्रुति में जिस आकाशादि स्वदेहपर्यन्त जगत् का वर्णन
आया है, [जिसके होने से द्वैत की शंका पैदा हो सकती है] वह
सब [जगत् का कारण जो आनन्द है उस आनन्द से पृथक् कुछ
भी नहीं है। यही कारण है कि [उस सब के रहने पर भी वह
आत्मानन्द अद्वितीय ब्रह्मरूप ही है। [आकाश आदि देहपर्यन्त
जगत् में द्वैत की शंका मत करो। यह सब मूल में अद्वैत
ब्रह्मतत्व ही है ।]
आनन्दादेव तज्जातं तिष्ठत्यानन्द एव तत् ।
आनन्द एव लीनं चेत्युक्तानन्दात् कथं पृथक् ॥३॥
[आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते (तै०३-६) इस
श्रुति में कहा गया है कि] आनन्द से ही वह उत्पन्न हुआ है
[समागम होने पर माता पिता को जब आनन्द आता है तब
यह जगत् उत्पन्न होता है] वह आनन्द में ही निवास करता है
[आनन्द के बिना इसका ठहरा रहना कठिन हो जाता है। इस
आनन्द से निराश हो जाने पर कुए में डूब कर या विष आदि
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०३
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०३
खाकर मर जाता है] अन्त में भी आनन्द में ही लीन हो जाता
है । जब श्रुति स्वयं यह बात कह रही है तो यह जगत् अपने
कारण उक्त आनन्द से पृथक् कैसे है ? तुम्हीं बताओ ।
कुलालाद् घट उत्पन्नो भिन्नश्चेति न शङ्क्यताम् ।
मृद्वदेव उपादानं, निमित्तं न कुलालवत् ॥४॥
कुम्हार से घट उत्पन्न हुआ है और वह उससे भिन्न भी
है, ऐसी शंका न करो। क्योंकि यह आत्मानन्द तो, मिट्टी जैसे
घड़े का उपादान कारण होती है इसी प्रकार, इस जगत् का
उपादान कारण है । यह कुम्हार की तरह का केवल निमित्त
कारण नहीं है । [ यह तो जाले का मकड़ी की तरह निमित्त
भी है और उपादान भी है । ]
स्थितिर्लयश्च कुम्भस्य कुलाले स्तो न हि क्वचित् ।
दृष्टौ तौ मृदि, तद्वत् स्यादुपादानं तयोः श्रुतेः ॥५॥
कुम्भ की स्थिति और कुम्भ का लय, कुम्हार में कभी नहीं
होते [इस कारण कुम्हार उसका उपादान नहीं होता] घड़े की
स्थिति और घड़े का लय उसके उपादान मिट्टी में ही होते हुए
प्रत्यक्ष देखे गये हैं। ठीक उसी तरह जगत् का उपादान आनन्द
ही है । श्रुति ने स्वयं अपने मुख से जगत् की स्थिति और
जगत् के लय को आनन्द में होता हुआ माना है ।
उपादानं त्रिधा भिन्नं विवर्ति, परिणामि च ।
आरम्भकं च, तत्रान्त्यौ न निरंशेऽवकाशिनी ॥६॥
उपादान तीन प्रकार का होता है—एक 'विवर्ती' दूसरा
'परिणामी' तीसरा 'आरम्भक' । इनमें से 'आरम्भ' और
'परिणाम' ये दोनों ही पक्ष निरवयव वस्तु में लागू नहीं हो सकते ।
५०४ पञ्चदशी
आरम्भवादिनोऽन्यस्मादन्यस्योत्पत्तिमूचिरे ।
तन्तोः पटस्य निष्पत्तेर्भिन्नौ तन्तुपटौ खलु ॥७॥
आरम्भवादी [वैशेषिक नैयायिक आदि] कहते हैं कि अन्य
[कार्य से सर्वथा भिन्न रहने वाले कारण] से अन्य अर्थात्
कार्य नाम की वस्तु उत्पन्न हुआ करती है [जो कि उससे सर्वथा
भिन्न ही होती है] वे कहते हैं कि तन्तु से वस्त्र की उत्पत्ति
देखी जाती है। इस कारण वे तन्तु और वस्त्र परस्पर भिन्न
ही है। [क्योंकि पट से निकलने वाले काम तन्तुओं से नहीं
निकाल सकते ।]
अवस्थान्तरतापत्ति रेकस्य परिणामिता ।
स्यात् क्षीरं दधि,मृत् कुम्भः,सुवर्णं कुण्डलं यथा ॥८॥
एक ही वस्तु जब पहली अवस्था को छोड़ कर दूसरी
अवस्था में आ जाती है तब उसी को 'परिणाम' कहते हैं। जैसे
कि परिणाम होने पर दूध दही हो जाता हैं, मिट्टी घड़ा बन
जाती है, सोने की बाली हो जाती है ।
अवस्थान्तरभानं तु विवर्तो रज्जुसर्पवत् ।
निरंशेऽप्यस्त्यसौ, व्योम्नि तलमालिन्यकल्पनात् ॥९॥
अपनी पूर्वावस्था भी न छूटे और दूसरी अवस्था का भान
भी होने लग पड़े तो इसे 'विवर्त' कहते हैं। रज्जुसर्प इसका
उदाहरण है [रज्जुरूप से विद्यमान जो पदार्थ है वही सर्वरूप
से भी भासने लगता है। यद्यपि हमने सावयव पदार्थ का ही
दृष्टान्त दिया है परन्तु] यह विवर्त निरवयव पदार्थों में भी
देखा जाता है। देखते हैं कि आकाश यद्यपि निरवयव है तो
भी वह तल सा दीखा करता और उसमें भी नीलवर्णता की
[header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०५ [/header]
[header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०५ [/header]
कल्पना अर्थात् आरोप [उस आकाश के रूप को न जानने वाले
लोग ] कर ही लेते हैं।
ततो निरंश आनन्दे विवर्तो जगदिष्यताम् ।
मायाशक्तिः कल्पिका स्यादैन्द्रजालिकशक्तिवत् ॥१०॥
ऊपर के दृष्टान्त से जब कि निरंश में भी विवर्त होना
सम्भव है तब यह भी मान ही लेना चाहिए कि—निरवयव
आनन्द में यह जगत् कल्पित कर लिया गया है। कल्पना
करने वाले की तलाश हो तो मायाशक्ति को ही कल्पना करने
वाली मान लो। इसका दृष्टान्त देखना चाहो तो ऐन्द्रजालिक
की शक्ति को देख लो [ऐन्द्रजालिक में रहने वाली जो मणि-
मन्त्रादिरूपी माया शक्ति होती है, वह गन्धर्वनगर आदि की
कल्पना कर डाला करती है। क्या यह बात हम लोक में नहीं
देखते हैं?]
शक्तिः शक्तात् पृथङ् नास्ति तद्वद् दृष्टे, र्न चाभिदा ।
प्रतिबन्धस्य दृष्टत्वाच्छक्त्यभावे तु कस्य सः ॥११॥
शक्ति शक्ति वाले से भिन्न नहीं है क्योंकि ऐसा ही [अभिन्न
होना ही] देखा जाता है। शक्ति शक्ति वाले से अभिन्न भी नहीं
है क्योंकि [अकेली] शक्ति का प्रतिबन्ध देखने में आता है।
यदि शक्ति [उससे पृथक्] कोई चीज नहीं है तो बताओ कि
यह प्रतिबन्ध किस वस्तु का होता है ?
प्रश्न यह है कि—आनन्दात्मा से भिन्न माया को मानें तो
द्वैत मानना पड़ता है। इसका उत्तर हमें यह देना है कि वह
माया तो अनिर्वचनीय होने से अनृत है। इसीसे द्वैत नहीं बनता।
देखलो कि लौकिक अग्नि आदि की शक्तियों को भी भिन्न या
५०६ पञ्चदशी
अभिन्न कुछ भी बताया नहीं जा सकता। क्योंकि अग्नि आदि की
शक्ति अग्नि आदि के स्वरूप से भिन्न नहीं होती है। क्योंकि अग्नि
आदि के स्वरूप से पृथक् वह दीख ही नहीं पड़ती है। शक्ति
और शक्तिमान् का अभेद भी नहीं माना जा सकता। क्योंकि
मणिमन्त्रादि से शक्ति का प्रतिबन्ध होता पाया जाता है। इस
कारण अग्नि आदि के स्वरूप से भिन्न शक्ति माननी चाहिए।
यदि अग्न्यादि से भिन्न शक्ति न मानोगे तो बताना होगा कि
वह प्रतिबन्ध किस का होता है ?
शक्तेः कार्यानुमेयत्वादकार्ये प्रतिबन्धनम् ।
ज्वलतोग्नेरदाहे स्यान्मन्त्रादिप्रतिबन्धता ॥१२॥
शक्ति वैसे तो किसी को भी आंखों से नहीं दीखती। उसे
तो केवल कार्य से ही अनुमान कर सकते हैं। फिर जब कारण
होने पर भी कार्य न होता हो तब प्रतिबन्ध को मानना पड़ता
है। दृष्टान्त देख लो कि—जब आग जल रही हो और दाह न
होता हो तब यह मानना होता है कि मन्त्रादि ने शक्ति का प्रति-
बन्ध, कर दिया है।
देवात्मशक्तिं स्वगुणै र्निगूढां मुनयोऽविदुन् ।
परास्य शक्ति र्विविधा क्रियाज्ञानबलात्मिका ॥१३॥
[ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् (श्वे०
१-३) इस श्रुति में कहा गया है कि] मुनि लोग जगत् के कारण
को जानने की इच्छा से, जब ध्यान योग में बैठे, तब उन्होंने
देव अर्थात् स्वयं प्रकाशस्वरूप आत्मा की मायारूपी शक्ति को
देख पाया, जो शक्ति अपने गुणों [अर्थात् अपने कार्य स्थूल-
सूक्ष्म शरीरों ] से छिपी बैठी थी ये
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०७
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०७
दर्शन नहीं होने देते थे । परास्य शक्ति र्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी
ज्ञानबलक्रिया च (श्वे० ६-८) इस में कहा गया है कि ] जगत्
को बनाने वाली, उस ब्रह्म की पराशक्ति, नाना प्रकार की सुनी
गयी है । वह माया शक्ति क्रिया ज्ञान और बल अर्थात् इच्छा
रूप होती है * ।
इति वेदवचः प्राह, वसिष्ठश्च तथाब्रवीत् ।
सर्वशक्ति परं ब्रह्म नित्यमापूर्णमद्वयम् ॥१४॥
माया के विषय में उपर्युक्त बात श्रुतियों ने कही है। वसि-
ष्ठमुनि ने भी इस मायाशक्ति की विचित्रता का वर्णन किया
है। वे कहते हैं कि वह परब्रह्म सर्वशक्तियुक्त है, वह ब्रह्म नित्य
पूर्ण और अद्वितीय है [ यों उन्होंने क्रमानुसार ब्रह्म के सोपा-
धिक रूप का भी और निरुपाधिक रूप का भी कथन कर
दिया है।]
ययोल्लसति शक्त्यासौ प्रकाशमधिगच्छति ।
चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेषूपलभ्यते ॥१५॥
वह परब्रह्म, जब जब, जिस जिस, मायाशक्ति के कारण
उल्लास किंवा विकास को प्राप्त हो जाता है, तब तब वह वह शक्ति
हम पर प्रकट हो जाया करती है [अर्थात् जब वह शक्ति प्रकट
नहीं भी होती तब भी अप्रकट दशा में ब्रह्म में यह जगत् रहता
है । हे राम ! तुम देखलो कि देवनिर्यङ् मनुष्यादि शरीर में
- कभी वह शक्ति ज्ञान रूप हो जाती है, फिर इच्छा रूप में दीखती
है, फिर क्रिया रूप में हो जाती है, कभी कभी दो या तीनों रूप एक
साथ धारण कर लेती है।
५०८ पञ्चदशी
वही चिच्छक्ति देखी जा रही है। [उस शक्ति के क्षुद्र कण
ही नाना शरीरों की चेतना के रूप में जब तब प्रकट होते
रहते हैं ]
स्पन्दशक्तिश्च वातेषु दार्ढ्यशक्ति स्तथोपले ।
द्रवशक्तिस्तथाम्भःसु दाहशक्तिस्तथानले ॥१६॥
शून्यशक्तिस्तथाकाशे नाशशक्तिर्विनाशिनि ।
वायु में उसकी स्पन्दशक्ति प्रकट होती है। पत्थर में उसकी
दार्ढ्य शक्ति अभिव्यक्त हो जाती है। जलों में उसकी द्रवशक्ति
प्रकट दशा में देखी जा सकती है। अग्नि में उसकी दाहशक्ति
देखने में आती है। आकाश में उसकी शून्यशक्ति पायी जाती
है। विनाशी पदार्थों में उसकी नाशशक्ति को देख सकते हैं।
यथाण्डेऽन्तर्महासर्पो जगदस्ति तथात्मनि ॥१७॥
[कहाँ तक कहें] जैसे सांप के अण्डे के भीतर महासर्प
अनभिव्यक्त दशा में छिपा पड़ा रहता है, इसी प्रकार आत्मा
में यह जगत् अनभिव्यक्त दशा में रहता है।
फलपत्रलतापुष्पशाखाविटपमूलवान् ।
तनु बीजे यथा वृक्षस्तथेदं ब्रह्मणि स्थितम् ॥१८॥
फल फूल पत्ते लता शाखा टहनी और मूल वाला पेड़ जैसे
एक बीज में [सूक्ष्म रूप में छिपा] रहता है इसी प्रकार यह
विचित्र जगत् ब्रह्म में रहता है।
क्वचित् काश्चित् कदाचिच्च तस्मादुद्यन्ति शक्तयः ।
देशकालविचित्रत्वात् क्ष्मातलादिव शालयः ॥१९॥
देश और काल के विचित्र होने के कारण कहीं किसी देश
में और किसी काल में कोई कोई शक्तियें अभिव्यक्त हो जाती
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०९
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०९
हैं [सब शक्तियें एक स्थान और एक काल में ही उदित नहीं
होतीं] देखते हैं कि भूमि में बहुत से बीज पड़े रहते हैं परन्तु
वे सब एक साथ उदित नहीं होते। किन्तु किसी देश और किसी
काल [ऋतु] में कोई कोई बीज अंकुर को उत्पन्न कर देते हैं।
स आत्मा सर्वगो राम ! नित्योदितमहावपुः ।
यन्मनाङ् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥२०॥
हे राम ! सर्वत्र विद्यमान नित्य प्रकाशमान तथा देश
कालादि की मर्यादा में कभी न आने वाले स्वरूप वाला वह
आत्मा जिस समय [आत्मबोध कराने वाली] मनन शक्ति को
[जो कि माया का परिणाम रूप है ] धारण कर लेता है, तब
उसको 'मन' कहने लगते हैं ।
आदौ मनस्तदनुबन्धविमोक्षदृष्टी
पश्चात् प्रपंचरचना भुवनाभिधाना ।
इत्यादिका स्थितिरियं हि गता प्रतिष्ठा-
माख्यायिका सुभगवालजनोदितेव ॥२१॥
[मनन शक्ति का उल्लास जब होता है तब] पहले तो मन
[उत्पन्न] होता है। उसके पश्चात् बन्ध और मोक्ष की कल्पना
जाग पड़ती है। उसके अनन्तर पर्वत नगर नदी समुद्रादि
प्रपंच की रचना - जिसको भुवन भी कहते हैं - हो जाती है।
इस तरह की यह जगत् की अवस्था प्राणियों के जी में जम
गई है [ कल्पित होने पर भी सच्ची सी प्रतीत होने लगती है ]
कहानी सुनने के शौकीन बच्चों को सुनाई हुई कथा को जैसे वे
बच्चे सच्ची ही मान लेते हैं, इसी प्रकार यह जगत् भी सत्य
माना जाने लगा है।
५१० पञ्चदशी
बालस्य हि विनोदाय धात्री वक्ति शुभां कथाम् ।
क्वचित् सन्ति महाबाहो राजपुत्रास्त्रयः शुभाः ॥२२॥
द्वौ न जातौ तथैकस्तु गर्भ एव न च स्थितः ।
वसन्ति ते धर्मयुक्ता अत्यन्तासति पत्तने ॥२३॥
स्वकीयाच्छून्यनगरान्निर्गत्य विमलाशायाः ।
गच्छन्तो गगने वृक्षान् ददृशुः फलशालिनः ॥२४॥
भविष्यन्नगरे तत्र राजपुत्रास्त्रयोऽपि ते ।
सुखमद्य स्थिताः पुत्र ! मृगयाव्यवहारिणः ॥२५॥
धात्र्येति कथिता राम ! बालकाख्यायिका शुभा ।
निश्चयं स ययौ बालो निर्विचारणया धिया ॥२६॥
बालकों को बहलाने के लिए धायी एक बड़ी मनोहर कहानी
कहा करती हैं कि—किसी देश में तीन बड़े सुन्दर राजकुमार
रहते हैं । उनमें से दो तो अभी तक उत्पन्न ही नहीं हुए हैं।
और एक तो अभी तक गर्भ में ही नहीं आया है। वे तीनों के
तीनों बड़े धर्मपूर्वक एक अत्यन्त असत् नगर में रहते हैं । एक
बार वे तीनों उदार राजकुमार अपने शून्य नगर में से निकल
कर जा रहे थे कि उन्होंने आकाश में फलों से लड़े हुए बहुत
से पेड़ देखे । वे तीनों गजपुत्र भविष्यत् नगर में शिकार
खेलते खेलते आज आनन्द पूर्वक रह रहे हैं ।. हे राम ! धायी
ने ये एक बड़ी मनोहर कहानी कही थी। वह भोला बच्चा अपनी
विचारशून्य [भोली] बुद्धि से इसे ठीक मान बैठा ।
इयं संसाररचना विचारोज्झितचेतसाम् ।
बालकाख्यायिकेवेत्थमवस्थितिमुपागता ॥२७॥
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५११
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५११
ठीक इसी प्रकार इस संसाररचना का हाल है [विचार
कर देखें तो कहीं भी इसकी श्रृंखला नहीं जुड़ती। खोदते खोदते
रेत की दीवार की तरह, विचार करते करते ही यह तितर बितर
हो जाती है] परन्तु जिनके चित्त को विचार करना नहीं आता
बालकों की कहानी की तरह उनके लिए ही यह संसाररचना
सच्ची हो जाती है।
इत्यादिभिरुपाख्यानैर्मायाशक्तेश्च विस्तरम् ।
वसिष्ठः कथयामास सैव शक्तिर्निरूप्यते ॥२८॥
इत्यादि उपाख्यानों के द्वारा मायाशक्ति का विस्तृत निरू-
पण वसिष्ठ ने किया है। उसी मायाशक्ति का निरूपण अब
किया जायगा ।
कार्यादाश्रयतश्चैषा भवेच्छक्तिर्विलक्षणा ।
स्फोटाङ्गारौ दृश्यमानौ शक्तिस्तत्रानुमीयते ॥२९॥
यह मायाशक्ति अपने कार्य [जगत्] से और अपने आश्रय
[ब्रह्म] इन दोनों से ही विलक्षण [किंवा विपरीत] स्वभाववाली
होती है। दृष्टान्त में देख लो कि वह्नि की शक्ति का कार्य
'स्फोट' [विदारण] तथा शक्ति का आश्रय 'अङ्गार' तो प्रत्यक्ष
ही दीखा करते हैं। शक्ति का अनुमान तो कार्य को देख कर
ही किया जाता है। [इस कारण वह शक्ति उन दोनों (कार्य
और आश्रय अथवा स्फोट और अंगार) से विलक्षण होती है]
पृथुबुध्नोदराकारो घटः कार्योऽत्र मृत्तिका ।
शब्दादिभिः पञ्चगुणैर्युक्ता शक्तिस्त्वतद्विधा ॥३०॥
मिट्टी की शक्ति के विषय में भी यही बात समझ लो—
मोटे और गोल पेट वाला घट तो मिट्टी की शक्ति का कार्य है।
५१२ पञ्चदशी
उस कार्य का आश्रय मिट्टी तो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध
नाम के पाँच गुणों वाली है। परन्तु शक्ति तो इन दोनों से ही
विलक्षण होती है [वह न तो घटरूप ही है और न वह मृत्तिका
रूप ही है।]
न पृथ्वादिर्नशब्दादिः शक्तावस्तु यथा तथा।
अत एव ह्यचिन्त्यैषा न निर्वचनमर्हति ॥३१॥
कार्य के धर्म मुटापा आदि, तथा आश्रय के धर्म शब्दादि
कोई भी शक्ति में नहीं पाये जाते। इस कारण वह शक्ति अपने
कार्य तथा अपने आश्रय से विलक्षण होती है। वह तो कुछ
ऐसी ही विलक्षण वस्तु है। कार्य और आश्रय से विलक्षण
होने के कारण ही वह अचिन्त्य है [उसका चिन्तन नहीं किया
जा सकता] भेद अभेद या अचिन्त्यत्वादि किसी भी रूप से
उसका निर्वचन हो ही नहीं सकता।
कार्योत्पत्तेः पुरा शक्तिर्निगूढा मृद्यवस्थिता।
कुलालादिसहायेन विकाराकारतां व्रजेत् ॥३२॥
मिट्टी की शक्ति घटादि कार्य की उत्पत्ति से पहले तो मिट्टी
में छिपी पड़ी रहती है [इस कारण प्रकट नहीं होती] कुलाल
दण्ड चक्र आदि की सहायता जब उस शक्ति को मिल जाती
है तब वह विकार [कार्य] के आकार की हो जाती है।
पृथुत्वादिविकारान्तं स्पर्शादिं चापि मृत्तिकाम्।
एकीकृत्य घटं प्राहुः विचारविकला जनाः ॥३३॥
जो लोग विचारहीन हैं, वे पृथुत्वादिरूपी कार्य को, तथा
शब्दस्पर्शादिरूपी मिट्टी को, अपने अविचार के कारण एक
[वस्तु] बना कर उसे 'घट' कहने लगते हैं।