पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context४९८ पञ्चदशी
असाध्यः कस्यचिद् योगः कस्यचिज्ज्ञाननिश्चयः ।
इत्थं विचार्य मार्गौ द्वौ जगाद परमेश्वरः ॥८३॥
कोई अधिकारी ऐसे होते हैं कि उनके लिये 'योग' असाध्य
होता है । किन्हीं को तो ज्ञान का निश्चय होना कठिन हो जाता
है । यों अधिकारियों की विचित्रता के कारण, परमेश्वर ने 'ज्ञान'
और 'योग' दोनों मार्गों को कहा है ।
योगे कोतिशयस्तेऽत्र ज्ञानमुक्तं समं द्वयोः ।
रागद्वेषाद्यभावश्च तुल्यो योगिविवेकिनोः ॥८४॥
आपके योग में तो इस ज्ञान से कोई भी उल्लेखयोग्य विशे-
षता नहीं पायी जाती । देख लो कि—'विवेक' और 'योग' दोनों
का ज्ञानरूपी एक ही फल होता है । जैसे योगी लोग रागद्वेष
से रहित होते हैं वैसे ही विवेकी लोग भी रागद्वेष से हीन पाये
जाते हैं ।
न प्रीति र्विषयेष्वस्ति प्रेयानात्मेति जानतः ।
कुतो रागः कुतो द्वेषः प्रातिकूल्यमपश्यतः ॥८५॥
जिस विवेकी को यह मालूम हो जाता है कि—आत्मा ही
एक प्रियतम पदार्थ है, उसे फिर विषयों में प्रीति ही नहीं रहती
यही कारण है कि फिर उसे किन्हीं विषयों में राग भी नहीं
होता । क्योंकि वह किसी विषय को अनुकूल ही नहीं मानता ।
फिर उसे किसी से द्वेष भी नहीं होता । क्योंकि वह किसी विषय
को अपने प्रतिकूल ही नहीं समझता ।
देहादेः प्रतिकूलेषु द्वेषस्तुल्यो द्वयोरपि ।
द्वेषं कुर्वन्न योगी चेद्विवेक्यपि तादृशः ॥८६॥