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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९९
देहादि के प्रतिकूल जितने पदार्थ होते हैं, उनसे जैसे
विवेकी लोग द्वेष करते हैं, वैसे योगी भी करते हैं। यदि कहो
कि [प्रतिकूल विच्छू सांप आदि से] द्वेष करने वाले को तो हम
योगी ही नहीं मानते, तो हम कहेंगे कि वैसे द्वेषी को हम विवेकी
भी कब कहते हैं ? [वैसा द्वेष करने वाला तो विवेकवान् भी
नहीं माना जा सकता]
द्वैतस्य प्रतिभानं तु व्यवहारे द्वयोः समम् ।
समाधौ नेति चेत् तद्वन्नाद्वैतत्वविवेकिनः ॥८७॥
व्यवहार काल में जैसे योगी को द्वैत का प्रतिभान होता
रहता है, वैसे ही विवेकी को भी हुआ करता है। यदि कहो
कि—योगी को समाधि करते समय द्वैत का भान नहीं होता,
[यही योगी में विवेकी से विशेषता है] तो हम कहेंगे कि उसी
तरह विवेकी को भी जब वह अद्वैत आत्मतत्वका विवेक करने
बैठता है, तब द्वैत का प्रतिभान नहीं रहता ।
विवक्ष्यते तदस्माभि रद्वैतानन्दनामके ।
अध्याये हि तृतीयेऽतः सर्वमप्यतिमङ्गलम् ॥८८॥
विवेकी को जैसे द्वैत का भान नहीं रहता है सो तो हम
अद्वैतानन्द नाम के अगले तीसरे अध्याय में कहेंगे। यों सभी
कुछ मङ्गल ही मङ्गल है।
सदा पश्यन्निजानन्द मपश्यन्निखिलं जगत् ।
अर्थाद् योगीति चेत् तर्हि संतुष्टो वर्धतां भवान् ॥८९॥
जो सदा आत्मानन्द को देखता रहता है, जिसे यह सम्पूर्ण
जगत् नहीं दीखता [जिसको द्वैत का दर्शन बन्द हो जाता है]
वह तो एक प्रकार से योगी ही हो गया है, ऐसा यदि तुम कहो