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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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[header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०५ [/header]
कल्पना अर्थात् आरोप [उस आकाश के रूप को न जानने वाले
लोग ] कर ही लेते हैं।
ततो निरंश आनन्दे विवर्तो जगदिष्यताम् ।
मायाशक्तिः कल्पिका स्यादैन्द्रजालिकशक्तिवत् ॥१०॥
ऊपर के दृष्टान्त से जब कि निरंश में भी विवर्त होना
सम्भव है तब यह भी मान ही लेना चाहिए कि—निरवयव
आनन्द में यह जगत् कल्पित कर लिया गया है। कल्पना
करने वाले की तलाश हो तो मायाशक्ति को ही कल्पना करने
वाली मान लो। इसका दृष्टान्त देखना चाहो तो ऐन्द्रजालिक
की शक्ति को देख लो [ऐन्द्रजालिक में रहने वाली जो मणि-
मन्त्रादिरूपी माया शक्ति होती है, वह गन्धर्वनगर आदि की
कल्पना कर डाला करती है। क्या यह बात हम लोक में नहीं
देखते हैं?]
शक्तिः शक्तात् पृथङ् नास्ति तद्वद् दृष्टे, र्न चाभिदा ।
प्रतिबन्धस्य दृष्टत्वाच्छक्त्यभावे तु कस्य सः ॥११॥
शक्ति शक्ति वाले से भिन्न नहीं है क्योंकि ऐसा ही [अभिन्न
होना ही] देखा जाता है। शक्ति शक्ति वाले से अभिन्न भी नहीं
है क्योंकि [अकेली] शक्ति का प्रतिबन्ध देखने में आता है।
यदि शक्ति [उससे पृथक्] कोई चीज नहीं है तो बताओ कि
यह प्रतिबन्ध किस वस्तु का होता है ?
प्रश्न यह है कि—आनन्दात्मा से भिन्न माया को मानें तो
द्वैत मानना पड़ता है। इसका उत्तर हमें यह देना है कि वह
माया तो अनिर्वचनीय होने से अनृत है। इसीसे द्वैत नहीं बनता।
देखलो कि लौकिक अग्नि आदि की शक्तियों को भी भिन्न या