पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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में से लाया ही नहीं जा सकता। अब यदि भेद को औपाधिक
मानें, अर्थात् गन्धादि को ग्रहण करने वाली घ्राणादि इन्द्रियों के
भेद से ही, उन गन्धादि में भी भेद मान लें तब तो ठीक उसी
तरह वृत्ति भेद के कारण [ क्रमानुसार चित् और आनन्द को
अभिव्यक्त करने वाली राजस और सात्विक वृत्तियों के भिन्न
भिन्न होने से ] उन चिदानन्दों का भी औपाधिक भेद हो ही
जायगा।
सत्ववृत्तौ चित्सुखैक्यं तद्वृत्तेर्निर्मलत्वतः ।
रजोवृत्तेस्तु मालिन्यात् सुखांशोऽत्र तिरस्कृतः॥७८॥
[चित् और आनन्द की एकता देखनी हो तो सात्विक
वृत्तियों में देखो] पुण्य कर्मों के प्रताप से जब बुद्धिवृत्ति का
सात्विक परिणाम होता है तब चित् और आनन्द की एकता
भासने लग पड़ती है। क्योंकि सात्विक वृत्तियें निर्मल होती
हैं। [इन दोनों के भेद के भासने का कारण भी सुन लो कि]
रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण इनमें सुखभाग दीखना
बन्द हो जाता है। [तब भूल से यह समझा जाता है कि हम
चित् ही चित् हैं सुख हम में है ही नहीं, सुख तो कहीं से लाना होगा]
तिंतिणीफल मत्यम्लं लवणेन युतं यदा।
तदाम्लस्य तिरस्कारा दीषदम्लं यथा तथा ॥७९॥
[होता हुआ भी सुखभाग कैसे ढक जाता है ? क्यों नहीं
दीखता ? इसके लिये दृष्टान्त देख लो] जैसे कि इमली का फल
बहुत खट्टा होता है, जब उसमें नमक मिला दिया जाता है तब
उसकी खटाई छिप जाती है और बहुत कम हो जाती है।
इसी प्रकार रजोवृत्तियों में भी आनन्द का तिरोभाव हो जाता है।