सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

४२८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF
४२८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
यति, न मे गृहवार्तां पृच्छति, न मत्पक्षान्प्रत्यवेक्षते, न मामासन्नकार्य्ये-
ष्त्वभ्यन्तरीकरोति, न मामन्तःपुरं प्रवेशयति । अपि च मामनर्हेषु कर्मसु
नियुङ्क्ते, मदास नमन्यैरवष्टभ्यमानमनुजानाति, मद्वैरिषु विश्रम्भं दर्शयति,
मदुक्तस्योत्तरं न ददाति, मत्समानदोषान्विगर्हति, मर्मणि मामुपहसति,
स्वमतमपि मया वर्ण्यमानं प्रतिक्षिपति, महार्हाणि वस्तूनि मत्प्रहितानि
नाभिनन्दति, नयज्ञानां स्खलितानि मत्स समक्षं मूर्खैरुद्धोषयति । सत्य-
माह चाणक्यः—'चित्तज्ञानानुवर्तिनोऽनर्था अपि प्रियाः स्युः । दक्षिणा
अपि तद्भावबहिष्कृता द्वेष्या भवेयुः' इति । तथापि का गतिः । अविनी-
तोऽपि न परित्याज्यः पितृपैतामहैरस्माद्दृशैरयमधिपतिः । अपरित्यज-
न्तोऽपि कम्पुपकारमश्रूयमाणवाचः कुर्मः । सर्वथा नयज्ञस्य वसन्तभानो-
दोषान् । चित्तज्ञानेत्यादि—अनर्था अपि यदि दुर्जनानां स्वमतानुकूलाः स्युस्तर्हि
प्रिया एव । दक्षिणा अनुकूलाः सरला वा यदि तद्भावविरुद्धातदा तेऽपि द्वेष्याः
स्युरित्यर्थः । तथापि एवं सत्यपि । का गतिः—उपायान्तरं नास्तीत्यर्थः । पितृपैता-
महैः पितृपितामहक्रमागतैः । न श्रूयमाणा वाक् येषां ते— वयमिति शेषः । अपि-
ही पूछते न हमारे उपकारों की ओर ध्यान ही देते हैं । यहां तक कि हमारे पक्ष-
पातियों की ओर भी विरक्ति दिखाते हैं । हमारे भरोसे अपना कोई विशेष कार्य भी नहीं
सौंपते । अन्तःपुरमें भी अब कभी नहीं भेजते हैं। हमें वे सर्वथा अयोग्य समझते हैं। दूसरे
लोग हमारे अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं तो वे अपनी मौन भाषा से मानो उसकी
स्वीकृति दे देते हैं—ऐसा भासता है। वे हमारे शत्रुओं की बातों पर विश्वास करने लगे हैं ।
यदि हम कुछ कहते हैं तो उसका उत्तर ही नहीं देते । हमारे निर्दोष मित्रों की निन्दाएँ
हमारे समक्ष करते हैं। हमारी रहस्यभरी मार्मिक बातें कह कर हमारी हँसी उड़ाते हैं।
यदि कभी हम अपना विचार दर्शाते हैं तो वे उसके विरुद्ध ही बोलते हैं। यदि हम
बहुमूल्य वस्तुओं का उपहार भी उनके समीप प्रेषित करते हैं तो वे उसे विनम्रता से स्वीकार
तक नहीं करते हैं। प्रख्यात-प्रख्यात नीतिज्ञों के वाक्यों को वे हमारे समक्ष मूर्खों का प्रलाप
बतलाते हैं । महानीतिज्ञ चाणक्य ने उचित ही कहा है कि मनोभिलाष के अनुकूल
अनुसरणकर्ता दुराचारी भी राजाओं के प्रियपात्र हो जाते हैं तथा मनोभिलाष के अननुकूल
चलनेवाले प्रियजन भी उनके अप्रिय हो जाते हैं। अतः अब क्या किया जाय ? ये
महाराज चाहे जैसे भी उद्धण्ड हों परन्तु अपने पिता-पितामहादि से सेवित हैं तथा हमारे
स्वामी भी हैं इसलिए उन्हें त्याग भी नहीं सकते हैं। परन्तु, न त्यागने पर भी यदि
हम इनकी कोई आज्ञा न मानेंगे तो इनका उपकार भी न होगा। मालूम होता है यह
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४२६
रश्मकेन्द्रस्य हस्ते राज्यमिदं पतितम्। अपि नामापदो भाविन्यः
प्रकृतिस्थमेनमापादयेयुः। अनर्थेषु सुलभव्यलीकेषु कचिदुत्पन्नोऽपि
द्वेषः, सद्वृत्तमस्मै न रोचयेत् । भवतु भविता तावदनर्थः। स्तम्भित-
पिशुनजिह्वो यथाकथंचिदभ्रष्टपदस्तिष्ठेयम् इति ।
(१७) एवं गते मन्त्रिणि, राजनि च कामवृत्ते, चन्द्रपालितो नामा-
श्मकेन्द्रामात्यस्येन्द्रपालितस्य सूनुः, असद्वृत्तः पितृनिर्वासितो नाम
भूत्वा, बहुभिश्चारणगणैर्बहीभिरनलपकौशलाभिः शिल्पकारिणीभिरनेक-
च्छन्नकिंकरैश्च गूढपुरुषैः परिवृतोऽभ्येत्य विविधाभिः क्रीडाभिर्विहारभद्र-
मात्मसादकरोत् । अमुना चैव संक्रमेण राजन्यास्पदमलभत । लब्धर-
नामेति सम्भावनायाम् । आपादयेयुः कुर्युः। सुलभं व्यलीकमपराधो येषु, तेषु ।
स्तम्भिता पिशुनानां खलानां जिह्वा येन सः। अभ्रष्टपदः अनष्टाधिकारः ।
(१७) कामवृत्ते यथेच्छाचारे । पितृनिर्वासितो नाम भूत्वा—असद्वृत्त इति
हेतोः पित्रा निर्वासितो राज्यान्निष्काशित इतिच्छद्मना । नामेत्यलीके । शिल्प-
कारिणीभिश्चित्रकारिणीभिः । आत्मसात् स्ववशीभूतम् । अमुना विहारभद्रेण सह ।
संक्रमेण सम्मेलनेन । राजनि नृपेऽनन्तवर्मण्यपि । आस्पदं स्थानं प्रतिष्ठामिति
साम्राज्य अब नीतिज्ञ महाराज अश्मकेश्वरके अधीन हो जायगा। क्या भविष्यत्में आने-
वालो आपत्तियां इन्हें सुधारेंगी ? । जो लोग अनायास विपत्ति मोल लेते हैं उनमें यदि
अपराधके चिह्न प्रत्यक्ष दिखाई भी देने लगें तो भी वे उन्हें नहीं देखते। अतएव
निःसन्देह अब कोई न कोई आपत्ति अवश्य आवेगी। जो भी हो, हमारा कर्त्तव्य अब यही
है कि हम अपनी जीभमें ताला लगाकर अपने पदों पर आरूढ़ रहें।
(१७) इस रीतिसे विचार कर जब मन्त्री तटस्थ रह गये तब राजा स्वेच्छ्यापूर्वक
राजकार्य करने लगा । इस बात को देखकर अश्मकेन्द्रके सचिव इन्द्रपालितके दुराचारी पुत्र
चन्द्रपालितने, जो पिताके द्वारा गृहसे निष्कासित था, अनेक दूतों तथा वन्दीजनोंके द्वारा
नाना प्रकार के कौतूहलपूर्ण खेल दिखाकर एवं वेश्याओंकी कौशलपूर्ण कलाओं द्वारा
अनेक गुप्तचरोंके सहयोगसे उस राजाको वशीभूत कर लिया। विहारभद्र जब चन्द्र-
पालितके चंगुलमें पूर्णतया आ गया तब उसने उसी विहारभद्र राजारूपी सेतु (पुल) के
सहारे समस्त राज्यपद प्राप्त कर लिया। चन्द्रपालितने छिद्रोंके अन्वेषणसे जिन-जिन
दुर्व्यसनोंमें उन्हें फँसाया उन-उन दुर्व्यसनोंकी राजाने प्रचुर प्रशंसा की। उसने एकवार

४३० दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
न्ध्रश्च स यद्यद्व्यसनमारभते तत्तथेत्यवर्णयत्—'देव, यथा मृगया ह्यौप-
कारिकी न तथान्यत् । अत्र हि व्यायामोत्कर्षादापत्सूपकर्ता दीर्घाध्वल-
ङ्घनक्षमो जङ्घाजवः, कफापचयादारोग्यैकमूलमाशयाग्निदीप्तिः, मेदोपक-
र्षादङ्गानां स्थैर्यकार्कश्यतिलाघवादीनि, शीतोष्णवातवर्षक्षुत्पिपासासह्-
त्वम्, सत्त्वानांमवस्थान्तरेषु चित्तचेष्टितज्ञानम्, हारिणगवलगवयादि-
वधेन सस्यलोपप्रतिक्रिया, वृकव्याघ्रादिघातेन स्थलपथशल्यशोधनम् ,
शैलाटवीप्रदेशानां विविधकर्मक्षमाणामालोचनम् , आटविकवर्गविश्रम्भ-
णम् , उत्साहशक्ति-संधुक्षणेन प्रत्यनीकवित्रासनमिति बहुतमा गुणाः ।
यावत् । व्यसनं मृगयादिकम्—स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुण्यार्थदूषणे । दण्ड-
पारुष्यमित्येतन्महाव्यसनसप्तकमिति वैजयन्ती । तथा युक्तम् । औपकारिकी उप-
कारायार्हा । अत्र मृगयायाम् । जङ्घाजवो जङ्घावेगः । कफस्य श्लेष्मणः अपचयात्
क्षयात् । आरोग्यस्यैकमद्वितीयं मूलं निदानम् आशयाग्नेर्दीप्तिः सन्धुक्षणम् ।
मेदसां भाषायां चर्बीति ख्यातानां धातुविशेषाणाम् अपकर्षादपचयात् । सत्त्वानां
प्राणिनाम् । अवस्थान्तरेषु अवस्थाविशेषेषु । गवलो महिषः । गवयो गोसदृशः
पशुः । सस्यलोपप्रतिक्रिया सस्यरक्षा । वृकः 'हुड़ार' इति भाषा । स्थलपथेति-
स्थलपथस्य शल्यानां कण्टकभूतानां शोधनमपनयनम् । शैलाटवीति—पार्वत्य-
वनभूमिषु बहवः प्रदेशा निरर्थकास्तिष्ठन्ति तेषां सार्थकीकरणम् । आटविका
आरण्यकाः । निश्रम्भं विश्वासोत्पादनम् । प्रत्यनीकः शत्रुः ।
महाराजसे कहा—आखेटसे जितने उपकार होते हैं उतने दूसरे से नहीं होते हैं । देखिये,
आखेटसे व्यायाम होता है अतः शरीर में बल बढ़ता है । शरीरमें बल रहने पर किसी
समय आपत्ति आने पर मनुष्य आत्मरक्षा कर सकता है । जांघोंमें पैदल रास्ता समाप्त
करनेकी शक्ति आती है । कफ दबा रहता है अतः उदराग्नि उद्दीपित रहती है । मेद
( चर्बी ) के न बढ़नेसे अङ्ग-प्रत्यङ्ग फुर्तीले रहते हैं । शीत-वायु-उष्ण-भूख-प्यास आदि
सहन करनेकी शक्ति रहती है-एवं हर एक प्राणीके मनोभाव ज्ञात करनेका ज्ञान प्राप्त
होता है । हिरण-साँभर आदि पशुओंको मार देनेसे खेतोंके अन्नोंकी चर जानेसे रक्षा होत
हैं । सिंह-भेड़ियों आदि चौपायोंके मारनेसे स्थलमार्ग निष्कण्टक हो जाता है । स्थल
मार्ग साफ रहनेसे मनुष्य निर्भय होकर पर्वत-अरण्योंमें घूमकर नदियोंकी सैर कर सकते
हैं जिनसे ज्ञानवृद्धिके साथ भौगोलिक एवं भौतिक वस्तुओंका भी बोध होता है यथा यह भी
विदित हो जाता है कि अमुक स्थान अमुक जगह है । बार-बार आवागमनसे बनैले
पशुओंको उस शिकारीके प्रति मनमें प्रतीति हो जाती है अतः फिर वे कष्ट भी नहीं देते ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF
अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४३१
( १८) द्यूतेऽपि द्रव्यराशेस्तृणवत्त्यागादनुपमानमाशयौदार्यम्,
जयपराजययानवस्थानाद्धर्षविषादयोरविधेयत्वम्, पौरुषैकनिमित्तस्याम-
र्षस्य वृद्धिः, अक्षहस्तभूम्यादिगोचराणामत्यन्तदुरुपलक्ष्याणां कूटकर्म-
णामुपलक्षणादनन्तबुद्धिनैपुण्यम्, एकविषयोपसंहाराच्चित्तस्यातिचित्र-
मैकाग्रथम्, अध्यवसायसहचरेषु साहसेष्वरतिः, अतिकर्कशपुरुषप्रतिसं-
सर्गादनन्यधर्षणीयता मानावधारणमकृपणं च शरीरवापनमिति ।
( १६) उत्तमाङ्गोपभोगेऽप्यर्थधर्मयोः सफलीकरणम्, पुष्कलः
पुरुषाभिमानः, भावज्ञानकौशलम्, अलोभक्लिष्टमाचेष्टितम्, अखिलासु
( १८) अनुपमानमतुलनीयम् । आशयस्य चिंदौचित्तस्यम् । जयपराजययोः
अनवस्थानात् अनिश्चितत्वात् । अविधेयत्वम् अवशीभूतत्वम् । एकस्मिन् विषये
उपसंहारात् अभिनिवेशात् । एकाग्रस्य भाव एकाग्रथम् । साहसेषु साहसकर्मसु
अरतिः अप्रीतिः । अनन्यधर्षणीयता अन्यानभिभवनीयता । अकृपणं दैन्यरहितम्,
शरीरवापनं शरीरधारणम् ।
( १९) पुष्कलः अतिशोभनः । अलब्धोपलब्धीत्यादि—अलब्धस्य वस्तुनो
लब्धिर्लाभः, लब्धस्य अनुरक्षणं पालनं, रक्षितस्योपभोगः, भुक्तस्यानुसन्धानं
स्मरणं, रुष्टस्य क्रुद्धस्य च अनुनयः समाधानमित्यादिषु विषयेषु अजस्रं निरन्तरम्
आखेटसे उत्साहशक्ति भी बढ़ती जाती है जिससे रिपुगणोंमें भय उत्पन्न करनेके अनेक
तरीके ज्ञात हो जाते हैं।
(१८) इसी रीतिसे द्यूत-क्रीडासे भी संसारकी सभी वस्तुओंको तृणके सदृश त्यागने
की शक्ति प्राप्त होती है। जय-पराजयका भी कोई निश्चय नहीं रहता कि कौन कब
विजित होगा अथवा किसकी कब जय होगी ? जुआ खेलने वाला हर्ष-विमर्षके विषादोंसे
दूर रहता है। इससे पौरुष बढ़ानेवाले अमर्षकी उत्पत्ति होती है। जुआ खेलनेसे हस्त-
कौशल आदि पाण्डित्य का अनुभव होता है। ये बातें ऐसे जानना अति कठिन है। बुद्धिमें
नैपुण्य आता है। एक ही कार्यमें मन लगानेसे मनमें आश्चर्यसे एकाग्रता-स्रोत उत्पन्न होता
है। उद्योगके सहायक कामोंमें बुद्धिकी लगन बढ़ती है। जुआ खेलनेमें एकसे एक कठोर
पुरुषोंका संपर्क हो जाता है जिससे मन इतना दृढ़ हो जाता है कि किसीके विचलित
करने पर भी विचलित नहीं होता है। जुआ खेलने से स्वाभिमानका भाव उदय होता है
एवं दीनतारहित जीवन व्यतीत करनेकी क्षमता आती है। अतः जुआ खेलना श्रेयस्कर है।
(१९) इसी प्रकारसे अच्छी-अच्छी अंगनाओंके साथ रमण करनेसे भी धर्म और
अर्थकी प्राप्ति होती है, जीवन सफल होता है। ऐसा करनेसे प्रबल पौरुषाभिमान बढ़ता है।
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu