सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

४४२ | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां

४४२ | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां
भर्तुर्द्वैमातुराय भ्रात्रे मित्रवर्मणे सापत्न्या देवी दर्शिताभूत् । तां चार्याम-
नार्योऽसावन्यथाभ्यमन्यत । निर्भत्सितश्च तया 'सुतमियमखण्डचारित्रा
राज्यार्हं चिकीर्षति' इति नैर्घृण्यात्तमेनं बालमजिघांसीत् । इदं तु ज्ञात्वा
देव्याहमाज्ञप्तः—'तात, नालीजङ्घ, जीवतानेनार्भकेण यत्र क्वचिदवधाय
जीव । जीवेयं चेदहमप्येनमनुसरिष्यामि । ज्ञापय मां क्षेमप्रवृत्तः स्ववा-
र्ताम्' इति । अहं तु संकुले राजकुले कथंचिदेनं निर्गमय्य विन्ध्याटवीं
व्यगाहिषि । पादचारिणं चैनमाश्वासयितुं घोषे क्वचिदहानि कानिचिद्वि-
श्रमय्य, तत्रापि राजपुरुषसंपातभीतो दूराध्वमपासरम् । तत्रास्य दारुण-
पिपासापीडितस्य वारि दातुकामः कूपेऽस्मिन्नपभ्रश्य पतितस्त्वयैवमनुगृ-
हीतः। त्वमेवास्यातः शरणमेधि विशरणस्य राजसूनोः' इत्यञ्जलिमबध्नात् ।
अपसर्पन् पलायमानः । भर्तुः पत्युर्द्वैमातुराय वैमात्रेयभ्रात्रे । आर्यां सुचरित्राम् ।
अन्यथा दुश्चरित्रामित्यर्थः । अखण्डचारित्रा अक्षतचरित्रा । राज्यार्हं राज्यप्राप्ति-
योग्यम् । इति हेतोः नैर्घृण्यात् निष्करुणत्वात् । अजिघांसीत् हन्तुमैच्छत् ।
सन्नन्ताद् हन्धातोलूँङ् । अहम्—अस्येतिवृत्तस्य वक्ता वृद्धो नालीजङ्घनामा । अव-
धाय व्यवहितो भूत्वा । संकुले जनाकीर्णे । व्यगाहिषि प्राविक्षम् । घोषे आभीरप-
ल्ल्याम् । विश्रमय्य विश्रामं कारयित्वा । तत्रापि घोषेऽपि । राजपुरुषेति-राजपुरु-
षाणां सम्पातात् आगमनाद् भीतः शङ्कितः । दूराध्वं दूरमार्गम् । अपभ्रश्य भ्रष्टो
भूत्वा त्वया विश्रुतेनेत्यर्थः । अतः अस्मात्परम् । विशरणस्य शरणरहितस्य ।
एधि भव । अस् धातोर्लोटि रूपम् ।
ने अपने सौतले भाई की हत्या नृशंसतापूर्वक करानी चाही। परन्तु जब महारानी को
यह बात ज्ञात हुई तो उन्होंने नालीजंघ से कहा—'हे नालीजंघ ! तुम उस बालक को कहीं
ले जाकर छिपा दो और इसी के साथ तुम भी छिपकर रहो। यदि मैं जीवित रह जाऊँगी
तो तुम लोंगों से मिलूँगी अन्यथा हरिइच्छा । यहां से जाकर जहां पर तुम रहो उसकी
सूचना गुप्त रीति से मेरे समीप भेज देना तथा कुशल वृत्त भी भेज देना ।'
महारानी की आज्ञानुसार हम सब बालक को साथ लेकर राजदरवार से बाहर होकर
विन्ध्याचल के सघन वनों में जाकर छिप गये। पैदल चलने के कारण थके हुए
बालक का श्रम मिटाने के लिए हम लोग कई दिनों तक एक ग्वाले की गोशाला में जाकर
रहे। किन्तु, वहां पर राजपुरुषों के आने की आशंका थी अतः वहां से हम आगे चल पड़े।
मार्ग में इस बालक को बड़ी तेजी से प्यास लगी । अतः जल लेने के लिए इस कूप पर
हम आये और इसमें गिर पड़े। बड़ी दया करके आपने हमें इसमें से निकाल लिया

अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४३
( २८ ) 'किमीया जात्यास्य माता' इत्यनुयुक्ते मयामुनोक्तम्-'पाट-
लिपुत्रस्य वणिजो वैश्रवणस्य दुहितरि सागरदत्तायां कोसलेन्द्रात्कुसुम-
धन्वनोऽस्य माता जाता' इति । 'यद्येवमेतन्मातुर्मत्पितुश्चैको मातामहः'
इति सस्नेहं तमहं सस्वजे । वृद्धेनोक्तम्-'सिन्धुदत्तपुत्राणां कतमस्ते
पिता' इति । 'सुश्रुतः' इत्युक्ते सोऽत्यहृष्यत् । अहं तु 'तं नयावलिप्तम-
श्मकनयेनैवोन्मूल्य बालमेनं पित्र्ये पदे प्रतिष्ठापयेयम्' इति प्रतिज्ञाय
'कथमस्यैनां क्षुधं क्षपयेयम्' इत्यचिन्तयम् । तावदापतितौ च कस्यापि
व्याधस्य त्रीनिषूनतीत्य द्वौ मृगौ स च व्याधः । तस्य हस्तादवशिष्ट-
( २८ ) किमीया जात्येति-कस्येयमिति किमीया कस्या जातेरुत्पन्नेत्यर्थः ।
अनुयुक्ते पृष्टे । मया विश्रुतेनेत्यर्थः । अमुना नालीजङ्घेन । तं बालकम् । सिन्धु-
दत्तेति सिन्धुदत्तस्य बहवः पुत्रास्तेषु तव पिता कतमः किंनामक इति । तम्
अश्मकेन्द्रम् । नयावलिप्तम् नीतिगर्वितम् । अश्मकनयेन पाषाणोन्मूलनन्यायेन ।
अश्मकमिति पाठे तु नयेन नीत्येति सम्बन्धः अस्य बालस्य । क्षुधं क्षुधाम् ।
क्षपयेयम् नाशयेयम् । तावत्-एतस्मिन्नन्तरे । त्रीन् इषून् बाणत्रयमित्यर्थः ।
जिससे हमारे प्राण बच गये । अब इस अनाथ राजकुमार के आप ही संरक्षक हैं, आप ही
इसे पालें ।' इतना कह कर वह खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर तकने लगा ।
( २८ ) हमने पूछा-'यह बालक किस जाति का है ?' तब उसने उत्तर दिया-
'पाटलिपुत्र के वैश्य वैश्रवण की पुत्री सागरदत्ता के साथ कोशल देश के स्वामी महाराज
कुसुमधन्वा का संसर्ग होने पर इसकी माता का जन्म हुआ था।' इस बात को श्रवण कर
हमने कहा- 'तब तो इसकी माता और हमारे पिता दोनों के मातामह एक ही थे।'
बस, हमने उस बालक को छाती से लगा लिया । वृद्ध ने पूछा-'सिन्धुदत्त के पुत्रों में
से कौन व्यक्ति आपके पिता थे ।' हमने कहा- 'सुश्रुत' यह बात श्रवण कर वह परम
मुदित हो गया । तब हमने मन ही मन में प्रतिज्ञा की कि 'मैं इस नीति से दर्पित अश्मक
देश के स्वामी को नीति की शक्ति से नष्ट कर डालूंगा तथा इस बालक को इसके पिता के
सिंहासन पर अवश्य बैठाऊँगा।' उसी समय दो हिरण दौड़ते हुए हमारे पास आये ।
वे एक बहेलिये के तीन बाणों से बचकर भाग निकले थे । उसी समय वह व्याध भी
वहाँ पर आकर उपस्थित हो गया । उसके पास दो बाण और भी शेष बचे थे । बस हमने
उससे धनुष-बाण ले लिए और उन मृगों पर चला दिये । उनमें से एक की देह पर वह
बाण ऊपर लगे हुए पक्ष तक छिद गया तथा दूसरे की देह में हमारा बाण ऐसा छिदा
कि आर-पार कर गया । उन दोनों मृगों में से एक मृग हमने बहेलिये को दे दिया और
२६ द० कु० उ०
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu