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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

४३८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां

४३८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
हृत्य तत्साहसोपन्यासैः योग्यनारीहारितानां संकेतेषु प्रागुपनितीय
पश्चादभिद्रुत्याकीर्तनीयैः प्रमापणैः, उपप्रलोभ्य बिलप्रवेषेषु निधानखन-
नेषु च विघ्नव्याजसाध्यैर्ध्यापादनैः, मत्तगजाधिरोहणाय प्रेर्य प्रत्यवाय-
निर्वर्तनैः, व्यालहस्तिनं कोपयित्वा लक्ष्यीकृतमुख्यमण्डलेष्वपक्रमणैः,
दायाद्यर्थे विवदमानानुपांशु हत्वा प्रतिपक्षेष्वयशःपातनैः, सामन्तपुर-
जनपदेष्वयथावृत्तानप्रकाशमभिप्रहृत्य तद्वैरिनामघोषणैः, योग्याङ्गनाभि-
रहर्निशमभिरमय्य राजयक्ष्मोत्पादनैः, वस्त्रामरणमाल्याङ्गरागादिषु रसवि-
साहसोपन्यासैः साहसोत्पादनैः । योग्यनारीति-योग्याभिनारीभिर्हारितानामाकर्षि-
तानां सङ्केतेषु सङ्केतस्थानेषु प्राक् प्रथममुपनिलीय प्रच्छन्नो भूत्वा पश्चादभिद्रुत्य
धावित्वा अकीर्त्तनीयैर्निन्दनीयैः प्रमापणैर्मारणैः । प्रत्यवायनिर्वर्तनैः हिंसोत्पा-
दनैः । व्यालहस्तिनं दुष्टगजम् । अपक्रमणैः प्रेरणैः । दायाद्यर्थे धनादिविषये ।
अयथावृत्तान् असद्वृत्तान् । राजयक्ष्मा रोगविशेषः । रसविधानकौशलैः विष-
प्रदानचातुर्यैः । चिकित्सामुखेन चिकित्साच्छलेन । आमयोपबृंहणैः रोगवर्धनैः ।
प्रलोभन देकर सैनिकों सहित अधिकारियों को ले जाकर धोखा दे कर वहीं समाप्त कर
देते। कभी-कभी वे लोग अमुक वनमें अमुक सिद्ध रहता है, उससे सारी मनोकामनाओं
की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ऐसा कहकर राज्यके वीरों तथा अधिकारियों को ले जाते
और वहाँ पर मन्त्र-तन्त्रका ढोंग दिखाकर शनैः शनैः उन लोगों की इहलीला समाप्त कर
देते। कभी-कभी किसी-किसी को किसी मतवाले हाथी पर चढ़ा देते और ऊपर-ऊपर उस
मतवाले हाथी को सम्हालने का प्रदर्शन दिखाते तथा भीतर से उसे भड़का देते जिससे
वह बिगड़कर उस वीर को ही मार डालता। कभी-कभी वे लोग किसी हाथी को मतवाला
करके क्रोधित बना देते और भीड़ में उस ओर भगाते जिधर राज्याधिकारी खड़े रहते।
बस, वह मतवाला-आगबबूला उन्मत्त हाथी उन सभी को रौंदकर मार देता। राजा के
वंश वालों में पुराने झगड़े का आपसी मनमुटाव जानकर वे लोग उनमें से एक पक्ष के
लोगों को मार डालते और उनके मारने के आरोप दूसरे पक्ष वालों पर प्रसिद्ध करके
और भी लड़ाई बढ़ा देते। कभी-कभी वे लोग धनिकों की बस्तियों में जाकर दुराचारी
गुण्डों को मार डालते और इस बात की प्रसिद्धि कर देते कि उनको मारने वाले शत्रुगण
वे ही धनिकगण हैं जिससे दुराचारी वर्ग कुपित हो धनिकों-कुलीनों पर चढ़ाई कर
बैठता था। कभी-कभी किसी रोगिणी महिला के साथ वीरों का धोके से सम्बन्ध कराकर
उन्हें आजीवन रोगी-क्षय आदि रोगों का सर्टिफिकेट दिला देते। कभी-कभी वीरों को
वे लोग तेल, फल, फूल, इत्र, वस्त्र, आभूषण विषाक्त पदार्थों से युक्त दे देते जिनका

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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४३६
धानकौशलैः, चिकित्सामुखेनामयोपबृंहणैरन्यैश्चाभ्युपायैरश्मकेन्द्रप्रयुक्ता-
स्तीक्ष्णरसदायः प्रक्षपितप्रवीरमनन्तवर्मकटकं जर्जरमकुर्वन् ।
( २५ ) अथ वसन्तभानुर्भानुवर्माणं नाम वानवास्यं प्रोत्साह्यान-
न्तवर्म्मणा व्यग्राहयत् । तत्परामृष्टराष्ट्रपर्यन्तञ्चानन्तवर्मा तमभियोक्तुं बल-
समुत्थानमकरोत् । सर्वसामन्तेभ्यश्चाश्मकेन्द्रः प्रागुपेत्यास्य प्रियतरोऽ-
भूत् । अपरेऽपि सामन्ताः समगंसत । गत्वा चाभ्यर्णे नर्मदारोधसि
न्यविशन् । तस्मिंश्चावसरे महासामन्तस्य कुन्तलपतेरवन्तिदेवस्यात्म-
नाटकीयां क्ष्मातलोर्वशीं नाम चन्द्रपालितादिभिरतिप्रशस्तनृत्यकौशला-
माहूयानन्तवर्मा नृत्यमद्राक्षीत् । अतिरक्तश्च भुक्तवानिमां मधुमत्ताम् ।
तीक्ष्णरसं विषं ददातीति तीक्ष्णरसद्ः स आदिर्येषां ते । प्रक्षपिता विनाशिताः
प्रवीरा योधा यस्य तत् । जर्जरं शिथिलम् ।
( २५ ) वसन्तभानुः अश्मकेन्द्रः । वानवास्यो वनप्रदेशाधिपतिः । व्यग्राहयत्
विग्रहं कारितवान् । तत्परामृष्टेति-तेन वानवास्येन परामृष्टो गृहीतो राष्ट्रस्य स्वरा-
ज्यस्य पर्यन्तः प्रान्तभागो यस्य सः । तम् अश्मकेन्द्रम् । सर्वसामन्तेभ्य इत्यत्र
पञ्चमीविभक्तिः । अस्य वानवास्यस्य । समगंसत मिलिता अभवन् । अभ्यर्णे
समीपवर्त्तिनि । नर्मदारोधसि नर्मदातीरे । आत्मनाटकीयां स्वनर्त्तकीम् । मधुमत्तां
मद्यपानप्रमत्ताम् ।
इस्तेमाल करते ही वे लोग मर जाते थे। इस रीति से अश्मकेश के द्वारा प्रेषित राजदूतों
ने गुप्तारूपेण तीक्ष्ण विषाक्त रसों से तथा कुटिल नीतियों से अनेक धोखेवाली चालों से
अनन्तवर्मा के समस्त सैन्य-बल को एवं राज्याधिकारी समुदाय को जर्जर बनाकर नष्ट
भ्रष्ट कर दिया ।
( २५ ) तत्पश्चात्—वसन्तभानु ने भीलों के अधिपति भानुवर्मा को उभाड़ कर
अनन्तवर्मासे लड़ा दिया । अनन्तवर्माने सम्पूर्ण राष्ट्रकी शक्ति भानुवर्माको पराजित करनेमें
लगा दी । इधर अपने सभी सामन्तों को साथ लेकर वसन्तभानु अनन्तवर्मा से मिल गया
और उसे हाथमें करके उसका प्रियपात्र हो गया । तब अन्य सामन्तगण भी अनन्तवर्मा की
सहायता करने आ गये । सभी सामन्तों ने रेवा नदी के पुण्य तट पर अपनी छावनियाँ
फेंकीं । उस समय वहाँ पर महासामन्त कुन्तलदेशाधिपति अवन्तिदेवकी रङ्गशालाओं
बनायीं वेश्या नर्तन कर रही थी। वह वेश्या सुन्दरता में भूतल पर उर्वशी के समान
थी । अनन्तवर्मा उसका नृत्य देखने में तल्लीन था । चन्द्रपालित आदि भी उसी के समीप
बैठे हुए थे । मधुपान करके मदोन्मत्त होकर उस समय वे सब उस पर आसक्त हो रहे
थे । उसी समय अश्मकेश ने कुन्तलपति अवन्तिदेव को अलग एकान्त में ले जाकर कहा—