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सर्वकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४२६
रश्मकेन्द्रस्य हस्ते राज्यमिदं पतितम्। अपि नामापदो भाविन्यः
प्रकृतिस्थमेनमापादयेयुः। अनर्थेषु सुलभव्यलीकेषु कचिदुत्पन्नोऽपि
द्वेषः, सद्वृत्तमस्मै न रोचयेत् । भवतु भविता तावदनर्थः। स्तम्भित-
पिशुनजिह्वो यथाकथंचिदभ्रष्टपदस्तिष्ठेयम् इति ।
(१७) एवं गते मन्त्रिणि, राजनि च कामवृत्ते, चन्द्रपालितो नामा-
श्मकेन्द्रामात्यस्येन्द्रपालितस्य सूनुः, असद्वृत्तः पितृनिर्वासितो नाम
भूत्वा, बहुभिश्चारणगणैर्बहीभिरनलपकौशलाभिः शिल्पकारिणीभिरनेक-
च्छन्नकिंकरैश्च गूढपुरुषैः परिवृतोऽभ्येत्य विविधाभिः क्रीडाभिर्विहारभद्र-
मात्मसादकरोत् । अमुना चैव संक्रमेण राजन्यास्पदमलभत । लब्धर-
नामेति सम्भावनायाम् । आपादयेयुः कुर्युः। सुलभं व्यलीकमपराधो येषु, तेषु ।
स्तम्भिता पिशुनानां खलानां जिह्वा येन सः। अभ्रष्टपदः अनष्टाधिकारः ।
(१७) कामवृत्ते यथेच्छाचारे । पितृनिर्वासितो नाम भूत्वा—असद्वृत्त इति
हेतोः पित्रा निर्वासितो राज्यान्निष्काशित इतिच्छद्मना । नामेत्यलीके । शिल्प-
कारिणीभिश्चित्रकारिणीभिः । आत्मसात् स्ववशीभूतम् । अमुना विहारभद्रेण सह ।
संक्रमेण सम्मेलनेन । राजनि नृपेऽनन्तवर्मण्यपि । आस्पदं स्थानं प्रतिष्ठामिति
साम्राज्य अब नीतिज्ञ महाराज अश्मकेश्वरके अधीन हो जायगा। क्या भविष्यत्में आने-
वालो आपत्तियां इन्हें सुधारेंगी ? । जो लोग अनायास विपत्ति मोल लेते हैं उनमें यदि
अपराधके चिह्न प्रत्यक्ष दिखाई भी देने लगें तो भी वे उन्हें नहीं देखते। अतएव
निःसन्देह अब कोई न कोई आपत्ति अवश्य आवेगी। जो भी हो, हमारा कर्त्तव्य अब यही
है कि हम अपनी जीभमें ताला लगाकर अपने पदों पर आरूढ़ रहें।
(१७) इस रीतिसे विचार कर जब मन्त्री तटस्थ रह गये तब राजा स्वेच्छ्यापूर्वक
राजकार्य करने लगा । इस बात को देखकर अश्मकेन्द्रके सचिव इन्द्रपालितके दुराचारी पुत्र
चन्द्रपालितने, जो पिताके द्वारा गृहसे निष्कासित था, अनेक दूतों तथा वन्दीजनोंके द्वारा
नाना प्रकार के कौतूहलपूर्ण खेल दिखाकर एवं वेश्याओंकी कौशलपूर्ण कलाओं द्वारा
अनेक गुप्तचरोंके सहयोगसे उस राजाको वशीभूत कर लिया। विहारभद्र जब चन्द्र-
पालितके चंगुलमें पूर्णतया आ गया तब उसने उसी विहारभद्र राजारूपी सेतु (पुल) के
सहारे समस्त राज्यपद प्राप्त कर लिया। चन्द्रपालितने छिद्रोंके अन्वेषणसे जिन-जिन
दुर्व्यसनोंमें उन्हें फँसाया उन-उन दुर्व्यसनोंकी राजाने प्रचुर प्रशंसा की। उसने एकवार