पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१
स्वस्मिन् मृतेऽपि पुत्रादिर्जीवेद् वित्तादिना यथा ।
तथैव यत्नं कुरुते मुख्याः पुत्रादयस्ततः ॥३८॥
देखा जाता है कि-अपने मर जाने पर भी पुत्र पत्नी
आदि, क्षेत्र आदि सम्पत्ति के द्वारा जैसे जीते रहें, वैसा यत्न
यह प्राणी किया करता है। इससे यही सिद्ध होता है कि-
पुत्र भार्या आदि ही मुख्य हैं [क्योंकि अपना प्रयास सह सह-
कर भी पुत्रादि के जीवन का उपाय किया जाता है, इसी से
समझते हैं कि पुत्रादि ही प्रधान हैं।]
बाढमेतावता नात्मा शेषो भवति कस्यचित् ।
गौणमिथ्यामुख्यभेदैरात्मायं भवति त्रिधा ॥३९॥
इसका समाधान यह है कि-उक्त रीति से कहीं कहीं
पुत्रादि मुख्य तो होते हैं। परन्तु केवल इतनी सी बात से यह
आत्मा किसी का शेष नहीं बन जाता। गौण, मिथ्या तथा
मुख्य ये तीन भेद आत्मा के होते हैं। [सो जिस जिस व्यव-
हार में, जिस जिस तरह की आत्मता विवक्षित होती है,
उस-उस व्यवहार में उस-उस आत्मा की प्रधानता मानी
जाती है।]
देवदत्तस्तु सिंहोऽयमित्यैक्यं गौणमेतयोः ।
भेदस्य भासमानत्वात् पुत्रादेरात्मता तथा ॥४०॥
'यह देवदत्त तो शेर है' ऐसा जब कोई कहता है तब शेर
तथा देवदत्त इन दोनों की जो एकता भासती है वह गौण है।
क्योंकि इन दोनों का भेद तो प्रत्यक्ष ही प्रतीत होता रहता है।
इसी प्रकार भेद के प्रत्यक्ष प्रतीत होते रहने के कारण पुत्रादि
भी गौण आत्मा माने जा सकते हैं। [ मुख्य नहीं ]
४८२ पञ्चदशी
भेदोस्ति पंचकोशेषु साक्षिणो न तु भात्यसौ ।
मिथ्यात्मताऽतः कोशानां स्थाणोश्चौरात्मता यथा ॥४१॥
आनन्दमयादि जो पांच कोष हैं, वे यद्यपि साक्षी से भिन्न
हैं, परन्तु यह भेद किसी को भी भासता नहीं है। इस कारण
इन कोशों को मिथ्या आत्मा कहा जाता है। जो स्थाणु वस्तुतः
चोर से भिन्न है उस स्थाणु की चोररूपता जैसे मिथ्या होती
है [ऐसे ही ये पांच कोष भी मिथ्या आत्मा कहा सकते हैं]
न भाति भेदो नाप्यस्ति साक्षिणोऽप्रतियोगिनः ।
सर्वान्तरत्वात् तस्यैव मुख्यमात्मत्वमिष्यते ॥४२॥
अप्रतियोगी होने के कारण, साक्षी का भेद न तो है ही
और न प्रतीत ही होता है। सर्वान्तर होने के कारण उस साक्षी
को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
पुत्र या देह आदि का प्रतियोगी जैसे स्वयं होता है इस
प्रकार स्वयं का कोई भी (सच्चा) प्रतियोगी नहीं होता, [क्योंकि
देहादि सभी पदार्थ आरोपित हैं] इस कारण साक्षीरूप इस
आत्मा का, पुत्रादि गौण आत्माओं की तरह, किसी से भी भेद
प्रतीत नहीं होता है और न देहादि मिथ्या आत्माओं की तरह
किसी से भेद है ही। देह या पुत्रादि जितने भी मिथ्या आत्मा
या गौण आत्मा हैं, उन सभी से आन्तर होने के कारण इस
साक्षी को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
सत्येवं व्यवहारेषु येषु यस्यात्मतोचिता ।
तेषु तस्यैव शेषित्वं सर्वस्यान्यस्य शेषता ॥४३॥
यों आत्मा के तीन प्रकार का होने पर भी जिन व्यवहारों
में जिसको आत्मा होना चाहिये, उन व्यवहारों में वही आत्मा
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८३
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८३
प्रधान होता है। उससे भिन्न और दोनों तरह के आत्मा 'शेष'
किंवा 'गौण' हो जाते हैं।
आत्मा यद्यपि तीन प्रकार का है तो भी पालन में 'पुत्र'
'मुख्यात्मा' होता है। पोषण के समय 'देह' ही 'मुख्यात्मा'
माना जाता है। तथा ब्रह्मात्मत्व का अनुसन्धान करते समय
'साक्षी' को ही 'मुख्यात्मा समझा जाता है। जब इनमें से किसी
एक को 'मुख्यात्मा' माना जाता है तब उस समय वही एक
शेषी किंवा मुख्य होता है। उस समय उससे भिन्न और सबके
सब शेष अथवा अमुख्य हो जाते हैं।
मुमूर्षो गृहरक्षादौ गौणात्मैवोपयुज्यते ।
न मुख्यात्मा न मिथ्यात्मा पुत्रः शेषी भवत्यतः॥४४॥
गृहरक्षादि कामों में मुमूर्षु को गौणात्मा का ही उपयोग
हो सकता है। मुख्यात्मा या मिथ्यात्मा का नहीं। इस कारण
ऐसे कामों में पुत्र ही शेषी होता है।
देख लो कि—घर की रक्षा आदि जो काम हैं उनमें पुत्र
या भार्या आदि गौणात्माओं का ही उपयोग हो सकता है।
क्योंकि वे उस के बाद भी जीवित रहना चाहते हैं। अविकारी
होने के कारण मुख्य आत्मा [ जो साक्षी है घर की रक्षा में
उस ] का तो कुछ उपयोग ही नहीं हो सकता। मिथ्या आत्मा
[जो देह है वह] तो मरने को तैयार बैठा है। उससे भी घर
की रक्षा नहीं हो सकती। इस कारण ऐसे काम में पुत्र ही
'शेषी' किंवा 'मुख्यात्मा' हो सकता है।
अध्येता वह्निरित्यत्र सन्नप्यग्निर्न गृह्यते ।
अयोग्यत्वेन, योग्यत्वाद् बटुरेवात्र गृह्यते ॥४५॥
४८४ पञ्चदशी
'यह पढ़ने वाला तो अग्नि है' इस वाक्य में, पढ़ने के
अयोग्य होने के कारण [वहाँ पर] विद्यमान भी अग्नि नहीं लिया
जाता। किन्तु उचित होने के कारण पढ़ने के योग्य तीव्र बालक का
ही अग्नि शब्द से ग्रहण किया जाता है [इस दृष्टान्त के अनुसार
ही, अपने मरने के बाद घर की रक्षा करने के लिये, अपने
आपे को छोड़ कर, पुत्र को ही 'आत्मा' माना जाता है।]
कृशोऽहं पुष्टि माप्स्यामीत्यादौ देहात्मतोचिता ।
न पुत्रं विनियुङ्क्तेऽत्र पुष्टिहेत्वन्नभक्षणे ॥४६॥
'मैं अब कृश होगया हूँ, अब घी दूध खा कर पुष्ट हो
जाऊँगा'इत्यादि लौकिक व्यवहारों में तो जो देह के लिये पुष्टि-
कारक अन्न खा सकता है उस को ही 'आत्मा' समझना
चाहिये। देखते हैं कि कोई भी अपने शरीर की पुष्टि को लक्ष्य
बना कर पुष्टि करने वाले अन्न का भोजन, पुत्र को नहीं
कराता [किन्तु स्वयं अपने देह को ही कराता है। ऐसे स्थलों
में मिथ्या आत्मा यह देह ही—प्रधान हो सकता है। मुख्यात्मा
को तो कुछ खिलाया ही नहीं जासकता। गौणात्मा को खिलाने
से अपने शरीर में पुष्टि नहीं आती]
तपसा स्वर्ग मेष्यामीत्यादौ कर्त्रात्मतोचिता ।
अनपेक्ष्य वपुर्भोगं चरेत् कृच्छ्रादिकं ततः ॥४७॥
'तप करके उससे स्वर्ग को पाऊँगा' इत्यादि व्यवहार.जब
किया जाता है, तब कर्ता जो विज्ञानमय है, वही आत्मा होना
चाहिये [इस व्यवहार में देहादि को आत्मा मानें तो काम नहीं
चलता। क्यों कि देह तो यहीं जल कर भस्म हो जाता है]
यही कारण है कि देह के भोगों को लात मार कर कृच्छ्र
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८५
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८५
चान्द्रायण आदि व्रत किये जाते हैं [इन कृच्छ्रादि से कर्त्ता
कहाने वाले विज्ञानमय का ही उपकार होता है। क्योंकि यही
विज्ञानमय लोकान्तरगमन आदि किया करता है]
मोक्ष्येऽहमित्यत्र युक्तं चिदात्मत्वं तदा पुमान् ।
तद्वेत्ति गुरुशास्त्राभ्यां न तु किंचिच्चिकीर्षति ॥४८॥
'मुझे मुक्ति पानी है' यह विचार जब आता है तब इस
विचार में चेतनतत्व ही आत्मा होना चाहिये। क्योंकि तब
यह [ अधिकारी ] पुरुष गुरु [ आचार्योपदेश ] तथा शास्त्र
[वाक्यार्थ] के विचार से उस चिदात्मतत्व को जान लेता है
[कि मैं कर्ता भोक्ता आदि कुछ नहीं हूँ। मैं तो सच्चिदानन्द
ब्रह्मतत्व ही हूँ] अपने इस रूप को जान चुकने के बाद यह पुरुष
कुछ भी करना नहीं चाहता है। [ इस मोक्षव्यवहार में
चेतन तत्व ही आत्मा होना चाहिये। इस में कर्ता आदि
आत्माओं से काम नहीं चल सकता]
विप्रक्षत्रादयो यद्वद् बृहस्पतिसवादिषु ।
व्यवस्थितास्तथा गौणमिथ्यामुख्या यथोचितम् ॥४९॥
विप्र क्षत्रिय आदि जिस प्रकार पृथक् पृथक् बृहस्पति
सवादियों में व्यवस्थित हैं [ब्राह्मण को बृहस्पतिसव का ही
अधिकार है। राजसूय क्षत्रिय ही कर सकता है। वैश्यस्तोम
वैश्य को ही करना चाहिये] इसी प्रकार 'गौण' 'मिथ्या' या
'मुख्य' तीनों प्रकार के 'आत्मा' यथायोग्य अपने अपने
व्यवहारों में प्रधान रहते हैं।
तत्र तत्रोचिते प्रीति रात्मन्येवातिशायिनी ।
अनात्मनि तु तच्छेषे प्रीति रन्यत्र नोभयम् ॥५०॥
४८६ पञ्चदशी
जिस जिस व्यवहार में जो जो आत्मा उचित होता है,
उस व्यवहार में उसी उचित आत्मा [अथवा यों कहो कि उपयोगी
होने से प्रधान बने हुए उसी आत्मा] में प्रेम की अधिकता हो
जाती है। जो जो अनात्मपदार्थ उस आत्मा का शेष होता है,
उस में भी प्रेम तो हो जाता है, परन्तु उस में निरतिशय प्रेम
नहीं हो सकता। जो पदार्थ न तो आत्मा ही हो और न आत्मा
का शेष [उपकारक, अंग] ही हो उसमें तो दोनों तरह का प्रेम
[अतिशय प्रेम और साधारण प्रेम] नहीं पाया जाता।
उपेक्ष्यं द्वेष्यमित्यन्यद् द्वेधा, मार्गतृणादिकम् ।
उपेक्ष्यं, व्याघ्रसर्पादि द्वेष्यमेवं चतुर्विधम् ॥५१॥
आत्मा और आत्मशेष से भिन्न जो पदार्थ होते हैं वे भी
दो दो तरह के होते हैं—एक 'उपेक्ष्य' दूसरे 'द्वेष्य' । उनमें से
मार्ग में पड़े हुए तिनके आदि उपेक्ष्य [ उपेक्षा करने योग्य ]
होते हैं तथा अपने को हानि पहुँचाने वाले व्याघ्र या सर्प आदि
'द्वेष्य' होते हैं। यों संसार के पदार्थ चार श्रेणियों में विभक्त
किये गये हैं।
आत्मा, शेष, उपेक्ष्यं च द्वेष्यं चेति चतुर्ष्वपि ।
न व्यक्तिनियमः किन्तु तत्तत्कार्यात् तथा तथा ॥५२॥
( १ ) आत्मा ( २ ) आत्मा का शेष ( ३ ) उपेक्ष्य तथा
( ४ ) द्वेष्य ये चार श्रेणियां संसार के पदार्थों की हैं। इन चारों
मे 'यही प्रियतम है' 'यही प्रिय है' 'यही उपेक्ष्य है' और 'यही
द्वेष्य हैं' ऐसा कोई भी नियम नहीं हो सकता। किन्तु उन उन
[ उपकारादि ] कामों के कारण ये वैसे वैसे हो जाया करते हैं
[ ये अपना रूप बदल देते हैं। कभी प्रिय द्वेष्य हो जाते हैं और
द्वेष्य प्रिय बन जाते हैं इत्यादि ।]
स्याद् व्याघ्रः संमुखो द्वेष्यो ह्युपेक्ष्यस्तु पराङ्मुखः ।
लालनादनुकूलश्चेद् विनोदायेति शेषताम् ॥५३॥
देख लो कि—जो व्याघ्र सामने से [ खाने को ] आता है
वह 'द्वेष्य' होता है । जब वह लौट कर दूसरी तरफ निकला
चला जाता है तब वही 'उपेक्ष्य' हो जाता है । वही व्याघ्र यदि
लालन से अपने अनुकूल हो जाय तो अपने विनोद की वस्तु हो
जाती है, यों अपना उपकारक होकर अपना 'प्रिय' किंवा
'शेष' हो जाता है ।
व्यक्तीनां नियमो मा भूल्लक्षणात्तु व्यवस्थितिः ।
आनुकूल्यं प्रातिकूल्यं द्वयाभावश्च लक्षणम् ॥५४॥
यद्यपि 'प्रिय' 'अप्रिय' या 'उपेक्ष्य' आदि नाम की कोई भी
एक नियत वस्तु नहीं होती, फिर भी व्यवहार की व्यवस्था तो
लक्षण के कारण हो ही जाती है। अनुकूलता 'प्रिय' का लक्षण
है। प्रतिकूलता 'द्वेष्य' का लक्षण बताया जाता है। जो तो
अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो उसको 'उपेक्ष्य'
मानते हैं ।
आत्मा प्रेयान्, प्रियः शेषो, द्वेषोपेक्षे तदन्ययोः ।
इति व्यवस्थितो लोको याज्ञवल्क्यमतं च तत्॥५५॥
[इस सब का संक्षेप यही है कि]—आत्मा अत्यन्त प्रिय
है। शेष अर्थात् अपने साधन बने हुए पदार्थ प्रिय कहाते हैं।
आत्मा और आत्मा के शेष से भिन्न जितने भी पदार्थ होते
४८८ पंचदशी
है, उन में से किसी से तो द्वेष होता है और किसी की उपेक्षा
की जाती है। यों चार विभागों के कारण लोक की व्यवस्था
हो रही है [इन चार विभागों के अतिरिक्त और किसी प्रकार
के पदार्थ नहीं पाये जाते] आत्मा आदि की जो प्रियतमता आदि
हमने बतायी है वह याज्ञवल्क्य को भी सम्मत है [देखो
बृहदारण्यक मैत्रेयी ब्राह्मण]
अन्यत्रापि श्रुतिः प्राह पुत्राद् वित्तात् तथान्यतः ।
सर्वस्मादान्तरं तत्त्वं तदेतत् प्रेय इष्यताम् ॥५६॥
केवल मैत्रेयी ब्राह्मण में ही नहीं, किन्तु पुरुषविध ब्राह्मण
में भी आत्मा को प्रियतम कहा है। वहाँ कहा गया है कि—
पुत्र से, धनधान्य से और सभी कुछ से, यह आत्मतत्त्व अत्यन्त
अन्दर का पदार्थ है। इस कारण इस को प्रेय [अर्थात् प्रियतम]
मान लेना चाहिये ।
श्रौत्या विचारदृष्ट्यायं साक्ष्येवात्मा न चेतरः ।
कोशान् पंच विविच्यान्तर्वस्तुदृष्टि र्विचारणा ॥५७॥
प्रकृत में तो हमें इतना ही कहना है कि—श्रौती विचारदृष्टि
करें तो यह अकेला साक्षी तत्व ही 'आत्मा' कहा सकता है।
इस से भिन्न पुत्रादि कुछ भी आत्मा नहीं है। यदि [तैत्तिरीय
श्रुति में बताये प्रकार से] अन्नमय आदि पांच कोशों को आत्मा
से पृथक् कर लिया जाय और उन सब के अन्दर छिपी हुई
जो आत्मवस्तु है उससे विचार की आंखें भिड़ा दी जांय, तो
बस यही 'विचारणा' कहाती है।
जागरस्वप्नसुप्तीना मागमापायभासनम् ।
यतो भवत्यसावात्मा स्वप्रकाशचिदात्मकः ॥५८॥
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८९
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८९
अन्दर की आत्मवस्तु को देखने की विधि किंवा आत्मविचार
की पद्धति तो यह है कि— [ आने जाने वाली जो] 'जागरण'
'स्वप्न' तथा 'सुषुप्ति' अवस्था हैं, इनमें से अगली के आने और
पिछली के चले जाने की प्रतीति जिस नित्य चैतन्य रूप साक्षी
से हुआ करती है वही स्वप्रकाशचिद्रूप पदार्थ 'आत्मा' है ।
शेषाः प्राणादिवित्तान्ता आसन्नास्तारतम्यतः ।
प्रीतिस्तथा तारतम्यात् तेषु सर्वेषु वीक्ष्यते ॥५९॥
शेष[अर्थात् उस साक्षी से भिन्न] प्राण से लेकर वित्तपर्यन्त
जितने भी पदार्थ हैं [जिन को आगे बताया गया है] न्यूनाधिक
भाव से आत्मा के समीपवर्ती होते हैं । जिस अनुपात से वे
आत्मा के समीपवर्ती हैं उसी अनुपात से उन सब (प्राणादियों)
में प्रीति पायी जाती है ।
वित्तात् पुत्रः प्रियः,पुत्रात् पिण्डः,पिण्डात्तथेन्द्रियम् ।
इन्द्रियाच्च प्रियः प्राणः, प्राणादात्मा प्रियः परः ॥६०॥
[प्रीति की न्यूनाधिकता इस प्रकार होती है कि] धन से
तो पुत्र प्यारा होता है। पुत्र की अपेक्षा शरीर पर अधिक प्यार
किया जाता है। शरीर से इन्द्रियें अधिक प्यारी होती हैं।
इन्द्रियों से प्राण प्यारे हैं। आत्मा तो प्राणों से भी बहुत अधिक
प्रिय माना गया है ।
सभी प्राणी पुत्र की विपत्ति को हटाने के लिये धन को
व्यय कर डालते हैं । पुत्र पर विपत्ति आने पर धन की पर्वाह
नहीं की जाती । कभी कभी तो अपने देह की रक्षा के लिये
पुत्रों तक को छोड़ दिया जाता है। इन्द्रियों के नाश को बचाने
के लिये लाठी डण्डों की मार से देह को पिटवाना पड़ता है और
४९० पञ्चदशी
इन्द्रियों को बचा लेते हैं। मरने का प्रसङ्ग आपड़े तो इन्द्रियों
का छेदन भी सहन किया जाता है और प्राणों को बचा लिया
जाता है। आत्मा का कल्याण दीख पड़ता हो तो प्राणों का
परित्याग करते हुए 'गर्व' और 'हर्ष' दोनों ही पाये जाते हैं।
यों जो जो पदार्थ आत्मा के जितना जितना अधिक निकट है,
वह उतना ही उतना अधिक प्रिय होता है। इस बातका अनुमोदन
सभी का अनुभव कर रहा है। परन्तु आत्मा की सर्वाधिक
प्रियता की ओर को पामर पुरुषों का ध्यान जाता ही नहीं। वहां
तक तो विद्वानों का अनुभव ही पहुँच सकता है।
एवं स्थिते विवादोऽत्र प्रतिबुद्धविमूढयोः ।
श्रुत्योदाहारि तत्रात्मा प्रेयानित्येव निर्णयः ॥६१॥
यों आत्मा की प्रियतमता प्रमाण से सिद्ध भी है तो भी
ज्ञानी और अज्ञानी की विप्रतिपत्ति को हटाने के लिये श्रुति ने
उन दोनों के विवाद का वर्णन कर दिया है और यही निर्णय
किया है कि आत्मा ही प्रियतम है।
साक्ष्येव दृश्यादन्यस्मात् प्रेयानित्याह तत्ववित् ।
प्रेयान् पुत्रादिरेवेमं भोक्तुं साक्षीति मूढधीः ॥६२॥
'अन्य सब दृश्य पदार्थों से अधिक प्रिय तो यह साक्षी
ही है' ऐसा तत्वज्ञानी समझता है। मूढबुद्धि का तो यह विचार
होता है कि—प्रियतम तो पुत्रादि ही हैं यह साक्षी आत्मा तो
इन [प्रियतम पुत्रादि] को भोगने के लिये इस संसार में उतरा है।
आत्मनोऽन्यं प्रियं ब्रूते शिष्यश्च प्रतिवाद्यपि ।
तस्योत्तरं वचो बोधशापौ कुर्यात् तयोः क्रमात् ॥६३॥
आत्मा से भिन्न को प्रिय कहने वाले दो होते हैं—एक
'शिष्य' दूसरा 'प्रतिवादी' । शिष्य के लिये उत्तर यही है कि
उसे आत्मबोध कराया जाय [और उसके अनुभव से ही आत्मा
की प्रियता को कहलाया जाय] प्रतिवादी के लिये उत्तर यही है कि
उसे शाप दिया जाय—उसे भय अर्थात् इस मन्तव्य से होने वाली
हानि दिखायी जाय [जैसा कि ६९ श्लोक में दिखाया गया है ।]
प्रियं त्वां रोत्स्यतीत्येवमुत्तरं वक्ति तत्ववित् ।
स्वोक्तप्रियस्य दुष्टत्वं शिष्यो वेत्ति विवेकतः ॥६४॥
[ तत्वज्ञानी पुरुष शिष्य और प्रतिवादी दोनों को एक ही
उत्तर देता है कि ]—हे शिष्य ! या हे प्रतिवादिन् तेरा माना
हुआ [ पुत्रादिरूपी ] प्रिय जब नष्ट होने लगेगा तब वह तुम्हें
[दोनों को] रुलायेगा । [रोक लेगा,बांध कर बैठा लेगा] शिष्य
जब इस उत्तर को सुनता है तब अपने प्रेमपात्र पुत्रादि के दोषों
का निम्नरीति से विचार करके उनकी दोषदुष्टता को पहचान
जाता है ।
अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम् ।
लब्धोऽपि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते ॥६५॥
जातस्य ग्रहरोजादिः कुमारस्य च मूर्खता ।
उपनीतेऽप्यविद्यत्व मनुद्वाहश्च पण्डिते ॥६६॥
यूनश्च परदारादि दारिद्र्यं च कुटुम्बिनः ।
पित्रोर्दुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्म्रियते तदा ॥६७॥
दोषों का विचार करने की रीति यह है कि—जब पुत्र की
आशा नहीं होती तब माता पिता को उस अजात पुत्र से चिर-
काल तक बड़ा क्लेश रहता है । पुत्र की आशा भी हो और
गर्भपात हो जाय तब और भी क्लेश होता है । प्रसव काल में
४९२ पञ्चदशी
माता को अकथनीय दुःख देता है । उत्पन्न होने पर ग्रहपीडा
या रोगों का आक्रमण हो जाय तो माता पिता को बड़े कष्टों का
सामना करना पड़ता है । कुमारावस्था में यदि वह विद्या न
पढ़ने लगे तो भी माँ-बाप दुःखी ही रहते हैं । उपनयन हो जाने
पर यदि विद्या प्राप्त न कर सके तो भी दुःख का कारण बन
जाता है । पण्डित होकर यदि उसका विवाह न हो सके तो मां
बाप के कष्ट का अन्त ही मत पूछो । युवा होकर यदि परस्त्री-
गमनादि दुराचार करने लगे तो मां बाप मुँह दिखाने योग्य भी
नहीं रहते । सन्तान वाला होकर भी यदि वह दरिद्र रहे तो
भी वे उससे चिन्तित ही रहते हैं । धनी होकर भी यदि वह
भरी जवानी में मर जाय तब तो माता पिता की आंखों के
सामने अंधेरा हो जाता है । यों माता पिता की कष्टकथा का
अन्त ही नहीं होता ।
एवं विविच्य पुत्रादौ प्रीतिं त्यक्त्वा, निजात्मनि ।
निश्चित्य परमां प्रीतिं, वीक्षते तमहर्निशम् ॥६८॥
इस प्रकार पुत्र, स्त्री आदि जितने भी प्रिय प्रतीत होने
वाले पदार्थ हैं, उनके दोषों को जानकर, उनसे प्रेम छोड़कर,
अपने आत्मा में ही परम प्रेम का निश्चय करके, दिन रात उस
आत्मा का ही अनुसन्धान करने लग जाता है ।
आग्रहाद् ब्रह्मविद्वेषादपि पक्षममुञ्चतः ।
वादिनो नरकः प्रोक्तो दोषश्च बहुयोनिषु ॥६६॥
आग्रह से [कि पुत्रादि की प्रियता को तो मैं कभी छोड़
ही नहीं सकता हूँ] तथा ब्रह्मविद्वेष से [कि इसके कहे हुए ब्रह्म
की तो मैं धज्जी उड़ा डालूँगा] अपने पक्ष को न छोड़ने वाले.
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३
प्रतिवादी को नरक मिलता है तथा अनेक योनियों में दोष देखने
पड़ते हैं [उसे अनेक तिर्यगादि जन्मों में कभी इष्ट का वियोग
होगा और कभी अनिष्ट की प्राप्ति होगी। यही शाप ज्ञानी लोग
दिया करते हैं। उनके 'प्रियं त्वां रोत्स्यति' कहने का यही अभिप्राय
होता है।]
ब्रह्मविद् ब्रह्मरूपत्वादीश्वर स्तेन वर्णितम् ।
यद्यत् तत्तत् तथैव स्यात् तच्छिष्यप्रतिवादिनोः ॥७०॥
[ईश्वरोह तथैव स्यात् बृ-१-४-८ इस वाक्य में कहा गया है
कि] ब्रह्मज्ञानी को अपने ब्रह्मत्व का अनुभव हो गया है। इस
से वह ईश्वर पद को पाचुका है। अब वह अपने शिष्यादि के
प्रति जो [भली या बुरी] बात कहता है, उस ज्ञानी का जो शिष्य
है, या जो प्रतिवादी है, उन दोनों को उसका कहा हुआ इष्ट
या अनिष्ट अवश्य ही प्राप्त हो जाता है। [यों ज्ञानी का कहा
हुआ एक ही वाक्य शिष्य के लिये उपदेश और वादी के लिये
शाप रूप हो जाता है]
यस्तु साक्षिणमात्मानं सेवते प्रियमुत्तमम् ।
तस्य प्रेयानसावात्मा न नश्यति कदाचन ॥७१॥
['आत्मानमेव प्रियमुपासीत, स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य
प्रियं प्रमायुकं भवति' (बृ-१-४-८) इस वाक्य में कहा गया है
कि] जो शिष्य आत्मा को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ
कर सदा आत्मा की सेवा करता है [किंचा सदा आत्मस्मरण
रखने लगता है] उसका प्रिय माना हुआ यह आत्मा, वैसे कभी
भी नष्ट नहीं हो जाता, जैसे प्रतिवादी का माना हुआ प्रिय नष्ट
४९४ पञ्चदशी
हो जाता है [ किन्तु वह तो सदानन्द रूप हो कर भासने
लगता है ]
परप्रेमास्पदत्वेन परमानन्दरूपता ।
सुखवृद्धिः प्रीतिवृद्धौ सार्वभौमादिषु श्रुता ॥७२॥
[यों यहां तक यह सिद्ध हो चुका कि] निरतिशय प्रेम का
विषय होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है । [ तैत्तिरीय और
बृहदारण्यक श्रुतियों में बताया गया है कि] चक्रवर्ती राजा से
लेकर हिरण्यगर्भपर्यन्त पदों में जहां जहां प्रीति की वृद्धि
होती है, वहां वहां सुख की भी वृद्धि होती है । यों जब प्रीति
की निरतिशयता भी समझ में आसकती है तब आनन्द की
निरतिशयता भी समझी जा सकती है । [ राजा को अपने
उपकरणों (साधनों) में प्रीति अधिक होती है तो उसे सुख भी
अधिक ही होता है ]
चैतन्यवत् सुखं चास्य स्वभावश्चेच्चिदात्मनः ।
धीवृत्तिष्वनुवर्तेत सर्वास्वपि चितिर्यथा ॥७३॥
शंका यह होती है कि—यदि चैतन्य के समान सुख या
आनन्द भी चिदात्मा का स्वभाव हो, तो जैसे सब बुद्धिवृत्तियों
में चैतन्य की अनुवृत्ति होती है वैसे सब बुद्धिवृत्तियों में
आनन्द की भी अनुवृत्ति होनी चाहिये ।
मैव मुष्णप्रकाशात्मा दीपस्तस्य प्रभा गृहे ।
व्याप्नोति नोष्णता तद्वच्चित्तेरेवानुवर्तनम् ॥७४॥
यह शंका न करनी चाहिये । दृष्टान्त में देख लो कि—
दीप के दो स्वरूप हैं एक 'उष्ण' दूसरा 'प्रकाश' । घर में जब
दीपक जलता है तब उसकी प्रभा तो घर को व्याप्त कर लेती
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९५
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९५
है परन्तु उसकी उष्णता व्याप्त नहीं करती। ठीक इसी प्रकार
बुद्धिवृत्तियों में चैतन्य की तो अनुवृत्ति हो जाती है परन्तु आनन्द
की अनुवृत्ति नहीं होती।
गन्धरूपरसस्पर्शेष्वपि सत्सु यथा पृथक् ।
एकाक्षेणैक एवार्थो गृह्यते नेतरस्तथा ॥७५॥
एक द्रव्य में गन्ध, रूप, रस और स्पर्श सभी रहते हैं,
परन्तु एक इन्द्रिय, इनमें से एक ही गुण को ग्रहण करती है,
दूसरे को नहीं। ठीक इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द इन
दोनों में से, केवल चैतन्य का भान लोगों को होता है, आनन्द
का नहीं होता।
चिदानन्दौ नैव भिन्नौ गन्धाद्यास्तु विलक्षणाः ।
इति चेत् तदभेदोऽपि साक्ष्यन्यत्र वा वद ॥७६॥
यदि कहा जाय कि—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में तो बड़ी
विषमता है। क्योंकि चित् और आनन्द तो भिन्न नहीं हैं,
गन्धादि तो परस्पर भिन्न भिन्न हैं। तो उत्तर देने से पहले यह
बताओ कि—चित् और आनन्द का जो अभेद है वह साक्षी
आत्मस्वरूप में है ? या कहीं अन्यत्र है [ या यह भेद उसकी
उपाधि कहाने वाली वृत्तियों में है। पूछने का तात्पर्य यह है
कि चिदानन्द का अभेद स्वाभाविक है या औपाधिक है ?]
आद्ये गन्धाद्योऽप्येवमभिन्नाः पुष्पवर्तिनः ।
अक्षभेदेन तद्भेदे वृत्तिभेदात् तयोर्भिदा ॥७७॥
चित् और आनन्द का साक्षी में कोई भेद नहीं है, इस
पक्ष में, पुष्प में रहने वाले गन्धादि भी इसी तरह [साक्षी में]
परस्पर भेद रहित हैं। क्योंकि एक को छोड़कर एक को उस
५९६ पञ्चदशी
में से लाया ही नहीं जा सकता। अब यदि भेद को औपाधिक
मानें, अर्थात् गन्धादि को ग्रहण करने वाली घ्राणादि इन्द्रियों के
भेद से ही, उन गन्धादि में भी भेद मान लें तब तो ठीक उसी
तरह वृत्ति भेद के कारण [ क्रमानुसार चित् और आनन्द को
अभिव्यक्त करने वाली राजस और सात्विक वृत्तियों के भिन्न
भिन्न होने से ] उन चिदानन्दों का भी औपाधिक भेद हो ही
जायगा।
सत्ववृत्तौ चित्सुखैक्यं तद्वृत्तेर्निर्मलत्वतः ।
रजोवृत्तेस्तु मालिन्यात् सुखांशोऽत्र तिरस्कृतः॥७८॥
[चित् और आनन्द की एकता देखनी हो तो सात्विक
वृत्तियों में देखो] पुण्य कर्मों के प्रताप से जब बुद्धिवृत्ति का
सात्विक परिणाम होता है तब चित् और आनन्द की एकता
भासने लग पड़ती है। क्योंकि सात्विक वृत्तियें निर्मल होती
हैं। [इन दोनों के भेद के भासने का कारण भी सुन लो कि]
रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण इनमें सुखभाग दीखना
बन्द हो जाता है। [तब भूल से यह समझा जाता है कि हम
चित् ही चित् हैं सुख हम में है ही नहीं, सुख तो कहीं से लाना होगा]
तिंतिणीफल मत्यम्लं लवणेन युतं यदा।
तदाम्लस्य तिरस्कारा दीषदम्लं यथा तथा ॥७९॥
[होता हुआ भी सुखभाग कैसे ढक जाता है ? क्यों नहीं
दीखता ? इसके लिये दृष्टान्त देख लो] जैसे कि इमली का फल
बहुत खट्टा होता है, जब उसमें नमक मिला दिया जाता है तब
उसकी खटाई छिप जाती है और बहुत कम हो जाती है।
इसी प्रकार रजोवृत्तियों में भी आनन्द का तिरोभाव हो जाता है।
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९७
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९७
ननु प्रियतमत्वेन परमानन्दतात्मनि ।
विवेक्तुं शक्यतामेवं विना योगेन किं भवेत् ॥८०॥
[रहस्य बात पूछता है कि] ऊपर जिस रीति से समझाया
गया है, उस रीति से परम प्रेम का स्थान होने के कारण आत्मा
की परमानन्दता का विवेक हो भी सकता हो, तो भी ऐसे थोथे
विवेक से क्या होना है ? मुक्ति के साधन योग के विना क्या
होगा ? [क्योंकि मुक्ति का साधन अपरोक्ष ज्ञान तो योग से
होता है]
यद्योगेन तदेवेति वदामो, ज्ञानसिद्धये ।
योगः प्रोक्तो, विवेकेन ज्ञानं किं नोपजायते ॥८१॥
[इस का उत्तर हम यह देते हैं कि] जो योग से होना है,
वही इस विवेक से हाथ आ जायगा [भाव यह है कि जैसे
योग अपरोक्ष ज्ञान का कारण है वैसे विवेक से भी अपरोक्ष
ज्ञान हो जाता है ] पहले अध्याय में अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि
के लिये जैसे योग बताया है इसी प्रकार [इस अध्याय में दिखाये
हुए गौण आदि आत्माओं के विवेक के द्वारा पांच कोषों के]
विवेक से भी ज्ञान उत्पन्न हो ही जाता है ।
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
इति स्मृतं फलैकत्वं योगिनां च विवेकिनाम् ॥८२॥
[गीता स्मृति में कहा भी है कि] सांख्य [अर्थात् आत्मा-
नात्मविवेकी] लोग जिस मोक्षरूप स्थान को पा लेते हैं योगी
लोग भी उसी को पा लेते हैं। यों गीता में 'योगी' और 'विवेकी'
दोनों के फलों की एकता बतायी गयी है [ज्ञान के द्वारा मोक्ष-
रूपी एक ही फल दोनों के हाथ लग जाता है ]
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४९८ पञ्चदशी
असाध्यः कस्यचिद् योगः कस्यचिज्ज्ञाननिश्चयः ।
इत्थं विचार्य मार्गौ द्वौ जगाद परमेश्वरः ॥८३॥
कोई अधिकारी ऐसे होते हैं कि उनके लिये 'योग' असाध्य
होता है । किन्हीं को तो ज्ञान का निश्चय होना कठिन हो जाता
है । यों अधिकारियों की विचित्रता के कारण, परमेश्वर ने 'ज्ञान'
और 'योग' दोनों मार्गों को कहा है ।
योगे कोतिशयस्तेऽत्र ज्ञानमुक्तं समं द्वयोः ।
रागद्वेषाद्यभावश्च तुल्यो योगिविवेकिनोः ॥८४॥
आपके योग में तो इस ज्ञान से कोई भी उल्लेखयोग्य विशे-
षता नहीं पायी जाती । देख लो कि—'विवेक' और 'योग' दोनों
का ज्ञानरूपी एक ही फल होता है । जैसे योगी लोग रागद्वेष
से रहित होते हैं वैसे ही विवेकी लोग भी रागद्वेष से हीन पाये
जाते हैं ।
न प्रीति र्विषयेष्वस्ति प्रेयानात्मेति जानतः ।
कुतो रागः कुतो द्वेषः प्रातिकूल्यमपश्यतः ॥८५॥
जिस विवेकी को यह मालूम हो जाता है कि—आत्मा ही
एक प्रियतम पदार्थ है, उसे फिर विषयों में प्रीति ही नहीं रहती
यही कारण है कि फिर उसे किन्हीं विषयों में राग भी नहीं
होता । क्योंकि वह किसी विषय को अनुकूल ही नहीं मानता ।
फिर उसे किसी से द्वेष भी नहीं होता । क्योंकि वह किसी विषय
को अपने प्रतिकूल ही नहीं समझता ।
देहादेः प्रतिकूलेषु द्वेषस्तुल्यो द्वयोरपि ।
द्वेषं कुर्वन्न योगी चेद्विवेक्यपि तादृशः ॥८६॥
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९९
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९९
देहादि के प्रतिकूल जितने पदार्थ होते हैं, उनसे जैसे
विवेकी लोग द्वेष करते हैं, वैसे योगी भी करते हैं। यदि कहो
कि [प्रतिकूल विच्छू सांप आदि से] द्वेष करने वाले को तो हम
योगी ही नहीं मानते, तो हम कहेंगे कि वैसे द्वेषी को हम विवेकी
भी कब कहते हैं ? [वैसा द्वेष करने वाला तो विवेकवान् भी
नहीं माना जा सकता]
द्वैतस्य प्रतिभानं तु व्यवहारे द्वयोः समम् ।
समाधौ नेति चेत् तद्वन्नाद्वैतत्वविवेकिनः ॥८७॥
व्यवहार काल में जैसे योगी को द्वैत का प्रतिभान होता
रहता है, वैसे ही विवेकी को भी हुआ करता है। यदि कहो
कि—योगी को समाधि करते समय द्वैत का भान नहीं होता,
[यही योगी में विवेकी से विशेषता है] तो हम कहेंगे कि उसी
तरह विवेकी को भी जब वह अद्वैत आत्मतत्वका विवेक करने
बैठता है, तब द्वैत का प्रतिभान नहीं रहता ।
विवक्ष्यते तदस्माभि रद्वैतानन्दनामके ।
अध्याये हि तृतीयेऽतः सर्वमप्यतिमङ्गलम् ॥८८॥
विवेकी को जैसे द्वैत का भान नहीं रहता है सो तो हम
अद्वैतानन्द नाम के अगले तीसरे अध्याय में कहेंगे। यों सभी
कुछ मङ्गल ही मङ्गल है।
सदा पश्यन्निजानन्द मपश्यन्निखिलं जगत् ।
अर्थाद् योगीति चेत् तर्हि संतुष्टो वर्धतां भवान् ॥८९॥
जो सदा आत्मानन्द को देखता रहता है, जिसे यह सम्पूर्ण
जगत् नहीं दीखता [जिसको द्वैत का दर्शन बन्द हो जाता है]
वह तो एक प्रकार से योगी ही हो गया है, ऐसा यदि तुम कहो
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तो अच्छा तुम ऐसे ही सन्तुष्ट हो जाओ और वृद्धि पाओ।
हम कब कहते हैं कि उपासना करनी ही चाहिये। ब्रह्मज्ञान से
बढ़कर और है ही क्या ।
ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे मन्दानुग्रहसिद्धये ।
द्वितीयाध्याय एतस्मिन्नात्मानन्दो विवेचितः ॥९०॥
ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ के इस द्वितीयाध्याय में मन्दाधि-
कारी पर अनुग्रह करने के लिए 'आत्मानन्द' का विवेचन किया
गया।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दः