पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 508 of 726
Read in context४८६ पञ्चदशी
जिस जिस व्यवहार में जो जो आत्मा उचित होता है,
उस व्यवहार में उसी उचित आत्मा [अथवा यों कहो कि उपयोगी
होने से प्रधान बने हुए उसी आत्मा] में प्रेम की अधिकता हो
जाती है। जो जो अनात्मपदार्थ उस आत्मा का शेष होता है,
उस में भी प्रेम तो हो जाता है, परन्तु उस में निरतिशय प्रेम
नहीं हो सकता। जो पदार्थ न तो आत्मा ही हो और न आत्मा
का शेष [उपकारक, अंग] ही हो उसमें तो दोनों तरह का प्रेम
[अतिशय प्रेम और साधारण प्रेम] नहीं पाया जाता।
उपेक्ष्यं द्वेष्यमित्यन्यद् द्वेधा, मार्गतृणादिकम् ।
उपेक्ष्यं, व्याघ्रसर्पादि द्वेष्यमेवं चतुर्विधम् ॥५१॥
आत्मा और आत्मशेष से भिन्न जो पदार्थ होते हैं वे भी
दो दो तरह के होते हैं—एक 'उपेक्ष्य' दूसरे 'द्वेष्य' । उनमें से
मार्ग में पड़े हुए तिनके आदि उपेक्ष्य [ उपेक्षा करने योग्य ]
होते हैं तथा अपने को हानि पहुँचाने वाले व्याघ्र या सर्प आदि
'द्वेष्य' होते हैं। यों संसार के पदार्थ चार श्रेणियों में विभक्त
किये गये हैं।
आत्मा, शेष, उपेक्ष्यं च द्वेष्यं चेति चतुर्ष्वपि ।
न व्यक्तिनियमः किन्तु तत्तत्कार्यात् तथा तथा ॥५२॥
( १ ) आत्मा ( २ ) आत्मा का शेष ( ३ ) उपेक्ष्य तथा
( ४ ) द्वेष्य ये चार श्रेणियां संसार के पदार्थों की हैं। इन चारों
मे 'यही प्रियतम है' 'यही प्रिय है' 'यही उपेक्ष्य है' और 'यही
द्वेष्य हैं' ऐसा कोई भी नियम नहीं हो सकता। किन्तु उन उन
[ उपकारादि ] कामों के कारण ये वैसे वैसे हो जाया करते हैं