Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

About this granth

Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.

The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.

This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.

Page 458Permalink

५३६ पञ्चदशी
'स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा
शयीतैवमेवैष एतच्छेते' (बृ. २-१-१९) इस श्रुति में कहा गया
है कि—जैसे स्तनपायी बालक पेट भर कर स्तन पीकर कोमल
शय्या पर पड़ा पड़ा हंसता रहता है और अपना पराया न
पहचानने के कारण रागद्वेष से रहित होकर सुख की मूरत
बना रहता है, या जैसे सार्वभौम महाराज [ अशुद्ध बुद्धि होने
पर भी ] सब मानुषानन्दों से युक्त होने के कारण, जब कि उसे
किसी वस्तु की चाह नहीं रहती तब मानुषानन्द की सीमा पर
पहुंच कर आनन्द की मूर्ति दीखा करता है, या जैसे कोई महा
ब्राह्मण जिसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो चुका हो जब 'मैं कृत कृत्य
हो चुका' ऐसी विद्यानन्द की सीमा को पा जाता है किंवा
जीवन्मुक्ति को पा लेता है, तब परमानन्द स्वरूप ही हो जाता
है । ठीक इसी प्रकार सोया हुआ पुरुप भी आनन्द रूप हो
गया होता है ।
मुग्धबुद्धातिबुद्धानां लोके सिद्धा सुखात्मता ।
उदाहृतानामन्ये तु दुःखिनो न सुखात्मकाः ॥५३॥
मुग्ध, बुद्ध और अतिबुद्ध ये ही तीन लोक में सुखी माने
जाते हैं [ जिनको विवेक नहीं है, उनमें बालक सब से सुखी
माना जाता है । जिन्हें कुछ विवेक है, उनमें सार्वभौम राजा
सर्वाधिक सुखी गिना जाता है । जो अतिविवेकी हैं उनमें
आत्मदर्शी को सर्वाधिक सुखी मानते हैं ] इन तीनों के अति-
रिक्त और तो सब सदा रागद्वेषादिसंकुल रहने के कारण दुःखी
ही बने रहते हैं । वे सुखी कभी नहीं होते [ इसी कारण उन
किसी का दृष्टान्त नहीं दिया है ]

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३७

Page 459Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३७
कुमारादिवदेवायँ ब्रह्मानन्दैकतत्परः ।
स्त्रीपरिष्वक्तवद् वेद न बाह्यं नापि चान्तरम् ॥५४॥
प्रकृत में तो हमें यही कहना है कि स्तनपायी कुमार या
महाराजा आदि जैसे आनन्द में मग्न रहते हैं ऐसे ही यह सुषुप्त
प्राणी केवल ब्रह्मानन्द को भोगा करता है। तद्यथा प्रियया स्त्रिया
संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना
संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् (बृ. ४-३-२१) इस वाक्य
में कहा गया है कि जैसे कोई कामी स्त्री का आलिंगन कर लेने
पर अन्दर बाहर के विषयज्ञान से शून्य होकर सुख की मूर्ति
हो जाता है इसी प्रकार सुषुप्ति के समय प्राज्ञ परमात्मा के साथ
एकता को प्राप्त हुआ यह जीव भी बाह्य और आन्तर कुछ भी
नहीं जानता और आनन्दरूप हो गया होता है ।
बाह्यं रथ्यादिकं वृत्तं, गृहकृत्यं यथान्तरम् ।
तथा जागरणं बाह्यं, नाडीस्थः स्वप्न आन्तरः ॥५५॥
[ऊपर के वाक्य में जो बाह्य और आन्तर दो शब्द आये
हैं उनके अर्थ यों जानने चाहियें] जैसे लोक में गली कूर्चा
आदि बाह्य तथा घर के काम आन्तर कहाते हैं, इसी प्रकार
जागरण को ‘बाह्य’ कहा जाता है तथा नाड़ी में प्रतीत होने
वाला स्वप्नप्रपंच ‘आन्तर’ कहाता है ।
पितापि सुप्तावपितेत्यादौ जीवत्ववारणात् ।
सुप्तौ ब्रह्मैव नो जीवः संसारित्वासमीक्षणात् ॥५६॥
अत्र पिताऽपिता भवति (बृ. ४-३-२२) इत्यादि श्रुति में
कहा गया है कि—सुप्तिकाल जब आता है तब पिता पिता
नहीं रहता । यों जीवत्व का वारण कर दिया है कि सुप्ति के

Page 460Permalink

५३८ पञ्चदशी
समय ब्रह्म ही रह जाता है जीव नहीं रहता । क्योंकि उस समय
संसारिभाव का कहीं पता ही नहीं चलता [भाव यह है कि-
सुप्ति में जीव के जो आध्यासिक पितृत्व आदि धर्म हैं वे नहीं
रहते । जीवभाव की प्रतीति के बन्द हो जाने पर अर्थात् ही
ब्रह्मभाव शेष रह जाता है । ]
पितृत्वाद्यभिमानो यः सुखदुःखाकरः स हि ।
तस्मिन्नपगते तीर्णः सर्वाञ्छोकान् भवत्ययम् ॥५७॥
तीर्णो हि तदा सर्वाञ्शोकान् हृदयस्य भवति (बृ. ४-३-२२) इस
वाक्य में बताया गया है कि-पितापने आदि का जो
अभिमान है वही तो सुख दुःख का आकर है । जब वह अभि-
मान नहीं रह जाता तब यह जीव सब शोकों के पार पहुँच
जाता है [यह संसार देहाभिमानमूलक है । जब देहाभिमान
नहीं रहता तब संसार भी नहीं रहता । देहाभिमान के भूलते
ही सब प्रकार के शोक समाप्त हो जाते हैं । ]
सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमसावृतः ।
सुखरूपमुपैतीति ब्रूते ह्याथर्वणी श्रुतिः॥५८॥
आथर्वणी श्रुति कहती है कि-यह सकल [जाग्रदादि]
प्रपंच जब [अपनी उपदान, तमःप्रधान प्रकृति में] विलीन हो
जाता है तब उसी तमोमयी प्रकृति से ढका हुआ यह जीव सुख
रूप [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है ।
सुखमस्वाप्समत्राहं न वै किंचिदवेदिषम् ।
इति सुप्ते सुखाज्ञाने परामृशति चोत्थितः ॥५६॥
[सबका अनुभव भी इसी बात को कह रहा है कि-]
'इस समय मैं सुख पूर्वक सोया । इतने समय मैंने कुछ भी नहीं

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३९

Page 461Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३९
जाना' यों निद्रा के समय के सुख और अज्ञान दोनों का स्मरण,
सोकर उठा हुआ पुरुष किया करता है [ इस कारण कहना
पड़ता है कि सुप्ति में सुख है ]
परामर्शोऽनुभूतेऽस्तीत्यासीदनुभवस्तदा ।
चिदात्मत्वात् स्वतो भाति सुखमज्ञानधीस्ततः ॥६०॥
जो भी परामर्श होता है वह अनुभूत विषय का ही होता
है [ अनुभव न किये हुए विषय का तो स्मरण हो ही नहीं सकता ]
इस कारण उस समय सुप्ति में सुख का अनुभव माना जाता
है। सुख का अनुभव करने के साधनों के बिना ही वह सुख स्वतः
प्रतीत हो जाता है क्योंकि वह सुख चिदात्मा है [ अर्थात् वह
सुख स्वयंप्रकाशचिद्रूप है ] । उसी स्वयंप्रकाश सुख के सहारे
से ही [ उस सुख को ढकने वाले ] अज्ञान की भी प्रतीति हो
जाती है ।
ब्रह्म विज्ञान मानन्दमिति वाजसनेयिनः ।
पठन्त्यतः स्वप्रकाशं सुखं ब्रह्मैव नेतरत् ॥६१॥
वाजसनेयी शाखा वाले कहते हैं कि- 'ब्रह्म' 'विज्ञान' तथा
'आनन्द' दो रूप का है । इस कारण जो भी स्वयं प्रकाश सुख
है वह सब ब्रह्म तत्व ही है । वह और कुछ नहीं है [फिर सुषुप्ति
के स्वयं प्रकाश सुख को भी ब्रह्मरूप ही मानना चाहिए]
यदज्ञानं तत्र लीनौ तौ विज्ञानमनोमयौ ।
तयोर्हि विलयावस्था निद्राऽज्ञानं च सैव हि ॥६२॥
['मैंने उस समय कुछ नहीं जाना' इस स्मरण की अन्य-
थानुपपत्ति से जिस अज्ञान को हम पहचानते हैं] उसी अज्ञान
में प्रमाता और प्रमाण कहाने वाले विज्ञानमय और मनोमय

Page 462Permalink

१४० पञ्चदशी
दोनों ही विलीन हो जाते हैं। [वे अपने विज्ञानमयत्व आदि
आकार को छोड़कर कारण रूप में पहुँच जाते हैं। अर्थात् उस
समय 'विज्ञानमय' और 'मनोमय' दोनों ही नहीं रहते] उन
'विज्ञानमय' और 'ननोमय' की विलयावस्था 'निद्रा' कहाती
है। उसी निद्रा को विद्वान् लोग 'अज्ञान' भी कहते हैं [सोच
कर देखलो नींद भी तो अज्ञान ही है]
विलीनघृतवत् पश्चात् स्याद् विज्ञानमयो घनः ।
विलीनावस्थ आनन्दमयशब्देन कथ्यते ॥६३॥
[अग्निसंयोग आदि से] पिघला हुआ घृत, पीछे शीतल-
वायु के संयोग से जैसे गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार [जाग्र-
दादि के भोगदायी कर्मों के क्षय हो जाने के कारण] निद्रारूप
से विलीन हुआ अन्तःकरण [फिर जब भोगदायी कर्मों के वश
से, जागरण अवस्था आती है] विज्ञानरूप से घनका [गाढ़ा]
हो जाता है। वह घन विज्ञान ही आत्मा की उपाधि होती है
इस कारण आत्मा भी विज्ञानमय हो जाता है। वही जब पहले
विलीन अवस्था में था— [जब वह अवस्था उसकी उपाधि बन
रही थी] तब उसी को 'आनन्दमय' कहा जाता था।
सुप्तिपूर्वक्षणे बुद्धिवृत्तिर्या सुखविम्विता ।
सैव तद्विम्वसहिता लीनानन्दमयस्ततः ॥६४॥
[ऊपर के श्लोक की बात को अधिक स्पष्ट रीति से यों सम-
झना चाहिए कि] सुप्ति से पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धि-
वृत्ति होती है उसमें जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके
बाद उस प्रतिबिम्ब को लिये ही लिये, वही वृत्ति जब निद्रारूप
से विलीन हो जाती है तब वही 'आनन्दमय' कहाने लगती है।

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१

Page 463Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१
अन्तर्मुखो य आनन्दमयो ब्रह्मसुखं तदा ।
भुङ्क्ते चिद्विम्बयुक्ताभि रज्ञानोत्पन्नवृत्तिभिः ॥६५॥
वह जो अन्तर्मुख 'आनन्दमय' है वह चिदाभास से युक्त,
तथा अज्ञान से उत्पन्न हुई वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख [किंवा
स्वरूपभूत सुख] को भोगता अर्थात् अनुभव किया करता है।
अज्ञानवृत्तयः सूक्ष्मा विस्पष्टा बुद्धिवृत्तयः ।
इति वेदान्तसिद्धान्तपारगाः प्रवदन्ति हि ॥६६॥
[ उस समय जागरण की तरह् सुख के अनुभव का जो
अभिमान नहीं होता उस का कारण तो यह है कि]—वे अज्ञान-
वृत्तियां बहुत ही सूक्ष्म होती हैं [वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट
नहीं होतीं।] बुद्धिवृत्तियां तो बहुत ही स्पष्ट होती हैं। यह बात
वेदान्तसिद्धान्त के पारङ्गत लोग बताते हैं।
अज्ञान वृत्तियों का पता नहीं चलता कि वे कैसी कैसी हैं
और कितनी हैं? जब तो उन अज्ञान वृत्तियों से बुद्धिवृत्तियें बन
जाती हैं, तब हम को मालूम पड़ता है कि हमारे अन्दर इतना
कूड़ा कचरा भरा पड़ा है। जब तक हमारा अज्ञान बुद्धिवृत्तियों
के रूप में प्रकट नहीं हो जाता तब तक हम अपने आप को
बड़ा महात्मा समझ बैठते हैं। एकान्त में जाकर साधन करने
से यह एक बड़ी कमी रह जाती है कि अज्ञान वृत्तियों को
बुद्धिवृत्ति बनने का अवसर ही नहीं मिलता और यों हमें अपने
विषय में मिथ्याज्ञान या मिथ्याभिमान हो जाता है। समाज
में रह कर साधन करने से हमारे अन्दर के अज्ञान की बार-
बार बुद्धिवृत्ति बनती रहती है और हमें अपने अज्ञान का पता
चलता रहता है। यों हम दुरभिमान से भी बचते हैं और उस

Page 464Permalink

४४२ पञ्चदशी
अज्ञान को हटाने में भी तत्पर रहते हैं अर्थात् हमारे साधन की
परीक्षा नित्य ही होती रहती है। इस दृष्टि से व्यवहार के साथ
साथ साधन करना अधिक लाभदायक प्रतीत होता है। व्यवहार
से हट कर आत्मसाधन करने वाले लोग प्रायः करके व्यवहार
के झंझट में स्थिर बुद्धि नहीं रह सकते हैं। यों साधन का यह मार्ग
बहुत से साधकों को अधूरा रख देता है ऐसा मालूम पड़ता है।
माण्डूक्यतापनीयादिश्रुतिष्वेतदतिस्फुटम् ।
आनन्दमयभोक्तृत्वं ब्रह्मानन्दे च भोग्यता ॥६७॥
माण्डूक्य और तापनीय आदि श्रुतियों में यह बात अत्यन्त
ही स्पष्ट है कि 'आनन्दमय' तो भोक्ता है तथा 'ब्रह्मानन्द'
भोग्य है ।
एकीभूतः सुषुप्तस्थः प्रज्ञानघनतां गतः ।
आनन्दमय आनन्दभुक् चेतोमयवृत्तिभिः ॥६८॥
[सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतो-
मुखः (माण्डूक्य ५) इस माण्डूक्य श्रुति में कहा गया है कि]
सुषुप्ति का जो अभिमानी है, वह जब एकीभाव को प्राप्त हो
जाता है, उसमें जब प्रज्ञानघनता आजाती है, तब वह आनन्द-
मय किंवा आनन्द प्रचुर हो जाता है। वही आनन्दमय, [जिन
में चैतन्य की अधिकता रहती है—जो चैतन्य के प्रतिबिम्ब से
से युक्त होती हैं] उन अपनी चेतोमय वृत्तियों से आनन्द को
भोगा करता है ।
विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराधुना ।
स लयेनैकतां प्राप्तो बहुतन्दुलपिष्टवत् ॥६९॥
जो आत्मा पहले जागरणकाल में विज्ञानमय आदि

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३

Page 465Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
मय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुमय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, आपो-
मय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतजोमय, काममय
अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय आदि] आकारविशेषों से युक्त
था, वही अब लय के कारण [विज्ञान आदि उपाधियों के विलीन
हो जाने के कारण] एकरूप हो जाता है। मानो बहुत से चावलों
को पीस कर उन की एक पिष्ठी बना ली गयी हो । [इसी को
उसका एकीभाव कहते हैं ]
प्रज्ञानानि पुरा बुद्धिवृत्तयोऽथ घनोऽभवत् ।
घनत्वं हिमबिन्दूना मुदग्देशे यथा तथा ॥७०॥
[उस श्रुति के प्रज्ञानघन शब्द का अर्थ यह है कि]—पुरा
अर्थात् पहले जाग्रदादि के समय घटादि को विषय करने वाली
प्रज्ञान नाम की जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थीं, अब [सुषुप्ति-
काल के आजाने पर जब कि कोई भी घटादि विषय नहीं रहते
तब] उन सब वृत्तियों का एक घन हो जाता है [अब उनका
केवल एक चिद्रूप ही हो जाता है] जैसे कि उत्तर दिशा में बरफ़
की बहुत सी बूंदों का घनाकार पिण्ड हो गया हो ।
तद्घनत्वं साक्षिभावं दुःखाभावं प्रचक्षते ।
लौकिकास्तार्किका यावद्दुःखवृत्तिविलोपनाव् ॥७१॥
यह जो वेदान्तों में साक्षी कहाने वाली प्रज्ञानघनता है उसी
को तो लौकिक लोग [जिन्हें शास्त्र का संस्कार ही नहीं है] तथा
तार्किक आदि लोग, दुःखाभाव कहते हैं या समझते हैं। क्योंकि
उस समय जितनी भी दुःखवृत्तियां होती हैं उन सभी का विलय
हो जाता है [वे लोग इसी बात को न समझ कर उस प्रज्ञान-
घनता को ही दुःखाभाव समझ बैठते हैं]

Page 466Permalink

४४४ पञ्चदशी
अज्ञानविम्बिता चित् स्यान्मुखमानन्दभोजने ।
भुक्तं ब्रह्मसुखं त्यक्त्वा बहिर्यात्यथ कर्मणा ॥७२॥
[उस श्रुति के चेतो मुख का अर्थ यह है कि]—सुषुप्ति-
काल के ब्रह्मानन्द को भोगने का मुख [साधन] अज्ञानवृत्ति में
प्रतिबिम्बित चैतन्य ही तो है [उस ब्रह्मानन्द को भोगता हुआ
भी वह उसे छोड़कर जो कि दुःखों के घर [इस जागरण] में
आता है उसका कारण यह है कि—यह जीव पुण्य पाप नामक
कर्मपाश में बंधा हुआ है, इस कारण उस] कर्म से प्रेरित हुआ
यह जीव, साक्षात् देखे हुए भी ब्रह्मानन्द को छोड़ कर, बाहर
निकल आता है अर्थात् जाग पड़ता है ।
कर्म जन्मान्तरेऽभूद् यत् तद्योगाद् बुध्यते पुनः ।
इति कैवल्यशाखायां कर्मजो बोध ईरितः ॥७३॥
पुनश्च जन्मान्तरकर्मयोगात् स एव जीवः स्वपिति प्रबुद्धः इस
कैवल्यशाखा में कहा गया है कि—जन्मान्तर में किये हुए कर्मों
से यह प्राणी फिर जागरण में आ जाता है । अर्थात् जागरण
अवस्था यों ही बिना कारण के नहीं आजाती किन्तु यह कर्मज है ।
कंचित्कालं प्रबुद्धस्य ब्रह्मानन्दस्य वासना ।
अनुगच्छेद् यतस्तूष्णीमास्ते निर्विषयः सुखी ॥७४॥
[सुप्ति में ब्रह्मानन्द भोगना मिलजाता है इसका चिह्न भी
सुनलो]—जब आदमी जाग जाता है तब भी थोड़ी देर तक
सुषुप्ति में जिस ब्रह्मानन्द का अनुभव उसने किया था उसी
के संस्कार चालू रहते हैं। जभी तो जागने के प्रारम्भ में बिना
ही विषय के सुखी होकर यह प्राणी चुपचाप बैठा रहता है

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५

Page 467Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५
[ इसी से जानते हैं कि उस ने ब्रह्मानंद को भोगा था और अब
भी उसके संस्कारों से वह सुखी हो रहा है ]
कर्मभिः प्रेरितः पश्चान्नानादुःखानि भावयन् ।
शनै र्विस्मरति ब्रह्मानन्दमेषोऽखिलो जनः ॥७५॥
[फिर सदा मौन होकर ही क्यों नहीं बैठा रहता इसका
कारण भी सुन लो] पूर्वोक्त कर्मों से प्रेरित हुए सभी प्राणी पीछे
से जब संसार के नाना दुःखों की भावना करने लगते हैं तब
फिर ये सभी प्राणी धीरे धीरे [हाय ! हाय ! उस जगज्जीवन]
ब्रह्मानन्द को भूल जाते हैं ।
प्रागूर्ध्वमपि निद्रायाः पक्षपातो दिने दिने ।
ब्रह्मानन्दे नृणां, तेन प्राज्ञोऽस्मिन् विवदेत कः ॥७६॥
[ब्रह्मानन्द में संशय न करने का एक यह भी कारण है
कि] सभी मनुष्यों को नींद से पहले और नींद के पीछे ब्रह्मा-
नन्द में स्नेह बना रहता है [जभी तो निद्रा के आदि में कोमल
शय्या आदि का संपादन करते हैं। निद्रा समाप्त हो जाने पर
उस ब्रह्मानन्द को न छोड़ने के कारण चुप चाप बैठे रहते हैं]
ऐसी अवस्था में कौन समझदार होगा जो इस आनन्द में
विवाद करेगा ?
ननु तूष्णीं स्थितौ ब्रह्मानन्दश्चेद् भाति, लौकिकाः।
अलसाश्चरितार्थाः स्युः, शास्त्रेण गुरुणात्र किम् ॥७७॥
जो ब्रह्मानन्दानुभव गुरुशुश्रूषा आदि प्रयासों से मिला
करता है वह अगर चुप रहने मात्र से किसी को मिल सकता
हो तब तो लौकिक पामर लोग तथा आलस में पड़े रहने वाले

Page 468Permalink

४४६ पञ्चदशी
अहदी लोग सभी कृतार्थ हो जाने चाहिये । फिर श्रवणादि
परिश्रम की क्या आवश्यकता रह जायगी ?
बाढं, ब्रह्मेति विद्युश्चेत् कृतार्था स्तावतैव ते ।
गुरुशास्त्रे विनात्यन्तं गम्भीरं ब्रह्म वेत्ति कः ॥७८॥
‘यह ब्रह्मानन्द है’ ऐसा यदि कोई उनमें से पहचान जाय
तो वह अवश्य ही कृतार्थ हो कर रहे । परन्तु गुरु और शास्त्र
के बिना [मन वाणी से अगम्य सर्वज्ञ सर्वान्तर सर्वात्मरूप]
उस गम्भीर ब्रह्म को और किस उपाय से कौन जान सकता
है ? [अर्थात् गुरु और शास्त्र के बिना इस तत्व का पता नहीं
चलता]
जानाम्यहं त्वदुक्त्याद्य कुतो मे न कृतार्थता ।
शृण्वत्र त्वादृशो वृत्तं प्राज्ञंमन्यस्य कस्यचित् ॥७९॥
यदि यह पूछा जाय कि—तुम्हारे कहने से मैं ब्रह्मानन्द
को जान तो गया हूँ परन्तु मैं कृतार्थ क्यों नहीं हो पाया हूँ ?
इसके उत्तर में अपने जैसे किसी प्राज्ञाभिमानी का वृत्तान्त सुन
लीजिये ।
चतुर्वेदविदे देयमिति शृण्वन्नवोचत ।
वेदाश्चत्वार इत्येवं वेद्मि मे दीयतां धनम् ॥८०॥
किसी तुम्हारे जैसे ने यह सुना था कि—चतुर्वेदज्ञ को
यह बहुत सा धन दे दो । बस इस बात को सुन कर वह कह
उठा कि वेद चार हैं यह तो मैं जानता ही हूँ और यों मैं चतु-
र्वेदज्ञ हो गया हूँ, इस कारण यह धन मुझे ही दे दो [ इसी
तरह तुम भी कहते हो कि मैं ब्रह्मज्ञ हो गया हूँ मैं कृतार्थ क्यों
नहीं हुआ ?]

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४७

Page 469Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४७
संख्यामेवेष जानाति न तु वेदानशेषतः ।
यदि तर्हि त्वमप्येवं नाशेषं ब्रह्म वेत्सि हि ॥८१॥
यह तो संख्या को ही जानता है, वेदों के स्वरूप को यह
सम्पूर्ण रीति से नहीं जानता है, ऐसा यदि तुम कहो तो हम
कहेंगे कि तुम भी तो ऐसे ही सम्पूर्ण ब्रह्म को नहीं जानते हो ।
अखण्डैकरसानन्दे मायातत्कार्यवर्जिते ।
अशेषत्वसशेषत्ववार्ताविसर एव कः ॥८२॥
[शंका करने वाला कहता है] जो अखण्ड एक रस आनन्द
है, जिसमें माया और उसका कार्य कुछ भी नहीं है, उसमें
सम्पूर्ण और अधूरे की बात को अवसर ही कहाँ है ?
शब्दानेव पठस्याहो तेषामर्थं च पश्यसि ।
शब्दपाठेऽर्थबोधस्ते संपाद्यत्वेन शिष्यते ॥८३॥
[उत्तर] 'अखण्डैकरस' 'अद्वितीय' 'सच्चिदानन्दरूप' इत्यादि
शब्द ही शब्द कहना जानते हो अथवा उनका जो स्वगतादि-
भेदशून्यता रूपी गम्भीर अर्थ है उसको भी पहचानते हो ?
क्योंकि मुख से शब्दों का उच्चारण कर देने पर भी तुम्हें अर्थ
बोध करना शेष रह ही जाता है ।
अर्थे व्याकरणाद् बुद्धे साक्षात्कारोंऽवशिष्यते ।
स्यात् कृतार्थत्वधीर्यावत् तावद् गुरुमुपास्व भोः ॥८४॥
व्याकरणादि से परोक्षज्ञान जब कर लिया जाता है, तब भी
संशयादि को हटा कर प्रत्यक्ष करना शेष रह ही जाता है। जब
तक तुम्हारी बुद्धि तुम्हें अपने कृतार्थ होने का नीरव संदेश न
सुनादे तब तक तुम गुरु की उपासना करते रहो। [जब कृतार्थत्व
बुद्धि उत्पन्न हो जाय तभी ज्ञान की सम्पूर्णता समझ लेना]

Page 470Permalink

१४८ पंचदशी
आस्तमेतद् यत्र यत्र सुखं स्याद् विषयैर्विना ।
तत्र सर्वत्र विद्ध्येतां ब्रह्मानन्दस्य वासनाम् ॥८५॥
इस सब को यहीं छोड़कर अब प्रकृत बात कहते हैं कि—
जहां जहां [ तूष्णींभाव आदि के समय ] विषयानुभव के बिना
भी सुख होता हो वहां सभी जगह इस ब्रह्मानन्द की वासना को
समझ लो ।
विषयेष्वपि लब्धेषु तदिच्छोपरमे सति ।
अन्तर्मुखमनोवृत्तावानन्दः प्रतिबिम्बति ॥८६॥
विषयों के मिल जाने पर भी जब उन विषयों की इच्छा
शान्त हो जाती और मन अन्तर्मुख होता है तब उस अन्तर्मुख
मन में इसी आनन्द का प्रतिबिम्ब पड़ा करता है । [ यही
'विषयानन्द' किंवा दुनियादारी का सुख कहाता है ]
ब्रह्मानन्दो वासना च प्रतिबिम्ब इति त्रयम् ।
अन्तरेण जगत्यस्मिन्नानन्दो नास्ति कश्चन ॥८७॥
'ब्रह्मानन्द' 'वासनानन्द' तथा 'विषयानन्द' इन तीन
आनन्दों के बिना जगत् में कोई आनन्द ही नहीं है ।
'ब्रह्मानन्द' वह है जो सुषुप्ति में स्वप्रकाशरूप से भासा
करता है । 'वासनानन्द' वह है जो कि चुप बैठने पर विषयानु-
भव के बिना ही प्रतीत हुआ करता है। अभिलषित विषय
के मिलने पर जब कि मन अन्तर्मुख हो जाया करता है तब
जो उसमें आत्मानन्द का प्रतिबिम्ब हो जाता है वह तो
'विषयानन्द' कहाता है ।
शंका—इसी प्रकरण के ११ वें श्लोक में “आनन्दस्त्रिविधो 'ब्रह्मा-
नन्दो' 'विद्यासुखं' तथा 'विषयानन्दः” इस प्रकार तीन तरह का आनन्द

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४९

Page 471Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४९
बताया है । अब यहां ब्रह्मानन्द वासनानन्द और आनन्द का प्रतिबिम्ब
नों नये ही तीन भेद कर दिये हैं। यह पूर्वोत्तर विरोध है। इसके अति-
रिक्त इसी प्रकरण के 'यावद्यावदहंकार'इस ९८ वें श्लोक में तथा'तादृक्
प्रमान्' इस १२१ वें श्लोक में निजानन्द और मुख्यानन्द का भी वर्णन
है। तथा अगले आत्मानन्द प्रकरण में 'मन्दप्रज्ञं तु जिज्ञासु मात्मानन्देन
बोधयेत्'उससे भिन्न ही आत्मानन्द का वर्णन आया है। अद्वैतानन्द के
पहले श्लोक में योगानन्द नाम का भेद भी मालूम हो रहा है। अद्वैता-
नन्द के १०५ श्लोक में अद्वैतानन्द एक नया ही भेद देख रहे हैं। ऐसी
अवस्था में इन तीनों आनन्दों के अतिरिक्त और कोई आनन्द है ही
नहीं" यह कहना विरुद्ध प्रतीत होता है। उत्तर-अन्तःकरण वृत्तिरूप
होने के कारण से विद्यानन्द भी विषयानन्द में ही अन्तर्भूत हो जाता है।
तथा निजानन्द मुख्यानन्द आत्मानन्द योगानन्द और अद्वैतानन्द नाम
के सभी आनन्द ब्रह्मानन्द से भिन्न कुछ भी नहीं है। इसी प्रकरण के
९८ वें श्लोक में जिस निजानन्द का वर्णन है वह भी ब्रह्मानन्द से अति-
रिक्त तत्व नहीं है क्योंकि इससे अगले १०० वें श्लोक में इस निजानन्द
को ही ब्रह्मानन्द कहा है। मुख्यानन्द भी ब्रह्मानन्द ही है क्योंकि आगे
आनन्दवासना की उपेक्षा करके मुख्यानन्द की भावना, तत्पर होकर
करने की बात कही है यों इस में ब्रह्मानन्द को ही मुख्यानन्द कहा है।
आत्मानन्द और अद्वैतानन्द तो ब्रह्मानन्द ही है। इस कारण ब्रह्मानन्द
वासना और प्रतिबिम्ब वाला भेद ठीक ही है।
तथा च विषयानन्दो वासनानन्द इत्ययम् ।
आनन्दौ जनयन्नास्ते ब्रह्मानन्दः स्वयंप्रभः ॥८८॥
यों आनन्द के तीन प्रकार का होने पर भी जो स्वयंप्रकाश
आनन्द 'विषयानन्द' को और 'वासनानन्द' को उत्पन्न किया
करता है उसी को 'ब्रह्मानन्द' जानना चाहिये।
३०

Page 472Permalink

४५० पञ्चदशी
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यः स्वप्रकाशचिदात्मके ।
ब्रह्मानन्दे सुप्तिकाले सिद्धे सत्यन्यदा शृणु ॥८९॥
सुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति इत्यादि 'श्रुतियों'
से, 'मैं सुख पूर्वक सोया था' इत्यादि परामर्श के और तरह से
न हो सकने वाली 'युक्ति' से तथा सुषुप्ति के 'अनुभव' से अब
तक यह सिद्ध किया जा चुका है कि सुषुप्ति काल में स्वयंप्रकाश
ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में भी ब्रह्मानन्द को
जानने का जो उपाय है उसका वर्णन किया जायगा उसे सुन लो।
य आनन्दमयः सुप्तौ स विज्ञानमयात्मताम् ।
गत्वा स्वप्नं प्रबोधं वा प्राप्नोति स्थानभेदतः ॥९०॥
सुषुप्तिकाल का जो उपरिवर्णित 'आनन्दमय' है, वह जब
विज्ञानमयता को पाता है तब फिर स्थानभेद के कारण कर्मानु-
सार 'स्वप्न' या 'जागरण' में आता है ।
नेत्रे जागरणं कण्ठे स्वप्नः सुप्तिर्हृदम्बुजे ।
आपादमस्तकं देहं व्याप्य जागर्ति चेतनः ॥९१॥
(नेत्र में 'जागरण' रहता है कण्ठ में 'स्वप्न' होता है हृदय
कमल में 'सुषुप्ति' होती है ।) यह जीव केवल नेत्र ही नहीं किन्तु
पैर से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त करके जागा करता है ।
आत्मा का स्वाभाविक स्थान हृदय है परन्तु अहंकार और
ममता की प्रेरणा से जब वहां नहीं रहा जाता तब आत्मा का
प्रतिबिम्ब विषयभोगलिप्सा के लिये मलिन हो जाता है तब
जाग्रत अवस्था में तो नेत्र तथा स्वप्न अवस्था में कण्ठ उस के
निवास स्थान बन जाते हैं ।

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५१

Page 473Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५१
देहतादात्म्यमापन्नस्तप्तायःपिण्डवत्ततः।
अहं मनुष्य इत्येवं निश्चित्यैवावतिष्ठते ॥९२॥
[ देह को व्याप्त करने की रीति यह है कि] तपे हुए लोह-
पिण्ड के साथ जैसे अग्नि का तादात्म्य हो जाता है इसी तरह
मनुष्य जाति वाले देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर 'मैं
मनुष्य हूँ' यह निश्चय करके बैठ जाता है। [ फिर उसे अपने
मनुष्य होने में थोड़ा सा भी संशय नहीं रहता ]
उदासीनः सुखी दुःखी त्यवस्थात्रयमेत्यसौ ।
सुखदुःखे कर्मकार्ये, त्वौदासीन्यं स्वभावतः ॥९३॥
[देह के साथ तादात्म्याभिमान कर लेने के कारण] यह जीव
उदासीन, सुखी, दुःखी इन तीन अवस्थाओं को प्राप्त होता है,
इन तीनों अवस्थाओं में से सुख और दुःख ये दोनों कर्मजन्य
हैं [अर्थात् सुखी या दुखीपन भी कर्मजन्य ही है] परन्तु
औदासीन्य तो स्वभाव से ही होता है [जब कर्म बन्द हो जाता
है तब उदासीनता स्वभाव से ही आ जाती है। उसके लिए
कर्म की आवश्यकता नहीं होती।]
बाह्यभोगान् मनोरज्यात् सुखदुःखे द्विधा मते ।
सुखदुःखान्तरालेषु भवेत् तूष्णीमवस्थितिः ॥९४॥
'बाह्य भोग' तथा 'मनोराज्य' से दो दो प्रकार सुख दुःख
होते हैं [ एक बाह्य भोगों से मिलने वाले सुख दुःख दूसरे
मनोराज्य से मिलने वाले सुख दुःख] परन्तु कभी कभी ऐसा
भी होता है कि न तो सुख ही होता है और न दुःख ही। सुखों
और दुःखों के बीच बीच चुप रहने की अवस्था आती है।

Page 474Permalink

४५२ पञ्चदशी
न कापि चिन्ता मेऽस्त्यद्य सुखमास इति ब्रुवन्।
औदासीन्ये निजानन्दभानं वक्त्यखिलो जनः ॥९५॥
जब कोई मनुष्य यह कहता है कि आज मुझे कुछ भी
चिन्ता नहीं है, इस लिये आज मैं सुख पूर्वक बैठा हूँ, तब वह
दूसरे शब्दों में यह स्वीकार कर रहा है कि उदासीनता के
समय स्वरूपानन्द की स्फूर्ति हुआ करती है [इससे यह जान
लेना चाहिय कि जागरण काल में भी आत्मानन्द का भान
प्राणियों को होता ही है।]
अहमस्मीत्यहंकारसामान्याच्छादितत्वतः।
निजानन्दो न मुख्योऽयं, किन्त्वसौ तस्य वासना ॥९६॥
[इस आनन्द को ब्रह्मानन्द न मानकर वासनानन्द ही
मानने का कारण भी सुन लो] यह उपर्युक्त आनन्द 'मैं हूँ' ऐसे
एक सामान्य [सूक्ष्म] अहंकार से आवृत रहता है [इस आनन्द
को भोगते समय अपने 'देवदत्तादिपने' का विचार नहीं रहता
किन्तु मैं हूँ ऐसा एक सामान्य (अस्पष्ट) अहंकार बना रहता
है] इस कारण यह आनन्द मुख्य आनन्द नहीं है। किन्तु यह
तो मुख्यानन्द की वासना है। [इसी से इसको 'वासनानन्द'
कहते हैं।] मुख्य आनन्द में मैं हूँ ऐसा अहंकार नहीं रहना
चाहिये।
नीरपूरितभाण्डस्य बाह्ये शैत्यं न तज्जलम्।
किन्तु नीरगुणस्तेन नीरसत्तानुमीयते ॥९७॥
जल से भरा हुआ जो घड़ा है, उसके बाहर की ओर जब
स्पर्श करते हैं, तब जो शैत्य प्रतीत होता है, वह शैत्य 'जल'
नहीं है [क्योंकि उसमें द्रवपना नहीं पाया जाता।] वह शैत्य

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३

Page 475Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
तो जल का गुण है। उस शैत्य से तो जल के होने का अनु-
मान भर हुआ करता है।
यावद्यावदहङ्कारो विस्मृतोऽभ्यासयोगतः ।
तावत्तावत्सूक्ष्मदृष्टे र्निजानन्दोऽनुमीयते ॥९८॥
[प्रकृत बात तो यह हुई कि] निरोध समाधि के अभ्यास
से जितना जितना अहंकार का विस्मरण होता जायगा—अहम्
आदि वृत्तियें विलीन होती जायंगी और योगी के चित्त में
सूक्ष्मता आती जायगी] उतना ही उतना निजानन्द अनुभव में
आने लगेगा अथवा उतना ही उतना निजानन्द व्यक्त होने
लगेगा ऐसा अनुमान से जाना जाता है।
अनुमान यों करना चाहिए—जिन क्षणों में हम अहंकार
का संकोच करने बैठते हैं, उनमें पिछले पिछले क्षणों में, पहले
पहले क्षणों से अधिक आत्मानन्द आविर्भूत होता जाता है।
क्योंकि अहंकार का संकोच करने वाले क्षणों की लम्बाई उत्त-
रोत्तर बढ़ती ही जाती है। अहंकार के विस्तार ने आत्मानन्द
को ढक रक्खा था। अब अहंकार का संकोच होने से वह
निजानन्द उघड़ने लगता है—फैलने लग पड़ता है। तात्पर्य यह
है कि—जैसे जैसे अहंकार का संकोच बढ़ने लगेगा तैसे तैसे
निजानन्द भी बढ़ता ही जायगा।
सर्वात्मना विस्मृतः सन् सूक्ष्मतां परमां व्रजेत् ।
अलीनत्वान्न निद्रैषा ततो देहोऽपि नो पतेत् ॥९९॥
जब अहंकार का विस्मरण पूर्णरूप से हो जाता है तब यह
परम सूक्ष्म हो जाता है [सब वृत्तियों के विलीन हो जाने पर
भी] अन्तःकरण का स्वरूप विलीन नहीं होता इसलिए उसे

Page 476Permalink

४५४ पञ्चदशी


निद्रा नहीं कह सकते [निद्रा तो वही है जब कि बुद्धि कारण
रूप में पहुँच गई हो] अन्तःकरण के स्वरूप का विलय न होने
से ही योगी का देह निद्रा की तरह गिर नहीं पड़ता [इससे
समझ लेना चाहिए कि अन्तःकरण का स्वरूप अभी विलीन
नहीं हुआ है।]
न द्वैतं भासते नापि निद्रा तत्रास्ति यत् सुखम् ।
स 'ब्रह्मानन्द' इत्याह भगवानर्जुनं प्रति ॥१००॥
गीता के छठे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा
है कि—जिस समय द्वैत का भान बन्द हो जाय, और नींद भी
न आय, उस समय जो सुख किसी को भासता हो, बस वही
'ब्रह्मानन्द' है।
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥१०१॥
गीता के ब्रह्मानन्दबोधक वे श्लोक ये हैं—धीर बुद्धि के
सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की साधना करो। जब मन
को आत्मसंस्थ कर चुको [जब मन को यह निश्चय करा चुको
कि यह सब कुछ आत्मा ही है 'आत्मा से भिन्न यह कुछ भी
नहीं है'] तब बस फिर कुछ भी न सोचो। [यह तो योग की
अन्तिम हालत है।]
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥१०२॥
[ऐसी ऊँची अवस्था को जो योगी लाना चाहें वह पहले
यह करें कि] जो मन [स्वभाव दोष से ही] चंचल है, जो अस्थिर
है [जो एक विषय में बंध कर कभी नहीं रहता] ऐसा मन जिस

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५५

Page 477Permalink

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५५
जिस शब्दादि कारण को लेकर बाहर निकल पड़ता हो, उस
उस शब्दादि की ओर से उसे रोक कर [ उन उन शब्दादियों
के मिथ्यात्व आदि दोष दिखा कर, उसे वैराग्य का उपदेश
देकर, वहाँ से हटा कर] आत्मा के वश में करता जाय। [इस
प्रकार योगाभ्यासी पुरुष का मन अभ्यास के प्रताप से आत्मा
में ही शान्त होने लगेगा । ]
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥१०३॥
[ मन के शान्त होने पर जो होता है उसे भी सुन लो ।
संसार की मोह ममता आदि ही बड़े क्लेश कहाते हैं। ये क्लेश
रजोगुण से उत्पन्न होते हैं] वह रजोगुण जिसका शान्त हो
चुका हो, इसी कारण जिसका मन प्रशान्त हो गया हो [ जिसके
मन में विक्षेपों का उठना सर्वथा रुक गया हो। 'यह सब ब्रह्म
ही है' इस निश्चय के कारण] जिसे ब्रह्मभाव की प्राप्ति हो गई
हो जो [जीवन्मुक्त हो गया हो] जो अकल्मष अर्थात् धर्माधर्म
से छूट चुका हो, ऐसे इस योगी को ही उत्तम सुख मिलता
है [अर्थात् उस सुख के क्षय हो जाने या उसस अधिक सुख
के होने का दोष नहीं होता । ]
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥१०४॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः ॥१०५॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥१०६॥