पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५३६ पञ्चदशी
'स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा
शयीतैवमेवैष एतच्छेते' (बृ. २-१-१९) इस श्रुति में कहा गया
है कि—जैसे स्तनपायी बालक पेट भर कर स्तन पीकर कोमल
शय्या पर पड़ा पड़ा हंसता रहता है और अपना पराया न
पहचानने के कारण रागद्वेष से रहित होकर सुख की मूरत
बना रहता है, या जैसे सार्वभौम महाराज [ अशुद्ध बुद्धि होने
पर भी ] सब मानुषानन्दों से युक्त होने के कारण, जब कि उसे
किसी वस्तु की चाह नहीं रहती तब मानुषानन्द की सीमा पर
पहुंच कर आनन्द की मूर्ति दीखा करता है, या जैसे कोई महा
ब्राह्मण जिसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो चुका हो जब 'मैं कृत कृत्य
हो चुका' ऐसी विद्यानन्द की सीमा को पा जाता है किंवा
जीवन्मुक्ति को पा लेता है, तब परमानन्द स्वरूप ही हो जाता
है । ठीक इसी प्रकार सोया हुआ पुरुप भी आनन्द रूप हो
गया होता है ।
मुग्धबुद्धातिबुद्धानां लोके सिद्धा सुखात्मता ।
उदाहृतानामन्ये तु दुःखिनो न सुखात्मकाः ॥५३॥
मुग्ध, बुद्ध और अतिबुद्ध ये ही तीन लोक में सुखी माने
जाते हैं [ जिनको विवेक नहीं है, उनमें बालक सब से सुखी
माना जाता है । जिन्हें कुछ विवेक है, उनमें सार्वभौम राजा
सर्वाधिक सुखी गिना जाता है । जो अतिविवेकी हैं उनमें
आत्मदर्शी को सर्वाधिक सुखी मानते हैं ] इन तीनों के अति-
रिक्त और तो सब सदा रागद्वेषादिसंकुल रहने के कारण दुःखी
ही बने रहते हैं । वे सुखी कभी नहीं होते [ इसी कारण उन
किसी का दृष्टान्त नहीं दिया है ]