Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 473 of 726

Read in context
Page 473

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५१
देहतादात्म्यमापन्नस्तप्तायःपिण्डवत्ततः।
अहं मनुष्य इत्येवं निश्चित्यैवावतिष्ठते ॥९२॥
[ देह को व्याप्त करने की रीति यह है कि] तपे हुए लोह-
पिण्ड के साथ जैसे अग्नि का तादात्म्य हो जाता है इसी तरह
मनुष्य जाति वाले देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर 'मैं
मनुष्य हूँ' यह निश्चय करके बैठ जाता है। [ फिर उसे अपने
मनुष्य होने में थोड़ा सा भी संशय नहीं रहता ]
उदासीनः सुखी दुःखी त्यवस्थात्रयमेत्यसौ ।
सुखदुःखे कर्मकार्ये, त्वौदासीन्यं स्वभावतः ॥९३॥
[देह के साथ तादात्म्याभिमान कर लेने के कारण] यह जीव
उदासीन, सुखी, दुःखी इन तीन अवस्थाओं को प्राप्त होता है,
इन तीनों अवस्थाओं में से सुख और दुःख ये दोनों कर्मजन्य
हैं [अर्थात् सुखी या दुखीपन भी कर्मजन्य ही है] परन्तु
औदासीन्य तो स्वभाव से ही होता है [जब कर्म बन्द हो जाता
है तब उदासीनता स्वभाव से ही आ जाती है। उसके लिए
कर्म की आवश्यकता नहीं होती।]
बाह्यभोगान् मनोरज्यात् सुखदुःखे द्विधा मते ।
सुखदुःखान्तरालेषु भवेत् तूष्णीमवस्थितिः ॥९४॥
'बाह्य भोग' तथा 'मनोराज्य' से दो दो प्रकार सुख दुःख
होते हैं [ एक बाह्य भोगों से मिलने वाले सुख दुःख दूसरे
मनोराज्य से मिलने वाले सुख दुःख] परन्तु कभी कभी ऐसा
भी होता है कि न तो सुख ही होता है और न दुःख ही। सुखों
और दुःखों के बीच बीच चुप रहने की अवस्था आती है।