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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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४४४ पञ्चदशी
अज्ञानविम्बिता चित् स्यान्मुखमानन्दभोजने ।
भुक्तं ब्रह्मसुखं त्यक्त्वा बहिर्यात्यथ कर्मणा ॥७२॥
[उस श्रुति के चेतो मुख का अर्थ यह है कि]—सुषुप्ति-
काल के ब्रह्मानन्द को भोगने का मुख [साधन] अज्ञानवृत्ति में
प्रतिबिम्बित चैतन्य ही तो है [उस ब्रह्मानन्द को भोगता हुआ
भी वह उसे छोड़कर जो कि दुःखों के घर [इस जागरण] में
आता है उसका कारण यह है कि—यह जीव पुण्य पाप नामक
कर्मपाश में बंधा हुआ है, इस कारण उस] कर्म से प्रेरित हुआ
यह जीव, साक्षात् देखे हुए भी ब्रह्मानन्द को छोड़ कर, बाहर
निकल आता है अर्थात् जाग पड़ता है ।
कर्म जन्मान्तरेऽभूद् यत् तद्योगाद् बुध्यते पुनः ।
इति कैवल्यशाखायां कर्मजो बोध ईरितः ॥७३॥
पुनश्च जन्मान्तरकर्मयोगात् स एव जीवः स्वपिति प्रबुद्धः इस
कैवल्यशाखा में कहा गया है कि—जन्मान्तर में किये हुए कर्मों
से यह प्राणी फिर जागरण में आ जाता है । अर्थात् जागरण
अवस्था यों ही बिना कारण के नहीं आजाती किन्तु यह कर्मज है ।
कंचित्कालं प्रबुद्धस्य ब्रह्मानन्दस्य वासना ।
अनुगच्छेद् यतस्तूष्णीमास्ते निर्विषयः सुखी ॥७४॥
[सुप्ति में ब्रह्मानन्द भोगना मिलजाता है इसका चिह्न भी
सुनलो]—जब आदमी जाग जाता है तब भी थोड़ी देर तक
सुषुप्ति में जिस ब्रह्मानन्द का अनुभव उसने किया था उसी
के संस्कार चालू रहते हैं। जभी तो जागने के प्रारम्भ में बिना
ही विषय के सुखी होकर यह प्राणी चुपचाप बैठा रहता है