पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३९
जाना' यों निद्रा के समय के सुख और अज्ञान दोनों का स्मरण,
सोकर उठा हुआ पुरुष किया करता है [ इस कारण कहना
पड़ता है कि सुप्ति में सुख है ]
परामर्शोऽनुभूतेऽस्तीत्यासीदनुभवस्तदा ।
चिदात्मत्वात् स्वतो भाति सुखमज्ञानधीस्ततः ॥६०॥
जो भी परामर्श होता है वह अनुभूत विषय का ही होता
है [ अनुभव न किये हुए विषय का तो स्मरण हो ही नहीं सकता ]
इस कारण उस समय सुप्ति में सुख का अनुभव माना जाता
है। सुख का अनुभव करने के साधनों के बिना ही वह सुख स्वतः
प्रतीत हो जाता है क्योंकि वह सुख चिदात्मा है [ अर्थात् वह
सुख स्वयंप्रकाशचिद्रूप है ] । उसी स्वयंप्रकाश सुख के सहारे
से ही [ उस सुख को ढकने वाले ] अज्ञान की भी प्रतीति हो
जाती है ।
ब्रह्म विज्ञान मानन्दमिति वाजसनेयिनः ।
पठन्त्यतः स्वप्रकाशं सुखं ब्रह्मैव नेतरत् ॥६१॥
वाजसनेयी शाखा वाले कहते हैं कि- 'ब्रह्म' 'विज्ञान' तथा
'आनन्द' दो रूप का है । इस कारण जो भी स्वयं प्रकाश सुख
है वह सब ब्रह्म तत्व ही है । वह और कुछ नहीं है [फिर सुषुप्ति
के स्वयं प्रकाश सुख को भी ब्रह्मरूप ही मानना चाहिए]
यदज्ञानं तत्र लीनौ तौ विज्ञानमनोमयौ ।
तयोर्हि विलयावस्था निद्राऽज्ञानं च सैव हि ॥६२॥
['मैंने उस समय कुछ नहीं जाना' इस स्मरण की अन्य-
थानुपपत्ति से जिस अज्ञान को हम पहचानते हैं] उसी अज्ञान
में प्रमाता और प्रमाण कहाने वाले विज्ञानमय और मनोमय