पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
ध्यानदीपप्रकरणम् ३९७
ध्यानदीपप्रकरणम् ३९७
आत्मा केवल मोह के आवरण में छिपा रहता है, उनके लिये तो
'सांख्य' नाम का तत्व विचार ही मुख्य उपाय है । क्योंकि
उनको उसीसे झटपट सिद्धि मिल जाती है ।
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥१३४॥
[योग और सांख्य (उपासना और तत्वज्ञान) दोनों ही
तत्वज्ञान के द्वारा मुक्ति को दे देते हैं। यह बात गीता में भी
कही गयी है । ] कि—सांख्यमार्गी लोग जिस पद को पाते
हैं योगमार्गी लोग भी वहाँ पहुँच जाते हैं। जो ज्ञानी सांख्य
और योग को फल में एक समझ लेता है—इनमें भेद नहीं
जानता है, वही शास्त्र के मर्म का जानने वाला है।
तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्य मिति हि श्रुतिः ।
यस्तु श्रुते र्विरुद्धः स आभासः सांख्ययोगयोः ॥१३५॥
[ श्वेताश्वतर श्रुति में भी कहा है कि ] इस जगत् का जो
मूल कारण है,वह सांख्य या योग किसीसे भी जाना जासकता
है । आज कल 'सांख्य और योग' नामसे प्रसिद्ध शास्त्रों में जो
बहुत सी बातें श्रुति के विरुद्ध दीख पड़ती हैं वे 'सांख्य' या
योग नहीं है। वे तो 'सांख्या-भास' 'योगाभास' हैं। [आभास की
बाधा जैसे होजाती है वैसे ही उनकी भी बाधा होजायगी ]
उपासनं नापि पक्वमिह यस्य परत्र सः ।
मरणे ब्रह्मलोके वा तत्वं विज्ञाय मुच्यते ॥१३६॥
इस जन्म में जिस की उपासना ( योग ) परिपक्व न हो
चुकी हो, वह आगे चल कर या तो मरते समय या ब्रह्मलोक
में पहुँच कर, तत्व को जान जाता है और मुक्त हो जाता है।
३९८ पञ्चदशी
[उपासक तत्वज्ञान होने से पहले बीच में ही मर जाय तो
भी मोक्ष से वंचित नहीं रह जाता है ] ।
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति यच्चित्तस्तेनं यातीति शास्त्रतः ॥१३७॥
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरं तं तमेवैति ( प्र. ८-६)
प्राणी अपने मरण काल में जिस जिस भाव को स्मरण करके
शरीर को छोड़ता है, उसी उस भाव को प्राप्त हो जाता है।
यच्चित्तस्तेनैव प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथा संक-
ल्पितं लोकं नयति ( प्र. ३-१०) [मरते समय जैसा चित्त
अर्थात् संकल्प होता है, मरते समय जिस देवता मनुष्य पशु
पक्षी और वृक्ष आदि के शरीर को अच्छा मान लेता है, उस
संकल्प से वह अपनी सब इन्द्रियों के साथ मुख्य प्राण में
आ जाता है अर्थात् तब केवल प्राण व्यापार चलता है। इन्द्रिय
व्यापार रुक जाता है। वह प्राण तेज अर्थात् उदान से युक्त हो
कर भोक्ता को भी संकल्पानुसारी लोक में ले जाता है। कर्म
करते समय जैसे संकल्प रहे हैं मरते समय वे वासना रूपसे
प्रकट होते हैं। अगले जन्म में उन ही वासनाओं का शरीर बन
जाता है। मरण के बाद जैसा शरीर मिलना होता है, वैसी ही
वासनायें होती हैं और वे ही योनियां मुमूर्षु को दीखा करती हैं]
ऊपर के गीतावाक्य तथा इस श्रुति के कथनानुसार मरते
समय के ज्ञान से मुक्ति मिलने की बात समझ में आती है।
अन्त्यप्रत्ययतो नूनं भाविजन्म, तथा सति ।
निर्गुणप्रत्ययोऽपि स्यात् सगुणोपासने यथा ॥१३८॥
ध्यानदीपप्रकरणम् ३१९
ध्यानदीपप्रकरणम् ३१९
[मरते समय इस जन्म में जो सबसे पिछले विचार होते
हैं वे यह बता देते हैं कि अगला जन्म कैसा होगा-कौन सी
योनि मिलेगी, ऊपर के दो प्रमाणों से यह तो सिद्ध हो ही
जाता है। परन्तु उस के साथ ही मरण काल में ज्ञान हो
जाता है और उस से मोक्ष मिल जाता है यह बात भी इन्हीं
प्रमाणों से सिद्ध हो जाती है ] पिछले ज्ञान जैसे भाविजन्म
की सूचना साधारण प्राणी को मिल जाती है, या जैसे
पूर्वाभ्यासवश मरण के समय सगुणोपासकों को सगुण ब्रह्म
के दर्शन मिल जाते हैं, इसी तरह पूर्वाभ्यास के प्रताप से
मरते समय निर्गुणोपासकों को भी निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान हो
ही जायगा, इस में वृथा सन्देह क्यों किये जाते हो ।
नित्यनिर्गुणरूपं तन्नाममात्रेण गीयताम् ।
अर्थतो मोक्ष एवैष संवादिभ्रमवन्मतः ॥१३९॥
[ यदि कहो कि निर्गुणोपासक को तो मरण काल में
निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति ही हो सकती है । उसे मुक्ति क्यों कर
मिल जायगी ? इसका समाधान यह है कि] उसका तुम निर्गुण
नाम भले ही गाते रहो । असल में तो यह मोक्ष ही है। जैसे
संवादिभ्रम कहने ही कहने को भ्रम है, असल में तो उसे तत्त्व
ज्ञान ही कहना चाहिये । [ब्रह्म प्राप्ति और मुक्ति ये एक ही
पदार्थ के दो नाम रख लिये गये हैं] ।
तत्सामर्थ्याज्जायते धीर्मूलाविद्यानिवर्तिका ।
अविमुक्तोपासनेन तारकब्रह्मबुद्धिवत् ॥१४०॥
निर्गुण उपासना के सामर्थ्य से जो ज्ञान पैदा होता है,
वह ज्ञान ही मूलाविद्या को निवृत्त कर देता है। अर्थात् वह
४०० पञ्चदशी
ज्ञान ही मोक्ष का साधन है [ हम मानस क्रिया-रूपी
निर्गुणोपासना को साक्षात् मुक्ति का साधन नहीं कहते हैं ]
अविमुक्तोपासना [ भ्रुकुटी में वैश्वानर की उपासना ] से
तारक ब्रह्म का ज्ञान जैसे हो जाता है [ ऐसे ही निर्गुणो-
पासना से मूलाविद्या को हटा देने वाली बुद्धि उत्पन्न
हो जाती है ] ।
सोऽकामो निष्काम इति ह्यशरीरो निरिन्द्रियः।
अभयं हीति मुक्तत्वं तापनीये फलं श्रुतम् ॥१४१॥
सोऽकामो निष्कामः आप्तकाम आत्मकाम अशरीरो निरिन्द्रियः
अभयं वै ब्रह्म भवति इत्यादि वाक्यों के द्वारा तापनीय उपनिषत्
में मोक्ष को निर्गुणोपासना का फल बताया है ।
उपासनस्य सामर्थ्याद् विद्योत्पत्तिर्भवेत् ततः ।
नान्यः पन्था इति ह्येतच्छास्त्रं नैव विरुध्यते ॥१४२॥
नान्यः पन्था विद्यतऽयनाय (श्वे. ३-८) यह शास्त्र कहता है
कि ज्ञान के सिवाय मुक्ति का दूसरा रास्ता ही नहीं है । उपासना
के सामर्थ्य से भी ज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है और ज्ञान से
मुक्ति हो जाती है । यों नान्यः पन्था वाले शास्त्र का विरोध
नहीं होता ।
निष्कामोपासनान्मुक्ति स्तापनीये समीरिता ।
ब्रह्मलोकः सकामस्य शैब्यप्रश्ने समीरितः ॥१४३॥
तापनीय उपनिषत् में निष्कामोपासना से मुक्ति मिलने की
बात कही है । शैब्यप्रश्न में यह बात कही गयी है कि सकामो-
पासना करने वाले को ब्रह्मलोक मिलता है ।
ध्यानदीपप्रकरणम् ४०१
ध्यानदीपप्रकरणम् ४०१
य उपास्ते त्रिमात्रेण ब्रह्मलोके स नीयते ।
स एतस्माज्जीवघनात् परं पुरुषमीक्षते ॥१४४॥
शैव्य प्रश्न में यह बात कही गयी है कि जो इस परम
पुरुष की उपासना त्रिमात्र ओंकार से करता है, वह ब्रह्मलोक
में ले जाया जाता है । उसके अनन्तर वहीं पर यह भी कहा
गया है कि— ब्रह्मलोक में पहुँचा हुआ वह उपासक, इस जीवघन
[ अर्थात् जीवों की समष्टि इस हिरण्यगर्भ ] से भी ऊंचे दर्जे
के उपाधि-रहित चैतन्य-रूपी परमात्मा का साक्षात् वहीं कर
लेता है ।
अप्रतीकाधिकरणे 'तत्क्रतुन्याय' ईरितः ।
ब्रह्मलोकफलं तस्मात् सकामस्येति वर्णितम् ॥१४५॥
'अप्रतीकालम्बनानयतीति बादरायणः (ब्रह्म ४-३-१५) उभयथा
दोषात्तत्क्रतुश्च' इन दोनों सूत्रों में व्यास मुनि ने कहा है कि—
अपनी अपनी कामना के अनुसार ही फल प्राप्त होता है । इस
कारण सकाम लोगों के ब्रह्मलोक पाने की बात कही है ।
[ सूत्रार्थ = प्रतीकोपासना न करने वाले उपासकों को
अमानव पुरुष ले जाता है ऐसा बादरायण आचार्य मानते हैं ।
किन्हीं को ले जाता है किन्हीं को नहीं ऐसी दोनों बात मानने
में कोई दोष नहीं है । क्योंकि यह सब संकल्प पर निर्भर
करता है ]
निर्गुणोपास्तिसामर्थ्यात् तत्र तत्त्वमवेक्षते ।
पुनरावर्तते नायं कल्पान्ते च विमुच्यते ॥१४६॥
[ सकाम निर्गुणोपासक को तत्त्वज्ञान होने का कारण यह
है कि ] निर्गुणोपासना के सामर्थ्य से ब्रह्मलोक में ही उसे तत्त्व-
४०२ पञ्चदशी
ज्ञान हो जाता है। ऐसा पुरुष फिर इस मर्त्यलोक में लौटकर
नहीं आता। जब कल्प का अन्त होने लगता है तभी वह हिरण्य-
गर्भ के साथ मुक्त हो जाता है ।
प्रणवोपास्तयः प्रायो निर्गुणा एव वेदगाः ।
क्वचित् सगणताप्युक्ता प्रणवोपासनस्य हि ॥१४७॥
वेद में प्रणव की जितनी भी उपासनायें हैं, वे प्रायः सब की
सब निर्गुण ही हैं । कहीं कहीं एकाध सगुणोपासना भी आती है ।
परापरब्रह्मरूप ओंकार उपवर्णितः ।
पिप्पलादेन मुनिना सत्यकामाय पृच्छते ॥१४८॥
पिप्पलाद मुनि ने सत्यकाम के प्रश्न के उत्तर में परापर
ब्रह्मरूप दो प्रकार का ओंकार बताया है । [उसी को ओंकार की
निर्गुण और सगुणोपासना का प्रमाण समझना चाहिए ।]
एतदालम्बनं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ।
इति प्रोक्तं यमेनापि पृच्छते नचिकेतसे ॥१४९॥
कठोपनिषत् में यम ने भी नचिकेता को यही उत्तर दिया
है कि इस ओंकाररूपी आलम्बन [सहारे] को जानकर जो पुरुष
जो चाहता है उसे वही मिल जाता है । [यम के उत्तर से भी
प्रणवोपासना दो तरह की पायी जाती है । ]
इह वा मरणे वास्य ब्रह्मलोकेऽथवा भवेत् ।
ब्रह्मसाक्षात्कृतिः सम्यगुपासीनस्य निर्गुणम् ॥१५०॥
[प्रकरण का तात्पर्य तो इतना ही है कि] जो निर्गुण की
किसी तरह की भी उपासना भले प्रकार कर लेता है उसको इस
लोक में या मरते समय अथवा ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्म का
साक्षात्कार हो ही जाता है । [ वह होने से रुकता नहीं ]
ध्यानदीपप्रकरणम् ४०३
ध्यानदीपप्रकरणम् ४०३
अर्थोऽयमात्मगीतायामपि स्पष्टमुदीरितः ।
विचाराक्षम आत्मानमुपासीतेति संततम् ॥१५१॥
जो विचार में असमर्थ हैं [विचार करने पर जिन्हें तत्व-
ज्ञान नहीं हो सकता है] उन्हें निर्गुण ब्रह्म की उपासना निरन्तर
करनी चाहिए। यह बात आत्मगीता में भी स्पष्ट कही है।
साक्षात्कर्तुमशक्तोऽपि चिन्तयेन्मामशङ्कितः ।
कालेनानुभवारूढो भवेयं फलितं ध्रुवम् ॥१५२॥
[आत्मगीता में कहा है कि] जिसमें आत्मतत्व को साक्षात्
करने की शक्ति न हो,वह निःशंक होकर, मेरी उपासना ही किया
करे । समय आने पर मैं उसके अनुभव में आऊँगा और निश्चय
ही फलित हो जाऊँगा ।
यथाऽगाधनिधेर्लब्धौ नोपायः खननं विना ।
मल्लाभेऽपि तथा स्वात्मचिन्तां मुक्त्वा न चापरः ॥१५३॥
अगाध निधि को पाने का जैसे खोदने के सिवाय और
कोई उपाय ही नहीं है, इसी प्रकार आत्मचिन्ता को छोड़ कर
मेरे पाने का भी और कोई उपाय नहीं है ।
देहोपलम्पाकृत्य बुद्धिकुद्दालकात् पुनः ।
खात्वा मनोभुवं भूयो गृह्णीयान्मां निधिं पुमान् ॥१५४॥
[पुरुष को चाहिए कि] बुद्धिरूपी कुदाल के सहारे से, देह
रूपी पत्थर को हटा कर, और मन रूपी भूमि को बार बार
खोद कर, मुझ निधि को प्राप्त कर ही ले ।
अनुभूतेरभावेऽपि ब्रह्मास्मीत्येव चिन्त्यताम् ।
अप्यसत्प्राप्यते ध्यानान्नित्याप्तं ब्रह्म किं पुनः ॥१५५॥
यदि किसी को अनुभूति न हो तो भी उसे 'मैं ब्रह्म हूँ'
४०४ पञ्चदशी
यह उपासना करनी ही चाहिए । ध्यान का तो इतना प्रताप है
कि—उससे असत् भी मिल जाता है [उपासक लोग असत्
देवभाव को भी प्राप्त कर लेते हैं] अपना स्वरूप होने के कारण,
नित्यप्राप्त जो सर्वात्मक ब्रह्म है, वह ध्यान से मिल जाता है,
इसका तो कहना ही क्या ?
अनात्मबुद्धिशैथिल्यं फलं ध्यानाद् दिने दिने ।
पश्यन्नपि न चेद् ध्यायेत् कोऽपरोऽस्मात् पशुर्वद॥१५६॥
ध्यान करने से दिन पर दिन अनात्मबुद्धि ढीली पड़ती
जाती है । ध्यान के इस महाफल को देख कर भी यदि कोई
ध्यान न करे तो इससे बड़ा पशु और कौन होगा ?
देहाभिमानं विध्वस्य ध्यानादात्मानमद्वयम् ।
पश्यन् मर्त्योऽमृतो भूत्वा ह्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१५७॥
सम्पूर्ण प्रकरण का निष्कर्ष तो यह है कि ध्यान का ऐसा
अद्भुत प्रभाव है कि इससे देहाभिमान का विध्वंस हो जाता
है । अद्वितीय आत्मा के दर्शन मिलते हैं । [इस मरने वाले देह
में से 'मैंपने' का अभिमान टूट जाने के कारण] अपने स्वाभा-
विक अमरपने का लाभ हो जाता है । फिर तो इस मरने वाले
देह के रहते रहते ही अपना निजस्वरूप ब्रह्म प्राप्त हो जाता है।
ध्यानदीपमिमं सम्यक् परामृशति यो नरः ।
मुक्तसंशय एवायं ध्यायति ब्रह्म संततम् ॥१५८॥
जो पुरुष इस 'ध्यानदीप' का विचार भले प्रकार करता
है, वह सभी संशयों से मुक्त हो जाता है और फिर सदा ब्रह्म
का ध्यान करने लगता है ।
इतिश्रीमद्विद्यारण्यविरचितपञ्चदश्यां ध्यानदीपप्रकरणम् ।
10. Natakadipa
नाटकदीपप्रकरणम्
परमात्माद्वयानन्दपूर्णः पूर्वं स्वमायया ।
स्वयमेव जगद् भूत्वा प्राविशज्जीवरूपतः ॥१॥
सृष्टि से पहले वह परमात्मा परमानन्द से परिपूर्ण था,
वह अपनी माया शक्ति से अपने आप ही जगद्रूप हो गया
और फिर वही जीवरूप से उसी में प्रवेश कर बैठा ।
विष्ण्वाद्युत्तमदेहेषु प्रविष्टो देवता भवेत् ।
मर्त्याद्यधमदेहेषु स्थितो भजति मर्त्यताम् ॥२॥
वह परमात्मा जब विष्णु आदि उत्तम देहों में प्रविष्ट हुआ
तब देवता बन गया । वह जब मर्त्य आदि अधम देहों में
घुसा तब मर्त्यभाव को प्राप्त हो गया । [भाव यह है कि यह
दीखने वाला उत्तमाधम भाव स्वाभाविक नहीं है । किन्तु शरीर
रूपी उपाधि के कारण से है । ऐसी अवस्था में जब एक ही
परमात्मा सब शरीरों में प्रविष्ट हुआ है तब फिर पूज्यपूजक
भाव या उत्तमाधम भाव क्यों है ? इस प्रश्न का समाधान हो
जाता है । ]
अनेकजन्मभजनात्-स्वविचारं चिकीर्षति ।
विचारेण विनष्टायां मायायां शिष्यते स्वयम् ॥३॥
अनेक जन्मों के भजन से [अनेक जन्मों में किये हुए कर्मों
को ब्रह्म में समर्पण करने से ] यह प्राणी आत्मविचार करना
४०६ पञ्चदशी
चाहा करता है। आत्मविचार के प्रभाव से जब [अपने अद्व-
यानन्द रूप को ढकने वाली] माया नष्ट हो जाती है तब वह
फिर पहले की तरह स्वयं [परमानन्दपूर्ण परमात्मा] ही शेष
रह जाता है।
अद्वयानन्दरूपस्य सद्वयत्वं च दुःखिता ।
बन्धः प्रोक्तः,स्वरूपेण स्थितिर्मुक्ति रितीर्यते ॥४॥
अद्वितीय ब्रह्म [के सच्चे बन्ध या मोक्ष का निरूपण तो
कोई कर ही नहीं सकता। इस कारण जब उस अद्वयानन्द]
को दुःखी होने का भ्रम हो जाता है तब बस यही उसका
'सद्वयपना' और यही उसका 'बन्ध' कहाता है। [उस दुःखी-
पने का हट जाना किंवा] अपने स्वरूप में पहुँच जाना ही मोक्ष
कहा जाता है।
अविचारकृतो बन्धो विचारेण निवर्तते ।
तस्माज्जीवपरात्मानौ सर्वदैव विचारयेत् ॥५॥
यह बन्धन अविचार का किया हुआ है। विचार से ही
इसकी निवृत्ति हो सकती है। इस कारण [तत्वसाक्षात्कार
होने तक] सदा ही जीव और परमात्मा का विचार करता रहे।
अहमित्यभिमन्ता यः कर्ताऽसौ, तस्य साधनम् ।
मनस्तस्य क्रिये अन्तर्बहिर्वृत्ती क्रमोत्थिते ॥६॥
[चिदाभास से युक्त] जो अहंकार देहादि में मैंपने का
अभिमान किया करता है, उसी को 'कर्ता' या जीव कहते हैं।
उस जीव [के अभिमान करने] का साधन मन कहाता है।
वह क्रमानुसार कभी अन्तर्वृत्ति और कभी 'बहिर्वृत्ति' नाम की
दो प्रकार की क्रियायें किया करता है।
नाटकदीपप्रकरणम् ४०७
नाटकदीपप्रकरणम् ४०७
अन्तर्मुखाहमित्येषा वृत्तिः कर्तारमुल्लिखेत् ।
बहिर्मुखेदमित्येषा वाह्यं वस्त्विदमुल्लिखेत् ॥७॥
उस मन की 'मैं' यह अन्तर्मुख वृत्ति तो कर्ता का उल्लेख
किया करती है। उसी मनकी बहिर्मुख रहने वाली 'इदं' यह
वृत्ति देह से बाहर के पदार्थों को 'यह' रूप में विषय
किया करती है।
इदमो ये विशेषाः स्युर्गन्धरूपरसादयः ।
असांकर्येण तान् भिन्द्याद् घ्राणादीन्द्रियपंचकम् ॥८॥
[मन तो सामान्यतया 'इदं' को विषय करता है परन्तु]
उस इदं के जो विशेष विशेष धर्म [गन्ध, रूप, रस आदि]
हैं, उन को तो पृथक् पृथक् घ्राण आदि पाँच इन्द्रियां ही प्रकट
किया करती हैं। [यों मन का भी उपयोग हो जाता और घ्राण
आदि इन्द्रियें भी व्यर्थ नहीं होतीं]।
कर्तारं च क्रियां तद्वद् व्यावृत्तविषयानपि ।
स्फोरयेदेकयत्नेन योऽसौ साक्ष्यत्र चिद्वपुः ॥९॥
जो तो केवल चिद्रूप होकर कर्ता को भी, क्रिया ['मैं'
'यह' की मनोवृत्तिरूपी] को भी, तथा एक दूसरे से अत्यन्त
विलक्षण गन्धादि विषयों को भी, एक ही यत्न से प्रकाशित
किया करता है, उसी चिद्रूप को यहां [वेदान्त में] साक्षी
कहते हैं।
नृत्यशालास्थितो दीपः प्रभुं सभ्यांश्च नर्तकीम् ।
दीपयेदविशेषेण तदभावेऽपि दीप्यते ॥१०॥
नृत्यशाला में रक्खा हुआ दीपक प्रभु [नृत्यशाला के मालिक]
को, सभ्यों को, तथा नर्तकी को, समान रूप से प्रकाशित किया
४०८ पञ्चदशी
करता है [वह किसी के प्रकाश के लिए घटता बढ़ता नहीं है
और जब नृत्यशाला में से ये सब लोग चले जाते हैं] जब वहां
कोई भी नहीं रहता तब भी वह वहां दीप्त हुआ रहता है।
अहंकारं धियं साक्षीं विषयानपि भासयेत् ।
अहंकाराद्यभावेऽपि स्वयं भात्येव पूर्ववत् ॥११॥
ऊपर के दृष्टान्त की तरह ही यह साक्षी तत्व अहंकार को,
बुद्धि को और विषयों को, प्रकाशित किया करता है। [सुषुप्ति
आदि के समय] जब तो अहंकार आदि कोई भी नहीं रहता,
तब भी वह [साक्षी] पहले ही की तरह जगमगाता रहता है।
निरन्तरं भासमाने कूटस्थे ज्ञप्तिरूपतः ।
तद्भासा भास्यमानेयं बुद्धिर्नृत्यत्यनेकधा ॥१२॥
वह कूटस्थ साक्षी तो ज्ञप्ति [किंवा स्वप्रकाश चैतन्य] रूप
से सदा ही भासता रहता है। यह बिचारी बुद्धि उसी [सदा-
विभात] साक्षी की प्रभा से प्रकाश्यमान होकर, अनेक रूप से
नाचा करती है। ['यह घट है' 'यह पट है' इत्यादि अनेक रूपों
में विकृत होती रहती है।]
अहंकारः प्रभुः, सभ्या विषया, नर्तकी मतिः ।
तालादिधारीण्यक्षाणि दीपः साक्ष्यवभासकः ॥१३॥
अहंकार ही इस [जगतरूपी] नाटक का प्रभु है [क्योंकि
नाटक के मालिक की तरह विषय भोग-की सफलता और विफ-
लता से हर्ष और विषाद् इसी अहंकार को होते हैं] विषय ही
इस नाटक के सभ्य हैं [नाटक के दर्शकों को सुख दुःखमयी
घटना देखने पर भी जैसे सुख दुःख कुछ नहीं होता, इसी प्रकार
इन विषयों को भी सुख दुःख कुछ नहीं होता] बुद्धि ही इस
नाटकदीपप्रकरणम् ४०९
नाटकदीपप्रकरणम् ४०९
नाटक की नर्तकी है [क्योंकि नर्तकी की तरह नाना तरह के
विकार इसी में होते हैं]। ताल आदि को धारण करने वाली
तो इन्द्रियां ही हैं [क्योंकि ये इन्द्रियां बुद्धि के विकारों के अनु-
कूल व्यापार करने लगती हैं]। यह साक्षी ही इन सब का
अवभासक दीपक है [क्योंकि यही इन सब को प्रकाशित किया
करता है।]
स्वस्थानसंस्थितो दीपः सर्वतो भासयेद् यथा ।
स्थिरस्थायी तथा साक्षी बहिरन्तः प्रकाशयेत् ॥१४॥
दीपक जैसे अपने स्थान पर ही रक्खा हुआ अपने चारों
ओर [के सम्पूर्ण पदार्थों को] प्रकाशित किया करता है, इसी
प्रकार स्थिर रूप से स्थायी यह साक्षी भी (विकारी न होकर
ही) बाहर और अन्दर प्रकाश किया करता है।
बहिरन्तर्विभागोऽयं देहापेक्षो न साक्षिणि ।
विषया बाह्यदेशस्था देहस्यान्तरहंकृतिः ॥१५॥
['अनन्तरमबाह्यम्' (बृ० ३-८-८) इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति
के अनुसार साक्षी में तो अन्दर और बाहर का कोई भी विभाग
नहीं होता] यह सब बाहर अन्दर का विभाग तो देह [रूपी पैमाने]
के कारण ही हो जाता है। विषय तो शरीर से बाहर रहते हैं।
अहंकार तो शरीर के अन्दर होता है। [इसीसे अन्दर बाहर
यह व्यवहार होने लगा है। आत्मा में अन्दर बाहर कहते
नहीं बनता।]
अन्तःस्था धीः सहैवाक्षै र्बहिर्याति पुनः पुनः ।
भास्यबुद्धिस्थचाञ्चल्यं साक्षिण्यारोप्यते वृथा ॥१६॥
शरीर के अन्दर बैठी हुई वह बुद्धि
४१० पंचदशी
करने के लिए ] इन्द्रियों के साथ साथ [अथवा इन्द्रियों के द्वारा]
बार बार बाहर निकला करती है। बस बुद्धि की इसी चंचलता
को [बुद्धि के भासक] साक्षी में वृथा ही आरोपित कर लिया
जाता है। [ उस साक्षी में वास्तविक चंचलता नहीं है।]
गृहान्तरगतः खल्पो गवाक्षादातपोऽचलः ।
तत्र हस्ते नर्त्यमाने नृत्यतीवातपो यथा ॥१७॥
निजस्थानस्थितः साक्षी बहिरन्तर्गमागमौ ।
अकुर्वन् बुद्धिचाञ्चल्यात् करोतीव तथा तथा ॥१८॥
झरोखे में होकर घर में गया हुआ नन्हा सा सूर्यप्रकाश,
अचल ही होता है। [वह हिलता जुलता नहीं है] उस आतप के
बीच में जब कोई पुरुष अपना हाथ हिलाने लगता है, तब जिस
प्रकार वह आतप भी हिलने सा लगता है, ठीक इसी प्रकार
साक्षी तो अपने ही स्थान में [किंवा अपनी अचल मर्यादा में ]
बैठा रहता है, वह कभी बाहर अन्दर आता जाता नहीं है।
परन्तु फिर भी बुद्धि की चंचलता के कारण, वैसा वैसा करता
हुआ सा [ व्यर्थ ही] प्रतीत होने लगता है।
न बाह्यो नान्तरः साक्षी बुद्धेर्देशौ हि तावुभौ ।
बुद्ध्याद्यशेषसंशान्तौ यत्र भात्यस्ति तत्र सः ॥१९॥
[ पहिले श्लोक में जो साक्षी को अपने स्थान पर स्थित
बताया है उसका अभिप्राय सुन लो ] वह साक्षी बाह्य या आन्तर
कभी नहीं होता। ये तो दोनों बुद्धि के ही देश कहाते हैं। बुद्धि
तथा इन्द्रिय आदि की प्रतीति के बन्द होने पर यह भाव अथवा
यह प्रकाश, जहाँ [ स्वतन्त्र रूप से ] जगमगाता रहता है, उसी
को इस साक्षी का स्थान समझ लो।
नाटकदीपप्रकरणम् ४११
नाटकदीपप्रकरणम् ४११
देशः कोऽपि न भासेत यदि तर्हस्त्वदेशभाक् ।
सर्वदेशप्रक्लप्त्यैव सर्वगत्वं न तु स्वतः ॥२०॥
यदि कहो कि-सम्पूर्ण व्यवहार के बन्द हो जाने पर तो
कोई भी देश भासा नहीं करता फिर उसको वहाँ कैसे पहचानें ?
तो हम कहेंगे कि तुम उसको बिना ही देश [स्थान] का समझ
लो [भाव यह है कि देश आदि की जितनी भी कल्पनायें हैं
उन सब कल्पनाओं का जो अधिष्ठान है उसे तो अपने से भिन्न
किसी देश की कुछ अपेक्षा ही नहीं होती ।] शास्त्र में भी उसको
कहीं कहीं सर्वगत आदि कहा गया है, वह भी सर्वदेश की कल्पना
के कारण ही कहा है। वह साक्षी आत्मा स्वभाव से सर्वगत
कदापि नहीं है [स्वभाव से तो वह अद्वितीय और असंग ही है]
अन्तर्बहिर्वा सर्वं वा यं देशं परिकल्पयेत् ।
बुद्धिस्तद्देशगः साक्षी तथा वस्तुषु योजयेत् ॥२१॥
अन्दर या बाहर या जिस किसी भी देश की कल्पना यह
बुद्धि कर लेती है उस देश का यह आत्मा 'साक्षी' कहाने लगता
है [वास्तव में तो सर्वगतपन की तरह सर्वसाक्षिपना भी कोई
पदार्थ नहीं है] इसी प्रकार अन्य वस्तुओं में भी साक्षी को समझ
लेना चाहिए ।
यद्यद् रूपादि कल्प्येत बुद्ध्या तत्तत् प्रकाशयन् ।
तस्य तस्य भवेत् साक्षी स्वतो वाग्बुद्ध्यगोचरः॥२२॥
बुद्धि से जिस जिस रूपादि की कल्पना की जाती है, उस
उस [कल्पित पदार्थ] को प्रकाशित रखने वाला यह आत्मा उस
उसका 'साक्षी' कहाने लगता है
४१२ पञ्चदशी
को पूछो तो हम कहेंगे कि ] वह स्वयं तो वाणी और बुद्धि का
अविषय ही है [ फिर उसे साक्षी भी कैसे कह दें ? ]
कथं तादृङ् मया ग्राह्य इति चेन्मैव गृह्यताम् ।
सर्वग्रहोपसंशान्तौ स्वयमेवावशिष्यते ॥२३॥
यदि वह साक्षी अवाङ् मनोगोचर है तो फिर मैं मुमुक्षु
ऐसे उसको कैसे ग्रहण करूँ ? इसका उत्तर यही है कि—उसे
तुम ग्रहण ही मत करो ! [तुम ग्रहण करने के झगड़े में ही मत
फंसो] जब सर्वग्रह शान्त हो जायगा [जब इस सब कुछ कहाने
वाले द्वैत की प्रतीति बन्द हो जायगी ] तब समझते हो क्या
शेष रह जायगा ? देखो उस समय यह स्वयं ही शेष रह गया
होगा [इसी को हम साक्षी कहते हैं । इसी को हम वाणी और
बुद्धि का अगोचर बताते हैं ।]
न तत्र मानापेक्षास्ति स्वप्रकाशस्वरूपतः ।
तादृग्व्युत्पत्यपेक्षा चेच्छ्रुतिं पठ गुरोर्मुखात् ॥२४॥
सर्वग्रह की शान्ति हो जाने पर जो स्वात्मा शेष रहता है,
उसके प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की कुछ भी आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि वह तो स्वयं प्रकाश-स्वरूप ही है । वह आत्मा स्वयं
प्रकाशस्वरूप कैसे है ? यह जानना हो तो गुरु के मुख से
वेदान्त का अध्यन करो । [ इस गहन तत्व का ज्ञान तुम्हारे
स्वतन्त्र स्वाध्याय से या किसी ग्रन्थ का अनुवाद पढ़ने से नहीं
हो सकेगा । यह बात तो अनुभव वाला ही समझा सकेगा ]
यदि सर्वग्रहत्यागोऽशक्यस्तर्हि धियं व्रज ।
शरणं, तदधीनोऽन्तर्बहिष्वैषोऽनुभूयताम् ॥२५॥
नाटकदीपप्रकरणम् ४१३
नाटकदीपप्रकरणम् ४१३
यदि मन्दाधिकारी लोग सर्वग्रह का त्याग न कर सकते
हों तो वे बुद्धि की शरण ले लें। अन्दर या बाहर सब जगह
बुद्धि के अधीन हुए हुए इस साक्षी का वे लोग अनुभव करें
[ वे लोग यह विचारें कि-यह बुद्धि जिस जिस बाह्य या
आभ्यन्तर पदार्थ की कल्पना करती है, उस उस पदार्थ का
साक्षी होकर यह परमात्मा उसके अधीन सा रहता है। वे लोग
इसी मार्ग से परमात्मा का अनुभव प्राप्त करें। ]
इतिश्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां नाटकदीपप्रकरणम्
11. Yogananda
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम्
ब्रह्मानन्दं प्रवक्ष्यामि, ज्ञाते तस्मिन्नशेषतः ।
ऐहिकामुष्मिकानर्थव्रातं हित्वा सुखायते ॥१॥
अब हम ब्रह्मरूप आनन्द किंवा ब्रह्मानन्द नामक ग्रन्थ का
वर्णन करेंगे। जब कोई उस आनन्द तथा उस ग्रन्थ को सम्पूर्ण
रूप से जान लेगा तब वह ऐहिक और आमुष्मिक दोनों
प्रकार के अनर्थों से छूट कर सुखरूप हो जायगा। [उसको जो
इस लोक के देह पुत्रादि में 'मैं' और 'मेरेपन' का अभिमान
करने से आध्यात्मिक आदि ताप होते थे, या परलोक में जिन
तापों के मिलने की संभावना थी वह उन सब को सम्पूर्णरूप
से छोड़ कर सुख रूप ब्रह्मतत्व ही हो जायगा।]
ब्रह्मवित् परमाप्नोति, शोकं तरति चात्मवित् ।
रसो ब्रह्म रसं लब्ध्वानन्दी भवति नान्यथा ॥२॥
ब्रह्मदर्शी पर को पा लेता है। आत्मज्ञानी शोक को तर
जाता है। रस ब्रह्म ही है। रस को पाकर ही आनन्दी होता है
और तरह से नहीं।
ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै० २-१) इस वाक्य में कहा गया है
कि जो ब्रह्म को जानता है वह पर अथवा उत्कृष्ट आनन्दरूप
ब्रह्म को प्राप्त कर चुकता है। श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकं
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१५
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१५
चात्मवित् (छा० ७-१-३) इस श्रुति में कहा गया है कि देश-
काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित आत्मतत्व को जान लेने
वाला पुरुष शोक अर्थात् इस अज्ञानमूलक संसार समुद्र को
लांघ जाता है । रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति (तै०२-७)
इस श्रुति में कहा गया है कि जिसको कहीं पर 'ब्रह्म' और
कहीं पर 'आत्मा' कहा जाता है वह यह आत्मा रस किंवा
सार अथवा आनन्दरूप है,उस आनन्दरूप ब्रह्म को पाकर [ मैं
ब्रह्म हूँ इस ज्ञान से प्राप्त करके] आनन्दी हो जाता है—मर्यादा-
रहित और सर्वाधिक सुख को पा लेता है। ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान
को छोड़ कर किसी भी दूसरे साधन के अनुष्ठान से आनन्दी
नहीं हो सकता। इन सब वाक्यों से यही सिद्ध होता है कि
ब्रह्मज्ञान से अनिष्ट की निवृत्ति होती है और इष्ट की प्राप्ति होती है।
प्रतिष्ठां विन्दते स्वस्मिन् यदा स्यादथ सोऽभयः।
कुरुतेऽस्मिन्नन्तरं चेदथ तस्य भयं भवेत् ॥३॥
जब अपने आपे में प्रतिष्ठा पा लेता है तब वह अभय हो
जाता है। जब इसमें भेद कर बैठता है फिर उसे भय लगने
लगता है।
यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्ये ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां
विन्दते ऽथ सोऽभयं गतो भवति (तै ०२-७) इस श्रुति में कहा गया
है कि जिस समय यह मुमुक्षु इन्द्रियों से न दीखने वाले, स्वरूप
होने के कारण अपना न कहा सकने वाले, शब्दों से न कहे
जाने वाले, किसी के आश्रय में न रहने वाले, अपनी ही महिमा
में ठहरने वाले, विद्वानों के अनुभव में आने वाले, इस आत्मा
में अभय अर्थात् भेद रहित होकर, प्रतिष्ठा अर्थात् अपनी ब्रह्म
४१६ पञ्चदशी
रूप स्थिति को, श्रवणादि के द्वारा उपार्जन कर लेता है ऐसा
जानने वाला पुरुष फिर उसी समय भयरहित मोक्षरूपी अद्वि-
तीय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । फिर आगे 'यदा ह्येवैष एतस्मि-
न्नुदरमन्तरं कुरुतेऽथ तस्य भयं भवति ( तै० २-७ ) इस श्रुति में
कहा गया है कि जब तो वही मुमुक्षु उसी प्रत्यगभिन्न ब्रह्म में
थोड़ा सा भी [ उपास्य उपासक आदि रूपी ] भेद करता या
देखने लगता है तब तुरन्त ही उस भेददर्शी को भय अर्थात्
संसार प्रयुक्त दुःख होने लगता है ।
वायुः सूर्यो वह्निरिन्द्रो मृत्यु र्जन्मान्तरेन्तरम् ।
कृत्वा धर्मं विजानन्तोऽप्यस्माद् भीत्या चरन्ति हि ॥४॥
भीषास्माद्वातः पवते (तै० २-८) इसमें कहा गया है कि[जगत्
के नियामक कहाने वाले] वायु, सूर्य, अग्नि, इन्द्र तथा मृत्यु ये
पांचों देवता पिछले जन्मों में अपने धर्म को जानते हुए भी
केवल अन्तर कर लेने [ किंवा प्रत्यगात्मा और ब्रह्म तत्व का
भेद समझ लेने ] के कारण अब उसी ब्रह्म के भय से [इन वायु
आदि जन्मों में ] अपने अपने कामों में ही सदा लगे रहते हैं
[ जैसे कि डण्डे के डर से तेली का बैल अपने चक्कर पर घूमता
रहता हो । ]
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ।
एतमेव तपेन्नैषा चिन्ता कर्माग्निसंभृता ॥५॥
ब्रह्मतत्व के आनन्द को समझ चुकने वाला पुरुष फिर
किसी बात से भय नहीं करता। कर्मरूपी अग्नि की चिन्ता बस
केवल इस ज्ञानी को ही नहीं तपाती [ शेष तो सब प्राणी इसी
कर्तव्याग्नि की ज्वालाओं से झुलसते और जलते भुनते रहते हैं]