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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 429 of 726

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Page 429

नाटकदीपप्रकरणम् ४०७

अन्तर्मुखाहमित्येषा वृत्तिः कर्तारमुल्लिखेत् ।
बहिर्मुखेदमित्येषा वाह्यं वस्त्विदमुल्लिखेत् ॥७॥
उस मन की 'मैं' यह अन्तर्मुख वृत्ति तो कर्ता का उल्लेख
किया करती है। उसी मनकी बहिर्मुख रहने वाली 'इदं' यह
वृत्ति देह से बाहर के पदार्थों को 'यह' रूप में विषय
किया करती है।
इदमो ये विशेषाः स्युर्गन्धरूपरसादयः ।
असांकर्येण तान् भिन्द्याद् घ्राणादीन्द्रियपंचकम् ॥८॥
[मन तो सामान्यतया 'इदं' को विषय करता है परन्तु]
उस इदं के जो विशेष विशेष धर्म [गन्ध, रूप, रस आदि]
हैं, उन को तो पृथक् पृथक् घ्राण आदि पाँच इन्द्रियां ही प्रकट
किया करती हैं। [यों मन का भी उपयोग हो जाता और घ्राण
आदि इन्द्रियें भी व्यर्थ नहीं होतीं]।
कर्तारं च क्रियां तद्वद् व्यावृत्तविषयानपि ।
स्फोरयेदेकयत्नेन योऽसौ साक्ष्यत्र चिद्वपुः ॥९॥
जो तो केवल चिद्रूप होकर कर्ता को भी, क्रिया ['मैं'
'यह' की मनोवृत्तिरूपी] को भी, तथा एक दूसरे से अत्यन्त
विलक्षण गन्धादि विषयों को भी, एक ही यत्न से प्रकाशित
किया करता है, उसी चिद्रूप को यहां [वेदान्त में] साक्षी
कहते हैं।
नृत्यशालास्थितो दीपः प्रभुं सभ्यांश्च नर्तकीम् ।
दीपयेदविशेषेण तदभावेऽपि दीप्यते ॥१०॥
नृत्यशाला में रक्खा हुआ दीपक प्रभु [नृत्यशाला के मालिक]
को, सभ्यों को, तथा नर्तकी को, समान रूप से प्रकाशित किया