पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम्
ब्रह्मानन्दं प्रवक्ष्यामि, ज्ञाते तस्मिन्नशेषतः ।
ऐहिकामुष्मिकानर्थव्रातं हित्वा सुखायते ॥१॥
अब हम ब्रह्मरूप आनन्द किंवा ब्रह्मानन्द नामक ग्रन्थ का
वर्णन करेंगे। जब कोई उस आनन्द तथा उस ग्रन्थ को सम्पूर्ण
रूप से जान लेगा तब वह ऐहिक और आमुष्मिक दोनों
प्रकार के अनर्थों से छूट कर सुखरूप हो जायगा। [उसको जो
इस लोक के देह पुत्रादि में 'मैं' और 'मेरेपन' का अभिमान
करने से आध्यात्मिक आदि ताप होते थे, या परलोक में जिन
तापों के मिलने की संभावना थी वह उन सब को सम्पूर्णरूप
से छोड़ कर सुख रूप ब्रह्मतत्व ही हो जायगा।]
ब्रह्मवित् परमाप्नोति, शोकं तरति चात्मवित् ।
रसो ब्रह्म रसं लब्ध्वानन्दी भवति नान्यथा ॥२॥
ब्रह्मदर्शी पर को पा लेता है। आत्मज्ञानी शोक को तर
जाता है। रस ब्रह्म ही है। रस को पाकर ही आनन्दी होता है
और तरह से नहीं।
ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै० २-१) इस वाक्य में कहा गया है
कि जो ब्रह्म को जानता है वह पर अथवा उत्कृष्ट आनन्दरूप
ब्रह्म को प्राप्त कर चुकता है। श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकं