पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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यह उपासना करनी ही चाहिए । ध्यान का तो इतना प्रताप है
कि—उससे असत् भी मिल जाता है [उपासक लोग असत्
देवभाव को भी प्राप्त कर लेते हैं] अपना स्वरूप होने के कारण,
नित्यप्राप्त जो सर्वात्मक ब्रह्म है, वह ध्यान से मिल जाता है,
इसका तो कहना ही क्या ?
अनात्मबुद्धिशैथिल्यं फलं ध्यानाद् दिने दिने ।
पश्यन्नपि न चेद् ध्यायेत् कोऽपरोऽस्मात् पशुर्वद॥१५६॥
ध्यान करने से दिन पर दिन अनात्मबुद्धि ढीली पड़ती
जाती है । ध्यान के इस महाफल को देख कर भी यदि कोई
ध्यान न करे तो इससे बड़ा पशु और कौन होगा ?
देहाभिमानं विध्वस्य ध्यानादात्मानमद्वयम् ।
पश्यन् मर्त्योऽमृतो भूत्वा ह्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१५७॥
सम्पूर्ण प्रकरण का निष्कर्ष तो यह है कि ध्यान का ऐसा
अद्भुत प्रभाव है कि इससे देहाभिमान का विध्वंस हो जाता
है । अद्वितीय आत्मा के दर्शन मिलते हैं । [इस मरने वाले देह
में से 'मैंपने' का अभिमान टूट जाने के कारण] अपने स्वाभा-
विक अमरपने का लाभ हो जाता है । फिर तो इस मरने वाले
देह के रहते रहते ही अपना निजस्वरूप ब्रह्म प्राप्त हो जाता है।
ध्यानदीपमिमं सम्यक् परामृशति यो नरः ।
मुक्तसंशय एवायं ध्यायति ब्रह्म संततम् ॥१५८॥
जो पुरुष इस 'ध्यानदीप' का विचार भले प्रकार करता
है, वह सभी संशयों से मुक्त हो जाता है और फिर सदा ब्रह्म
का ध्यान करने लगता है ।
इतिश्रीमद्विद्यारण्यविरचितपञ्चदश्यां ध्यानदीपप्रकरणम् ।