पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextध्यानदीपप्रकरणम् ४०३
अर्थोऽयमात्मगीतायामपि स्पष्टमुदीरितः ।
विचाराक्षम आत्मानमुपासीतेति संततम् ॥१५१॥
जो विचार में असमर्थ हैं [विचार करने पर जिन्हें तत्व-
ज्ञान नहीं हो सकता है] उन्हें निर्गुण ब्रह्म की उपासना निरन्तर
करनी चाहिए। यह बात आत्मगीता में भी स्पष्ट कही है।
साक्षात्कर्तुमशक्तोऽपि चिन्तयेन्मामशङ्कितः ।
कालेनानुभवारूढो भवेयं फलितं ध्रुवम् ॥१५२॥
[आत्मगीता में कहा है कि] जिसमें आत्मतत्व को साक्षात्
करने की शक्ति न हो,वह निःशंक होकर, मेरी उपासना ही किया
करे । समय आने पर मैं उसके अनुभव में आऊँगा और निश्चय
ही फलित हो जाऊँगा ।
यथाऽगाधनिधेर्लब्धौ नोपायः खननं विना ।
मल्लाभेऽपि तथा स्वात्मचिन्तां मुक्त्वा न चापरः ॥१५३॥
अगाध निधि को पाने का जैसे खोदने के सिवाय और
कोई उपाय ही नहीं है, इसी प्रकार आत्मचिन्ता को छोड़ कर
मेरे पाने का भी और कोई उपाय नहीं है ।
देहोपलम्पाकृत्य बुद्धिकुद्दालकात् पुनः ।
खात्वा मनोभुवं भूयो गृह्णीयान्मां निधिं पुमान् ॥१५४॥
[पुरुष को चाहिए कि] बुद्धिरूपी कुदाल के सहारे से, देह
रूपी पत्थर को हटा कर, और मन रूपी भूमि को बार बार
खोद कर, मुझ निधि को प्राप्त कर ही ले ।
अनुभूतेरभावेऽपि ब्रह्मास्मीत्येव चिन्त्यताम् ।
अप्यसत्प्राप्यते ध्यानान्नित्याप्तं ब्रह्म किं पुनः ॥१५५॥
यदि किसी को अनुभूति न हो तो भी उसे 'मैं ब्रह्म हूँ'