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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

About this granth

Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.

The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.

This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.

तृप्तिदीपप्रकरणम् २४५

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २४५
विचार किया, तब वह व्यक्ति अर्थात् प्रत्यगात्मा रूपी ब्रह्म को
देख पाया। [यों तैत्तिरीय श्रुति के पर्यालोचन से यह बात
सिद्ध होती है कि—पहले तो वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न
हुआ करता है। फिर जब उस वाक्य के साथ विचार मिल
जाता है,तब वाक्य से अपरोक्ष ज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है]।
यद्यपि त्वमसीत्यत्र वाक्यं नोचे भृगोः पिता ।
तथाप्यन्नं प्राणमिति विचार्य स्थलमुक्तवान् ॥६४॥
इस प्रकरण में यद्यपि भृगु के पिता ने 'तू ही ब्रह्म है' ऐसा
कोई उपदेश वाक्य तो नहीं कहा है, तो भी अन्न, प्राण आदि
का विचार करने के बाद, आत्मसाक्षात्कार के उत्पादक विचार
के योग्य स्थल को तो दिखला ही दिया है।
अन्नप्राणादिकोशेषु सुविचार्य पुनः पुनः।
आनन्दव्यक्तिमीक्षित्वा ब्रह्मलक्ष्माप्ययूयुजत् ॥६५॥
अन्न प्राण आदि पांचों कोशों में बार बार सुविचार करके
आनन्द नाम के आत्मा को साक्षात् देख कर पीछे से
आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति
आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । (तै० ३-६) ब्रह्म के इस लक्षण को
भी प्रत्यगात्मा में ही लगा दिया है। [इस कारण यह न कहना
चाहिए कि—अन्नमयादि कोशों का विचार करने पर तो प्रत्य-
गात्मा का साक्षात्कार हो सकता है। ब्रह्म का साक्षात्कार उससे
कैसे होगा ? क्योंकि प्रत्यगात्मा ही तो ब्रह्म है। क्योंकि ब्रह्म के
सब लक्षण उसमें मिलते हैं। यों उससे भिन्न ब्रह्म नाम का
कोई भी पदार्थ नहीं है]।

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२४६ पञ्चदशी
सत्यं ज्ञान मनन्तं चेत्येवं ब्रह्मस्वलक्षणम् ।
उक्त्वा गुहाहितत्वेन कोशेष्वेतत् प्रदर्शितम् ॥६६॥
'सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह्म' (तै० २-१) इस वाक्य से ब्रह्म के
स्वरूप लक्षण को बता कर 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्'
(मुण्ड० २-१-१०) इस वाक्य के द्वारा पांचों कोशों रूपी
गुहाओं के अन्दर छिपे बैठे हुए, उसी को प्रत्यगात्मा कह दिया
है [अर्थात् सत्यादि स्वरूप वाले ब्रह्म ने ही प्रत्यग्रूप धारण कर
लिया है। ऐसा श्रुतियों का अभिप्राय है। वे प्रत्यगात्मा और
ब्रह्म में भेद नहीं समझती हैं]।
पारोक्ष्येण विबुध्येन्द्रो य आत्मेत्यादिलक्षणात् ।
अपरोक्षीकर्तुमिच्छंश्चतुर्वारं गुरुं ययौ ॥६७॥
'य आत्मा पहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकः' (छा०८-७-१)
इस वाक्य में बताये हुए लक्षण से इन्द्र ने आत्मा को पहले
परोक्षरूप से ही तो जान लिया था—फिर [तीनों शरीरों का
निराकरण करके] आत्मा को साक्षात् करने के लिये, चार बार
गुरु के पास गया था। [यह बात छान्दोग्य के आठवें अध्याय
में कही गयी है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि परोक्षज्ञान
के पश्चात् विचार करने पर ही साक्षात्कार हुआ करता है]
आत्मा वा इदमित्यादौ परोक्षं ब्रह्म लक्षितम् ।
अध्यारोपापवादाभ्यां प्रज्ञानं ब्रह्म दर्शितम् ॥६८॥
'आत्मा वा इदं' इत्यादि ऐतरेय में पहले लक्षणा द्वारा परोक्ष-
रीति से ब्रह्म का कथन किया गया। फिर अध्यारोप और
अपवाद के द्वारा प्रज्ञानरूप ब्रह्म को साक्षात् दिखाया गया।

तृप्तिदीपप्रकरणम् २४७

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २४७
किञ्चन मिषत्' (ऐत० १-१) इस वाक्य से तो पहले ब्रह्म को
लक्षित किया गया, फिर 'स ईक्षत लोकान्नु सृजा' (ऐत० १-१)
इत्यादि रीति से प्रारम्भ करके 'तस्य त्रय आवसथा स्त्रयः स्वप्ना
अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथः' (ऐत० ३-१२) तक जगत् के
आरोप की रीति बतायी गयी। फिर 'स जातो भूतान्यभिव्यैक्षत
किमिहान्यं वावदिषत्' (एते० ३-१३) इसमें आरोपित किये हुए का
अपवाद (खण्डन) किया गया। उस के पश्चात् 'स एतमेव पुरुषं
ब्रह्म ततमपश्यदिदमदर्शमिति' (ऐत० ३-१३) इस वाक्य में प्रत्य-
गात्मा के रूप में ब्रह्मस्वरूप को प्रत्यक्ष देखा गया। उस के
अनन्तर 'पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो जायते' (ऐत० ४-१) इत्यादि
वाक्यों में ज्ञान के साधन वैराग्य को उत्पन्न करने के लिये
गर्भवासादि के दुःखों का प्रदर्शन कराया गया। फिर 'कोय-
मात्मेति वयमुपास्महे' (ऐत० ५-१) इत्यादि विचार के द्वारा 'तत्'
'त्वं' पदार्थ का परिशोधन करने के पश्चात् प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐत०५-१)
इस महावाक्य के द्वारा प्रज्ञानरूप आत्मा की ब्रह्मता का प्रद्-
र्शन किया गया है।
अवान्तरेण वाक्येन परोक्षा ब्रह्मधीर्भवेत् ।
सर्वत्रैव महावाक्यविचारादपरोक्षधीः ॥६९॥
[इन ही उपनिषदों में नहीं और भी] सब शास्त्रों में
अवान्तर वाक्यों से तो परोक्ष ब्रह्मज्ञान कराया जाता है
तथा महावाक्यों के द्वारा अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ब्रह्मज्ञान किया
जाता है।
ब्रह्मापरोक्ष्यसिद्धयर्थं महावाक्यमितीरितम् ।
वाक्यवृत्तावतो ब्रह्मापरोक्ष्ये विमतिर्नहि ॥७०॥

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२४८ पञ्चदशी
ब्रह्म के अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) करने के लिये ही महावाक्यों
का कथन है, यह बात शंकराचार्यजी ने अपनी 'वाक्यवृत्ति'
नाम की पुस्तक में कही है । इस कारण वाक्य से ब्रह्म का
प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाने में कोई भी विप्रतिपत्ति नहीं रहती ।
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः ।
अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः ॥७१॥
वाक्यवृत्ति में कहा गया है कि—अन्तःकरण उपाधिवाला
जो बोध (चिदात्मा) है, जो 'मैं' इस प्रतीति के तथा 'मैं' इस
शब्द के विषयरूप से प्रतीत होता है, वही (बोध) त्वं पद का
वाच्यार्थ कहाता है ।
मायोपाधि र्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः ।
पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मक स्तत्पदाभिधः ॥७२॥
माया जिसकी उपाधि है, जगत् का जो [निमित्त और
उपादान] कारण है, सर्वज्ञता आदि जिसके तटस्थ लक्षण हैं,
परोक्षता नामक धर्म जिसमें पाया जाता है, सत्य ज्ञानादि
जिसका स्वरूप बताया जाता है वही तो 'तत्' पद का वाच्यार्थ है।
प्रत्यक्परोक्षतैकस्य सद्वितीयत्वपूर्णता ।
विरुद्ध्येते यतस्तस्माल्लक्षणा संप्रवर्तते ॥७३॥
वही वस्तु 'प्रत्यक्' भी हो और 'परोक्ष' भी हो, तथा 'सद्वि-
तीय' भी हो और 'पूर्ण' भी हो, ये दोनों बातें विरुद्ध हैं (हो
नहीं सकती) इस कारण (संगति बैठाने के लिए) लक्षणा वृत्ति
का आश्रय लेना पड़ जाता है ।
तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा ।
सोऽयमित्यादिवाक्यस्थपदयोरिव नापरा ॥७४॥

तृप्तिदीपप्रकरणम् २४९

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २४९
'सोयं देवदत्तः' इस वाक्य के 'सोऽयं' इन दोनों पदों में
जैसे भागलक्षणा [जहदजहल्लक्षणा] मानी गई है [दूसरी कोई
सी लक्षणा नहीं मानी गई] इसी प्रकार तत्वमसि आदि वाक्यों
में भी भागत्याग लक्षणा ही होती है ।
संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र संमतः ।
अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मतः ॥७५॥
[ 'गामानय' गौ को लाओ इत्यादि वाक्यों में लक्षणा न
करने पर भी वाक्यार्थबोध हो जाता है, वैसे ही इन तत्वमसि
आदि वाक्यों में भी हो जायगा। इस शंका का समाधान यह
है कि लोक में 'गामानय' इत्यादि पदों से जो आकांक्षा आदि
वाले गौ आदि पदार्थ उपस्थित होते हैं, उनका परस्पर 'संसर्ग'
(अन्वय) हो जाना ही जैसे वाक्यार्थ माना जाता है, 'नीलं
महत्सुगन्ध्युत्पलम्' इत्यादि में नीलता आदि विशिष्ट उत्पल (फूल)
को वाक्यार्थ माना जाता है, इस तरह ] इन महावाक्यों में
'संसर्ग' या 'विशिष्ट' कोई भी वाक्यार्थ नहीं माना जाता।
किन्तु विद्वान् लोग अखण्ड एकरस पदार्थ को वाक्यार्थ मानते
हैं [इस कारण लक्षणा का आश्रय कर लेना चाहिए ] ।
प्रत्यग्बोधो य आभाति सोऽद्वयानन्दलक्षणः ।
अद्वयानन्दरूपश्च प्रत्यग्बोधैकलक्षणः ॥७६॥
अखण्ड एकरस वाक्यार्थ यों होता है—जो कि प्रत्यग्बोध
[या सर्वान्तर चिदात्मा] प्रतीत हो रहा है [जो बुद्धि आदि का
साक्षी होकर भास रहा है] वही तो अद्वितीय आनन्दरूप पर-
मात्मा है, तथा वह जो अद्वितीय आनन्दरूप परमात्मा
बताया जाता है वह यह चिदेकरस आत्मा ही तो है।

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२५० पञ्चदशी
इत्थमन्योन्यतादात्म्यप्रतिपत्तिर्यदा भवेत् ।
अब्रह्मत्वं त्वमर्थस्य व्यावर्तते तदैव हि ॥७७॥
तदर्थस्य च पारोक्ष्यम्, यद्येवं किं ततः शृणु ।
पूर्णानन्दैकरूपेण प्रत्यग्बोधोऽवतिष्ठते ॥७८॥
जब किसी को इस प्रकार [व्यतिहार से—लौट फेर से]
तादात्म्य का ज्ञान हो जायगा,तब एक तो यह होगा कि त्वमर्थ
में जो अब्रह्मता आ गई थी [भ्रान्ति से उसको जो अब्रह्म
समझ लिया गया था] वह तुरन्त ही भाग जायगी । दूसरे
यह होगा कि तदर्थ में जो परोक्षता आ गई थी [वह जो परोक्ष
ज्ञान का ही विषय हो गया था] वह भी उसी क्षण नष्ट हो
जायगी । ऐसा होने पर भी क्या होगा ? सो इस प्रश्न का उत्तर
भी सुन लो, कि—यह जो अभी तक प्रत्यग्बोध ही था यही
अब पूर्णानन्द बन बैठता है ।
एवं सति महावाक्यात् परोक्षज्ञानमीर्यते ।
यैस्तेषां शास्त्रसिद्धान्तविज्ञानं शोभतेतराम् ॥७९॥
इतना सब सुन चुकने पर भी जो लोग यह कहते ही जाते
हैं कि महावाक्य से परोक्षज्ञान ही होता है, [वे सिद्धान्त के
रहस्य को जानते ही नहीं] सिद्धान्त-ज्ञानरहित उनकी बात सुन
कर हमें तो हँसी आती है ।
आस्तां शास्त्रस्य सिद्धान्तो युक्त्या वाक्यात् परोक्षधीः ।
स्वर्गादिवाक्यवन्नैवं दशमे व्यभिचारतः ॥८०॥
शास्त्र के सिद्धान्त की बात को छोड़ दो [उससे हमें कुछ
मतलब नहीं] युक्ति से यही सिद्ध होता है कि—वाक्य से तो-

तृप्तिदीपप्रकरणम् २५१

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २५१
स्वर्गादि के प्रतिपादक वाक्यों की तरह, परोक्षज्ञान ही हुआ करता
है। सो यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि इस बात का व्यभि-
चार दशवें में देखा जाता है [देखते हैं कि 'तू ही दसवां है'
यह वाक्य प्रत्यक्षज्ञान को उत्पन्न किया करता है]
स्वतऽपरोक्षजीवस्य ब्रह्मत्वमभिवाञ्छतः ।
नश्येत् सिद्धापरोक्षत्वमिति युक्तिर्महत्त्यहो ॥८१॥
सिद्धान्ती हंसी में कहता है कि—तुम्हारी यह युक्ति तो
इनाम देने योग्य ही है कि—जो बिचारा जीव अभी तक स्वतः
अपरोक्ष ही था, उसे जब ब्रह्मभाव की इच्छा हुई तो उस की
(पहले से) सिद्ध अपरोक्षता भी हाथ से छिन गयी। [इस
कारण महावाक्यों को परोक्षज्ञान का जनक मानना ठीक
ही नहीं है]
वृद्धिमिष्टवतो मूलमपि नष्टमितीदृशम् ।
लौकिकं वचनं सार्थं संपन्नं त्वत्प्रसादतः ॥८२॥
[यदि इस दोष को इष्टापत्ति मानो तो हम कहेंगे कि]
तुम्हारे जैसे अविचारशील की कृपा से तो आज यह लौकिक
वचन भी सार्थक हो गया कि 'सूद चाहने वाले का मूल धन
भी बरबाद हो गया।'
अन्तःकरणसंभिन्नबोधो जीवोऽपरोक्षताम् ।
अर्हत्युपाधिसद्भावान्न तु ब्रह्मानुपाधितः ॥८३॥
नैवं ब्रह्मत्वबोधस्य सोपाधिविषयत्वतः ।
यावद्विदेहकैवल्य मुपाधेरनिवारणात् ॥८४॥
पूर्वपक्षी कहता है कि—अन्तःकरण से मिश्रित जो बोध
है, जिसे 'जीव' कहते हैं, उपाधि के होने से उसका प्रत्यक्ष

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२५२ पञ्चदशी
हो जाय वह तो हम मान लेते हैं। परन्तु उपाधि से रहित जो
ब्रह्मतत्व है उसका प्रत्यक्ष होना ठीक नहीं मालूम होता ॥८३॥
इस पर सिद्धान्ती का कहना है कि—[जीव को जो] ब्रह्मरूपता
का परिज्ञान होता है, वह तो सोपाधिक वस्तु को ही विषय
करता है [इस कारण उस ज्ञान का विषय जो ब्रह्म है वह भी
सोपाधिक ही है। तात्पर्य यह है कि—जब तक ज्ञेय सोपाधिक
नहीं होगा,तब तक ज्ञान उस पदार्थ को अपना विषय ही कैसे
करेगा। उपाधि के बिना तो ज्ञेय का ज्ञान होता ही नहीं] जब
तक किसी को विदेह कैवल्य की प्राप्ति नहीं हो जाती है, तब
तक उपाधि का निवारण तो हो ही नहीं सकता, इस कारण
तब तक वह उपाधि बनी ही रहेगी और यों ब्रह्म का प्रत्यक्ष भी
होता ही रहेगा।
अन्तःकरणसाहित्यराहित्याभ्यां विशिष्यते ।
उपाधिर्जीवभावस्य ब्रह्मतयाश्च नान्यथा ॥८५॥
[इन उपाधियों की बात भी सुन लीजिये] 'अन्तःकरण का
साहित्य' तो जीवभाव की उपाधि है तथा 'अन्तःकरण का
राहित्य' ब्रह्मभाव की उपाधि मानी गयी है। इनकी उपाधियों में
और कोई विलक्षणता नहीं है—[अन्तःकरण सहित तत्व को
'जीव' कहते हैं और अन्तःकरण रहित हो चुके हुए तत्व को
'ब्रह्म' कहते हैं। जो तत्व अभी तक अन्तःकरण सहित सा
ही रहा था, वही तत्व अब अन्तःकरण से नाराज़ होकर अलग
बैठ गया है। जिस तत्व को अभी तक अन्तःकरण से सहित
पहचानते थे, उसी तत्व को अब अन्तःकरण से रहित रूप में
जानने लगे हैं]

तृप्तिदीपप्रकरणम् २५३

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २५३
यथा, विधिरुपाधिः स्यात् प्रतिषेधस्तथा न किम् ।
सुवर्णलोहभेदेन शृङ्खलात्वं न भिद्यते ॥८६॥
विधि [अर्थात् भावरूप अन्तःकरण का सम्बन्ध] जिस
प्रकार उपाधि होती है, क्या इसी प्रकार प्रतिषेध [अर्थात् अभाव-
रूप, अन्तःकरण का वियोग] उपाधि नहीं हो सकता है ?
तात्पर्य यह है कि हो ही सकता है । [फिर भी जो भाव या
अभावरूपी अवान्तर विलक्षणता दीखती है, उसकी परवाह न
करनी चाहिये। क्योंकि देखते हैं कि] सोने या लोहे के अवान्तर
भेद से शृङ्खलापने में तो कोई भी भेद नहीं हो जाता। [पुरुष
की स्वतन्त्रता को हरण करने में सुवर्णपने या लोहपने का कुछ
भी मूल्य नहीं है । इसी प्रकार उस तत्व को चाहे अन्तःकरण
से सहित रूप में पहचाना जाय या अन्तःकरण से रहित रूप
में पहचाना जाय, बात एक ही है । कुण्डल वाला गुरु है कुण्डल
जिस पर नहीं वह उसका विद्यार्थी, यहाँ पर कुण्डल का होना
गुरु की उपाधि है । कुण्डल का न होना छात्र की उपाधि है ।
यों उपाधि के अवान्तर भेद को समझें तो अन्तःकरण रहित
रूप में ब्रह्मतत्व जाना ही जा सकता है । ]
अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद् विधिमुखेन च ।
वेदान्तानां प्रवृत्तिः स्याद् द्विधेत्याचार्यभाषितम् ॥८७॥
आचार्य ने कहा है कि—वेदान्तों ने ब्रह्म का प्रतिपादन दो
तरह से किया है—एक तो अतद्व्यावृत्ति रूप से, दूसरे साक्षात्
विधिमुख से । अतद् अर्थात् तद् (ब्रह्म) से भिन्न जो अज्ञा-
नादि हैं उनको 'नेतिनेति' करके हटा दिया जाय, किंवा अतत्
जो यह प्रपंच है, उसकी व्यावृत्तिरूपी उपाय भी ब्रह्म का दर्शन

यही विधिमुख से किया हुआ प्रतिपादन माना जाता है ।

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२५४ पञ्चदशी
करा देता है । दूसरे उस ब्रह्म के साक्षात् वाचक शब्दों का ही
कथन कर दिया जाय—जैसे कि 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इत्यादि ।
यही विधिमुख से किया हुआ प्रतिपादन माना जाता है ।
अहमर्थपरित्यागादहं ब्रह्मेति धीः कुतः ।
नैवमंशस्य हि त्यागो भागलक्षणयोदितः ॥८८॥
[जब वेदान्तों को अतद्व्यावृत्ति रूप से ब्रह्म का बोधक
मानोगे तब] 'अहं' शब्द का अर्थ जो कूटस्थ है, उसका भी
त्याग जब हो जायगा तब 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा ज्ञान कैसे उत्पन्न
हो सकेगा ? इसका उत्तर यह है कि—हम ऐसा सर्वत्याग
मानते ही नहीं । हम तो 'भागलक्षणा' किंवा 'जहदजहल्लक्षणा'
से अहंशब्द के अर्थ जडभागरूपी एकदेश का ही त्याग करते
हैं [अहं के दूसरे अर्थ कूटस्थ अंश का त्याग हम ने नहीं
माना है । ऐसी अवस्था में 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान हो ही
सकता है]
अन्तःकरणसं त्यागादवशिष्टे चिदात्मनि ।
अहं ब्रह्मेतिवाक्येन ब्रह्मत्वं साक्षिणीक्ष्यते ॥८९॥
अन्तःकरण का पूर्ण त्याग कर देने पर [अपने आत्मराज्य
में से अन्तःकरण को धक्का दे देने पर] जो चिदात्मा शेष रह
जाता है, 'अहं ब्रह्मास्मि' यह महावाक्य उसी शेष रहे हुए चेतन
साक्षी में ब्रह्मत्व का ज्ञान कराता है ।
स्वप्रकाशोऽपि साक्ष्येव धीवृत्त्या व्याप्यतेऽन्यवत् ।
फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् ॥ ९० ॥

तृप्तिदीपप्रकरणम् २५५

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[Header]
तृप्तिदीपप्रकरणम् २५५

[Main Text]
प्रत्यगात्मा को बुद्धिवृत्तियाँ कैसे विषय करेंगी ? इस प्रश्न का
उत्तर यह है कि] स्वयंप्रकाश भी वह साक्षी अन्य घटादियों
के समान धीवृत्तियों से व्याप्त तो हो ही जाता है [तभी तो
'मैं स्वयंप्रकाश हूँ' ऐसी बुद्धिवृत्ति का होना सम्भव हो गया
है ] यह बात हम सिद्धान्त से बाहर की नहीं कह रहे हैं क्योंकि
शास्त्रकारों ने यही तो कहा है कि फल [अर्थात् वृत्ति में प्रति-
विम्बित चिदाभास] इस आत्मा को व्याप्त नहीं करता [क्योंकि
वह तो स्वयं ही स्फुरणरूप होता है । आत्मा की वृत्ति की
व्याप्ति को तो पूर्वाचार्य भी मानते ही हैं। वे तो केवल फल
की व्याप्ति का निषेध करते हैं]
बुद्धितत्स्थचिदाभासौ द्वावपि व्याप्तुतो घटम् ।
तत्राज्ञानं धिया नश्येदाभासेन घटः स्फुरेत् ॥९१॥
[जब हमें घट दीखता है तब] बुद्धि भी और उसमें पड़ा
हुआ चिदाभास भी दोनों ही घट को व्याप्त किया करते हैं
[दोनों के व्याप्त करने के फल भी पृथक् पृथक् देख लो कि]
उन दोनों में से बुद्धिवृत्ति से तो अज्ञान नष्ट हो जाता है—
[क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है] तथा
दूसरा जो चिदाभास है उस से घट की स्फूर्ति हुआ करती है
[क्योंकि जड होने के कारण घट में स्वयं स्फुरण की योग्यता
नहीं होती]
ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ।
स्वयंस्फुरणरूपत्वान्नाभास उपयुज्यते ॥९२॥
[प्रत्यगात्मा और ब्रह्म की जो एकता थी उसको अज्ञान
ने आवृत कर रक्खा था] ब्रह्म में के उस अज्ञान का नाश करने

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२५६ पञ्चदशी
के लिये वृत्ति की व्याप्ति तो अपेक्षित होती है— [महावाक्यों
को सुनकर 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी जो एक बुद्धिवृत्ति उत्पन्न हुआ
करती है, वह वृत्ति ब्रह्म को व्याप्त करले, केवल यही बात
आवश्यक है] परन्तु स्वयं स्फुरणरूप होने के कारण, उसकी
स्फूर्ति कराने के लिये, फिर चिदाभास का कुछ भी उपयोग नहीं
रह जाता [ऐसी अवस्था में वह चिदाभास भले ही ब्रह्म से
युक्त हो भी जाता हो तो भी उसमें उसका कुछ भी उपयोग नहीं
होता। वह तो सूरज के सामने लाये हुए दीपक की तरह ब्रह्म-
तत्व के सामने निकम्मा हो जाता है, या उस ही में लीन
हो कर एक हो जाता है। यों वह उसे देख नहीं पाता।]
चक्षुर्दीपावपेक्ष्येते घटादेर्दर्शने यथा।
न दीपदर्शने किन्तु चक्षुरेकमपेक्ष्यते ॥९३॥
[अन्धेरे से ढके हुए] घटादि को देखने में चक्षु और दीपक
दोनों ही अपेक्षित होते हैं। परन्तु दीपक को देखने में तो वैसा
नहीं होता। किन्तु एक चक्षु ही चक्षु अपेक्षित होती है [इसी
प्रकार ब्रह्म में अज्ञान का नाश करने के लिये वृत्ति की व्याप्ति
तो मान लेनी चाहिये किन्तु उसके स्फुरण के लिये आभास का
कुछ उपयोग नहीं होता]
स्थितोऽप्यसौ चिदाभासो ब्रह्मण्येकीभवेत् परम्।
न तु ब्रह्मण्यतिशयं फलं कुर्याद् घटादिवत् ॥९४॥
जो वृत्तियाँ ब्रह्म को विषय किया करती हैं, उनमें भी
यद्यपि चिदाभास रहता है, परन्तु वह ब्रह्म से पृथक् होकर
नहीं भासता। किन्तु [प्रचण्ड धूप में जलते हुए दीपप्रकाश
के समान] ब्रह्म के साथ एकीभाव को प्राप्त हो जाता है।

[Header] चित्रदीपप्रकरणम् २५७

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[Header] चित्रदीपप्रकरणम् २५७

फिर वही चिदाभास घटादि की तरह ब्रह्म में स्फूर्ति रूपी अति-
शय को उत्पन्न नहीं कर सकता ।
अप्रमेय मनादिं चेत्यत्र श्रुत्येदमीरितम् ।
मनसैवेदमाप्तव्यमिति धीव्याप्यता श्रुता ॥९५॥
ब्रह्म में वृत्ति की व्याप्ति तो है परन्तु फल की व्याप्ति ब्रह्म में
नहीं होती, यह बात हम अप्रामाणिक नहीं कहते हैं देखो कि-
निर्विकल्पमनन्तं च हेतुदृष्टान्तवर्जितं। अप्रमेयमनादिं च यज्ज्ञात्वा मुच्यते
बुधः ॥ अमृतबिन्दु उपनिषत् की इस श्रुति के अप्रमेय शब्द
का तात्पर्य यही है कि उसमें फल की व्याप्ति नहीं होती, और
यों वह अप्रमेय ही रह जाता है तथा मनसैवेदमाप्तव्यं नेहना-
नास्ति किंचन (कठ० २-४-११) इस श्रुति में ब्रह्म की वृत्ति-
व्याप्यता की बात सुनी गयी है ।
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति वाक्यतः ।
ब्रह्मात्मन्याक्ति मुल्लिख्य यो बोधः सोऽभिधीयते॥९६॥
[सत्यज्ञानादि स्वरूपवाले] ब्रह्म से अभिन्न आत्मा को जब
कोई अधिकारी विषय कर लेता है, उस समय जो बोध
किंवा अपरोक्ष ज्ञान उसे उत्पन्न हुआ करता है, उसी बोध का
वर्णन श्रुति के आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मि (बृ० ४-४-१२)
'आत्मा को यदि पहचान ले कि मैं तो ऐसा महान् तत्व हूँ'
इतने वाक्यखण्ड ने किया है ।
अस्तु बोधो ऽपरोक्षोत्र महावाक्यात् तथाप्यसौ ।
न दृढः श्रवणादीनामाचार्यैः पुनरीरणात् ॥९७॥
इस ब्रह्मात्मता के विषय में महावाक्यों से

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२५८ पञ्चदशी
बार सुनकर विचार करने पर ] अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है
यह तो हम माने लेते हैं , परन्तु ऐसा बोध दृढ तो नहीं होता
क्योंकि श्रीमच्छङ्कराचार्य ने वाक्यार्थ ज्ञान के उत्पन्न हो जाने
के बाद भी श्रवण आदि की आवृत्ति करने को कहा है ।
[ वह उन्होंने ज्ञान की दृढता के ही लिये तो कहा है । इसी
से समझते हैं कि महावाक्य से हुआ अपरोक्ष ज्ञान टिकाऊ
नहीं होता ]
अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थबोधो यावद् दृढीभवेत् ।
शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकम् ॥९८॥
आचार्य ने कहा है कि—जब तक किसी को अपने
ब्रह्मभाव का दृढ निश्चय न हो जाय, तब तक शमदमादि से
युक्त होकर, श्रवणादि का अभ्यास किया ही करे।
बाढं सन्ति ह्यदार्ढ्यस्य हेतवः श्रुत्यनेकता ।
असंभाव्यत्वमर्थस्य विपरीता च भावना ॥९९॥
जो कि शब्दप्रमाण से उत्पन्न हुआ ज्ञान दृढ नहीं होता,
उसका कारण एक तो श्रुतियों की अनेकता होती है [ कोई
श्रुति कुछ कहती है, दूसरी श्रुति कुछ और ही बता देती है ]
दूसरे अलौकिक होने के कारण अखण्डैकरस अद्वितीय ब्रह्म-
रूपी अर्थ की संभावना ही साधारण प्राणी के हृदय में नहीं
हो पाती। तीसरे विपरीत भावनाओं ने भी प्राणियों के हृदय
पर पूर्णाधिकार जमा रक्खा है, [ कर्तृत्व भोक्तृत्व के वृथा
अभिमान से प्राणियों को इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि
वे अपने ब्रह्मत्व का किंवा अपने असंग रूप का कभी विचार
भी कर सकें ] ।

तृप्तिदीपप्रकरणम् २५९

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २५९
शाखाभेदात् कामभेदाच्छ्रुतं कर्मान्यथाऽन्यथा ।
एवमत्रापि मा शङ्कीत्यतः श्रवणमाचरेत् ॥१००॥
[ श्रुतियों के नाना होने से यदि यह ज्ञान दृढ न होता हो,
तो उसका उपाय इस श्लोक में बताया गया है ] शाखा के
भिन्न भिन्न होने से कर्म भिन्न भिन्न हो जाता है । इसी प्रकार
कामना के भिन्न भिन्न होने से भी कर्मों में भेद आ जाता है ।
ऐसा ही कोई भेद ज्ञानकाण्ड में भी होता होगा, इस शंका
[ भेदशंका ] को हटाने के लिये बार बार श्रवण करते रहो ।
वेदान्तानामशेषाणामादिमध्यावसानतः ।
ब्रह्मात्मन्येव तात्पर्यमिति धीः श्रवणं भवेत् ॥१०१॥
आदि मध्य और अन्त में कहीं से भी विचार करने पर
सब वेदान्तों [ किंवा उपनिषदों ] का परम निष्कर्ष ब्रह्म को
प्रत्यगात्मारूप बताने में ही है,ऐसा निश्चय 'श्रवण' कहाता है ।
समन्वयाध्याय एतत् सूक्तं,धीस्वास्थ्यकारिभिः ।
तर्कैः संभावनार्थस्य द्वितीयाध्याय ईरिता ॥१०२॥
व्यास मुनि ने इसी 'श्रवण'को वेदान्त दर्शन के समन्वय
नाम के प्रथमाध्याय में भली रीति से वर्णन किया है । प्रमेय
को समझने में जो जो अड़चनें हों, उन सब को हटाकर,
बुद्धि का सन्तोष कर देने वाले तर्कों किंवा युक्तियों से, अर्थ
की संभावना करना [ कि श्रवण किया हुआ अर्थ यों यों
संभव है ] 'मनन' कहाता है । इस मनन का निरूपण उन्होंने
द्वितीयाध्याय में किया है ।
बहुजन्मदृढाभ्यासाद् देहादिष्वात्मधीः क्षणात् ।
पुनः पुनरुदेत्येवं जगत्सत्यत्वधीरपि ॥१०३॥

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२६० पञ्चदशी
विपरीता भावनेयमैकाग्र्यात् सा निवर्तते ।
तत्त्वोपदेशात् प्रागेव भवत्येतदुपासनात् ॥१०४॥
अनन्त जन्मों का दृढ अभ्यास हो गया है, उसके कारण
देहादि को जो आत्मा समझने के और जगत् को सत्य सम-
झने के वृथा विचार फिर फिर उत्पन्न हुआ करते हैं, बस यही
तो 'विपरीत भावना' कहाती है । यह विपरीत भावना एका-
ग्रता से नष्ट हो जाती है । यह एकाग्रता तो ब्रह्मोपदेश से पहले
पहले ही उपासना से कर लेनी चाहिये ।
उपास्तयोऽतएवात्र ब्रह्मशास्त्रेऽपि चिन्तिताः ।
प्रागनभ्यासिनः पश्चाद् ब्रह्माभ्यासेन तद् भवेत् ॥१०५॥
यही कारण है कि उपासनाओं की चिन्ता ब्रह्म शास्त्र
[ वेदान्त शास्त्र ] में भी की गयी है । जिसने तो ब्रह्म ज्ञान
होने से पहले एकाग्रता का अभ्यास नहीं किया होता, उसको
तो ब्रह्माभ्यास करते रहने से ही एकाग्रता हो जाती है ।
तच्चिन्तनं तत्कथन मन्योऽन्यं तत्प्रबोधनम् ।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः ॥१०६॥
ब्रह्म का ही चिन्तन करने को, उसी की बात करने को,
एक दूसरे को उसी को समझाने को तथा सदा केवल तन्निष्ठ
हो जाने को ही ज्ञानी लोग ब्रह्माभ्यास कहते हैं । [ ऐसा
ब्रह्माभ्यास करते करते ज्ञानी का चित्त एकाग्र हो जाता है ]
तमेव धीरो विज्ञायः प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् ॥१०७॥
धीर [अर्थात् ब्रह्मचर्यादिसाधन से युक्त] ब्राह्मण [ अर्थात्
ब्रह्मभाव चाहने वाले मुमुक्षु ] को उचित है कि उसी प्रत्यग्रूप

तृप्तिदीपप्रकरणम् २६१

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २६१
परमात्मा को पूर्ण रूप से जान ले [ जिससे उसमें किसी प्रकार
का संशयादि न रह जाय] इतना कर चुकने पर फिर प्रज्ञा
किंवा एकाग्रता को करले [ अर्थात् ब्रह्मात्मैकता के ज्ञान की
एक निरन्तर धारा बहादे] अनात्मा को विषय करनेवाले
शब्दों का ध्यान [ और कथन दोनों ही] छोड़ दे। क्योंकि वह
ध्यान और वह कथन वाणी और मन की थकावट का ही तो
कारण होता है। [शब्दों का ध्यान करने से मन थकता है
तथा शब्दों को बोलने से वाणी को श्रम होता है। यों श्रुति
ने अपने मुख से इसी ब्रह्मनिष्ठता का वर्णन किया है।]
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥१०८॥
जो महापुरुष मुझसे अनन्य होकर मेरा चिन्तन करते
करते सदा मेरी ही उपासना किया करते हैं-[सदा मद्रूप ही
हुए रहते हैं] नित्य ही मुझमें लगे हुए [मेरे गम्भीर अन्तस्तल
तक पहुँचे हुए] उन उपासकों के भोजनाच्छादि का प्रबन्ध
और उनके धन की रक्षा का भार मेरे कन्धों पर रहता है।
क्योंकि उन्होंने तो मुझको ही अपना आत्मा समझ लिया
है। वे फिर अपने भोजनादि के प्रबन्ध की चिन्ता नहीं
करते । जिस प्रकार कोई ग्वाला किसी पशु को चराना छोड़
देता है तो उस पशु का स्वामी उसे नहीं छोड़ बैठता । फिर
तो वह स्वयं ही उसके खान पान की देखभाल किया करता
है। इसी प्रकार यदि कोई साधक ज्ञानावेश में आकर या
भक्ति के उद्रेक में फँस कर शरीर के निर्वाह की चिन्ता छोड़
देता है तो समष्टि का अभिमानी उसके निर्वाह को अपने जिम्मे

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२६२ पञ्चदशी
ले लेता है। ईश्वर के संकल्प का ही दूसरा नाम प्रारब्ध है।
सो उस प्रारब्ध के प्रताप से किन्हीं भी लोगों के मन में ऐसी
प्रेरणायें हो जाती है कि अमुक को भोजनादि की आवश्य-
कता है चलो दे आवें। देखते हैं कि जब कोई अन्धा, जो अब
अपनी सहायता स्वयं नहीं कर सकता, हमारे सामने आकर
कुछ मांगता है तब हमारे मन में उसको भोजनाच्छादनादि
देने की अन्तः प्रेरणायें, जब तक उसे कुछ दे नहीं देते,तब तक
बार बार होती रहती हैं। यों इस मार्ग से असमर्थ की अपङ्ग
की, और भक्ति में गहरे डूवे हुए भक्तों की, चिन्ता ईश्वर [देने
लेने वाले दोनों के अन्तर्यामी ] स्वयं करते हैं। जो तो बहु-
र्मुख रहते हैं, अपना भार अपने ही ऊपर उठाये रहते हैं,
भगवान भी उनकी तरफ से निश्चिन्त बने बैठे रहते हैं।
इति श्रुतिस्मृती नित्यमात्मन्येकाग्रतां धियः ।
विधत्तो विपरीताया भावनायाः क्षयाय हि ॥१०९॥
ऊपर कही हुई ये श्रुति और स्मृतियें कहती हैं कि—विप-
रीत भावना की निवृत्ति करने के लिये आत्मा में सदा चित्त
को एकाग्र किये रहना चाहिये। [ऐसे लोग पेट कहाँ से पालें ?
बाल बच्चों को कहाँ से खिलायें ? इसी का उत्तर पहले श्लोक में
जिम्मेदारी की दस्तावेज लिखकर गीता में दिया है।
यद्यथा वर्तते तस्य तत्वं हित्वाऽन्यथात्वधीः ।
विपरीता भावना स्यात् पित्रादावरिधीर्यथा ॥११०॥
जो [शुक्ति आदि]पदार्थ जिस रूप का है, उसके उस रूप
को तो छोड़ दिया जाय और उसको अन्यथा [रजत आदि
रूप का] समझ लिया जाय, बस यही 'विपरीत भावना,कहाती

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है [इसी को 'अतत्' को 'तत्' समझ लेना भी कहा जाता है]
जैसे कि पिता आदि हितैषियों को शत्रु समझ लिया जाता है
तो इसको भी विपरीत भावना ही कहते हैं ।
आत्मा देहादिभिन्नोयं मिथ्या चेदं जगत् तयोः ।
देहाद्यात्मत्वसत्यत्वधी र्विपर्ययभावना ।।१११।।
यह आत्मा वस्तुतः देहादियों से भिन्न ही है और यह
जगत् भी मिथ्या ही है । ऐसा होने पर भी आत्मा को तो
देहादि रूप मान लेना, तथा जगत् को सत्य समझ लेना, यही
इस प्रकरण की 'विपरीत भावना' है ।
तत्त्वभावनया नश्येत् सातो देहातिरिक्तताम् ।
आत्मनो भावयेत् तद्वन्मिथ्यात्वं जगतोऽनिशम्।।११२।।
[देहादि की आत्मता और जगत् की सत्यता बुद्धि वाली]
वह विपरीत भावना, तत्व भावना से [या यों समझना चाहिये
कि आत्मा तो देहादि से भिन्न है तथा यह जगत् मिथ्या है
ऐसा निरन्तर ध्यान करते रहने से ] नष्ट हो जाती है । इस
कारण आत्मा की देहादि से भिन्नता तथा देहादि जगत् के
मिथ्यापन की भावना सदा ही किया करे ।
किं मन्त्रजपवन्मूर्तिध्यानवद् वात्मभेदधीः ।
जगन्मिथ्यात्वधीश्चात्र व्यावत्र्या स्यादुतान्यथा ।।११३।।
आत्मा के देहादि से भिन्न होने के ज्ञान को, तथा जगत् के
मिथ्या होने के विचार को, मन्त्र के जप की तरह, या देवता के
ध्यानादि की तरह नियम से करें ? या लौकिक कामों की तरह
नियम के बिना भी कर सकते हैं ? यह एक साधन मार्ग का प्रश्न है।

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२६४ पञ्चदशी
अन्यथेति विजानीहि दृष्टार्थत्वेन भुक्तिवत् ।
बुभुक्षुर्जपवद् भुङ्क्ते न कश्चिन्नियतः क्वचित् ॥११४॥
यह तो बिना नियम ही करना चाहिये। क्योंकि यह मामला
तो भोजन आदि की तरह दृष्टार्थ ही है । भूख को हटाने के
लिये खाना चाहने वाला पुरुष जप करने वाले की तरह नियम
से नहीं खाता [किन्तु जिस तरह भी उसकी भूख शान्त हो
जाय उसी तरह भोजन करता है ।]
अश्नाति च नवाश्नाति भुङ्क्ते वा स्वेच्छयाऽन्यथा ।
येन केन प्रकारेण क्षुधामपनिनीषति ॥११५॥
भूख की शान्ति चाहने वाला पुरुष अन्न हो तो खाता है,
नहीं हो तो नहीं खाता, [बिना खाये ही दिन काट देता है]
आसन पर बैठकर चलते चलते मूढ़े या कुर्सी पर बैठकर अथवा
लेटे लेटे ही स्वेच्छा से खाया करता है । जिस किसी तरह
भूख को ही हटा देना चाहता है । [भाव यह है कि भोजन
तो भूख की शान्तिरुपी दृष्ट फल के लिये ही करना चाहिये।
उस में जो विशेष विशेष नियम लगा दिये गये हैं वे नियम
परलोक के लिये होते हैं ।]
नियमेन जपं कुर्यादकृतौ प्रत्यवायतः ।
अन्यथाकरणेऽनर्थः स्वरवर्णविपर्ययात् ॥११६॥
जप को तो नियम से ही करना चाहिये । जप को न करें,
तो पाप चढ़ता है । उस जप को यदि अविधिपूर्वक करें तो
स्वर और वर्ण के उलट पुलट हो जाने से अनर्थ हो जाता है ।
क्षुधेव दृष्टबाधाकृद् विपरीता च भावना ।
जेया केनाप्युपायेन नास्त्यत्रानुष्ठितेः क्रमः ॥११७॥