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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 268 of 726

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Page 268

२४८ पञ्चदशी
ब्रह्म के अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) करने के लिये ही महावाक्यों
का कथन है, यह बात शंकराचार्यजी ने अपनी 'वाक्यवृत्ति'
नाम की पुस्तक में कही है । इस कारण वाक्य से ब्रह्म का
प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाने में कोई भी विप्रतिपत्ति नहीं रहती ।
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः ।
अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः ॥७१॥
वाक्यवृत्ति में कहा गया है कि—अन्तःकरण उपाधिवाला
जो बोध (चिदात्मा) है, जो 'मैं' इस प्रतीति के तथा 'मैं' इस
शब्द के विषयरूप से प्रतीत होता है, वही (बोध) त्वं पद का
वाच्यार्थ कहाता है ।
मायोपाधि र्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः ।
पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मक स्तत्पदाभिधः ॥७२॥
माया जिसकी उपाधि है, जगत् का जो [निमित्त और
उपादान] कारण है, सर्वज्ञता आदि जिसके तटस्थ लक्षण हैं,
परोक्षता नामक धर्म जिसमें पाया जाता है, सत्य ज्ञानादि
जिसका स्वरूप बताया जाता है वही तो 'तत्' पद का वाच्यार्थ है।
प्रत्यक्परोक्षतैकस्य सद्वितीयत्वपूर्णता ।
विरुद्ध्येते यतस्तस्माल्लक्षणा संप्रवर्तते ॥७३॥
वही वस्तु 'प्रत्यक्' भी हो और 'परोक्ष' भी हो, तथा 'सद्वि-
तीय' भी हो और 'पूर्ण' भी हो, ये दोनों बातें विरुद्ध हैं (हो
नहीं सकती) इस कारण (संगति बैठाने के लिए) लक्षणा वृत्ति
का आश्रय लेना पड़ जाता है ।
तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा ।
सोऽयमित्यादिवाक्यस्थपदयोरिव नापरा ॥७४॥