पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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ले लेता है। ईश्वर के संकल्प का ही दूसरा नाम प्रारब्ध है।
सो उस प्रारब्ध के प्रताप से किन्हीं भी लोगों के मन में ऐसी
प्रेरणायें हो जाती है कि अमुक को भोजनादि की आवश्य-
कता है चलो दे आवें। देखते हैं कि जब कोई अन्धा, जो अब
अपनी सहायता स्वयं नहीं कर सकता, हमारे सामने आकर
कुछ मांगता है तब हमारे मन में उसको भोजनाच्छादनादि
देने की अन्तः प्रेरणायें, जब तक उसे कुछ दे नहीं देते,तब तक
बार बार होती रहती हैं। यों इस मार्ग से असमर्थ की अपङ्ग
की, और भक्ति में गहरे डूवे हुए भक्तों की, चिन्ता ईश्वर [देने
लेने वाले दोनों के अन्तर्यामी ] स्वयं करते हैं। जो तो बहु-
र्मुख रहते हैं, अपना भार अपने ही ऊपर उठाये रहते हैं,
भगवान भी उनकी तरफ से निश्चिन्त बने बैठे रहते हैं।
इति श्रुतिस्मृती नित्यमात्मन्येकाग्रतां धियः ।
विधत्तो विपरीताया भावनायाः क्षयाय हि ॥१०९॥
ऊपर कही हुई ये श्रुति और स्मृतियें कहती हैं कि—विप-
रीत भावना की निवृत्ति करने के लिये आत्मा में सदा चित्त
को एकाग्र किये रहना चाहिये। [ऐसे लोग पेट कहाँ से पालें ?
बाल बच्चों को कहाँ से खिलायें ? इसी का उत्तर पहले श्लोक में
जिम्मेदारी की दस्तावेज लिखकर गीता में दिया है।
यद्यथा वर्तते तस्य तत्वं हित्वाऽन्यथात्वधीः ।
विपरीता भावना स्यात् पित्रादावरिधीर्यथा ॥११०॥
जो [शुक्ति आदि]पदार्थ जिस रूप का है, उसके उस रूप
को तो छोड़ दिया जाय और उसको अन्यथा [रजत आदि
रूप का] समझ लिया जाय, बस यही 'विपरीत भावना,कहाती