पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context२६४ पञ्चदशी
अन्यथेति विजानीहि दृष्टार्थत्वेन भुक्तिवत् ।
बुभुक्षुर्जपवद् भुङ्क्ते न कश्चिन्नियतः क्वचित् ॥११४॥
यह तो बिना नियम ही करना चाहिये। क्योंकि यह मामला
तो भोजन आदि की तरह दृष्टार्थ ही है । भूख को हटाने के
लिये खाना चाहने वाला पुरुष जप करने वाले की तरह नियम
से नहीं खाता [किन्तु जिस तरह भी उसकी भूख शान्त हो
जाय उसी तरह भोजन करता है ।]
अश्नाति च नवाश्नाति भुङ्क्ते वा स्वेच्छयाऽन्यथा ।
येन केन प्रकारेण क्षुधामपनिनीषति ॥११५॥
भूख की शान्ति चाहने वाला पुरुष अन्न हो तो खाता है,
नहीं हो तो नहीं खाता, [बिना खाये ही दिन काट देता है]
आसन पर बैठकर चलते चलते मूढ़े या कुर्सी पर बैठकर अथवा
लेटे लेटे ही स्वेच्छा से खाया करता है । जिस किसी तरह
भूख को ही हटा देना चाहता है । [भाव यह है कि भोजन
तो भूख की शान्तिरुपी दृष्ट फल के लिये ही करना चाहिये।
उस में जो विशेष विशेष नियम लगा दिये गये हैं वे नियम
परलोक के लिये होते हैं ।]
नियमेन जपं कुर्यादकृतौ प्रत्यवायतः ।
अन्यथाकरणेऽनर्थः स्वरवर्णविपर्ययात् ॥११६॥
जप को तो नियम से ही करना चाहिये । जप को न करें,
तो पाप चढ़ता है । उस जप को यदि अविधिपूर्वक करें तो
स्वर और वर्ण के उलट पुलट हो जाने से अनर्थ हो जाता है ।
क्षुधेव दृष्टबाधाकृद् विपरीता च भावना ।
जेया केनाप्युपायेन नास्त्यत्रानुष्ठितेः क्रमः ॥११७॥