पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextतृप्तिदीपप्रकरणम् २५१
स्वर्गादि के प्रतिपादक वाक्यों की तरह, परोक्षज्ञान ही हुआ करता
है। सो यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि इस बात का व्यभि-
चार दशवें में देखा जाता है [देखते हैं कि 'तू ही दसवां है'
यह वाक्य प्रत्यक्षज्ञान को उत्पन्न किया करता है]
स्वतऽपरोक्षजीवस्य ब्रह्मत्वमभिवाञ्छतः ।
नश्येत् सिद्धापरोक्षत्वमिति युक्तिर्महत्त्यहो ॥८१॥
सिद्धान्ती हंसी में कहता है कि—तुम्हारी यह युक्ति तो
इनाम देने योग्य ही है कि—जो बिचारा जीव अभी तक स्वतः
अपरोक्ष ही था, उसे जब ब्रह्मभाव की इच्छा हुई तो उस की
(पहले से) सिद्ध अपरोक्षता भी हाथ से छिन गयी। [इस
कारण महावाक्यों को परोक्षज्ञान का जनक मानना ठीक
ही नहीं है]
वृद्धिमिष्टवतो मूलमपि नष्टमितीदृशम् ।
लौकिकं वचनं सार्थं संपन्नं त्वत्प्रसादतः ॥८२॥
[यदि इस दोष को इष्टापत्ति मानो तो हम कहेंगे कि]
तुम्हारे जैसे अविचारशील की कृपा से तो आज यह लौकिक
वचन भी सार्थक हो गया कि 'सूद चाहने वाले का मूल धन
भी बरबाद हो गया।'
अन्तःकरणसंभिन्नबोधो जीवोऽपरोक्षताम् ।
अर्हत्युपाधिसद्भावान्न तु ब्रह्मानुपाधितः ॥८३॥
नैवं ब्रह्मत्वबोधस्य सोपाधिविषयत्वतः ।
यावद्विदेहकैवल्य मुपाधेरनिवारणात् ॥८४॥
पूर्वपक्षी कहता है कि—अन्तःकरण से मिश्रित जो बोध
है, जिसे 'जीव' कहते हैं, उपाधि के होने से उसका प्रत्यक्ष