पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९
तादृशेनापि बोधेन संसारो हि निवर्तते ।
यक्षानुरूपो हि बलिरित्याहु लौकिका जनाः ॥१७॥
यद्यपि वह बोध मिथ्या ही है तौ भी उससे मिथ्या संसार
तो निवृत्त हो ही जायगा [ जैसे कि सुपने के झूठे व्याघ्र
को देखकर चौकने से किसी की निद्रा टूट जाती है] लोक में
कहा भी जाता है कि—जैसा यक्ष वैसी बलि, [जैसी शीतला
देवी, वैसी ही उसकी गधे की सवारी । यह इस कारण कहते
हैं कि जब यह संसार मिथ्या ही है तो यह मिथ्या बोध से भी
मर जायगा ] ।
तत्सादाभासपुरुषः सकूटस्थो विविच्य तम् ।
कूटस्थोऽस्मीति विज्ञातुमर्हती त्यभ्यधाच्छ्रुतिः ॥१८॥
[ क्योंकि कूटस्थ ही चिदाभास का निज स्वरूप है ] इस
कारण कूटस्थ सहित जो चिदाभास है वह उस कूटस्थ को
अपने मिथ्या स्वरूप से पृथक् करके [ मुख्य वृत्ति से तो नहीं
किन्तु लक्षणा वृत्ति से तो ] यह जान ही सकता है कि 'मैं
कूटस्थ हूँ' [ मेरा असली रूप कूटस्थ है ] इसी अभिप्राय को
लेकर श्रुति ने 'अस्मि' यह पद कहा है ।
असन्दिग्धाविपर्यस्तबोधो देहात्मनीक्ष्यते ।
तद्वदत्रेति निर्णैतु मयमित्यभिधीयते ॥१९॥
[मूल श्रुति के 'पुरुष' तथा 'अस्मि' इन दो पदों का व्या-
ख्यान यहां तक हो चुका । अब 'अयम्' का व्याख्यान किया
जाता है] लौकिक लोगों को इस प्रसिद्ध देहरूपी आत्मा में
संशय और विपर्यय से रहित बोध पाया जाता है [वे बिना
सन्देह और बिना विपर्यय के इस देह को मैं हूँ कहते हैं । वे
२३० पञ्चदशी
जब बड़े मेलों में घुसते हैं तब -अपने शरीरों पर कोई चिन्ह
करके नहीं घुसते। अपने शरीर के अपने होने में उन्हें कभी
सन्देह नहीं होता ] ठीक इसी प्रकार प्रत्यगात्मा के विषय में
ऐसा ही दृढ़ ज्ञान, मुक्ति को पाने के लिये आवश्यक है। इसी
बात का निर्णय करने के लिये श्रुति में 'अयम्' यह पद कहा है।
देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम्।
आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ॥२०॥
'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा जो देहात्मविषय में लोगों का दृढ़
निश्चय पाया जाता है, उसके समान ही यदि किसी को
प्रत्यगात्मा के विषय में, देहात्मज्ञान की बाधा करने वाला ज्ञान
हो जाय [कि यही आत्मतत्व मैं हूँ। यही ब्रह्मतत्व मैं हूँ]
वह विद्वान् मुक्त होना न चाहने पर भी मुक्त हो जाता है
[क्योंकि उसका संसार का कारण अज्ञान तो ज्ञान से बाधित
हो चुका है ]
अयमित्यपरोक्षत्व-मुच्यते चेत्तदुच्यताम् ।
स्वयंप्रकाशचैतन्यमपरोक्षं सदा यतः ॥२१॥
'अयम्' का अर्थ लोक में 'अपरोक्षत्व' होता है। सो इस
श्रुति में भी 'अयं' इस शब्द से अपरोक्षता ही लिया गया है,
ऐसा यदि कोई कहे तो उसकी बात भी मान लो कि हाँ यह
अर्थ भी लिया जा सकता है। क्योंकि स्वयंप्रकाश [अर्थात् किसी
साधनान्तर की सहायता के बिना प्रतीत होने वाला] चैतन्य तो
सदा ही प्रत्यक्ष रहता है [यह हमारा सिद्धान्त ही है]
परोक्षमपरोक्षं च ज्ञानमज्ञानमित्यदः ।
नित्यापरोक्षरूपेऽपि द्वयं स्याद् दशमे यथा ॥२२॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३१
'परोक्ष' और 'अपरोक्ष' का विरोधी जोड़ा इसी प्रकार
'ज्ञान' और 'अज्ञान' का विरोधी जोड़ा, यह दोनों ही नित्य
अपरोक्ष आत्मा में भी हो ही सकते हैं। जैसे कि दशवें में ये
दोनों ही [विरोधी बातें] पाये जाते हैं।
नवसंख्याहृतज्ञानो दशमो विभ्रमात्तदा।
न वेत्ति दशमोऽस्मीति वीक्षमाणोऽपि तान्नव ॥२३॥
[दस आदमी किसी नदी को पार उतरे। उतर कर अपने
आदमियों को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़ कर
शेष नौ को गिन लेता था। परिणाम में वे नदी के किनारे बैठ
कर दसवें को रो रहे थे कि हाय ! दसवाँ डूब गया] उस
गिनने वाले दसवें को अपना जो ज्ञान होता था उस ज्ञान को
नौ (९) की गिनती ने दबा दिया था। वह दसवां, पुरुष उन,
नौ को प्रत्यक्ष देखता भी था। परन्तु भ्रान्ति में फंसकर,
गिनने वाला अपने आप को नहीं जानता था कि 'मैं ही तो
दसवां हूँ' [शेष नवों को देखता था, परन्तु अपनी ओर उस
का ध्यान नहीं जाता था। उस का सारा ध्यान नौ ने खेंच
लिया था]।
न भाति नास्ति दशम इति स्वं दशमं तदा।
मत्वा वक्ति तदज्ञानकृतमावरणं विदुः ॥२४॥
तब वह दसवां पुरुष [यद्यपि वह स्वयं ही दशवां है, फिर
भी] अपने ही को कह बैठता है कि—दसवां न तो मुझे प्रतीत
ही होता है और न दसवां है ही। बुद्धिमान लोग इसी को तो
अज्ञान का किया हुआ आवरण [परदा] बताते हैं।
२३२ पञ्चदशी
नद्यां ममार दशम इति शोचन् प्ररोदिति ।
अज्ञानकृतविक्षेपं रोदनादिं विदुर्बुधाः ॥२५॥
अब वह दसवां मनुष्य शोक करता और रोता है कि हाय !
दसवां तो नदी में डूब मरा । बुद्धिमान् लोग इस रोदन आदि
को अज्ञान का किया हुआ विक्षेप समझते हैं ।
न मृतो दशमोऽस्तीति श्रुत्वाप्तवचनं तदा ।
परोक्षत्वेन दशमं वेत्ति स्वर्गादिलोकवत् ॥२६॥
जब कोई आप्त पुरुष आकर कहता है कि—भाई दसवां
मरा नहीं, वह तो यहीं है, तब इस आप्त वचन को सुनकर
परोक्षरूप से दसवें को जान जाता है । जैसे शास्त्र के कहने से
स्वर्गादिलोक को परोक्षरूप से जान लिया जाता है ।
त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शितः ।
अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति ॥२७॥
उस आप्त पुरुष ने, नौ को गिनने के बाद उससे कह दिया
[बता दिया] कि 'दसवां तो तू ही है' बस अब तो उसने अपरोक्ष-
रूप से अपने आपको जान लिया कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ।
अब तो वह परमहृष्ट होता है, अब वह पहले की तरह रोता नहीं है।
अज्ञानावृतिविक्षेपद्विविधज्ञानतृप्तयः ।
शोकापगम इत्येते योजनीयाश्चिदात्मनि ॥२८॥
(१) अज्ञान (२) आवरण (३) विक्षेप (४) परोक्षज्ञान
(५) अपरोक्ष ज्ञान (६) तृप्ति तथा (७) शोकनाश ये सातों
अवस्थायें जो दृष्टान्तभूत दसवें में दिखाई गयी हैं, दार्ष्टान्तिक
चिदात्मा में भी लगा लेनी चाहियें ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३३
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३३
संसारासक्तचित्तः संश्चिदाभासः कदाचन ।
स्वयंप्रकाशकूटस्थं स्वतत्त्वं नैव वेत्ययम् ॥२९॥
यह विचारा चिदाभास, संसार अर्थात् विषयोपार्जन के
ध्यान में मस्त हुआ हुआ, अपने स्वयं प्रकाश कूटस्थ आत्मतत्व
को कभी पहचानता ही नहीं [वह तो दिन रात शरीर आदि
की चाकरी में लगा रहता है, उसे आत्मतत्व को पहचानने की
फुर्सत ही नहीं है । वह अपने आत्मतत्व की बात को एक
अप्रासंगिक (बे मौक़े) बात समझता है । बात चीत चलने
पर वह आत्मतत्व को खूब ही फटकारता है, बस यही उस की
अज्ञान नाम की पहली अवस्था कहाती है]
न भाति नास्ति कूटस्थ इति वक्ति प्रसङ्गतः ।
कर्ता भोक्ताहमस्मीति विक्षेपं प्रतिपद्यते ॥३०॥
चिदात्मा के विषय की जब बात चीत चलती है तब सदा
यही कहता है कि महाशय कूटस्थ का न तो मुझे भान ही
होता है और न वह है ही [यही अज्ञान की की हुई आवरण
नाम की दूसरी अवस्था कहाती है] इसी से आत्मा को यह
कहने लगता है कि 'मैं कर्ता हूँ' 'मैं भोक्ता हूँ' यही विक्षेप नाम
की तीसरी अवस्था होने लगती है ।
अस्ति कूटस्थ इत्यादौ परोक्षं वेत्ति वार्तया ।
पश्चात् कूटस्थ एवास्मीत्येवं वेत्ति विचारतः ॥३१॥
बात चीत में जब कोई समझाता है तब उसे परोक्षज्ञान नाम
की चौथी अवस्था आ जाती है कि 'कूटस्थ है' [श्रवणादि का
जब परिपाक हो जाता है तब] पीछे से वह यह प्रत्यक्ष रूप से
१५
२६४ पञ्चदशी
जानता है कि मैं तो कूटस्थ ही हूँ । यही उसकी अपरोक्षज्ञान
नाम की पांचवीं अवस्था कहाती है ।
कर्ता भोक्तेत्येवमादिशोकजातं प्रमुञ्चति ।
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव तुष्यति ॥३२॥
[कूटस्थ असङ्ग आत्मा का ज्ञान जब हो जाता है तब]
कर्ता भोक्ता आदि जितने भी शोक हैं उन सब को छोड़ देता है।
[यही शोकापगम नाम की छठी अवस्था कहाती है] । जो कुछ
करना था सो कर लिया, जो कुछ पाना था सो पा लिया, ऐसा
समझ कर वह संतुष्ट हो जाता है । [यही उसकी तृप्ति नाम की
सातवीं अवस्था कहाती है] ।
अज्ञान मावृति स्तद्वद् विक्षेपश्च परोक्षधीः ।
अपरोक्षमत्तिः शोकमोक्ष स्तृप्ति निरंकुशा ॥३३॥
अज्ञान, आवरण, विक्षेप, परोक्षज्ञान, अपरोक्षज्ञान, शोक-
राहित्य और निरङ्कुश तृप्ति [यों ये सातों अवस्थाएं इस
दाष्ट्रान्तिक में भी होती हैं]।
सप्तावस्था इमाःसन्ति चिदाभासस्य तास्वसौ ।
बन्धमोक्षौ स्थितौ, तत्र तिस्त्रो बन्धकृतः स्मृताः॥३४॥
ये सातों अवस्थाएं चिदाभास की ही हैं। [कूटस्थ की नहीं]
ये बन्ध और मोक्ष इन सातों अवस्थाओं में ही समा जाते हैं।
इन सातों में पहली तीन [अज्ञान आवरण तथा विक्षेप] अवस्थाएं
बन्ध करने वाली हैं। [पिछली चार मोक्ष की अवस्थाएं हैं] ।
न जानामीत्युदासीनव्यवहारस्य कारणम् ।
विचारप्रागभावेन युक्तमज्ञानमीरितम् ॥३५॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३५
जिसके साथ आत्मतत्व के विचार का प्रागभाव नियम
से रहता हो, तथा जो ‘हम नहीं जानते आत्मतत्व क्या चीज़
है’ ऐसा उदासीन व्यवहार कराता हो, उसी को ‘अज्ञान’
कहते हैं।
अमार्गेण विचार्याथ नास्ति नो भाति चेत्यसौ ।
विपरीतव्यवहृति रावृतेः कार्यमिष्यते ॥३६॥
[शास्त्रोक्त पद्धति को छोड़ कर] जब अमार्ग (केवल तर्क)
से विचार करके, यह विपरीत व्यवहार किया जाने लगता है
कि ‘कूटस्थ न तो है ही और न प्रतीत ही होता है’ तब इसी
को ‘आवरण का कार्य’ कहते हैं।
देहद्वयचिदाभासरूपो विक्षेप ईरितः ।
कर्तृत्वाद्यखिलः शोकः संसाराख्योऽस्य बन्धकः॥३७॥
स्थूल और सूक्ष्म दोनों देहों के सहित जो चिदाभास है
वही ‘विक्षेप’ कहाता है। बन्धक अर्थात् बन्धन कराने वाला
कर्तृत्व प्रमातृत्व रूपी जो संसार नाम का सम्पूर्ण शोक है वह
सब इसी चिदाभास का उत्पन्न किया हुआ है।
अज्ञानमावृतिश्चैते विक्षेपात् प्राक् प्रसिद्धयतः ।
यद्यप्यथाप्यवस्थे ते विक्षेपस्यैव नात्मनः ॥३८॥
यद्यपि ‘अज्ञान’ और ‘आवरण’ ये दोनों अवस्थाएं विक्षेप
से पहली हैं, तौ भी ये दोनों अवस्थाएं आत्मा की नहीं हैं
[क्योंकि असङ्ग होने के कारण आत्मा की तो कोई अवस्था
[ही नहीं होती] और कोई गति न होने से इनको चिदाभास की
ही अवस्था मानना पड़ता है।
[ उत्पादक ] संस्कार तो थे ही, इस कारण से 'अज्ञान' और
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विक्षेपोत्पत्तितः पूर्वमपि विक्षेपसंस्कृतिः ।
अस्त्येव तदवस्थात्वमविरुद्धं ततस्तयोः ॥३९॥
जब तक विक्षेप उत्पन्न नहीं हुआ था, तब भी विक्षेप के
[ उत्पादक ] संस्कार तो थे ही, इस कारण से 'अज्ञान' और
'आवरण' दोनों को विक्षेप की अवस्था कहने में कोई विरोध
नहीं रह जाता ।
ब्रह्मण्यरारोपितत्वेन ब्रह्मावस्थे इमे इति ।
न शङ्कनीयं, सर्वासां ब्रह्मण्येवाधिरोपणात् ॥४०॥
[अज्ञात रहने वाले संस्कारों के सहारे से, इन दोनों को
विक्षेप की अवस्था कहने से तो यही अच्छा है कि ] ब्रह्म में
आरोपित होने से इन दोनों को ब्रह्म की ही अवस्था मान लिया
जाय, ऐसी शंका न करनी चाहिए । क्योंकि यों तो सारी ही
अवस्थाएं ब्रह्म में आरोपित हैं [ फिर तो सभी को ब्रह्म की
अवस्था कह देना होगा ] ।
संसार्यहं विबुद्धोहं निःशोकस्तुष्ट इत्यपि ।
जीवगा उत्तरावस्था भान्ति न ब्रह्मगा यदि ॥४१॥
तर्ह्यज्ञोहं ब्रह्मसत्वभाने मद्दृष्टितो नहि ।
इति पूर्वे अवस्थे च भासेते जीवगे खलु ॥४२॥
मैं संसारी [ कर्तृत्व आदि धर्म वाला ] हूँ, मैं विबुद्ध हूँ
अर्थात् मुझे तत्व का साक्षात्कार हो चुका है, अब मुझे शोक
नहीं रहा, मैं अब पूर्ण तुष्ट हो चुका हूँ, ये पिछली चारों अव-
स्थाएं तो स्पष्ट ही जीव के आश्रित प्रतीत हो रही हैं,इस कारण
हम इन चारों को ब्रह्माश्चित नहीं कहते हैं । किन्तु विक्षेप से
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३७
पहली उन दो अवस्थाओं को (अज्ञान और आवरण को) ही
ब्रह्माश्चित कहते हैं, ऐसी शंका यदि कोई करे तो उससे कहो कि
तब तो पहली दोनों (अज्ञान और आवरण नाम की) अवस्थाएं
भी जीव के आश्रित ही प्रतीत होती हैं, इसलिए वे जीव की
ही अवस्थाएं हैं, तभी तो कहा जाता है कि मैं अज्ञ हूँ, ब्रह्म
की सत्ता और ब्रह्म का भान मेरे अनुभव में आता ही नहीं।
अज्ञानस्याश्रयो ब्रह्मेत्यधिष्ठानतया जगुः।
जीवावस्थात्वमज्ञानाभिमानित्वादवादिषम् ॥४३॥
पूर्वाचार्यों ने जो ब्रह्म को अज्ञान का आश्रय कहा है,उनका
तात्पर्य उसे अधिष्ठान बताने में ही है। हमने तो अज्ञान का
अभिमानी होने से उस (अज्ञान) को जीव की अवस्था कह
दिया था।
ज्ञानद्वयेन नष्टेऽस्मिन्नज्ञाने तत्कृतावृत्तिः।
न भाति नास्ति चेत्येषा द्विविधापि विनश्यति ॥४४॥
परोक्षज्ञान और अपरोक्षज्ञान के द्वारा जब यह आवरण
करने वाला अज्ञान नष्ट हो जाता है,तब उस अज्ञान का उत्पन्न
किया हुआ दोनों ही प्रकार का आवरण* 'कि वह नहीं है और
प्रतीत भी नहीं होता है' विनष्ट हो जाता है [क्योंकि उसका
कारण ही नहीं रहता। यों परोक्षज्ञान और अपरोक्षज्ञान नाम
की दोनों अवस्थाएं अज्ञान और आवरण को हटा कर मुक्ति का
कारण हो जाती हैं]।
*आवरण दो प्रकार का होता है एक असत्वापादक [नहीं है
कहलाने वाला] कि वह है.ही नहीं, दूसरा अभानापादक [प्रतीत नहीं
होता कहलाने वाला] कि वह मुझे प्रतीत नहीं होता।
२३८ पञ्चदशी
परोक्षज्ञानतो नश्येदसत्वावृतिहेतुता ।
अपरोक्षज्ञाननाश्या ह्यभानावृतिहेतुता ॥४५॥
['कूटस्थ है' ऐसा] परोक्षज्ञान जब हो जाता है, तब
अज्ञान की असत्वावरण शक्ति नष्ट हो जाती है [फिर वह
साधक 'ब्रह्म नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहता] जब तो [मैं ही
कूटस्थ हूँ' ऐसा] प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है फिर [कूटस्थ की
प्रतीति मुझे नहीं होती ऐसा] अभानावरण भी भाग जाता है ।
[असत्वावरण अनुभवीगुरु के समझाने से जाता है,अभानावरण
अपने प्रयत्न से साक्षात् होने पर हटाया जाता है ] ।
अभानावर्णे नष्टे जीवत्वारोपसंक्षयात् ।
कर्तृत्वाद्यखिलः शोकः संसाराख्यो निवर्तते ॥४६॥
[पिछली दोनों अवस्थायें ज्ञान का फल हैं । अब उन में
से पहली शोकनिवृत्ति नाम की अवस्था को कहा जाता है कि]
अभानावरण जब निवृत्त हो जाता है तब भ्रान्ति से प्रतीत
होने वाला जीवत्व भी नहीं रहता और फिर तो [जीव भाव
के कारण बना हुआ] कर्ता भोक्ता रूपी संसार नाम का सभी
शोक भाग जाता है ।
निवृत्ते सर्वसंसारे नित्यमुक्तत्वभासनात् ।
निरङ्कुशा भवेत् तृप्तिः पुनः शोकासमुद्भवात् ॥४७॥
जब [कर्तृत्व आदि रूप वाला] सब संसार नहीं रहता
तब [मेघों के हट जाने से सूर्य का भास जैसे हो जाता है उसी
तरह] आत्मा के नित्यमुक्तपने का भास होने लगता है । फिर
तो निर्मर्याद तृप्ति हो जाती है । क्योंकि फिर कभी शोक की
उत्पत्ति ही नहीं हो सकती ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३९
अपरोक्षज्ञानशोकनिवृत्याख्ये उभे इमे ।
अवस्थे जीवगे ब्रूते आत्मानं चेदिति श्रुतिः ॥४८॥
चिदाभास की जो सात अवस्थायें ऊपर बतायी गयी हैं,
उनमें जो 'प्रत्यक्षज्ञान' और 'शोकनिवृत्ति' नाम की दो पिछली
अवस्थायें जीवों में पायी जाती हैं, उन्हीं का प्रतिपादन'आत्मानं
चेद्विजानीयात्' इस श्रुति ने किया है । [यों हम ने प्रकरण से
बाहर कुछ भी वर्णन नहीं किया ।]
अयमित्यपरोक्षत्वमुक्तं तद् द्विविधं भवेत् ।
विषयस्वप्रकाशत्वाद् धियाप्येवं तदीक्षणात् ॥४९॥
'अयम्' यह शब्द जिस अपरोक्षता का वर्णन करता है.
वह अपरोक्षता दो तरह की होती है । एक तो यह कि वह
विषय ही स्वयं प्रकाश है [वह अपने व्यवहार के लिये दूसरे
साधन का मुँह ही नहीं तकता] दूसरे यह कि बुद्धि से भी उस
आत्मा को स्वयं प्रकाश ही देख या जान लिया जाता है । [यह
आत्मवार्ता तोतों के राम राम की तरह केवल कहने ही कहने
की न रह जाय, किन्तु अपने हृदय को जब इस महान तत्व
की दीक्षा दे दी जाती है,जब हृदय पटल में अनुभव के अक्षरों
में लिख कर आत्मवार्ता टांग दी जाती है, उस अवस्था का
वर्णन इसमें है ]
परोक्षज्ञानकालेऽपि विषयस्वप्रकाशता ।
समा, ब्रह्म स्वप्रकाशमस्तीत्येवं विवोधनात् ॥५०॥
जब किसी को उसका परोक्षज्ञान हो ( प्रत्यक्ष न हुआ हो )
तब भी आत्मा नाम का विषय तो स्वप्रकाश रहता ही है ।
२४० पंचदशी
परोक्षज्ञान के समय भी वह ब्रह्म स्वयंप्रकाश ही रहता है] क्यों
कि तब [परोक्षज्ञान के समय] उसे यही ज्ञान तो होता है कि
स्वयंप्रकाश ब्रह्म नाम की वस्तु इस संसार में है।
अहं ब्रह्मेत्यनुल्लिख्य ब्रह्मास्तीत्येवमुल्लिखत् ।
परोक्षज्ञानमेतन्न भ्रान्तं वाधानिरूपणात् ॥५१॥
परोक्षज्ञान में केवल इतनी ही कमी तो है कि वह साधक
के हृदय में 'मैं ब्रह्म हूँ' इस महावार्ता को [अनुभव के अक्षरों
में] लिख नहीं देता है। वह तो उसे केवल यही बताता है कि
ब्रह्म नाम का कोई पदार्थ है। सो भाई ! यह परोक्षज्ञान भ्रान्त
ज्ञान नहीं है क्योंकि इस [परोक्षज्ञान] की बाधा का निरूपण
तो हो ही नहीं सकता। [इस परोक्षज्ञान को अधूरा ज्ञान तो
कह सकते हैं, भ्रान्त नहीं कह सकते]
ब्रह्म नास्तीति मानं चेत् स्याद् वाध्येत तदा ध्रुवम् ।
न चैवं प्रबलं मानं पश्यामोऽतो न बाध्यते ॥५२॥
[परोक्षज्ञान की बाधा नहीं होती, इसी को स्पष्ट करके
दिखाया जाता है कि] यदि कोई ऐसा प्रमाण मिल जाता जो
यह सिद्ध कर देता कि 'ब्रह्म नहीं है' तब तो निश्चय ही इस
परोक्षज्ञान की भी बाधा हो जाती। परन्तु ऐसा प्रबल प्रमाण
तो हमें मिलता ही नहीं। इससे [हम तो यही कहते हैं कि]
इस परोक्षज्ञान की बाधा नहीं होती है।
व्यक्त्यनुल्लेखमात्रेण भ्रमत्वे स्वर्गधीरपि ।
भ्रान्तिः स्याद्व्यक्त्यनुल्लेखात् सामान्योल्लेखदर्शनात् ॥
परोक्षज्ञान से ब्रह्मव्यक्ति का उल्लेख नहीं होता है, केवल
इतने से कारण से यदि परोक्षज्ञान को भ्रान्तज्ञान माना जायगा
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तो हम कहेंगे कि तब तो स्वर्ग का ज्ञान भी भ्रम ही होगा।
क्योंकि 'यह स्वर्ग है' ऐसा ज्ञान किसी को नहीं होता। किन्तु
सब सामान्यतया इतना ही तो जानते हैं कि 'स्वर्ग नाम का
कोई लोकविशेष है।'
अपरोक्षत्वयोग्यस्य न परोक्षमत्ति भ्रमः ।
परोक्षमित्यनुल्लेखादर्थात् पारोक्ष्यसंभवात् ॥५४॥
जो वस्तु प्रत्यक्ष होनी चाहिये, उसको यदि पहले केवल
परोक्षरूप से ही जान लिया जाय तो वह भ्रम नहीं होता है।
क्योंकि 'ब्रह्म परोक्ष है' ऐसा ज्ञान तो हम किसी को कराते ही
नहीं। वह ब्रह्म तो [हम लोगों की बे समझी से] अर्थात् ही
परोक्ष हो गया है। ['वह ब्रह्म है' ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान जब किसी
को नहीं हो पाता, तब वह अर्थात् यह मान बैठता है कि ब्रह्म
तत्व परोक्ष है। हां 'ब्रह्म परोक्ष है' ऐसा ज्ञान यदि किसी को
हो जाता हो तो वह अवश्य ही भ्रान्त ज्ञान कहायगा]
अंशागृहीते भ्रान्तिश्चेद् घटज्ञानं भ्रमो भवेत् ।
निरंशस्यापि सांशत्वं व्यावृत्यांशविभेदतः ॥५५॥
[परोक्षज्ञान में ब्रह्मभाग को तो ग्रहण कर लिया जाता है किंतु
उसका जो प्रत्यग् भाग है—उसमें जो मैं पन या हमारा हिस्सा है—
उसको ग्रहण नहीं किया जाता यों] अंश का अग्रहण होने से ही
यदि उस परोक्षज्ञान को भ्रम माना जाय, तब तो घटादि का ज्ञान
भी भ्रम ही हो जायगा [क्योंकि घट के अन्दर के अवयवों का
भी तो ग्रहण किसी को नहीं होता है, वहाँ भी तो अंश का अग्रहण
रहता ही है] यदि पूछो निरंश ब्रह्म को अंश वाला कैसे कहते हो ?
२४२ पञ्चदशी
हम कहेंगे कि-व्यावर्त्य अंशरूपी उपाधि के भिन्न होने से निरंश
(निरवयव) भी सांश (सावयव) मान लिया जाता है।
असत्वांशो निवर्तेत परोक्षज्ञानतस्तथा ।
अभानांशनिवृत्तिः स्यादपरोक्षधिया कृता ॥५६॥
उन व्यावर्त्य दो अंशों में से एक 'असत्त्वांश' की निवृत्ति
तो परोक्षज्ञान से हो जाती है तथा दूसरे 'अभानांश की निवृत्ति
अपरोक्षज्ञान कर देता है।
दशमोस्तीति विश्रान्तं परोक्षज्ञान मीक्ष्यते ।
ब्रह्मास्तीत्यपि तद्वत्स्यादज्ञानावरणं समम् ॥५७॥
आप्त का वाक्य सुनने पर 'दसवां है' ऐसा विश्रान्त अर्थात्
अभ्रान्त परोक्षज्ञान लोक में देखते हैं। इसी प्रकार [शास्त्र या
गुरु के कहने से] जोकि 'ब्रह्म है' ऐसा एक परोक्षज्ञान उत्पन्न
होता है वह भी अभ्रान्त ही है। क्योंकि अज्ञान के कारण
असत्वावरण तो दोनों में समान ही था [ब्रह्म और दसवां दोनों
ही नास्ति (नहीं हैं) समझ लिये गये थे। ऐसी अवस्था में
जिसको प्रत्यक्ष ग्रहण किया जा सकता हो, इसको यदि परोक्ष
रूप से जान लिया जाय तो वह ज्ञान भ्रमज्ञान नहीं होता।
यही बात इस श्लोक में दर्शायी गयी है।]
आत्मा ब्रह्मेति वाक्यार्थे निःशेषेण विचारिते ।
व्यक्तिरुल्लिख्यते यद्वद् दशमस्त्वमसीत्यतः ॥५८॥
'अयमात्मा ब्रह्म' बृ० २-५-१९ इस महावाक्य के अर्थ का
विचार जब भले प्रकार किया जाता है तब पहले जिस ब्रह्म
को परोक्षरूप से जाना जा चुका था, उसी ब्रह्म स्वरूप का
पीछे से साक्षात्कार हो जाता है। जैसे कि 'दसवां तू ही है'
इस वाक्य से अपने में दशमत्व का साक्षात्कार हो गया था।
[भाव यह है कि—केवल वाक्यश्रवण से तो परोक्षज्ञान ही
हुआ करता है। परन्तु जब उस परोक्षज्ञान के साथ विचार
भी मिल जाता है और विचार तथा अनुभव दोनों एक ही
बात कहने लगते हैं, तब साक्षात्कार किंवा अपरोक्षज्ञान
हो जाता है।]
दशमः क इति प्रश्ने त्वमेवेति निराकृते ।
गणयित्वा स्वेन सह स्वमेव दशमं स्मरेत् ॥५९॥
[जिस दसवें के होने को तुम कह रहे हो कि 'दसवां है']
वह दसवां कौन सा है ? वह प्रश्न जब किया जाता है और
जब कि उसका उत्तर यह दिया जाता है, कि 'दसवें तुम्ही हो'
तब वह अपने साथ शेष नौ को गिन कर पीछे से अपने को
ही दसवां मान लेता है [कि ओहो ! दसवां तो मैं ही हूँ। यों
यह देख लो कि विचार सहित वाक्य से अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न
हो जाता है]।
दशमोसीति वाक्योत्था न धीरस्य विहन्यते ।
आदिमध्यावसानेषु न नवस्वस्य संशयः ॥६०॥
इस दसवें पुरुष को 'तू ही दसवां है' इस वाक्य से जो
अपने दशवेंपन का ज्ञान उत्पन्न.हो जाता है कि 'मैं ही दसवां
हूँ' उस बुद्धि का फिर कभी विघात नहीं होता [किसी ज्ञान से
उस बुद्धि की बाधा नहीं होती]। फिर तो उसे उन नौ के
आदि, मध्य या अवसान में कहीं भी गणना करने पर दसवें
के विषय में संशय कभी (जीवनपर्यन्त) नहीं होता कि 'मैं
दसवां हूँ या नहीं?
२४४ पञ्चदशी
है। उसको नौ के विषय में संशय नहीं था केवल दसवें का
संशय था वह भी अब जाता रहा ]
सदेवेत्यादिवाक्येन ब्रह्मसत्त्वं परोक्षतः ।
गृहीत्वा तत्वमस्यादिवाक्याद् व्यक्तिं समुल्लिखेत् ॥६१॥
सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (छा० ६-२-१) इत्यादि
वाक्यों को सुन कर साधक पहले तो ब्रह्म के होने का निश्चय
कर लेता है, [फिर जब उसके जीवरूप से प्रवेश को सुनता है
तब उसी के प्रत्यग्रूप होने की संभावना भी कर लेता है] उसके
पश्चात् जब 'तत्वमसि' आदि महावाक्य [ अनुभवी गुरु के
द्वारा] सुनाया जाता है तब अपने अद्वितीय ब्रह्मरूप आत्मा को
'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस रूप में साक्षात् कर लेता है ।
आदिमध्यावसानेषु स्वस्य ब्रह्मत्वधीरियम् ।
नैव व्यभिचरेत् तस्मादापरोक्ष्यं प्रतिष्ठितम् ॥६२॥
यह आत्मा के ब्रह्मत्व की बुद्धि जब एक बार पैदा हो
जाती है, फिर पांचों कोशों के आदि या मध्य या अन्त में कहीं
भी आत्मा का व्यवहार करने पर भी, वह ब्रह्मत्व बुद्धि अन्यथा
नहीं होती । इस कारण इस बुद्धि को ही अपरोक्षज्ञान कहते हैं।
जन्मादिकारणत्वाख्यलक्षणेन भृगुः पुरा ।
पारोक्ष्येण गृहीत्वाथ विचाराद् व्यक्तिमैक्षत ॥६३॥
भृगु नाम के ऋषि ने 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन
जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म' तै० ३-१
इस वाक्य में कहे हुए लक्षणों से, कि वह जगत् के जन्म,
स्थिति और प्रलय का कारण है, ब्रह्म को पहले तो परोक्षरूप
से जाना, उसके पश्चात् जब उसने अन्नमयादि पांचों कोशों का
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४५
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विचार किया, तब वह व्यक्ति अर्थात् प्रत्यगात्मा रूपी ब्रह्म को
देख पाया। [यों तैत्तिरीय श्रुति के पर्यालोचन से यह बात
सिद्ध होती है कि—पहले तो वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न
हुआ करता है। फिर जब उस वाक्य के साथ विचार मिल
जाता है,तब वाक्य से अपरोक्ष ज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है]।
यद्यपि त्वमसीत्यत्र वाक्यं नोचे भृगोः पिता ।
तथाप्यन्नं प्राणमिति विचार्य स्थलमुक्तवान् ॥६४॥
इस प्रकरण में यद्यपि भृगु के पिता ने 'तू ही ब्रह्म है' ऐसा
कोई उपदेश वाक्य तो नहीं कहा है, तो भी अन्न, प्राण आदि
का विचार करने के बाद, आत्मसाक्षात्कार के उत्पादक विचार
के योग्य स्थल को तो दिखला ही दिया है।
अन्नप्राणादिकोशेषु सुविचार्य पुनः पुनः।
आनन्दव्यक्तिमीक्षित्वा ब्रह्मलक्ष्माप्ययूयुजत् ॥६५॥
अन्न प्राण आदि पांचों कोशों में बार बार सुविचार करके
आनन्द नाम के आत्मा को साक्षात् देख कर पीछे से
आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति
आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । (तै० ३-६) ब्रह्म के इस लक्षण को
भी प्रत्यगात्मा में ही लगा दिया है। [इस कारण यह न कहना
चाहिए कि—अन्नमयादि कोशों का विचार करने पर तो प्रत्य-
गात्मा का साक्षात्कार हो सकता है। ब्रह्म का साक्षात्कार उससे
कैसे होगा ? क्योंकि प्रत्यगात्मा ही तो ब्रह्म है। क्योंकि ब्रह्म के
सब लक्षण उसमें मिलते हैं। यों उससे भिन्न ब्रह्म नाम का
कोई भी पदार्थ नहीं है]।
२४६ पञ्चदशी
सत्यं ज्ञान मनन्तं चेत्येवं ब्रह्मस्वलक्षणम् ।
उक्त्वा गुहाहितत्वेन कोशेष्वेतत् प्रदर्शितम् ॥६६॥
'सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह्म' (तै० २-१) इस वाक्य से ब्रह्म के
स्वरूप लक्षण को बता कर 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्'
(मुण्ड० २-१-१०) इस वाक्य के द्वारा पांचों कोशों रूपी
गुहाओं के अन्दर छिपे बैठे हुए, उसी को प्रत्यगात्मा कह दिया
है [अर्थात् सत्यादि स्वरूप वाले ब्रह्म ने ही प्रत्यग्रूप धारण कर
लिया है। ऐसा श्रुतियों का अभिप्राय है। वे प्रत्यगात्मा और
ब्रह्म में भेद नहीं समझती हैं]।
पारोक्ष्येण विबुध्येन्द्रो य आत्मेत्यादिलक्षणात् ।
अपरोक्षीकर्तुमिच्छंश्चतुर्वारं गुरुं ययौ ॥६७॥
'य आत्मा पहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकः' (छा०८-७-१)
इस वाक्य में बताये हुए लक्षण से इन्द्र ने आत्मा को पहले
परोक्षरूप से ही तो जान लिया था—फिर [तीनों शरीरों का
निराकरण करके] आत्मा को साक्षात् करने के लिये, चार बार
गुरु के पास गया था। [यह बात छान्दोग्य के आठवें अध्याय
में कही गयी है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि परोक्षज्ञान
के पश्चात् विचार करने पर ही साक्षात्कार हुआ करता है]
आत्मा वा इदमित्यादौ परोक्षं ब्रह्म लक्षितम् ।
अध्यारोपापवादाभ्यां प्रज्ञानं ब्रह्म दर्शितम् ॥६८॥
'आत्मा वा इदं' इत्यादि ऐतरेय में पहले लक्षणा द्वारा परोक्ष-
रीति से ब्रह्म का कथन किया गया। फिर अध्यारोप और
अपवाद के द्वारा प्रज्ञानरूप ब्रह्म को साक्षात् दिखाया गया।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २४७
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किञ्चन मिषत्' (ऐत० १-१) इस वाक्य से तो पहले ब्रह्म को
लक्षित किया गया, फिर 'स ईक्षत लोकान्नु सृजा' (ऐत० १-१)
इत्यादि रीति से प्रारम्भ करके 'तस्य त्रय आवसथा स्त्रयः स्वप्ना
अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथः' (ऐत० ३-१२) तक जगत् के
आरोप की रीति बतायी गयी। फिर 'स जातो भूतान्यभिव्यैक्षत
किमिहान्यं वावदिषत्' (एते० ३-१३) इसमें आरोपित किये हुए का
अपवाद (खण्डन) किया गया। उस के पश्चात् 'स एतमेव पुरुषं
ब्रह्म ततमपश्यदिदमदर्शमिति' (ऐत० ३-१३) इस वाक्य में प्रत्य-
गात्मा के रूप में ब्रह्मस्वरूप को प्रत्यक्ष देखा गया। उस के
अनन्तर 'पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो जायते' (ऐत० ४-१) इत्यादि
वाक्यों में ज्ञान के साधन वैराग्य को उत्पन्न करने के लिये
गर्भवासादि के दुःखों का प्रदर्शन कराया गया। फिर 'कोय-
मात्मेति वयमुपास्महे' (ऐत० ५-१) इत्यादि विचार के द्वारा 'तत्'
'त्वं' पदार्थ का परिशोधन करने के पश्चात् प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐत०५-१)
इस महावाक्य के द्वारा प्रज्ञानरूप आत्मा की ब्रह्मता का प्रद्-
र्शन किया गया है।
अवान्तरेण वाक्येन परोक्षा ब्रह्मधीर्भवेत् ।
सर्वत्रैव महावाक्यविचारादपरोक्षधीः ॥६९॥
[इन ही उपनिषदों में नहीं और भी] सब शास्त्रों में
अवान्तर वाक्यों से तो परोक्ष ब्रह्मज्ञान कराया जाता है
तथा महावाक्यों के द्वारा अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ब्रह्मज्ञान किया
जाता है।
ब्रह्मापरोक्ष्यसिद्धयर्थं महावाक्यमितीरितम् ।
वाक्यवृत्तावतो ब्रह्मापरोक्ष्ये विमतिर्नहि ॥७०॥
२४८ पञ्चदशी
ब्रह्म के अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) करने के लिये ही महावाक्यों
का कथन है, यह बात शंकराचार्यजी ने अपनी 'वाक्यवृत्ति'
नाम की पुस्तक में कही है । इस कारण वाक्य से ब्रह्म का
प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाने में कोई भी विप्रतिपत्ति नहीं रहती ।
आलम्बनतया भाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः ।
अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः ॥७१॥
वाक्यवृत्ति में कहा गया है कि—अन्तःकरण उपाधिवाला
जो बोध (चिदात्मा) है, जो 'मैं' इस प्रतीति के तथा 'मैं' इस
शब्द के विषयरूप से प्रतीत होता है, वही (बोध) त्वं पद का
वाच्यार्थ कहाता है ।
मायोपाधि र्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः ।
पारोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मक स्तत्पदाभिधः ॥७२॥
माया जिसकी उपाधि है, जगत् का जो [निमित्त और
उपादान] कारण है, सर्वज्ञता आदि जिसके तटस्थ लक्षण हैं,
परोक्षता नामक धर्म जिसमें पाया जाता है, सत्य ज्ञानादि
जिसका स्वरूप बताया जाता है वही तो 'तत्' पद का वाच्यार्थ है।
प्रत्यक्परोक्षतैकस्य सद्वितीयत्वपूर्णता ।
विरुद्ध्येते यतस्तस्माल्लक्षणा संप्रवर्तते ॥७३॥
वही वस्तु 'प्रत्यक्' भी हो और 'परोक्ष' भी हो, तथा 'सद्वि-
तीय' भी हो और 'पूर्ण' भी हो, ये दोनों बातें विरुद्ध हैं (हो
नहीं सकती) इस कारण (संगति बैठाने के लिए) लक्षणा वृत्ति
का आश्रय लेना पड़ जाता है ।
तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा ।
सोऽयमित्यादिवाक्यस्थपदयोरिव नापरा ॥७४॥