पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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है। उसको नौ के विषय में संशय नहीं था केवल दसवें का
संशय था वह भी अब जाता रहा ]
सदेवेत्यादिवाक्येन ब्रह्मसत्त्वं परोक्षतः ।
गृहीत्वा तत्वमस्यादिवाक्याद् व्यक्तिं समुल्लिखेत् ॥६१॥
सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् (छा० ६-२-१) इत्यादि
वाक्यों को सुन कर साधक पहले तो ब्रह्म के होने का निश्चय
कर लेता है, [फिर जब उसके जीवरूप से प्रवेश को सुनता है
तब उसी के प्रत्यग्रूप होने की संभावना भी कर लेता है] उसके
पश्चात् जब 'तत्वमसि' आदि महावाक्य [ अनुभवी गुरु के
द्वारा] सुनाया जाता है तब अपने अद्वितीय ब्रह्मरूप आत्मा को
'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस रूप में साक्षात् कर लेता है ।
आदिमध्यावसानेषु स्वस्य ब्रह्मत्वधीरियम् ।
नैव व्यभिचरेत् तस्मादापरोक्ष्यं प्रतिष्ठितम् ॥६२॥
यह आत्मा के ब्रह्मत्व की बुद्धि जब एक बार पैदा हो
जाती है, फिर पांचों कोशों के आदि या मध्य या अन्त में कहीं
भी आत्मा का व्यवहार करने पर भी, वह ब्रह्मत्व बुद्धि अन्यथा
नहीं होती । इस कारण इस बुद्धि को ही अपरोक्षज्ञान कहते हैं।
जन्मादिकारणत्वाख्यलक्षणेन भृगुः पुरा ।
पारोक्ष्येण गृहीत्वाथ विचाराद् व्यक्तिमैक्षत ॥६३॥
भृगु नाम के ऋषि ने 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन
जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म' तै० ३-१
इस वाक्य में कहे हुए लक्षणों से, कि वह जगत् के जन्म,
स्थिति और प्रलय का कारण है, ब्रह्म को पहले तो परोक्षरूप
से जाना, उसके पश्चात् जब उसने अन्नमयादि पांचों कोशों का