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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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२४२ पञ्चदशी
हम कहेंगे कि-व्यावर्त्य अंशरूपी उपाधि के भिन्न होने से निरंश
(निरवयव) भी सांश (सावयव) मान लिया जाता है।
असत्वांशो निवर्तेत परोक्षज्ञानतस्तथा ।
अभानांशनिवृत्तिः स्यादपरोक्षधिया कृता ॥५६॥
उन व्यावर्त्य दो अंशों में से एक 'असत्त्वांश' की निवृत्ति
तो परोक्षज्ञान से हो जाती है तथा दूसरे 'अभानांश की निवृत्ति
अपरोक्षज्ञान कर देता है।
दशमोस्तीति विश्रान्तं परोक्षज्ञान मीक्ष्यते ।
ब्रह्मास्तीत्यपि तद्वत्स्यादज्ञानावरणं समम् ॥५७॥
आप्त का वाक्य सुनने पर 'दसवां है' ऐसा विश्रान्त अर्थात्
अभ्रान्त परोक्षज्ञान लोक में देखते हैं। इसी प्रकार [शास्त्र या
गुरु के कहने से] जोकि 'ब्रह्म है' ऐसा एक परोक्षज्ञान उत्पन्न
होता है वह भी अभ्रान्त ही है। क्योंकि अज्ञान के कारण
असत्वावरण तो दोनों में समान ही था [ब्रह्म और दसवां दोनों
ही नास्ति (नहीं हैं) समझ लिये गये थे। ऐसी अवस्था में
जिसको प्रत्यक्ष ग्रहण किया जा सकता हो, इसको यदि परोक्ष
रूप से जान लिया जाय तो वह ज्ञान भ्रमज्ञान नहीं होता।
यही बात इस श्लोक में दर्शायी गयी है।]
आत्मा ब्रह्मेति वाक्यार्थे निःशेषेण विचारिते ।
व्यक्तिरुल्लिख्यते यद्वद् दशमस्त्वमसीत्यतः ॥५८॥
'अयमात्मा ब्रह्म' बृ० २-५-१९ इस महावाक्य के अर्थ का
विचार जब भले प्रकार किया जाता है तब पहले जिस ब्रह्म
को परोक्षरूप से जाना जा चुका था, उसी ब्रह्म स्वरूप का
पीछे से साक्षात्कार हो जाता है। जैसे कि 'दसवां तू ही है'