पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextतृप्तिदीपप्रकरणम् २३९
अपरोक्षज्ञानशोकनिवृत्याख्ये उभे इमे ।
अवस्थे जीवगे ब्रूते आत्मानं चेदिति श्रुतिः ॥४८॥
चिदाभास की जो सात अवस्थायें ऊपर बतायी गयी हैं,
उनमें जो 'प्रत्यक्षज्ञान' और 'शोकनिवृत्ति' नाम की दो पिछली
अवस्थायें जीवों में पायी जाती हैं, उन्हीं का प्रतिपादन'आत्मानं
चेद्विजानीयात्' इस श्रुति ने किया है । [यों हम ने प्रकरण से
बाहर कुछ भी वर्णन नहीं किया ।]
अयमित्यपरोक्षत्वमुक्तं तद् द्विविधं भवेत् ।
विषयस्वप्रकाशत्वाद् धियाप्येवं तदीक्षणात् ॥४९॥
'अयम्' यह शब्द जिस अपरोक्षता का वर्णन करता है.
वह अपरोक्षता दो तरह की होती है । एक तो यह कि वह
विषय ही स्वयं प्रकाश है [वह अपने व्यवहार के लिये दूसरे
साधन का मुँह ही नहीं तकता] दूसरे यह कि बुद्धि से भी उस
आत्मा को स्वयं प्रकाश ही देख या जान लिया जाता है । [यह
आत्मवार्ता तोतों के राम राम की तरह केवल कहने ही कहने
की न रह जाय, किन्तु अपने हृदय को जब इस महान तत्व
की दीक्षा दे दी जाती है,जब हृदय पटल में अनुभव के अक्षरों
में लिख कर आत्मवार्ता टांग दी जाती है, उस अवस्था का
वर्णन इसमें है ]
परोक्षज्ञानकालेऽपि विषयस्वप्रकाशता ।
समा, ब्रह्म स्वप्रकाशमस्तीत्येवं विवोधनात् ॥५०॥
जब किसी को उसका परोक्षज्ञान हो ( प्रत्यक्ष न हुआ हो )
तब भी आत्मा नाम का विषय तो स्वप्रकाश रहता ही है ।