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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages
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१९४ पञ्चदशी
बुरा व्यवहार कराता है । यों ईश्वरतत्व प्राणियों का भागी बन
कर रहता है। वह उनसे भिन्न कोई तटस्थ शासक कदापि नहीं है ।
ज्ञात्वा सदा तत्वनिष्ठा ननु मोदामहे वयम् ।
अनुशोचाम एवान्यान्न भ्रान्ते र्विवदामहे ॥२१५॥
उस अद्वितीय ब्रह्मतत्व को जब से हम पहचान गये हैं,
तभी से तत्वनिष्ठ होकर हम तो बड़े ही प्रसन्न रहने लगे हैं ।
जिन मन्द भागियों को इस तत्व का ज्ञान नहीं हुआ है उन पर
तो हमें केवल थोड़ा सा शोक ही होता है । भ्रान्ति में फँसकर
हम उनके साथ विवाद करना पसन्द नहीं करते हैं ।
तृणार्चकादियोगान्ता ईश्वरे भ्रान्तिमाश्रिताः ।
लोकायतादिसांख्यान्ता जीवे विभ्रान्तिमाश्रिताः॥२१६॥
तृणपूजकों से लेकर योग पर्यन्त वादियों को 'ईश्वरतत्व'
के विषय में भ्रान्ति हो रही है । लोकायत से लेकर सांख्य
पर्यन्त वादियों को 'जीव' के विषय में बड़ा भ्रम हो रहा है ।
अद्वितीयब्रह्मतत्वं न जानन्ति यदा तदा ।
भ्रान्ता एवाखिलास्तेषां क्व मुक्तिः क्वेह वा सुखम् ॥२१७॥
जो अद्वितीय ब्रह्मतत्व को नहीं जानते हैं वे तो सभी
भ्रान्त हैं । उनको मर जाने पर न तो विदेहमुक्ति ही मिलती
है और न इस लोक में ही वे सुख पा सकते हैं ।
तत्वज्ञान न होने से इन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी तथा वैराग्य-
सम्पन्न होने के कारण इस लोक के सुखों से भी ये लोग स्वयं
ही परहेज कर बैठेंगे । यों ये दोनों सुखों से वंचित होजायंगे ।
उत्तमाधमभावश्चेत् तेषां स्यादस्तु तेन किम् ।
स्वप्नस्वराज्यभिक्षाभ्यां न बुद्धः स्पृश्यते खलु ॥२१८॥

चित्रदीपप्रकरणम् १९५

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चित्रदीपप्रकरणम् १९५
ब्रह्मविद्या के अतिरिक्त और विद्याओं के कारण यदि उनमें
ऊँच नीच भाव होता हो तो हुआ करो । ऐसे उत्तमाधम भाव
से मुमुक्षु लोगों को लाभ ही क्या ? देखते नहीं हो कि सपने
में राज्य करने से और सपने में भीख माँगने से, जागे हुए
आदमी का कुछ भी घटता बढ़ता नहीं है ।
तस्मान्मुमुक्षुभि नैव मतिर्जीवेशवादयोः ।
कार्या, किन्तु ब्रह्मतत्वं विचार्यं बुध्यतां च तत् ॥२१९॥
इस कारण हमारा तो यही कहना है कि—जो लोग मुक्ति
चाहते हों, वे 'जीववाद' और 'ईश्वरवाद' के झगड़े में कभी
भी न पड़ें । उन्हें तो चाहिये कि वे सदा ब्रह्मतत्व का ही विचार
करें और विचार कर उस ब्रह्मतत्व को पहचान जाँय ।
पूर्वपक्षतया तौ चेत् तत्वनिश्चयहेतुताम् ।
प्राप्नुतोऽस्तु निमज्जस्व तयो नैतावताऽवशः ॥२२०॥
यदि तो वे जीववाद और ईश्वरवाद पूर्वपक्ष रूप से तत्व
का निश्चय करने में सहायक होते हों तो हमें कुछ कहना नहीं
है । हम तो केवल यही कहते हैं कि—इतने मात्र से तुम इन
दोनों के विचार में ही बेबस होकर डूबे न रह जाओ [अपने
विवेकज्ञान को हाथ से खो मत बैठो ] ।
असङ्गचिद्विभुर्जीवः सांख्योक्तस्तादृगीश्वरः ।
योगोक्तस्तत्वमोरर्थौ शुद्धौ ताविति चेच्छृणु ॥२२१॥
न तत्वमोरभावार्था वसत्सिद्धान्ततां गतौ ।
अद्वैतवोधनायैव सा कक्षा काचिदिष्यते ॥२२२॥
सांख्य ने जीव को असङ्ग चेतन और व्यापक बताया है ।

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१९६ पञ्चदशी

योग का बताया हुआ ईश्वर भी वैसा ही [ असंग चेतन और
व्यापक ] है। ये ही तो 'तत्' और 'त्वं' के शुद्ध अर्थ हैं [ इस
को तो आप भी मानते ही हो, फिर उन्हें पूर्वपक्ष क्यों बताते
हो ] इसका उत्तर सुनो ॥२२१॥ तत् और त्वं के ये दोनों अर्थ
हमारा सिद्धान्त नहीं है [ वे तो इन दोनों में वास्तव भेद मानते
हैं। हमें वह भेद (तात्विक रूप से) स्वीकार ही नहीं है।] हमने
जो कहीं कहीं भिन्न भिन्न 'तत्' 'त्वं' पदार्थों का निरूपण किया
है, वह तो अद्वैत का ज्ञान कराने के लिये एक रीति सोची है।
[ हमने सोचा है कि लोकप्रसिद्ध भेद को हटाकर, उन दोनों
को एक बताने के लिये पहले उन दोनों को अलग अलग सम-
झाया जाय, और पीछे से उन दोनों को एक कह दिया जाय।
उन दोनों के भेद का प्रतिपादन करना तो हमें कदापि अभीष्ट
नहीं है ]।
अनादिमायया भ्रान्ता जीवेशौ सुविलक्षणौ ।
मन्यन्ते, तद्व्युदासाय केवलं शोधनं तयोः ॥२२३॥
अनादि अविद्या के प्रताप से जो पुरुष भ्रान्ति में फँसे हुए
हैं, वे जीव और ईश्वर को अत्यन्त भिन्न चीज़ मानते हैं [ वे
समझते हैं कि—कर्तृत्वआदि धर्म वाला तो जीव है, तथा सर्वज्ञता
आदि गुणों वाला ईश्वर है। वे इन दोनों के धर्मों को पारमा-
र्थिक ही मानते हैं। इस कारण इन दोनों को भी पृथक् पृथक्
मानते हैं ] हमने तो इनके इस भ्रान्त विचार को हटाने के
लिये ही उन दोनों ['तत्' 'त्वं'] का शोध किया है।
अत एवात्र दृष्टान्तो योग्यः प्राक् सम्यगीरितः ।
घटाकाश-महाकाश-जलाकाशाभ्रखात्मकः ॥२२४॥

चित्रदीपप्रकरणम् १९७

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चित्रदीपप्रकरणम् १९७
क्योंकि हमें पदार्थ का शोध करना है इसी से घटाकाश,
महाकाश, जलाकाश तथा अभ्राकाश का योग्य दृष्टान्त हमने
पहले दिया था । [ इस दृष्टान्त में मूलतत्त्व एक ही है ।
उपाधिभेद से उसी के अनेक नाम हो गये हैं ]
जलाभ्रोपाध्यधीने ते जलाकाशाभ्रखे, तयोः ।
आधारौ तु घटाकाशमहाकाशौ सुनिर्मलौ ॥२२५॥
जलाकाश तथा मेघाकाश दोनों ही जल तथा मेघरूपी उपा-
धियों के अधीन होते हैं इसी से वे दोनों अपारमार्थिक भी हैं।
किन्तु उन दोनों के आधार बने हुए जो घटाकाश और महा-
काश हैं वे तो सुनिर्मल ही रहते हैं । [क्योंकि यदि जलादि
उपाधियों की उपेक्षा कर दी जाय तो वे केवल आकाश ही
आकाश तो हैं]।
एवमानन्दविज्ञानमयौ मायाधियोर्वशौ ।
तदधिष्ठानकूटस्थब्रह्मणी तु सुनिर्मले ॥२२६॥
ठीक ऊपर के दृष्टान्त के अनुसार ही 'आनन्दमय' और
'विज्ञानमय' दोनों ही क्रम से 'माया' तथा 'बुद्धि' के वशवर्ती
हैं । उनके अधिष्ठान कूटस्थ तथा ब्रह्म तो सुनिर्मल ही रहते हैं ।
एतत्कक्षोपयोगेन सांख्ययोगौ मतौ यदि ।
देहोऽन्नमयकक्षत्वा दात्मत्वेनाभ्युपेयताम् ॥२२७॥
इस कक्षा में कुछ उपयोगी होजाने से ही यदि सांख्य और
योग के मत को मानोगे तो फिर अन्नमय कक्षा में उपयोगी
होने से देह को भी आत्मा मानना पड़ जायगा ।
पुत्रादि आत्मा नहीं है इसका निश्चय कराने के लिए देह
को भी आत्मा मानना उपयोगी हो जाता है, तो क्या देह को

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१९८ पञ्चदशी

ही आत्मा मान लें ? आत्मा के असंग स्वरूप का निश्चय करने
के लिये सांख्य योग की सब बातों को कैसे मान बैठें ?
आत्मभेदो जगत्सत्य मीशोऽन्य इति चेत् त्रयम् ।
त्यज्यते तैस्तदा सांख्ययोगवेदान्तसंमतिः ॥२२८॥
(१) आत्माओं की अनेकता, (२) जगत् की सत्यता, (३)
और ईश्वर की आत्मा से भिन्नता, विरोध करनेवाली ये तीनों
बातें यदि वे छोड़ दें, तो सांख्य, योग तथा वेदान्त की सम्मति
हो सकती है । [ वे लोग जीवों का भेद मानते हैं, जगत् को वे
सत्य बताते हैं, ईश्वर को वे तटस्थ कहते हैं, फिर उनका हमारा
विरोध कैसे टले ? ]
जीवासङ्गत्वमात्रेण कृतार्थ इति चेत्तदा ।
स्रक्चन्दनादिनित्यत्वमात्रेणापि कृतार्थता ॥२२९॥
यदि यह समझा जाय कि हम जीव की असङ्गता को जान
लेने से ही कृतकृत्य (मुक्त) हो जायेंगे, इस अद्वैत ज्ञान का क्या
करें ? उसका समाधान यह है कि—फिर तो स्रक् चन्दनादि
भोगों को नित्य किंवा सदा रहनेवाला समझ लेने से भी कृत-
र्थता हो सकती है । [ बहुत से लोग स्रगादि भोगों को नित्य
मान बैठे हैं तो क्या वे इतने से ही कृतार्थ हो सकते हैं ? अगले
श्लोक को पढ़ने से इसका भाव स्पष्ट हो जायगा । ]
यथा स्रगादिनित्यत्वं दुःसंपाद्यं तथात्मनः ।
असंगत्वं न संभाव्यं जीवतो जगदीशयोः ॥२३०॥
जिस प्रकार कि माला आदि पदार्थों की नित्यता [ का सिद्ध
होना ] असंभव है, इसी प्रकार जब तक जीव और जगदीश

चित्रदीपप्रकरणम् १९२

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चित्रदीपप्रकरणम् १९२
जीवित हैं [जब तक ये दोनों किसी को भास रहे हैं] तब तक
आत्मा की असंगता का ज्ञान होना भी असंभव ही समझ लो
[अद्वैत ज्ञान के विना असंगता का बोध हो ही नहीं सकता
यह यहां गुप्त भाव है]
अवश्यं प्रकृतिः सङ्गं पुरेवापादयेत् तथा ।
नियच्छत्येतमीशोऽपि कोऽस्य मोक्षस्तथा सति ॥२३१॥
[अपने आपको असंग समझ कर जो कृतकृत्य हो बैठा
है] यह प्रकृति पहले की तरह [जैसे कि उसने पहले असंग में
संग कर रक्खा था] फिर भी उसमें संग पैदा कर ही देगी ।
ईश्वर भी अपना शासन उस पर पूर्ववत् रखेंगे ही । फिर
बताओ कि उस विचारे का यह मोक्ष ही क्या हुआ ?
अविवेककृतः सङ्गो नियमश्चेति चेत् तदा ।
बलादापतितो मायावादः सांख्यस्य दुर्मतेः ॥२३२॥
सङ्ग और नियमन दोनों ही अविवेक से उत्पन्न हुआ करते
हैं [फिर जब एक बार विवेक ज्ञान से अविवेक मर जायगा तब
सङ्ग या नियमन की उत्पत्ति हो ही कैसे सकेगी ?] ऐसा यदि
सांख्य कहता हो तब तो वह अविचारशील ज़बरदस्ती [न
चाहने पर भी] मायावादी हो जाता है । [भाव यह है कि
यदि उस अविवेक को अभावमात्र मानें, तब तो उससे भाव
रूप कार्य की उत्पत्ति ही कैसे हो सकेगी ? यदि और किसी
को संग का कारण मानें तो अविवेक को छोड़कर और कोई
पदार्थ सङ्ग को उत्पन्न करने का कारण देखा ही नहीं गया ।
फिर जब उस अविवेक को भावरूप अज्ञान माना जायगा,
तब इसी को तो मायावाद कहा जायगा ।]

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२०० पञ्चदशी
बन्धमोक्षव्यवस्थार्थ मात्मनानात्वमिष्यताम् ।
इति चेन्न यतो माया व्यवस्थापयितुं क्षमा ॥२३३॥
अद्वैत को मानें तो यह प्रत्यक्ष दीखने वाली बन्धमोक्ष
व्यवस्था नहीं बनती । इस बन्धमोक्ष व्यवस्था को बनाने के लिये
आत्माओं को नाना मान लेना चाहिये, यह कथन ठीक नहीं ।
क्योंकि आत्मा तो एक ही है । तुम्हारी इस बन्धमोक्षव्यवस्था
को तो माया ही व्यवस्थित कर सकती है [ इतने से काम के
लिये आत्मभेद मान लेना ठीक नहीं है । ]
‘दुर्धटं घटयामीति’ विरुद्धं किं न पश्यसि !
वास्तवौ बन्धमोक्षौ तु श्रुतिर्न सहतेतराम् ॥२३४॥
क्या तुमने माया की विरुद्ध भाषा ( बोली ) नहीं सुनी है ?
वह कहती है कि जो बात दुर्घट है [ हो नहीं सकती है ] उसे
ही मैं कर सकती हूँ । विचार कर देख लो कि सच्चे बन्ध या
सच्चे मोक्ष को तो श्रुति सहती ही नहीं [ अनादेरन्तवत्वं च संसारस्य न
सेत्स्यति । अनन्तता चादिमतो मोक्षस्य न भविष्यति । यदि इस संसार
को अनादि मानलें तो फिर इसका अन्त कभी नहीं होगा । यदि
मोक्ष को प्रारम्भ होने वाला मान लें तो फिर यह अनन्त भी नहीं
हो सकेगा। यही कारण है कि श्रुति सच्चे बन्धमोक्ष नहीं मानती ।
वह तो कहती है कि— ]
न निरोधो न चोत्पत्ति र्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षु र्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥२३५॥
न कभी आत्मा का नाश होता है । न यह आत्मा कभी देह
के सम्बन्ध में आता है । न इसे कभी सुख दुःख होते हैं । न यह
कभी श्रवणादि साधनों का अभ्यास करता है । न इसमें कभी

चित्रदीपप्रकरणम् २०१

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चित्रदीपप्रकरणम् २०१
मुमुक्षुभाव ही रहता है और न कभी यह मुक्त ही होता है ।
यही परमार्थ है । [ निरोध, उत्पत्ति, बद्धता, साधक भाव,
मुमुक्षुत्व तथा मुक्ति यह कुछ भी वास्तविक नहीं है ।
ये सब तो आत्म-सागर में आने वाली क्षुद्र लहरें हैं। ये
सब तो आत्मसमुद्र में उठ खड़े हुए तुच्छ बुलबुले हैं। समुद्र के
गम्भीर अन्तस्तल के नाई यह आत्मसागर सदा शान्त और एक-
रस ही बना रहता है । उपर्युक्त घटनाओं में से एक भी घटना
'पारमार्थिक नहीं है । बस यही सम्पूर्ण शास्त्रों का निचोड़ किंवा
परमार्थ बात है ] ।
मायाख्यायाः कामधेनो र्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ ।
यथेच्छं पिबतां द्वैतं तत्त्वं त्वद्वैतमेव हि ॥२३६॥
इस सब कथन का सारांश तो यही है कि माया नाम की एक
कामधेनु है, उसके दो बच्चे हैं, एक का नाम 'जीव' है दूसरे का
नाम 'ईश्वर' है । वे दोनों बच्चे द्वैत रूपी दूध को भले ही पेट
भर भर पीते रहें [ वे इसमें किलोलें किया करें ] परन्तु तत्व
तो अद्वैत ही है ।
कूटस्थब्रह्मणोर्भेदों नाममात्रादृते न हि ।
घटाकाशमहाकाशौ वियुज्यते न हि क्वचित् ॥२३७॥
कूटस्थ और ब्रह्म [ दोनों ही पारमार्थिक हैं परन्तु इनका
भेद पारमार्थिक नहीं है क्योंकि इन ] का भेद तो नाम मात्र के
अतिरिक्त कुछ भी नहीं है [ इनका भेद तो कहने ही कहने को
है ] जैसे घटाकाश और महाकाश [ कहने ही कहने को पृथक्
पृथक् होते हैं वस्तुतः इन दोनों ] का पार्थक्य कभी
नहीं होता ।
१३

की उत्पत्ति से पहले जिस अद्वैत ब्रह्मतत्व का प्रतिपादन किया

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२०२ पञ्चदशी
यदद्वैतं श्रुतं सृष्टेः प्राक्, तदेवाद्य, चोपरि।
मुक्तावपि, वृथा माया भ्रामयत्यखिलान् जनान् ॥२३८॥
सदेव सोम्येदमग्र आसीत् (छा० ६-२-१) इस श्रुति में सृष्टि
की उत्पत्ति से पहले जिस अद्वैत ब्रह्मतत्व का प्रतिपादन किया
गया है, वही अद्वैत तत्व तीनों कालों में रहता है—वही आज
भी मौजूद है और भविष्यत् में मुक्ति हो जाने पर भी वही बना
रहेगा [इतना होने पर भी सभी को जो भेद का पक्षपात हो
रहा है उसका कारण तो यह है कि] इस माया ने इन लोगों
को वृथा ही भरमा रक्खा है [तत्व ज्ञान से हीन होने के कारण
इन लोगों को ऐसा अभिनिवेश हो गया है।]
ये वदन्तीत्थमेतेपि भ्राम्यन्ते विद्ययात्र किम् ?
न यथापूर्वमेतेषामत्र भ्रान्ते रदर्शनात् ॥२३९॥
प्रपंच को मायामय और तत्व को अद्वितीय जो लोग बताते
हैं, वे भी तो [अविद्या के वश में आकर] भरमाये फिर ही रहे
हैं—[वे भी तो संसार में फँसे ही देखे जाते हैं] ऐसी कोरी
विद्या किंवा ऐसे कोरे तत्वज्ञान का फिर हम क्या करें? ऐसी
शंका करने वाले से कहो कि इन लोगों को यहाँ पहले जैसी
भ्रान्ति नहीं रह गयी है [प्रारब्ध कर्म के वश से वे लोग व्यव-
हार में फँसे भी रहें परन्तु इनको पहले जैसा अभिनिवेश (आग्रह
आसक्ति] नहीं होता है क्योंकि बन्धन मन की चीज है, वह ज्ञानी
का टूट जाता है। अद्वैत तत्व भावप्रधान है। क्रियाओं को देख कर
तत्वज्ञानी का निश्चय नहीं हो सकता। क्रिया तो ज्ञानी और
अज्ञानी दोनों एक ही जैसी करते हैं। भेद इतना है कि ज्ञानी
नाटक के पात्रों की तरह अपने हिस्से आया काम कर जाता

चित्रदीपप्रकरणम् २०२

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चित्रदीपप्रकरणम् २०२
है और अज्ञानी रो झींक कर अपने हिस्से आया काम असक्ति
या द्वेष से करता है।
ऐहिकामुष्मिकः सर्वः संसारो वास्तवस्ततः ।
न भाति नास्ति चाद्वैतमित्यज्ञानिविनिश्चयः ॥२४०॥
[स्त्री पुत्रादि का पोषण आदि] ऐहिक तथा [स्वर्ग सुखादि
का अनुभव आदि] आमुष्मिक यह सब संसार वास्तव ही है
और अद्वैत नाम की कोई चीज़ न तो प्रतीत ही होती है और
न वह है ही। बस यही अज्ञानी लोगों की धारणा होती है।
ज्ञानिनो विपरीतोऽस्मान्निश्चयः सम्यगीक्ष्यते ।
स्वस्वनिश्चयतो बद्धो मुक्तोऽहं चेति मन्यते ॥२४१॥
ज्ञानी लोगों को तो इससे विपरीत निश्चय होता है, जो
ज्ञानियों में स्पष्ट ही देखा जाता है [ वे समझते हैं कि अद्वैत ही
एक पारमार्थिक वस्तु है तथा उन्हें अद्वैत की प्रतीति भी होती
है। संसार को तो वे निश्चित रूप से अपारमार्थिक किंवा मिथ्या
समझे रहते हैं। हम तो यही समझते हैं कि] अपने अपने निश्चय
के अनुसार कोई अपने को बद्ध और कोई अपने को मुक्त माना
करते हैं।
नाद्वैतमपरोक्षं चेन्न चिद्रूपेण भासनात् ।
अशेषेण न भातं चेद् द्वैतं किं भासतेऽखिलम् ॥२४२॥
'अद्वैत तो किसी को प्रत्यक्ष ही नहीं होता है ऐसा कहना
ठीक नहीं है। क्योंकि 'घट की स्फूर्ति होती है, पट की स्फूर्ति
होती है' इत्यादि चिद्रूप से उस अद्वैततत्व की प्रतीति सभी को
[ सब पदार्थों में ] हो रही है। इस पर भी यदि यह कहो कि
सम्पूर्ण अद्वैत का भान तो किसी को होता ही नहीं, तो हम यह

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२०४ पंचदशी
कहेंगे कि ऐसे तो सम्पूर्ण द्वैत का भान भी किसी को नहीं होता
है [यों यह दोष दोनों पक्षों में समान ही है]
दिङ्मात्रेण विभानं तु द्वयोरपि समं खलु ।
द्वैतसिद्धिर्यदद्वैतसिद्धिस्ते तावता न किम् ॥२४३॥
एक देश का भान हो जाना तो द्वैत और अद्वैत दोनों पक्षों
में समान ही है। द्वैत के किसी एक देश को देखकर जैसे तुम
सम्पूर्ण द्वैत को सिद्ध कर लेते हो [उस पर विश्वास कर लेते हो]
इसी प्रकार अद्वैत के एक देश को जानकर अद्वैत का निश्चय तुम्हें
क्यों नहीं होता है सो हमें भी बताओ ?
द्वैतेन हीन मद्वैतं, द्वैतज्ञाने कथं त्विदम् ।
चिद्भानं त्वविरोध्यस्य द्वैतस्यातोऽसमे उभे ॥२४४॥
पूर्वपक्षी कहता है कि, द्वैत से जो हीन हो वही तो 'अद्वैत'
है । सो भाई, जब तक द्वैत का ज्ञान बना हुआ है तब तक अद्वैत
ठहरेगा ही कैसे यह हमें बताओ ? [२४२ श्लोक में तुम कह
चुके हो कि चिद्रूप से अद्वैततत्व का भास हो रहा है सो तुम्हारा
वह] चिद्भान तो इस द्वैत का विरोध करता ही नहीं । इस कारण
तुम हमारी तरह यह नहीं कह सकते हो कि अद्वैत का विरोधी
होने से अद्वैत के रहते रहते द्वैत की सिद्धि कैसे हो जायगी ।
एवं तर्हि शृणु द्वैतमसन् मायामयत्वतः ।
तेन वास्तवमद्वैतं परिशेषाद् विभासते ॥२४५॥
सिद्धान्ती इसका उत्तर यों देता है—हम जो द्वैत को असत्
बताते हैं उसका कारण भी हम से सुन लो—हमारा कहना है
कि मायामय होने के कारण यह द्वैत असत् है । जब इस प्रकार
द्वैत का निषेध कर डाला जाता है तब परिशेष से वास्तव अद्वैत ही

चित्रदीपप्रकरणम् २०५

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चित्रदीपप्रकरणम् २०५

ज्ञानी को भासने लगता है । [प्राप्त हुए सभी पदार्थों का निषेध
करते जाने पर जहां हमारा निषेध लागू न हो सकता हो उसका
सत्यत्व निश्चय कर लेना ‘परिशेष’ है।
अचिन्त्यरचनारूपं मायैव सकलं जगत् ।
इति निश्चित्य वस्तुत्वमद्वैते परिशेष्यताम् ॥२४६॥
इस जगत् की न तो रचना ही समझ में आती है और न
इसका कुछ रूप ही ध्यान पर चढ़ता है यों ‘अचिन्त्यरचना’ और
‘अचिन्त्यरूप’ वाला होने से यह सम्पूर्ण जगत् ‘माया’ किंवा
‘मिथ्या’ ही है । इस प्रकार अनिर्वचनीय होने के कारण द्वैत के
मिथ्यात्व का निश्चय करके, परिशेष से अद्वैत को ही वास्तव
समझ लेना चाहिये ।
पुनर्द्वैतस्य वस्तुत्वं भाति चेत् त्वं तथा पुनः ।
परिशीलय कोवात्र प्रयासस्तेन ते वद ॥२४७॥
यदि तो पूर्ववासनाओं की प्रबलता से फिर फिर द्वैत की
सत्यता का भान तुम्हें होता हो तो, तुम्हें चाहिये कि तुम फिर
फिर विचार किया करो । बताओ कि विचार करने में तुम्हें कौन
सी मेहनत पड़ेगी ? [यही बात ‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्’ इस सूत्र
में वेदान्त दर्शन के चतुर्थ अध्याय में कही गयी है कि आत्मा के
श्रवणादि की आवृत्ति करते रहना चाहिये। क्योंकि अनादि काल
की द्वैतवासनायें साधक पर लौट लौट कर हमला करेंगी।
अपना पूर्वाधिकार पाने के लिये जी तोड़ कोशिश करेंगी। इस
लिये भुलावे से बचने के लिये साधक को विवेक को दुहराते
रहना चाहिये ] ।

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२०६ पञ्चदशी
कियन्तं कालमिति चेत् खेदोऽयं द्वैत इष्यताम् ।
अद्वैते तु न युक्तोऽयं सर्वानर्थनिवारणात् ॥२४८॥
'विचार कब तक करें' यह खेद तो द्वैत में ही हो सकता है,
सम्पूर्ण अनर्थों का निवारण हो जाने से अद्वैत में तो यह खेद
युक्त ही नहीं है ।
यदि पूछो कि फिर कितने समय तक इस प्रकार विचार
करते चलें तो उसका उत्तर यह है कि—प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त हो
जाने पर यह विचार स्वयमेव समाप्त हो जाता है, यह बात इसी
प्रकरण के पन्द्रहवें श्लोक में कही जा चुकी है । विचार करते
जाने का अनन्त खेद तो द्वैतवाद में ही हो सकता है। आत्म-
दर्शन हो जाने पर सम्पूर्ण अनर्थों के भाग जाने से, अद्वैत में तो
यह खेद करना, किंवा अपने सामने एक अनन्त काम पड़ा हुआ
देखना, युक्त ही नहीं है । जब अद्वैत का पूर्ण साक्षात्कार होगा
तब विचार अपने आप छूट जायगा । विचार का अपने आप
छूट जाना, पेट भरी हुई जोक (जलौका) की तरह गिर पड़ना,
ही अद्वैत प्राप्ति की सूचना है ।
क्षुत्पिपासादयो दृष्टा यथापूर्वं मयीति चेत् ।
मच्छब्दवाच्येऽहंकारे दृश्यतां नेति को वदेत् ॥२४९॥
अद्वैत को समझ लेने पर अब भी पहले ही की तरह मैं तो
अपने में उन्हीं पहले की भूख प्यासों को देख रहा हूँ । फिर
आत्मज्ञान को सम्पूर्ण अनर्थों को भगा देने वाला कैसे मान
लूँ ? ऐसा यदि कहा जाय तो उसका उत्तर यह है कि [मैं के दो
अर्थ होते हैं एक 'अहंकार' दूसरा 'चिदात्मा' । सो भाई असंग
और अविषय होने के कारण चिदात्मा को तो भूख प्यास लगती

चित्रदीपप्रकरणम् २०७

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चित्रदीपप्रकरणम् २०७
ही नहीं।] ये भूख प्यास आदि तो मैं के अहंकार रूपी (दूसरे)
अर्थ में ही पायी जाती हैं। भूख प्यास लगने को तो कोई भी मना
नहीं करता है। [हमारा कहना तो केवल इतना ही है कि—
चिदात्मतत्व को भूख प्यास नहीं लगतीं, अहंकार को लगती हैं]
चिप्द्रेऽपि प्रसज्येरंस्तादात्म्याध्यासतो यदि ।
माध्यासं कुरु किन्तु त्वं विवेकं कुरु सर्वदा ॥२५०॥
यदि [कहा जाय कि चिदात्मा में भूख प्यास वस्तुतः न होती
हों तो न हों किन्तु] तादात्म्याध्यास किंवा भ्रम से तो चिदात्मा
में भी यदि भूख प्यास लगने लगें तो हम क्या करें ? इसका
उत्तर यह है कि [इस बात को पहचानने के बाद तुम यह करो
कि] अनर्थ की जड़ इस अध्यास को करना ही छोड़ दो और
अध्यास को निवृत्त करने के लिये सदा ही विवेक करते रहा करो।
झटित्यध्यास आयाति दृढवासनयेति चेत् ।
आवर्तयेद् विवेकं च दृढं वासयितुं सदा ॥२५१॥
यदि तो अनादि दृढ वासनाओं की प्रबलता से यह गया
हुआ भी अध्यास वार बार लौट कर आता हो तो, उसको निवृत्त
करने के लिये विवेक की आवृत्ति ही करनी चाहिये। जिससे कि
विवेक की वासनायें दृढ हो जांय [इसके अतिरिक्त अध्यास को
हटाने का अन्य कोई भी उपाय नहीं है। जैसे अध्यास ने हमारे
हृदय में जड़ पकड़ ली हैं इसी तरह विवेक को बद्धमूल करने के
लिये—अध्यास की जगह विवेक को दे देने के लिये—विवेक
की अनन्त आवृत्तियें करनी पड़ेंगी]।
विवेके द्वैतमिथ्यात्वं युक्त्यैवेति न भण्यताम् ।
अचिन्त्यरचनात्वस्यानुभूतिर्हि स्वसाक्षिकी ॥२५२॥

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विचार करने पर द्वैत का मिथ्यापन तो केवल युक्ति से ही
सिद्ध होता है। अनुभव से द्वैत का मिथ्यापन सिद्ध नहीं होता
ऐसा कभी भी न कहना चाहिये। क्योंकि इस द्वैत के अचिन्त्य
रचनापने का किंवा मिथ्यापने का जो अनुभव होता है उसका
साक्षी तो अपना आत्मा ही है [इस द्वैत की रचना का चिन्तन
भी नहीं हो सकता यह तो प्रत्येक का अनुभव कह ही रहा है]।
चिदप्यचिन्त्यरचना यदि तर्ह्यस्तु नो वयम् ।
चितिं सुचिन्त्यरचनां ब्रूमो नित्यत्वकारणात् ॥२५३॥
यदि यह कहा जाय कि ऐसे तो चिदात्मा की रचना भी
अचिन्त्य ही है फिर बताओ कि वह मिथ्या क्यों नहीं होता ?
तो हम कहेंगे कि आत्मा अचिन्त्यरचना वाला है तो हुआ करो।
हम तो उसको नित्य होने के कारण सुचिन्त्य रचना वाला कभी
नहीं कहते । [नित्यपदार्थों की रचना होती ही नहीं इसी कारण
उनको भी अचिन्त्यरचना वाला माना जाता है]।
प्रागभावो नानुभूतश्चितेर्नित्या ततश्चितिः ।
द्वैतस्य प्रागभावस्तु चैतन्येनानुभूयते ॥२५४॥
चिति के नित्य होने का कारण तो यह है कि—इसके प्राग-
भाव को किसी ने आज तक अनुभव किया ही नहीं। उस द्वैत के
प्रागभाव को तो यह चैतन्य ही अनुभव किया करता है। [देखते
हैं कि जाग्रदादि द्वैत के अभाव को सुषुप्ति के समय यह साक्षी
चैतन्य ही अनुभव करता है]।
प्रागभावयुतं द्वैतं रच्यते हि घटादिवत् ।
तथापि रचनाऽचिन्त्या मिथ्या तेनेन्द्रजालवत् ॥२५५॥
प्रागभाव से युक्त होने के कारण, यह द्वैत, घटादि के समान

चित्रदीपप्रकरणम् २०९

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चित्रदीपप्रकरणम् २०९
ही, रचा तो जाता है, परन्तु इसकी रचना अचिन्त्य ही है [इसकी
रचना किसी की समझ में आने वाली नहीं है। कोई भी यथार्थ
रूप से इसकी रचना को जान नहीं सका है] इससे यही कहना
पड़ता है कि यह इन्द्रजाल के समान मिथ्या ही है [जो चीज़
रची तो जाय पर उसकी रचना अचिन्त्य हो, उसे 'मिथ्या' कहा
जाता है। यह मिथ्या का लक्षण द्वैत में मिलता है, इससे द्वैत का
मिथ्यापन सिद्ध हो चुका ] ।
चित्प्रत्यक्षा ततोऽन्यस्य मिथ्यात्वं चानुभूयते ।
नाद्वैतमपरोक्षं चेत्येतन्न व्याहतं कथम् ॥२५६॥
[स्वप्रकाश होने के कारण] चिति तो नित्य ही प्रत्यक्ष प्रतीत
हो रही है। उस चिति से भिन्न जो भी कुछ है,उस सब के मिथ्या-
भाव को भी वही चिति अनुभव कर रही है। यह बात यहां
तक सिद्ध की जा चुकी। इतने पर भी जब कोई यह कह बैठे कि
हमें तो अद्वैत का अपरोक्ष [प्रत्यक्ष] नहीं होता है तो उसके इस
कथन में व्याघात दोष क्यों नहीं है ? [इसी प्रकरण के २४२
श्लोक में अद्वैत के प्रत्यक्ष होने की बात भले प्रकार समझा दी है
इस कारण अद्वैत का प्रत्यक्ष न होना विरुद्ध बात है। जो अद्वैत
होगा वह तो प्रत्यक्ष होगा ही ] ।
इत्थं ज्ञात्वाप्यसन्तुष्टाः केचित् कुत इतीर्यताम् ।
चार्वाकादेः प्रबुद्धस्याप्यात्मा देहः कुतो वद ॥२५७॥
वेदान्त की बतायी इस महावार्ता को जान कर भी, बहुत
से लोग इससे सन्तुष्ट क्यों नहीं हैं ? [उन्हें इस पर विश्वास क्यों
नहीं होता है ? ] यह जब हम से पूछा जायगा तब हम कहेंगे
कि-तुम यह बताओ कि ऊहापोह करने में परम प्रवीण

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२१० पञ्चदशी
समझदार] चार्वाक आदि लोग भला देह को ही आत्मा क्योंकर
मानते हैं? [भाव यह है कि जिन लोगों को मताध्यास हो जाता
है वे दूसरे की उचित बात को भी अपने हृदयमन्दिर में घुसने
नहीं देते हैं] ।
सम्यग्विचारो नास्त्यस्य धीदोषादिति चेत् तथा ।
असन्तुष्टास्तु शास्त्रार्थं न त्वैक्षन्त विशेषतः ॥२५८॥
यदि कहा जाय कि 'इस चार्वाक ने तो धीदोष के कारण
भले प्रकार विचार ही नहीं किया है तो हम कहेंगे कि बुद्धिदोष के
कारण ही जो लोग असन्तुष्ट हैं उन्होंने कभी वेदान्त की गुह्य
बात का गम्भीर विचार ही नहीं किया है । [वे ऊपर ऊपर इसे
सुनकर हंसी में टाल जाते हैं। नहीं तो बताओ कि सारे संसार
का प्रत्यक्ष तो हमें हो, परन्तु अपने आपे का हमें प्रत्यक्ष न हो--
अपना आपा हमें परोक्ष बना रहे—संसार में इससे बड़ी मूर्खता
और इससे बड़ा अपराध और कोई हो सकता है ?]
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
इति श्रौतं फलं दृष्टं नेति चेद् दृष्टमेव तत् ॥२५९॥
इस मुमुक्षु के हृदय में जो काम अथवा इच्छादि घुसे बैठे
हैं, वे सब के सब जब [मुमुक्षु के हृदय में से] निकल कर भाग
जाते हैं-[तत्व ज्ञान के प्रभाव से अध्यास के निवृत्त होते ही जब
वे सब निवृत्त हो जाते हैं] तो फिर अचम्भे की बात देखो कि-
देह के साथ तादात्म्याध्यास करके बार बार मर मिटने वाला
ही यह पुरुष तुरन्त ही अमर पद को पा जाता है [क्योंकि वह
तो इस हाड मांस के देह में ही सत्यादि स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो
जाता है। तत्व ज्ञान का ऐसा ही श्रौत महाफल देखा जाता है।]

चित्रदीपप्रकरणम् २११

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चित्रदीपप्रकरणम् २११
फिर भी यदि यह कहा जाय कि यह कामनिवृत्ति आदि महाफल
श्रुति ने कह ही कह दिया है, परन्तु ऐसा कहीं देखा नहीं जाता
है तो हम फिर प्रबल शब्दों में कहेंगे कि ऐसा फल देखा भी गया
है। [आज कल भी बहुत से ऐसे योगी महात्मा हैं कि जिनका
ग्रन्थिभेद हो चुका है, वे अमर हो चुके हैं और यहीं अमर पद
को पा चुके हैं ]
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयग्रन्थयस्त्विति ।
कामा ग्रन्थिस्वरूपेण व्याख्याता वाक्यशेषतः ॥२६०॥
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते (कठ० ६-१५) इस वाक्य में कामनाओं
को ही ग्रन्थिरूप कहा गया है। इस वाक्य में कामनाओं से छुट-
कारे को ही ग्रन्थिभेद बताया है [अहंकार और चिदात्मा का
तादात्म्याध्यास जब निवृत्त हो जाता है तब उसी को 'ग्रन्थिभेद'
कहते हैं। वह ग्रन्थिभेद तो हो जाय और किसी को उसका
प्रत्यक्ष न हो यह कैसे सम्भव हो सकता है ? इसी से कहा
था कि कामनिवृत्ति रूपी फल देखा भी गया है यह केवल
पुस्तकों में लिखने की ही बात नहीं है। ]
अहंकारचिदात्मानावेकीकृत्याविवेकतः ।
इदं मे स्यादिदं मे स्यादितीच्छाः कामशब्दिताः॥२६१॥
अहंकार और चिदात्मा को, अपने अज्ञान से, एक बना
कर, ऐसी आशा करने लगना कि 'यह भी मुझे मिले' और
'वह भी मुझे मिले' बस यही इच्छायें 'काम' कहाती हैं।
अप्रवेश्य चिदात्मानं पृथक् पश्यन्नहंकृतिम् ।
इच्छंस्तु कोटिवस्तूनि न बाधो ग्रन्थिभेदतः ॥२६२॥
चिदात्मा को तो उसमें प्रविष्ट न किया जाय और अहंकार

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२१२ पञ्चदशी
को उससे पृथक् देख लिया जाय। फिर तो चाहे कोई करोड़ों
वस्तुओं की इच्छा करता रहो, ग्रन्थिभेद हो जाने के कारण फिर
उसकी कुछ भी हानि नहीं होनी है। [तात्पर्य यह कि अध्यास-
मूलक काम ही त्याज्य है। साधारणतया सब कामों को त्याज्य
कहने में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है। जिन कामनाओं के मूल में
अध्यास नहीं होता उनसे किसी हानि की सम्भावना नहीं होती।
प्रत्युत उन अध्यासहीन कामनाओं से ही लोकसंग्रह किंवा लोक-
शिक्षण होता है। कई साधक साधना करते करते ऐसे चतुर हो
जाते हैं कि वे चिदात्मा और अहंकार को कभी मिलने ही नहीं
देते। ऐसे साधक करोड़ों पदार्थों की इच्छा भी करें तो भी उनके
पथभ्रष्ट हो जाने की शंका नहीं रह जाती ] ।
ग्रन्थिभेदेऽपि संभाव्या इच्छाः प्रारब्धदोषतः ।
बुद्ध्वापि पापबाहुल्या दसन्तोषो यथा तव ॥२६३॥
ग्रन्थिभेद हो जाने पर भी, प्रारब्ध दोष के कारण, इच्छाओं
का होना संभव ही है। जैसे कि आत्मतत्व को समझ कर भी,
पापों की अधिकता से तुझे अभी तक सन्तोष नहीं हो रहा है।
[जब अध्यास ही न रहेगा तब कामनायें उत्पन्न ही कैसे हो
सकेंगी ? इसका समाधान यह है कि प्रारब्ध कर्म की प्रबलता
से, निर्वीर्य कामनायें, ज्ञानी को उत्पन्न हो ही सकती हैं ] ।
अहंकारगतेच्छाद्यै र्देहव्याध्यादिभिस्तथा ।
वृक्षादिजन्मनाशैर्वा चिद्रूपात्मनि किं भवेत् ॥२६४॥
[ अध्यास से रहित हो चुके हुए ] अहंकार में जो इच्छा
आदि होते हैं, उनसे चिद्रूप आत्मा में, ठीक इसी प्रकार कुछ
भी विकार नहीं हो सकता, जिस प्रकार देह की व्याधियों से

चित्रदीपप्रकरणम् २१३

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चित्रदीपप्रकरणम् २१३
देहसम्बन्धरहित आत्मा की बाधा नहीं होती है । अथवा यों
समझो कि जैसे वृक्षादि के उत्पन्न होने या विनष्ट हो जाने से
आत्मतत्व का कुछ नहीं बिगड़ता है ।
ग्रन्थिभेदात् पुराप्येवमिति चेत् तन्न विस्मर ।
अयमेव ग्रन्थिभेदस्तव तेन कृती भवान् ॥२६५॥
यदि कोई यह कहे कि—ग्रन्थिभेद जब तक नहीं हुआ
था, तब तक भी तो कामादि से इस आत्मा की बाधा नहीं होती
थी [यह आत्मतत्व तो पहले भी ऐसा ही था] तो हम उससे
कहेंगे कि—बस इस महावार्ता को कभी न भूल जाना । ऐसी
समझ आ जाना ही तो 'ग्रन्थिभेद' कहाता है । तेरा ग्रन्थिभेद
हो चुका है । इस ग्रन्थिभेद के कारण तुम कृतकृत्य हो चुके हो ।
नैवं जानन्ति मूढाश्चेत् सोऽयं ग्रन्थिर्न चापरः ।
ग्रन्थितद्भेदमात्रेण वैषम्यं मूढबुद्धयोः ॥२६६॥
यदि कहो कि—साधारण लोग तो ऐसा नहीं समझते हैं,
तो हम कहेंगे कि यही तो 'ग्रन्थि' है—[ऐसा ज्ञान न होना ही
'ग्रन्थि' कहाती है] इसके अतिरिक्त और कोई ग्रन्थि नाम का
पदार्थ नहीं होता है । मूढ और ज्ञानी में यही तो केवल अन्तर
होता है कि—मूढों की तो ग्रन्थि लगी रहती है तथा ज्ञानी की
ग्रन्थि खुल जाती है ।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा देहेन्द्रियमनोधियाम् ।
न किञ्चिदपि वैषम्य मस्त्यज्ञानिविबुद्धयोः ॥२६७॥
देह इन्द्रिय मन और बुद्धि जब किसी काम में प्रवृत्त और
किसी काम से निवृत्त होती हैं, तब अज्ञानी और ज्ञानी में स्वल्प
भी अन्तर नहीं पाया जाता ।