Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 218 of 726

Read in context
Page 218

१९८ पञ्चदशी

ही आत्मा मान लें ? आत्मा के असंग स्वरूप का निश्चय करने
के लिये सांख्य योग की सब बातों को कैसे मान बैठें ?
आत्मभेदो जगत्सत्य मीशोऽन्य इति चेत् त्रयम् ।
त्यज्यते तैस्तदा सांख्ययोगवेदान्तसंमतिः ॥२२८॥
(१) आत्माओं की अनेकता, (२) जगत् की सत्यता, (३)
और ईश्वर की आत्मा से भिन्नता, विरोध करनेवाली ये तीनों
बातें यदि वे छोड़ दें, तो सांख्य, योग तथा वेदान्त की सम्मति
हो सकती है । [ वे लोग जीवों का भेद मानते हैं, जगत् को वे
सत्य बताते हैं, ईश्वर को वे तटस्थ कहते हैं, फिर उनका हमारा
विरोध कैसे टले ? ]
जीवासङ्गत्वमात्रेण कृतार्थ इति चेत्तदा ।
स्रक्चन्दनादिनित्यत्वमात्रेणापि कृतार्थता ॥२२९॥
यदि यह समझा जाय कि हम जीव की असङ्गता को जान
लेने से ही कृतकृत्य (मुक्त) हो जायेंगे, इस अद्वैत ज्ञान का क्या
करें ? उसका समाधान यह है कि—फिर तो स्रक् चन्दनादि
भोगों को नित्य किंवा सदा रहनेवाला समझ लेने से भी कृत-
र्थता हो सकती है । [ बहुत से लोग स्रगादि भोगों को नित्य
मान बैठे हैं तो क्या वे इतने से ही कृतार्थ हो सकते हैं ? अगले
श्लोक को पढ़ने से इसका भाव स्पष्ट हो जायगा । ]
यथा स्रगादिनित्यत्वं दुःसंपाद्यं तथात्मनः ।
असंगत्वं न संभाव्यं जीवतो जगदीशयोः ॥२३०॥
जिस प्रकार कि माला आदि पदार्थों की नित्यता [ का सिद्ध
होना ] असंभव है, इसी प्रकार जब तक जीव और जगदीश