Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 232 of 726

Read in context
Page 232

२१२ पञ्चदशी
को उससे पृथक् देख लिया जाय। फिर तो चाहे कोई करोड़ों
वस्तुओं की इच्छा करता रहो, ग्रन्थिभेद हो जाने के कारण फिर
उसकी कुछ भी हानि नहीं होनी है। [तात्पर्य यह कि अध्यास-
मूलक काम ही त्याज्य है। साधारणतया सब कामों को त्याज्य
कहने में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है। जिन कामनाओं के मूल में
अध्यास नहीं होता उनसे किसी हानि की सम्भावना नहीं होती।
प्रत्युत उन अध्यासहीन कामनाओं से ही लोकसंग्रह किंवा लोक-
शिक्षण होता है। कई साधक साधना करते करते ऐसे चतुर हो
जाते हैं कि वे चिदात्मा और अहंकार को कभी मिलने ही नहीं
देते। ऐसे साधक करोड़ों पदार्थों की इच्छा भी करें तो भी उनके
पथभ्रष्ट हो जाने की शंका नहीं रह जाती ] ।
ग्रन्थिभेदेऽपि संभाव्या इच्छाः प्रारब्धदोषतः ।
बुद्ध्वापि पापबाहुल्या दसन्तोषो यथा तव ॥२६३॥
ग्रन्थिभेद हो जाने पर भी, प्रारब्ध दोष के कारण, इच्छाओं
का होना संभव ही है। जैसे कि आत्मतत्व को समझ कर भी,
पापों की अधिकता से तुझे अभी तक सन्तोष नहीं हो रहा है।
[जब अध्यास ही न रहेगा तब कामनायें उत्पन्न ही कैसे हो
सकेंगी ? इसका समाधान यह है कि प्रारब्ध कर्म की प्रबलता
से, निर्वीर्य कामनायें, ज्ञानी को उत्पन्न हो ही सकती हैं ] ।
अहंकारगतेच्छाद्यै र्देहव्याध्यादिभिस्तथा ।
वृक्षादिजन्मनाशैर्वा चिद्रूपात्मनि किं भवेत् ॥२६४॥
[ अध्यास से रहित हो चुके हुए ] अहंकार में जो इच्छा
आदि होते हैं, उनसे चिद्रूप आत्मा में, ठीक इसी प्रकार कुछ
भी विकार नहीं हो सकता, जिस प्रकार देह की व्याधियों से