पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextचित्रदीपप्रकरणम् २१३
देहसम्बन्धरहित आत्मा की बाधा नहीं होती है । अथवा यों
समझो कि जैसे वृक्षादि के उत्पन्न होने या विनष्ट हो जाने से
आत्मतत्व का कुछ नहीं बिगड़ता है ।
ग्रन्थिभेदात् पुराप्येवमिति चेत् तन्न विस्मर ।
अयमेव ग्रन्थिभेदस्तव तेन कृती भवान् ॥२६५॥
यदि कोई यह कहे कि—ग्रन्थिभेद जब तक नहीं हुआ
था, तब तक भी तो कामादि से इस आत्मा की बाधा नहीं होती
थी [यह आत्मतत्व तो पहले भी ऐसा ही था] तो हम उससे
कहेंगे कि—बस इस महावार्ता को कभी न भूल जाना । ऐसी
समझ आ जाना ही तो 'ग्रन्थिभेद' कहाता है । तेरा ग्रन्थिभेद
हो चुका है । इस ग्रन्थिभेद के कारण तुम कृतकृत्य हो चुके हो ।
नैवं जानन्ति मूढाश्चेत् सोऽयं ग्रन्थिर्न चापरः ।
ग्रन्थितद्भेदमात्रेण वैषम्यं मूढबुद्धयोः ॥२६६॥
यदि कहो कि—साधारण लोग तो ऐसा नहीं समझते हैं,
तो हम कहेंगे कि यही तो 'ग्रन्थि' है—[ऐसा ज्ञान न होना ही
'ग्रन्थि' कहाती है] इसके अतिरिक्त और कोई ग्रन्थि नाम का
पदार्थ नहीं होता है । मूढ और ज्ञानी में यही तो केवल अन्तर
होता है कि—मूढों की तो ग्रन्थि लगी रहती है तथा ज्ञानी की
ग्रन्थि खुल जाती है ।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा देहेन्द्रियमनोधियाम् ।
न किञ्चिदपि वैषम्य मस्त्यज्ञानिविबुद्धयोः ॥२६७॥
देह इन्द्रिय मन और बुद्धि जब किसी काम में प्रवृत्त और
किसी काम से निवृत्त होती हैं, तब अज्ञानी और ज्ञानी में स्वल्प
भी अन्तर नहीं पाया जाता ।