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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

४४६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां

४४६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
यित्वा स्वदुहित्रे देया । मृते तु तस्मिंस्तस्यां च निर्विकारायां सत्याम् ,
सतीत्येवैनां प्रकृतयोऽनुवर्तिष्यन्ते । पुनः प्रचण्डवर्मणे संदेश्यम्—'अना-
यकमिदं राज्यम् । अनेनैव सह बालिकेयं स्वीकर्तव्या' इति । तावदावां
कापालिकवेषच्छन्नौ देव्याैव दीयमानभिक्षौ पुरो बहिरुपश्मशानं
वत्स्यावः । पुनरार्यप्रायान्पौरवृद्धानाप्तांश्च मन्त्रिवृद्धानेकान्ते ब्रवीतु देवी-
स्वप्नेऽद्य मे देव्या विन्ध्यवासिन्या कृतः प्रसादः । अद्य चतुर्थेऽहनि
प्रचण्डवर्मा मरिष्यति । पञ्चमेऽहनि रेवातटवर्तिनि मद्भवने परीक्ष्य वैज-
न्यम् , जनेषु निर्गतेषु कपाटमुद्घाट्य त्वत्सुतेन सह कोऽपि द्विजकुमारो
निर्यास्यति । स राज्यमिदमनुपाल्य बालं ते प्रतिष्ठापयिष्यति । ख खलु
बालो मया व्याघ्रीरूपया तिरस्कृत्य स्थापितः । सा चेयं वत्सा मञ्जुवा-
मञ्जुवादिन्याम् । निर्विकारायां विकाररहितायाम् । सतीति पतिव्रतेति । एनां
देवीम् । अनुवर्त्तिष्यन्ते अनुसरिष्यन्ति । सन्देश्यं वाचिकं प्रेषणीयम् । अनायकं
नायकशून्यम् । अनेन राज्येन । स्वीकर्त्तव्या विग्राह्या । तावत् तावता कालेन ।
आवाम् अहं भास्करवर्मा च । दीयमाना भिक्षा याभ्यां तौ । पुरो बहिर्नगराद्वहिः ।
उपश्मशानं श्मशानसमीपे । आर्यप्रायान् साधून् सच्चरित्रान् । वैजन्यं जनशून्य-
सदृश हो।' इसके पश्चात् हमारी इस औषध में वह माला धो लेवें तथा निर्विष करके
उसे अपनी कन्या मंजुवादिनी को दे दें । ऐसा कार्य करने से मित्रवर्मा मर जायगा और
मंजुवादिनी बच जायगी ।
ऐसी स्थिति में लोग महादेवी को सती समझने लगेंगे और उसकी पूजा करेंगे ।
तदनन्तर प्रचण्डवर्मा के समीप यह सन्देश भेजा जाय कि यह साम्राज्य अधुना राजा से
से रहित है । अतः आप इस साम्राज्य के साथ-साथ इस बालिका को भी स्वीकारिये ।
तब तक हम दोनों कापालिक साधु का वेश धर कर महारानी की भिक्षा पर जीवन
व्यतीत करते हुए नगर के बाहर श्मशान में रहेंगे । समय पाकर महादेवी अपने निर्जा
नगरवासियों और वृद्ध सचिवोंको बुलाकर एकान्त में कहें—'आज भगवती विन्ध्यवासिनी
देवी ने स्वप्न में मुझसे आकर कहा है कि आज के चौथे दिन प्रचण्डवर्मा मर जायगा ।
पाँचवें दिन नर्मदा के तट पर एकान्त में वर्तमान मेरे मन्दिर में सन्नाटा हो जायगा
तब तक एक विप्र का बालक तुम्हारे बालक के साथ फाटक खोलकर बाहर आवेगा ।
वह ब्राह्मण इस साम्राज्य को लेकर तुम्हारे पुत्र को राज्यसिंहासन पर आरूढ़ कर देगा ।
इस समय मैं व्याघ्री बनकर तुम्हारे पुत्र की रक्षा कर रही हूँ । मंजुवादिनी उस वि

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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४५७
दिनी तस्य द्विजातिदारकस्य दारत्वेनैव कल्पिता' इति । तदेतदतिरहस्यं
युष्मास्वेव गुप्तं तिष्ठतु यावदेतदुपपत्स्यते' इति ।
( ३० ) स सांप्रतमतिप्रीततः प्रयातोऽर्थश्चायं यथाचिन्तितमनुष्ठितोऽ-
भूत् । प्रतिदिशं च लोकवादः प्रासर्पत्—'अहो माहात्म्यं पतिव्रतानाम् ।
असिप्रहार एव हि स मालाप्रहारस्तस्मै जातः । न शक्यमुपधियुक्तमेत-
त्कर्मेति वक्तुम् । यतस्तदेव दत्तं दाम दुहित्रे स्तनमण्डनमेव तस्यै जातं
न मृत्युः । योऽस्याः पतिव्रतायाः शासनमतिवर्तते स भस्मैव भवेत्'इति ।
( ३१ ) अथ महाव्रतिवेषेण मां च पुत्रं च भिक्षायै प्रविष्टौ दृष्ट्वा
प्रस्नुतस्तनी प्रत्युत्थाय हर्षाकुलमब्रवीत्—'भगवन्, अयमञ्जलिः ।
ताम् । अतिरहस्यमतिगोपनीयम् । यावत् यत्काळपर्यन्तम् । उपपत्स्यते सिद्धं
भविष्यति ।
( ३० ) सः नालीजंघः । अर्थः मदुक्तो विषयः । प्रासर्पत् प्राचरत् । तस्मै
तदर्थम् मित्रवर्मणे इत्यर्थः । उपधियुक्तं कपटायुक्तम् । दाम माला । अतिव-
र्त्तते लंघयति ।
( ३१ ) महाव्रतिवेषेण कापालिकच्छद्मना । भिक्षायै भिक्षार्थम् । प्रस्नुतस्तनी
स्रवत्पयोधरा । यद्येवं भवद्वचनं सत्यं स्यात् । अस्याः ममेत्यर्थः । अस्याः
कुमार की परिणीता भार्या होगी । हमने जो मद्गुप्त की बात बतायी है, उसे तब तक आप
लोग गुप्त रखें जब तक यह बात ठीक न हो जाय ।
( ३० ) इन बातों को सुनने के पश्चात्—वह बूढ़ा नालीजंघ अति आनन्द के साथ
विदा हुआ तथा हमने जो योजनाएँ बनायी थीं उसने उन्हें सम्पादित भी कर दी । अब
चारों ओर यह हल्ला हो गया कि, 'देखो पातिव्रत धर्म की कितनी बड़ी महिमा है कि
देवी ने मित्रवर्मा पर माला का प्रहार किया और वह प्रहार उसके लिए खङ्ग प्रहार हो
गया। यदि यह कहा जाय कि उक्त माला में कोई विष मिला था तो ऐसी कल्पना करना
भी भ्रममात्र है, क्योंकि उसी माला द्वारा मित्रवर्मा को मारकर देवी ने वही माला
मंजुवादिनी को दे दी है और उसने तुरन्त धारण भी कर लिया । परन्तु वह तो न मरी
अपितु, वह माला उसके स्तनों की भूषण बन गयी अतः जो कोई भी इस पतिव्रता की
आज्ञाओं को न मानेगा वह जलकर भस्म हो जायगा।'
( ३१ ) तदनन्तर हम उसके साथ संन्यासियों का रूप धरकर उसके यहाँ भिक्षा
माँगने गये । हम दोनों को देखकर वह अति हर्षित हुई। उसके स्तनों से दुग्ध की
धारा बह चली । वह गद्गद स्वर में बोली—'हे भगवन् ! मैं आपसे हाथ जोड़कर विनय
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu