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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

४४० | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF
४४० | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां
( ३६ ) अश्मकेन्द्रस्तु कुन्तलपतिमेकान्ते समभ्यधत्त—'प्रमत्त एष
राजा कलत्राणि नः परामृशति । कियत्यवज्ञा सोढव्या । मम शतमस्ति
हस्तिनाम् , पञ्चशतानि च ते । तदावां संभूय मुरलेशं वीरसेनमृचीके-
शमेकवीरं कोङ्कणपतिं कुमारगुप्तं सासिक्यनाथं च नागपालमुपजपाव ।
ते चावश्यमस्याविनयमसहमाना अस्मन्मतेनैवोपावर्तेरन् । अयं च वान-
वास्यः प्रियं मे मित्रम् । अमुनैवं दुर्विनीतमग्रतो व्यतिषक्तं पृष्ठतः प्राह-
रेम । कोशवाहनं च विभज्य गृह्णीमः' इति हृष्टेन चामुनाभ्युपेते, विंशतिं
वरांशुकानाम् , पञ्चविंशतिं काञ्चनकुङ्कुमकम्बलानाम् , प्राभृतीकृत्याप्तमु-
खेन तैः सामन्तैः संमन्त्र्य तानपि स्वमतावस्थापयत् । उत्तरेद्युस्तेषां
सामन्तानां वानवास्यस्य च अनन्तवर्मा नयद्वेषादामिषत्वमगच्छत् । वस-
( २६ ) परामृशति धर्षयति । सम्भूय मिलित्वा । उपजपाव विघटयाव ।
लोट् । ते वीरसेनादयः । अस्य अनन्तवर्मणः अविनयं दुराचरणम् । उपावर्त्तेरन्
आगच्छेयुः । अमुना वानवास्येन । एनम् अश्मकेन्द्रम् । अग्रतः सम्मुखे । व्यति-
षक्तं प्रतिरुद्धम् । अमुना कुन्तलपतिना । अभ्युपेते स्वीकृते । वरांशूकानां श्रेष्ठ-
वस्त्राणाम् । काञ्चनेति—काञ्चनवर्णकुङ्कुमवासितकम्बलानामित्यर्थः । प्राभृतीकृत्य
उपायनीकृत्य । आप्तमुखेन विश्वस्तपुरुषद्वारा । स्वमतौ स्वामिमते । उत्तरेद्युः
( २६ ) 'यह राजा आजकल पागल सा हो गया है तथा हमारी बहू-बेटियों पर
बलात्कार किया करता है । आखिरकार हम लोग कब तक ऐसे निरादरों तथा अपमानों
को सहें । मेरे समीप एक सौ हाथी हैं तथा आपके समीप पाँच सौ हैं । अतः हम लोग
चलकर मुरलेश वीरसेन, ऋचीक देश के शासक एकवीर, कोंकण के अधिपति कुमारगुप्त
तथा सासिक्य के स्वामी नागपाल को इससे फोड़कर अपनी ओर मिला लें तथा अनन्तवर्मा
से उनका वैर करा दें । वे लोग इसके उच्छृङ्खल व्यवहारों से अवश्य अपनी ओर आ
जायेंगे—क्योंकि ऐसा ज्ञात हो चुका है कि वे लोग इस पर क्षुब्ध रहते हैं । भीलों का
अधिपति हमारा मित्र है ही अतः उसे आगे भेजकर अनन्तवर्मा को रुकवा दें । पीछे से हम
लोग इस पर आक्रमण करके मार डालें । ततः इसके कोष और राज्य-वाहनादि को परस्पर
बाँट लें।' जब अवन्तिदेव ने यह योजना मान ली तब बीस अच्छे वस्त्र, पचीस सुनहले
तथा कुङ्कुम की सुगन्ध से युक्त कम्बलों को देकर उसने उसके विश्वासपात्र सचिवों के
साथ मन्त्रणादि करके उन सबको भी अपनी ओर कर लिया । तत्पश्चात् दूसरे दिन भीलों
के स्वामी की तथा उन सामन्तों की कला-कुशलता से अनन्तवर्मा मार डाला गया ।
तब वसन्तभानु ने उस अनन्तवर्मा के कोश-वाहन और विध्वस्त सैन्य-बल को अपने
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४१
न्तभानुश्च तत्कोशवाहनमवशीर्णमात्माधिष्ठितमेव कृत्वा 'यथान्यासं
यथाबलं च विभज्य गृह्णीत । युष्मदनुज्ञया येनकेनचिदंशेनाहं तुष्यामि'
इति शाठ्यात्सर्वानुवर्ती, तेनैवामिषेण निमित्तीकृतेनोत्पादितकलहः सर्व-
सामन्तान्ध्वंसयत् । तदीयं च सर्वस्वं स्वयमेवाग्रसत् । वानवास्यं केन-
चिदंशेनागृह्य प्रत्यावृत्य सर्वमनन्तवर्मराज्यमात्मसादकरोत् ।
(२७) अस्मिंश्चान्तरे मन्त्रिवृद्धो वसुरक्षितः कैश्चिन्मौलैः संभूय
बालमेनं भास्करवर्माणम् , अस्यैव ज्यायसीं भगिनीं त्रयोदशवर्षां मञ्जु-
वादिनीम् , अनयोश्च मातरं महादेवीं वसुंधरामादायापसर्पन्नापदोऽस्या
आवितया दाहज्वरेण देहमजहात् । अस्मादृशैर्मित्रैस्तु नीत्वा माहिष्मतीं
परदिने । नयद्वेषात् दुर्नयात् । आमिषत्वं भोग्यवस्तुत्वम् । तैर्हत इति भावः ।
तत्कोशेति-तस्यानन्तवर्मणः कोशवाहनं धनरत्नगजाश्वादिकम् । अवशीर्णं विध्व-
स्तम् । आत्माधिकृतं स्वाधिकृतम् । यथाप्रयासं स्वस्वचेष्टानुरूपम् । यथाबलं
स्वस्वशक्त्यनुसारेण । सर्वानुवर्त्ती सर्वेषां मनोरञ्जकः ।
(२७) मौलैः भूयादिमूलज्ञातृभिः । 'मुखिया' इति भाषा । भास्करवर्मा
विश्रुतेन पूर्वदृष्टाऽष्टवर्षदेशीयो बालकः अनन्तवर्मणः पुत्रः । ज्यायसीं ज्येष्ठांम् ।
अधिकारमें कर लिया तथा लोगों से कहा—'आप लोग अपनी शक्तिके और परिश्रमके
अनुसार इसमें से हिस्सा बाँट कर लें । हमें आप लोग जो प्रसन्नतासे देंगे वही लेने में
हम राजी हो जायेंगे—हमें कोई आपत्ति नहीं है । इस प्रकार के भुलावे दे देकर
वसन्तभानुने सबको अपनी ओर राजी कर लिया । परन्तु बटवारेमें से सब सामन्त
परस्पर झगड़ गये । वसन्तभानुने ऐसे मौके से लाभ उठाया और सभी सामन्तोंको
मार डाला । तदनन्तर उन सबके समस्त धनको उसने ले लिया। मीलोंके अधिपति
को जो उसका मित्र था उसमेसे हिस्सा दे दिया और वहां से लौटकर बेखटके अनन्तवर्मा
के सारे साम्राज्य पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया ।
(२७) इसी बीचमें सचिवोंमें श्रेष्ठ वसुरक्षित इस आपत्तिसे व्याकुल होकर कुछ
पुराने दासोंको लेकर तथा अपनी त्रयोदशवर्षीया भगिनी मंजुवादिनी एवं अपनी माता
महादेवी वसुन्धराके साथ भागा । परन्तु, थोड़े ही दिनों पश्चात् वह ज्वरपीड़ित होकर मर
गया । तब कुछ सुहृदोंने बालकोंके साथ महादेवी वसुन्धराको उसकी सौतके पुत्रके
समीप भेजवा दिया । किन्तु, उस सुचरित्रा विमाता को उसने भ्रष्टाचारिणी समझा
और यह भी सोचा कि सम्भव है विमाता का विचार अपने पुत्र को राजा बनाने
का होवे । इस बात का विचार कर वह बहुत घबराया तथा इसी विचार से मित्रवर्मा