दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
४१८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
४१८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
अनाथोऽयं जनोऽनुगृह्यताम् । अस्ति ममैकः स्वप्नः स किं सत्यो न
वा' इति । मयोक्तम्—'फलमस्याद्यैव द्रक्ष्यसि' इति । 'यद्येवं बहु भाग-
धेयमस्या वो दास्याः। स खल्वस्याः सानाथ्यशंसी स्वप्नः' इति मद्-
र्शनरागबद्धसाध्वसां मञ्जुवादिनीं प्रणमय्य, भूयोऽपि हर्षगर्भमब्रूत्—
'तच्चेन्मिथ्या सोऽयं युष्मदीयो बालकपाली श्वो मया निरोद्धव्यः' इति ।
मयापि सस्मितं मञ्जुवादिनीरागलीनदृष्टिलौढधैर्येण 'एवमस्तु' इति लब्ध-
भैक्ष्यः नालीजङ्घमाकार्य निर्गम्य ततश्च तं चानुयान्तं शनैरपृच्छम्—
'क्वासावल्पायुः प्रथितः प्रचण्डवर्मा' इति । सोऽब्रूत्—'राज्यमिदं ममे-
त्यपास्तशङ्को राजस्थानमण्डप एव तिष्ठत्युपास्यमानः कुशीलवैः' इति ।
( ३२ ) 'यद्येवमुद्याने तिष्ठ' इति तं जरन्तमादिश्य तत्प्राकारैकपार्श्वे
मद्धुहितुः सानाथ्यं शंसतीति सानाथ्यशंसी सनाथतासूचकः । मद्दर्शनेति—
मम दर्शनाद् रागेण प्रेम्णा बद्धमुत्पादितं साध्वसं लज्जा यस्यास्ताम् । प्रणमय्य
प्रणामं कारयित्वा मञ्जुवादिनीत्येति शेषः । तत् तव वचनं चेन्मिथ्या अवेत्तर्हि ।
बालकपाली शिशुव्रती । मञ्जुवादिनीत्यादि—मञ्जुवादिन्या रागेण प्रेम्णा लीना
संसक्ता या दृष्टिस्तया लीनं कवलितं धैर्य्यं यस्य तेन । स नालीजंघः । राज-
स्थानमण्डपे राजसभायाम् । कुशीलवैः चारणैः ।
( ३२ ) जरन्तं वृद्धम् । शून्यमठिकायां निर्जनमठे । मठशब्दात्स्वल्पार्थे कः
करती हूं कि आप इस अनाथ को सनाथ बनावें । मैंने एक स्वप्न देखा है वह सत्य है वा
नहीं ?' हमने उत्तर दिया—'उस स्वप्न का फल आज ही ज्ञात होगा।' इस बात को
श्रवणकर उसने कहा—'यदि इस दासी का इतना बड़ा भाग्योदय हुआ तो मैं समझती
हूँ कि वह स्वप्न इसे सनाथ करने के लिये ही सूचनार्थ हुआ था।' ऐसा कहकर हमें देखती
हुई उसने आसक्त होने वाली मंजुवादिनी से प्रणाम कराकर हमसे कहा—'यदि मेरा
वह स्वप्न मिथ्या हुआ तो कल मैं आपके इस बाल ब्रह्मचारी को रोक लूँगी।' हमने
मंजुवादिनी के अनुराग को स्थिर दृष्टि से अवलोकित कर मन्द हँसी हँसकर कहा—
अच्छी बात है, ऐसा ही सही, तथा भिक्षा ले ली और नालीजंघ को साथ लेकर चल
पड़े। कुछ दूर मार्ग पार कर हमने नालीजंघ से पूछा—'वह अल्पायु चण्डवर्मा इदानीं
कहाँ पर है ।' उसने उत्तर में कहा—'उसे पूर्ण विश्वास हो चुका है, कि यह साम्राज्य
उसी का है अतः वह स्तुतिपाठकों (भाटों) द्वारा स्तुतियाँ सुनता हुआ राजसभा में
बैठा हुआ है।'
( ३२ ) 'यदि ऐसा है तो आप इस उद्यान में ही ठहरें।' हम ऐसा कहकर उस
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अष्टमोच्छ्वासः ]
व्याख्याद्वयोपेतम् ।
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क्वचिच्छून्यमठिकायां मात्राः समवतार्य, तद्रक्षणनियुक्तराजपुत्रः, कृतकु-
शीलववेषलीलः प्रचण्डवर्माणमेत्यान्वरञ्जयम् अनुरञ्जितातपे तु समये,
जनसमाजज्ञानोपयोगीनि संहृत्य नृत्यगीतनानारुदितादिहस्तचङ्क्रम-
णमूर्ध्वपादालतपादपीठवृश्चिकमकरलङ्घनादीनि मत्स्योद्धर्त्तनादीनि च
कारणानि, पुनरादायादायासन्नवर्तिनां छुरिकाःताभिरुपाहितवर्मा चित्र-
दुष्कराणि करणानि श्येनपातोत्क्रोशपातादीनि दर्शयन्, विंशतिचापा-
प्रत्ययः । मात्राः कल्यादिपरिच्छेदान् । मात्रा परिच्छेदेऽल्पेंऽशे इति कोषात् । तद्र-
क्षणे मात्रासंरक्षार्या नियुक्तो राजपुत्रो येनासौ । कृतकुशीलवेति-कुशीलवच्छद्म-
नेत्यर्थः । अनुरञ्जितो रक्त आतपो यस्मात्-दिवावसानकाले । जनसमाजस्य
लोकसमूहस्य ज्ञानोपयोगीनि यथा लोकाः ज्ञातुं प्रभवेयुस्तथाभूतानि । संहृत्य
दर्शयित्वा । नृत्यं नर्त्तनं, गीतं गानं नानारुदितादि नानाविधक्रन्दनानुकारि
शब्दादि, हस्तचक्रमणम् इतस्ततो हस्तभ्रामगम्, ऊर्ध्वपादोऽलातपादश्चेति नृत्य-
विशेषौ, वृश्चिकलंघनं वृश्चिकेन क्रीडनं मकरलंघनपि तथा । द्वन्द्वान्ते बहुव्रीहिः।
मत्स्योद्धर्त्तनं मीनविलसितम् । करणानि क्रियाविशेषान् । आदायादाय विश्वासो-
त्पादनार्थं पुनःपुनर्गृहीत्वा । आसन्नवर्त्तिनां समीपस्थितानाम् । छुरिकाः शस्त्रिकाः ।
आदायेत्यस्य कर्म । ताभिश्च्छुरिकाभिः । उपाहितवर्म्मा संयुक्तशरीरः । चित्रदुष्क-
राणि चित्राणि आश्चर्याणि दुष्कराणि अन्यैः कर्तुमशक्यानि । श्येनः पक्षिविशेषः
उत्क्रोशः-कुररपक्षी तद्वत्पातः पतनं तादृशानि । विंशतिचापेति-विंशतिचाप-
राजप्रासाद के एक कोने में वर्तमान शून्य मठ में चले गये । वहाँ पर जाकर हमने
कापालिक वेष उतार कर धर दिया और चारण का रूप धारण करके प्रचण्डवर्मा के
समीप चले गये । कह-सुनकर समझकर राजकुमार को भी उसकी सेवा में लगा दिया
तथा कविता सुनाकर प्रचण्डवर्मा का मनोरंजन करने लगे । जब सायंकाल का समय
हुआ और सूर्यभगवान् लाल हो गये तब हमने ऐसा रूप धारण किया जिससे
साधारण लोग हमें पहचान न सकें । नृत्य गान, विविध रीति के हाव-भाव, रोदन-हास,
हाथ-पाँव मटकाकर दोनों हाथों से पृथिवी पकड़कर शिर घुमाते हुए ऊपर की ओर पैरों
को उठाकर स्वांग दिखाये । फिर एक पांव उठाकर दूसरा पैर संकुचित कर नाचने, बिच्छू
वा मकर के समान आकार बनाने, मछली के समान रेंगने-उलटने-पुलटने आदि के
कौशल दिखाये । तब बाजीगर के समान अपने पास के दर्शकों से छुरियाँ लेकर उनके
ऊपर अपनी देह का भार रख दिया-मेरे ऐसे कार्य को देखकर वे आश्चर्यचकित हो
गये क्योंकि वैसे कार्य साधारण लोग नहीं कर सकते थे। तत्पश्चात् कुररी पक्षी के समान
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