दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
२ दशकुमारचरितम्। [ पूर्वपीठिकायां
२ दशकुमारचरितम्। [ पूर्वपीठिकायां
क्षोणीनौकूपदण्डः क्षरदमरसरित्पट्टिकाकेतुदण्डः।
ज्योतिश्चक्राक्षदण्डस्त्रिभुवनविजयस्तम्भदण्डोऽङ्घ्रिदण्डः
अत्र कविना वामनरूपेणावतीर्णस्य भगवतो नारायणस्य बलिनियमनार्थमावि-
ष्कृतस्य पादत्रयस्य वर्णनं कृतम्। तेष्वेकः पाद ऊर्ध्वमुत्क्षिप्तः समस्तं गगनं,
द्वितीयश्चाधोगतः सम्पूर्णां क्षोणीं, तृतीयः पुनर्नाभितो निर्गतो बलेरुत्तमाङ्गं समा-
क्रान्तवानिति पौराणिकी कथा। रूपकेण कविस्तामेव विशिनष्टि—
ब्रह्माण्डं जगदेव छत्रमातपत्रं तस्य दण्ड आधारयष्टिः। भगवतः समस्तजगदाधा-
रत्वात्। एतेनोर्ध्वपादो गम्यते। शतधृतेर्ब्रह्मणो भवनं गृहमाश्रय इत्यर्थः, यदम्भोरुहं
कमलं तस्य नालदण्डो वृन्तभूता यष्टिः, अनेन मध्यमपादो गम्यते। क्षोणी क्षितिरेव
नौस्तरणिस्तस्याः कूपदण्डो गुणवृक्षः, एतेन भूतस्थपादो गम्यते। क्षरन्ती प्रवह-
माणा याऽमरसरिदाकाशगङ्गा सैव पट्टिका पताका तस्याः केतुदण्डो ध्वजदण्डस्व-
रूपः, अयमप्यूर्ध्वपादः। ज्योतिषां ग्रहनक्षत्रादीनां चक्रं मण्डलमेव चक्रं रथ चक्रमित्यर्थः,
तस्याक्षदण्डः काष्ठदण्डविशेषः। त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनं त्रैलो-
क्यं तस्य यो व्यापनरूपो विजयस्तत्सूचकः स्तम्भदण्डः। विबुधद्वेषिणामसुराणां
हो जानेपर कार्यसिद्धि हो जाती है। वह कार्यप्रतिबन्धक शक्ति ईश्वरानुकम्पासे ही दूर हो
सकती है इसी कारण भक्त जन स्वसम्प्रदायानुसार विशेष तथा सामान्य रीतिसे सज-धज
एवं भावनाके साथ परमपिता परमेश्वरका या उनकी कृतियोंका आराधन करते हैं। उसी
भावमय भक्तिका नाम मंगलाचरण है जो ग्रन्थारम्भमें की जाती है।
आगामी सृष्टिके सभी लोग—प्राणिमात्र—इस मंगलाचरण से सुन्दर फल प्राप्त करें इसी
कारण ग्रन्थकृत् सज्जन अपने-अपने ग्रन्थोंके प्रारम्भमें मंगलाचरण करते हैं, जिसके कारण
अध्यापक तथा शिष्यों, पाठक एवं पाठिकाओंको अनायास ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है।
पूज्यपाद दण्डी कविने भी इसी प्रणालीके आधारपर अपने ग्रन्थ—दशकुमारचरित—की
रचनाके आरम्भमें भगवान् वामनके चरणकी वन्दना की, जिससे उनके ग्रन्थकी निर्विघ्न
समाप्ति भी हो तथा सुहृदोंको लाभ भी हो। वे अपनी भावमयी भक्ति निम्नरीत्या प्रदर्शित
करते हुए भगवान्के चरणकमलोंकी स्तुति करते हैं—
परमपिता परमेश्वर वामन भगवान्का चरणकमलदण्ड आपका तथा पाठक-पाठिकाओंका
कल्याण करनेवाला है। जिस समय देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिए विष्णु भगवान्ने
छद्मवेषी वामनावतार धारण किया था तथा पातालके राजा बलिसे तीन चरण पृथ्वी-दानका
संकल्प करा लिया था उस समय राजा बलिको छद्मसे वन्दी करनेके हेतु उन्होंने तीनों
लोकोंको नापनेके लिए अपना चरणरूपमात्र दण्ड बनाया था तथा उसे आकाशतक
लम्बायमान कर दिया था। उस समय वह चरण जैसा प्रतीत होता था उसीका वर्णन इस
श्लोकमें चित्रित किया गया है।
प्रथमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ३
श्रेयस्त्रैविक्रमस्ते वितरतु विबुधद्वेषिणां कालदण्डः ॥
कालदण्डो यमदण्डस्वरूपः, त्रिविक्रमस्यायमिति त्रैविक्रमो विष्णुसम्बन्धी अङ्घ्रि-
श्चरणो दण्ड इवेत्यङ्घ्रिदण्डश्चरणदण्डस्ते तुभ्यं तव वा श्रेयो मङ्गलं सुकृतं वा वितरतु
ददातु । अत्र रूपकालङ्कारसंसृष्टिः । ब्रह्माण्ड-क्षोणी-स्वर्गाङ्गासु छत्र-नौ-पट्टिकानामा-
रोपो भगवच्चरणे दण्ड-कूपदण्ड-ध्वजदण्डत्वारोपे हेतुरिति परम्परितरूपकं तच्चात्रा-
श्लिष्टशब्दनिबन्धनम् । ज्योतिश्चक्राक्षदण्डेत्यत्र तु चक्रशब्दस्य श्लिष्टत्वात् श्लिष्ट-
शब्दनिबन्धनम् । अन्यत्र तु केवलं निरङ्गरूपकम् । तेषाञ्च परस्परनिरपेक्षत्वात्
संसृष्टिः । वृत्तञ्चात्र स्रग्धरा ।
वह चरण क्या, मानो ब्रह्माण्डरूपी छत्रका स्वर्णमय दण्ड है । अथवा ब्रह्माके उत्पत्ति
स्थानरूपी कमलका नाल-दण्ड है । वा पृथ्वीरूपी नौकाका कूपदण्ड (*गुनरखा) है ।
अथवा स्वर्गसे गिरनेवाली आकाशगंगारूपी पताकाका केतुदण्ड है । अथवा चन्द्रादि
नक्षत्रोंके ज्योतिषचक्रका अक्षदण्ड है । अथवा भगवान्के त्रैलोक्य-विजयको सूचित करने-
वाला सूचक स्तम्भ है तथा इन्द्रादि देवोंके शत्रुओंको ताड़ना देनेवाला कालदण्ड है ।
व्युत्पत्ति
इस श्लोकमें प्रतिपादके अन्तमें आठ बार दण्ड शब्द व्यवहृत हुआ है तथा प्रतिपादके
पाँचवें अक्षरके पश्चात् यह शब्द आया है । अतः पादान्त्यानुप्रास और पदान्त्यानुप्रास
इसे कहना चाहिये । हिन्दीमें इसे तुकान्त कविता कहा जाता है । परन्तु चौथे पादमें पाँच
अक्षरोंके पश्चात् पदान्त्यानुप्रास कुछ शिथिल है क्योंकि वहाँ दण्ड शब्द व्यवहृत नहीं है ।
यति स्थल में दण्डः शब्द है परन्तु, अङ्घ्रिके पूर्व दण्डो होनेसे स्वरूप-प्रक्रमभंगदोष कहा
जा सकता है । यदि प्रकारान्तरसे ये शब्द रचे जायें तो निर्दोष हो जायेंगे ।
तीनों भुवनोंको जीतनेके लिए भगवान् वामनने तीन बार पैरको विस्तृत किया इसी
भावको झलकानेके लिए त्रिभुवन एवं त्रैविक्रम पद विशेषणरूपसे द्योतित किये गये हैं ।
अतः इसे परिकरालंकार जानना चाहिये । दण्डी कवि भगवान् वामनके चरणकमलोंमें
श्रद्धासे नतमस्तक हो रहे हैं । इससे यहाँ शुद्ध भक्ति प्रकट हो रही है। अंघ्रि अर्थात् चरण-
को दण्डरूप मानकर सात स्वरूपोंमें उसे व्यक्त करनेका प्रयास किया गया है जिससे यहाँ
रूपकालंकार है । वही रूपक ब्रह्माण्डच्छत्रदण्डः क्षोणीनौकूपदण्डः क्षरदमरसरित्पट्टिका-
केतुदण्डः आदि तीनों चरणोंमें अश्लिष्ट परम्परित है तथा 'ज्योतिश्चक्राक्षदण्डः' में श्लिष्ट-
परम्परित है, अन्य शेष स्थलोंमें साधारण है ।
इस सम्पूर्ण ग्रन्थमें पदे-पदे अनुप्रास तथा यमकालंकार आये हैं । अतः उन्हें मैं न
- गुनरखा—अनुकूल पवनकी ओर बिना पतवार नौका ले जाते समय जो बाँस जलमें
धँसाया जाता है उसे मल्लाह लोग गुनरखा कहते हैं ।