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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-४, ब्राह्मण-१

३६२ शतपथ ब्राह्मण

वै द्विरूपो भवति । द्विदेवत्यो हि भवति देवतयोरसम॑दं॒ कृ॒ष्णसारं॑गं स्या॒दित्या॒-
क्षरेत॒द्ध्येनयो॑ रू॒पतम॒मिवेति॒ यदि॑ कृ॒ष्णसारं॑गं न॒ विन्दे॒दप्य॑-ऽपि लो॒हितसा॑रंगं
स्यात् ॥ २३ ॥ तस्मिन्वाचयति । नमो॒ मित्र॑स्य॒ वरु॑णस्य॒ चक्ष॑से म॒हो दे॒वाय॒ तदृ॒-
तꣳ॒ स॑पर्यत । दू॒रे दृशे दे॒वजा॑ताय के॒तवे॑ दि॒वस्पु॒त्राय॒ सूर्या॑य॒ शꣳस॒तेति॒ नम ए॒-
वास्मा॒ एतत्क॑रोति मित्रे॒धैर्य॑मे॒वैने॑नैतत्कु॑रुते ॥ २४ ॥ अथाधर्यु॑रारो॒हणं॒ विमु॑ञ्चति ।
वरु॑णस्योत्तम्भन॒मसीत्युप॑स्तम्भनेनोप॑स्तभ्नाति वरु॑णस्य स्कम्भस॒र्जनी॑ स्थ॒ इति॑ श॒-
म्येऽऽउद्व॑हति स॒ यदा॒ह वरु॑णस्य स्कम्भस॒र्जनी॑ स्थ॒ इति॑ वरु॒ण्यो ह्ये॑ष ए॒तर्हि॑ भ॒-
वति॒ यत्सोमः॑ क्री॒तः ॥ २५ ॥ अथ चत्वारो॒ राज्ञा॒सन्दी॒माद॑दते । द्वौ वा॒ऽअ॒स्मै॑ मा॒-
नुषा॒य राज्ञ॒ऽआद॑दाते॒ऽथैवैतां चत्वारो॒ योऽस्य॑ स॒कृत्स॒र्वस्येष्टे॑ ॥ २६ ॥ औदु॑म्बरी
भवति । अन्नं॒ वाऽऊर्गौदु॑म्बर ऊर्जो॒ऽन्नाद्य॒स्यावरु॑द्ध्या॒ तस्मा॑दौदुम्बरी भवति ॥ २७॥
नाभिदघ्ना भवति । अत्र वाऽअन्नं॒ प्रति॑तिष्ठत्य॒न्नꣳ सो॑म॒स्तस्मा॑न्नाभिदघ्ना भवत्यत्रो
ऽएव रेत॑स॒ आश॑यो रेत॒: सोम॒स्तस्मा॑दत्रदघ्ना भवति ॥ २८ ॥ ता॒मभि॒मृश॑ति । व॒-
रुण॒स्य॒ऽऋत॒सद॑न्यसीत्यथ कृष्णाजिन॒मास्तृ॑णाति वरु॑णस्य॒ऽऋत॒सदन॑मसी॒त्यथैनमा॒-
सादयति वरु॑णस्य॒ऽऋत॒सदन॒मासी॑देति स॒ यदा॒ह वरु॑णस्य॒ऽऋत॒सदन॒मासी॑देति
वरु॒ण्यो ह्ये॑ष ए॒तर्हि॑ भवति ॥ २९॥ अथैनꣳ शालां॑ प्रपा॒दय॑ति । स प्रपा॒द्यन्वा॒-
चयति या ते॒ धामा॑नि ह॒विषा॒ यज॑न्ति॒ ता ते॒ विश्वा॑ परि॒भूर॑स्तु य॒ज्ञम् । गयस्फा॒-
नः प्र॒तर॑णः सु॒वीरो॒ऽवीर॑हा प्रचरा सोम दु॒र्यानि॒ति गृ॒हा वै दु॒र्या गृ॒हान्त् शि॒वः
शा॒न्तोऽपा॑पकृत्प्र॒चरि॑त्ये॒वैतदा॑ह ॥ ३०॥ अत्र॒ हैके॑ । उदपा॒त्रमुप॑निन॒यन्ति॒ यथा॑ रा॒-
ज्ञऽआग॑तायोदक॒माहृ॑रेदे॒वमे॒तदिति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॑ न॒ कुर्या॑न्मानु॒षꣳ ह॒ ते य॒ज्ञे
कुर्व॑न्ति॒ व्यृ॑द्धं॒ वै तद्य॒ज्ञस्य॒ यन्मानु॑षं॒ नेद्व्यृ॑द्धं य॒ज्ञे कर॒वाणी॑ति॒ तस्मा॒न्नोप॑निनयेत्
॥ ३१ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [३.४] ॥ तृतीयोऽध्यायः [१८] ॥ ॥
शिरो॒ वै य॒ज्ञस्याति॑थ्यं बा॒हू प्र॑ायणीयोदयनी॒यौ । अ॒भितो॒ वै शिरो॑ बा॒हू भ॒-

का० ३, अ० ३-४, ब्रा० ४-१, क० २३-३१ व १ शतपथब्राह्मण / ३६३
पशु दो रूप का होता है, क्योंकि दो देवताओं का होता है। कुछ का कथन है कि इन
दोनों का मेल करने के लिए कृष्ण सारंग होना चाहिए, क्योंकि यही उन दोनों देवताओं के
समानतम है। यदि कृष्ण-सा रंग न मिले तो लोहित सारंग (लाल धब्बेवाला) होना
चाहिए ॥२३॥
अब यह मन्त्र पढ़वाता है— “नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं॒ सपर्यत।
दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शं॒सत” (यजु० ४।३५)—“मित्र और वरुण की
आँख के लिए नमस्कार। बड़े देव के लिए इस पूजा को करो। इस दूरदर्शी देवोत्पन्न, केतु, द्यौ
के पुत्र, सूर्य के लिए प्रशंसा करो।” इस प्रकार पशु की अर्चना करता है और उसकी मित्रता का
चिह्न बनाता है ॥२४॥
अब अध्वर्यु कपड़े को कटाता है। “वरुणस्योत्तम्भनमसि” (यजु० ४।३६)—“वरुण का
खम्भा है तू।” इससे गाड़ी में खम्भा लगाता है। “वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थः” (यजु० ४।३६)—
“तुम दोनों वरुण की खूंटी हो।” इससे खूंटियाँ निकालता है। ‘वरुण की तुम दोनों खूंटियां हो’
इसलिए कहता है कि सोम ही अब वरुण है ॥२५॥
अब चार आदमी सोम राजा के तख्त को उठाते हैं। मनुष्य राजा के तख्त को दो
आदमी उठाते हैं। सोम राजा के तख्त को चार उठाते हैं क्योंकि यह सबके ऊपर
है ॥२६॥
यह तख्त उदुम्बर की लकड़ी का होता है, उदुम्बर रस और अन्न है। रस और अन्न
के लिए। इसलिए यह उदुम्बर की लकड़ी का होता है ॥२७॥
यह नाभि के बराबर ऊँचा होता है। क्योंकि नाभि तक ही अन्न पहुंचता है। सोम अन्न
है, इसलिए यह नाभि के बराबर ऊँचा होता है। यहीं वीर्य रहता है, सोम वीर्य है। इसलिए
नाभि के बराबर होता है ॥२८॥
अब वह तख्त को छूता है यह पढ़कर-‘वरुणस्य ऽ ऋतसदन्यसि’ (यजु० ४।३६)-‘तू
वरुण की उचित बैठक है।” अब वह उस पर काला मृग-चर्म बिछाता है यह पढ़कर—“वरुणस्य
ऋतसदनमासीद”(४।३६)—“वरुण के उचित स्थान पर बैठ।” सोम अब वरुण जैसा हो गया।
इसलिए कहा ‘वरुण के उचित स्थान पर बैठ’ ॥२६॥
अब सोम को शाला में ले जाता है। और ले जाते हुए यजमान से यह कहलवाता है—
“या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्। गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा
प्रचरा सोम दुर्यान्” (यजु० ४।३७)—“हवि से ये लोग तेरे जिन धामों की अर्चना करें वे सब
धाम यज्ञ को चारों ओर से घेर लें। हे सोम, हमारे घरों में आ जा !” गृहस्थ की सम्पत्ति को देने-
वाला, आपत्तियों का भगानेवाला, वीर और वीरों का हनन न करनेवाला, (ये चार विशेषण
सोम के हैं) ‘दुर्यान्’ का अर्थ है घर। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे घर शुभ और
शान्त तथा पापरहित होवें ॥३०॥
कुछ लोग जल के पात्र से जल उंड़ेलते हैं और कहते हैं कि जब राजा आता है तो उसके
लिए भी जल-सिंचन किया जाता है; परन्तु ऐसा न करे। यह तो मानुषी क्रिया है, यज्ञ में मानुषी
क्रिया करना ठीक नहीं। इसलिये जल-सिंचन न करे, क्योंकि ऐसा करना अनुचित है ॥३१॥
अध्याय ४-ब्राह्मण १
आतिथ्य (मेहमान का सत्कार) यज्ञ का सिर है। प्रायणीय और उदयनीय बाहू हैं।

वत॒स्तस्मा॑द॒भित॑ आति॒थ्यमे॒ते ह॒विषी॑ भवतः प्रायणी॒यश्चो॑दय॒नीय॑श्च ॥ १ ॥ अथ
यस्मा॒दाति॒थ्यं नाम॑ । अ॒तिथि॑र्वाऽए॒ष ए॒तस्याग॑च्छति॒ यत्स्रोमः क्री॒तस्त॒स्माऽए॒तत्क॑-
था॒ राज्ञे॑ वा ब्रा॒ह्मणा॑य वा म॒होक्षं॑ वा म॒हाजं॑ वा प॒चेत्तद॑ह॒ मानु॑ष॒ꣳ ह॒विर्देवा॑-
नामेवम॒स्माऽए॒तदाति॑थ्यं करोति ॥ २॥ तदा॑हुः । पूर्वी᳭स्ती॒र्त्वा ग्र॑ह्णीया॒दिति॒ यत्र॒
वाऽअर्ह॑न्त॒माग॑तं॒ नाप॑चाय॒न्ति क्रुध्य॑ति॒ वै स तत्र॒ तथा॒ ह्याप॑चिती भवति ॥ ३॥
तद्वाऽअ॒न्यत॑र एव विमुक्तः स्या॒त् । अ॒न्यत॑रोऽविमुक्तोऽथ॑ गृह्णीया॒त्स यद॒न्यत॑रो
विमु॒क्तस्तेनाग॑तो॒ यद॒न्यत॑रो॒ऽविमु॒क्तस्तेनाप॑चितः ॥ ४॥ तदु॒ तथा॒ न कु॑र्यात् ।
विमु॒च्यै॑व प्र॒पाद्य॑ गृह्णीयाद्यथा॒ वै दे॒वानां॑ च॒रणं॒ तद॒न्व॑नु मनु॒ष्याणां॒ तस्मान्मा-
नु॒षे याव॒न्न वि॒मुञ्च॑न्ते॒ नैवास्मै॑ तावदुद॒कꣳ हर॑न्ति॒ नाप॑चितिं कुर्वन्त्यनाग॑तो॒ हि
स ताव॒द्भव॑त्यथ॒ यदैव वि॒मुञ्च॑न्ते॒ऽथास्मा॑ऽउद॒कꣳ हर॑न्त्यथाप॑चितिं कुर्वन्ति त॒र्हि
हि स आ॑ग॒तो भव॑ति॒ तस्मा॑द्विमु॒च्यै॑व॒ प्रपा॒द्य गृह्णी॒यात् ॥ ५॥ स वै संत्वर॑माण-
इव गृह्णी॒यात् । तथा॒ ह्याप॑चितो भवति॒ तत्प॒त्यन्वा॑रभते॒ पर्यु॑ह्य॒माणं॒ वै य॒ज्ञमा-
नोऽन्वा॑रभते॒ऽथाय॑ पत्न्यु॒भयत॑ ए॒वैत॒न्मिथुने॒नान्वा॑रभेते॒ यत्र॒ वाऽअर्ह॑न्नाग॒च्छति॒
सर्व॑गृह्या-इव वै तत्र॒ चेष्ट॑न्ति॒ तथा॒ ह्याप॑चितो भव॑ति ॥ ६॥ स वाऽअ॒न्येने॑व त-
तो य॒जुषा॑ गृह्णीयात् । येनो चान्या॑नि ह॒वीꣳष्येकं॒ वाऽए॒ष भागं॑ क्रियमा॒णोऽभि॑-
क्रीयते॒ छन्द॑सामेव॒ राज्या॑य॒ छन्द॑साꣳ साम्रा॒ज्याय॒ तस्य॒ छन्दा॑ꣳस्य॒भितः॑ साचया॑नि
यथा॒ राज्ञोऽरा॑जानो राज॒कृतः॑ सूतग्राम॒ण्य॑ एवमस्य॒ छन्दा॑ꣳस्य॒भितः॑ साचया॑नि ॥७॥
न वै तद॒वक॑ल्पते । यच्छन्दो॑भ्य॒ इति॒ केव॑लं गृह्णी॒याद्यत्र॒ वाऽअर्ह॑न्ते पच॑न्ति त-
द॒भितः॑ साचयोऽन्वा॑भक्ता भवन्त्यरा॒जानो॑ राज॒कृतः॑ सूतग्राम॒ण्य॑स्त॒स्माद्य॒त्रैवैतस्यै॑
गृह्णी॒यात्तदे॑व छन्दा॑ꣳस्यन्वा॒भजे॑त् ॥ ८॥ स गृह्णाति । अग्ने॒स्तनू॑रसि॒ विष्ण॑वे॒ त्वेत्य-
ग्रिर्वै गाय॒त्री तद्वाय॒त्रीमन्वा॒भज॑ति ॥ ९॥ सोम॑स्य तनू॑रसि॒ विष्ण॑वे॒ त्वेति॑ । क्ष॒त्रं
वै सोम॑ः क्ष॒त्रं त्रि॒ष्टुब्ध्रैष्टुभ॑मन्वा॒भज॑ति ॥ १०॥ अ॑तिथेराति॒थ्यम॑सि॒ विष्ण॑वे॒ त्वेति॑ ।

का० ३, अ० ४, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / ३६५
सिर के दोनों ओर बाहू होते हैं। इसलिये प्रायणीय और उदयनीय आहुतियाँ आतिथ्य के दोनों
ओर होती हैं ॥१॥
यह आतिथ्य नाम यों पड़ा। यह जो खरीदा गया सोम है वह यजमान के पास अतिथि
के रूप में आता है। जैसे राजा या ब्राह्मण के सत्कारार्थ [साथ आए] महोक्ष (बड़े बैल) या महाज
(बड़े बकरे) को पकाते (पोषित करते) हैं, यह मानुषी सत्कार होता है, इसी प्रकार देवताओं
के लिए हवि दी जाती है, इसलिए आतिथ्य-सत्कार किया जाता है। (सम्भव है 'महोक्ष' और
'महाज' किन्हीं भोजनविशेष के नाम हों) ॥२॥
इस पर कहते हैं कि पहले सोम के पास जाये; तब आतिथ्य की सामग्री निकाले। जब
कोई अर्हन्त आता है और उसका कोई आदर नहीं करते तो वह क्रुद्ध हो जाता है। इस प्रकार
सोम का सत्कार किया जाता है ॥३॥
उन (गाड़ी के बैलों) में से एक को मुक्त कर दे (जुआ खोल दे) और दूसरे को नहीं।
एक को विमुक्त करने का अर्थ यह हुआ कि सोम आ गया, और दूसरे को न छोड़ने का अर्थ यह
हुआ कि उसका सत्कार किया गया। (युक्ति हमारी समझ में नहीं आई—अनुवादक) ॥४॥
परन्तु ऐसा न करना चाहिए। दोनों बैलों को खोलने और शाला में सोम के आने के
पश्चात् सामग्री निकाले। जैसा देवों का चलन होता है वैसा ही मनुष्यों का। मनुष्यों में चलन
यह होता है जब आगन्तुक बैल खोल देता है और भीतर आ जाता है तभी पानी लाते हैं और
सत्कार करते हैं, क्योंकि तभी वह 'आया हुआ' समझा जाता है। इसी प्रकार बैल खोलकर और
सोम को भीतर लाकर ही सामग्री इकट्ठी करे ॥५॥
इसमें शीघ्रता करनी चाहिए। सत्कार की यही रीति है। एक ओर से पत्नी आरम्भ
करती है और दूसरी ओर से यजमान। इस प्रकार सोम के दोनों ओर पति और पत्नी लगते हैं।
जब कोई अर्हन्त आता है तो सभी मिलकर सत्कार करते हैं। इसी प्रकार चेष्टा करते हैं और
इसी प्रकार सत्कार किया जाता है ॥६॥
इस सामग्री को भिन्न यजुः से ग्रहण करे; उसी से नहीं जिससे अन्य हवियां ग्रहण की
जाती हैं। क्योंकि जब सोम खरीदा जाता है तो विशेष कार्य के लिए खरीदा जाता है अर्थात्
छन्दों के राज्य के लिए, छन्दों के साम्राज्य के लिए। छन्द सोम के परिचारक (सेवक) होते हैं।
जैसे सूत या ग्रामीण लोग जो राजा नहीं हैं राजा के सेवक होते हैं, इसी प्रकार छन्द भी सोम के
परिचारक होते हैं ॥७॥
ऐसा न चाहिए कि केवल छन्दों के लिए ही सामग्री ग्रहण करे। जब किसी अर्हन्त के
लिए भोजन बनाते हैं तो जो उसके साथी सूत या ग्रामीण मनुष्य हैं,उनको भी राजा के साथ-
साथ खाना देते हैं। इसी प्रकार जब सोम के सत्कार की सामग्री इकट्ठी करे तो छन्दों के लिए भी
भाग निकाले ॥८॥
इस मन्त्र से ग्रहण करे—"अग्नेस्तनूरसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)—"तू अग्नि का
शरीर है। विष्णु के लिए तुझको।" अग्नि गायत्री है। इस प्रकार गायत्री को उसका भाग
मिलता है ॥६॥
"सोमस्य तनूरसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)-"सोम का तू शरीर है। विष्णु के लिए
तुझको।" सोम क्षत्र है। क्षत्र त्रिष्टुभ् है। इसलिये त्रिष्टुभ् का सत्कार किया जाता है ॥१०॥
"अतिथेरातिथ्यमसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)-"अतिथि का आतिथ्य है तू। तुझको

३६६ शतपथ ब्राह्मण
सो॒ऽस्योद्वा॑रो यथा॒ श्रेष्ठ॒स्योद्वा॒र ए॒वम॒स्यैष॒ऽऋ॒ते छन्दो॑भ्यः ॥११॥ श्ये॒नाय॑ त्वा
सो॒मभृते॒ विष्ण॑वे॒ वेति॑ । तद्गाय॒त्रीमन्वा॒भज॑ति सा यद्गाय॒त्री श्ये॒नो भू॒त्वा दि॒वः
सो॒ममाह॑र॒त्तेन॒ सा श्ये॒नः सो॒मभृ॒त्तेनै॒वैना॑मेतद्वीर्येण द्वितीय॒मन्वा॒भज॑ति ॥१२॥
अ॒ग्नये॑ त्वा रायस्पोष॒दे विष्ण॑वे॒ वेति॑ । पश॒वो वै रा॒यस्पोषः॑ पश॒वो जग॑ती तज्जग॑-
तीमन्वा॒भज॑ति ॥१३॥ अथ॒ यत्पञ्च॑ कृ॒त्वो गृ॑ह्णाति । सं॑वत्स॒रसं॑मितो॒ वै य॒ज्ञः
प॒ञ्च वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॒ तं प॒ञ्चभि॑रा॒प्नोति॒ तस्मा॒त्पञ्च॑ कृ॒त्वा गृ॑ह्णात्यथ यद्विष्ण॑-
वे त्वा॒ विष्ण॑वे॒ वेति॒ गृह्णा॑ति विष्ण॑वे॒ हि गृह्णा॑ति यो य॒ज्ञाय॒ गृह्णा॑ति ॥१४॥ न॒-
वकपा॒लः पु॒रोडाशो॑ भवति । शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॒ नवाक्ष॑रा॒ वै गा॑य॒त्र्यष्टौ ता-
नि यान्य॒न्वाह॒ प्रण॑वो नव॒मः पूर्वा॑र्धो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ गायत्री पूर्वा॒र्ध ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ त-
स्मान्न॑वकपा॒लः पु॒रोडाशो॑ भवति ॥१५॥ कार्ष्मर्यम॒याः प॑रि॒धयः॑ । दे॒वा ह॒ वा
ऽए॒तं वन॒स्पति॑षु रा॒ज्ञोऽध्रं॑ ददृशुर्यत्कार्ष्म॒र्य॑ शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॒ नेद्रक्षो॒ य॒ज्ञस्य॑
नाष्ट्रा॒ रक्षाँ॑सि हि॒न्सन्निति॒ तस्मा॒त्कार्ष्म॑र्यम॒याः प॑रि॒धयो॑ भवन्ति ॥१६॥ आ॒श्व-
वा॒लः प्र॑स्त॒रः । य॒ज्ञो ह॒ दे॒वेभ्यो॒ऽपच॑क्राम सो॒ऽश्वो भू॒त्वा परा॑ङाववर्त्त॒ तस्य॑ दे॒वा
अनु॒हाय॒ वालान॑भिपेदु॒स्ताना॑लुलुपु॒स्ताना॑लुप्य॒ सार्द्धं॒ संन्या॑सुस्तत एता ओष॑ध-
यः स॒मभव॒न्यद॑श्ववा॒लाः शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॑ जघनार्धो॒ वाला॑ उभ॒यत ए॒वैतद्य॒-
ज्ञं परि॑गृह्णाति॒ यदा॑श्ववा॒लः प्र॑स्त॒रो भव॑ति ॥१७॥ ऐक्षव्यौ॑ विधृती । नेद्रक्ष॑श्श्व
प्रस्त॒रञ्च॒ संल्लु॑भ्या॒त इत्य॑थो॒त्पूया॑ऽथ॒ सर्वा॑ण्ये॒व चतु॑र्गृहीता॒न्याज्या॑नि गृह्णाति॒ न
ह्यत्रा॑नुया॒जा भव॑न्ति ॥१८॥ आ॒साद्य॑ ह॒वीँष्य॒ग्निं म॑न्थति । शिरो॒ वै य॒ज्ञस्याति॑-
थ्यं॑ जनय॒न्ति वाऽए॒नमेतद्यन्म॒न्थन्ति॑ शीर्ष॒तो वाऽअ॒ग्ने जा॒यमा॑नो जायते शीर्ष॒त
ए॒वैतद॒ग्रे य॒ज्ञं ज॑नयत्य॒ग्निर्वे सर्वा॑ दे॒वता॑ अ॒ग्नौ हि सर्वा॑भ्यो दे॒वता॑भ्यो जुह्व॑ति
शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यं॑ शीर्ष॒त ए॒वैतद्य॒ज्ञꣳ सर्वा॑भिर्देव॒ताभिः॑ समर्धयति॒ तस्मा॑द॒ग्निं
म॑न्थति ॥१९॥ सो॒ऽधिमन्थनꣳ॑ शकल॒माद॑त्ते । अ॒ग्नेर्ज॒नित्र॑मसी॒त्यत्र॒ ह्य॒ग्निर्जा॑यते

कां० ३, अ० ४, ब्रा० १, कं० ११-२० शतपथब्राह्मण / ३६७
विष्णु के लिए।" यह उस (सोम) का भाग है। जैसे राजा का भाग अलग होता है, इसी प्रकार
छन्दों से अतिरिक्त यह सोम का भाग है ॥११॥
"श्येनाय त्वा सोमभृते विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१) – "तुझे सोम लानेवाले श्येन के लिए।
तुझे विष्णु के लिए।" इस प्रकार गायत्री का भाग देता है, क्योंकि गायत्री श्येन होकर द्यौलोक
से सोम लाई। इसलिए गायत्री को सोम लानेवाला 'श्येन' कहते हैं। इस पराक्रम के लिए
उसको दूसरा भाग देता है ॥१२॥
"अग्नये त्वा रायस्पोषदे विष्णवे त्वा" (यजु० ५।२) - "अग्नि के लिए तुझको, धन और
पुष्टि के देनेवाले के लिए तुझको, विष्णु के लिए तुझको।" 'रायस्पोष' से यहाँ पशु से तात्पर्य है।
पशु जगती हैं। इस प्रकार जगती का भाग देता है ॥१३॥
पंचगुना इसलिये लेता है कि यज्ञ संवत्सर के तुल्य है। संवत्सर में ऋतुएँ पांच होती
हैं। संवत्सर के पाँच भाग हैं। इसलिए वह पंचगुना लेता है। 'विष्णु के लिए तुझको, विष्णु के
लिए तुझको' यह कहकर वह सामग्री इसलिए लेता है कि जो चीज यज्ञ के लिए ली जाती है वह
विष्णु के लिए ही ली जाती है ॥१४॥
पुरोडाश के नौ कपाल होते हैं। आतिथ्य यज्ञ का शिर है। गायत्री में नौ अक्षर होते
हैं। आठ तो वे हैं जो पढ़े जाते हैं और नवाँ प्रणव (ओ३म्) है। गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है।
पुरोडाश भी यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए उसमें नौ कपाल होते हैं ॥१५॥
परिधि की समिधाएँ कार्ष्मर्य लकड़ी की होती हैं। देवताओं ने अनुभव किया कि वृक्षों
में यह वृक्ष राक्षसों का घातक है। आतिथ्य यज्ञ का सिर है। परिधियां कार्ष्मर्य की इसलिये होती
हैं कि राक्षस यज्ञ के सिर को हानि न पहुँचा सकें ॥१६॥
प्रस्तर आश्ववाल घास का होता है। एक बार यज्ञ देवताओं के पास से भाग गया। वह
घोड़ा बनकर भाग गया। देवों ने उसका पीछा किया और पूँछ के बाल तोड़ डाले, और उनको
तोड़कर एक जगह फेंक दिया। उसकी अश्वबाल घास उग खड़ी हुई। आतिथ्य यज्ञ का सिर है
और पूँछ के बाल पिछला भाग होते हैं। इस प्रकार अश्वबाल का प्रस्तर होने से वह यज्ञ को दोनों
ओर से घेर लेता है ॥१७॥
विधृतियाँ (बर्हि के ऊपर रखने के डंठल) गन्ने की होती हैं जिससे बर्हि और प्रस्तर
मिल न जायें। घी को शुद्ध करके सब-का-सब चार भागों में ले लेवे, क्योंकि इसमें अनुयाज नहीं
होते ॥१८॥
हवियों को रखकर अग्नि का मंथन करता है। आतिथ्य यज्ञ का शिर है। अग्नि के मन्थन
का अर्थ यह है कि यज्ञ को उत्पन्न किया जाय। जब बच्चा उत्पन्न होता है तो सिर की ओर से
उत्पन्न होता है, इस प्रकार वह यज्ञ को सिर की ओर से उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त
अग्नि 'सब देवता' के अर्थ में आता है; अग्नि में सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है।
'आतिथ्य यज्ञ का सिर है' इस प्रकार सब देवताओं के द्वारा वह यज्ञ को सिर अर्थात् आरम्भ से
ही बढ़ाता है। इसलिये अग्नि का मंथन करता है ॥१९॥
अब अधिमंथन शकल को लेता है। (अधिमंथन शकल एक लकड़ी का टुकड़ा होता है
जो अधरारणि के ऊपर रक्खा जाता है।) इस मन्त्र से- "अग्नेर्जनित्रमसि" (यजु० ५।२) -
"तू अग्नि का जन्म-स्थान है।" क्योंकि यहीं तो अग्नि उत्पन्न की जाती है। इसलिए कहा कि 'तू

अध्याय-४, ब्राह्मण-२

३६८ शतपथ ब्राह्मण
त॒स्मादाहा॒ग्नेर्जनि॑त्रमसीति ॥ २०॥ अथ दर्भतरु॒णके निद॑धाति । वृष॑णौ स्थ इति
त॒द्या॒वे॒वेमौ॒ स्त्रि॒यै साक॑ञ्जावे॒तावे॒वैतौ ॥ २१॥ अ॒थाध॑रारणिं॒ निद॑धाति । उ॒र्वश्य॑-
सीत्यथो॑त्त॒रार॑ण्याड्यवि॒लाप॑नीमुप॒स्पृश॑त्यायुर॒सीति॒ ताम॒भिनिद॑धाति पुरूरु॑वा अ-
सीत्यु॑र्वशी वाऽअप्स॒राः पुरूरु॑वाः पति॒रथ॒ यत्त॑स्मान्मिथु॒नादजायत॒ तदायु॑रे॒वमे॒वैष
ए॒तस्मान्मिथु॒नाद्य॒ज्ञं ज॑नयत्यथा॒ाग्नये मथ्य॑मानायानुब्रूहीति॑ ॥ २२॥ स मन्थति ।
गायत्रेण वा॒ छन्द॑सा मन्थामि॒ त्रैष्टु॑भेन वा॒ छन्द॑सा मन्थामि॒ जाग॑तेन वा॒ छन्द॑सा
मन्

कां० ३, अ० ४, ब्रा० १-२, कं० २०-२६ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३६६
अग्नि का जन्म-स्थान है' ॥२०॥
अब वह दो दर्भ के डंठल रखता है, यह मन्त्र पढ़कर- "वृषणौ स्थ" (यजु० ५।२) -
"तुम नर हो।" यहाँ ये इसी प्रकार हैं जैसे किसी स्त्री के दो बच्चे एक-साथ उत्पन्न हुए
हों ॥२१॥
अब वह अधरारणि (नीचे की लकड़ी) को रखता है यह मन्त्र पढ़कर- "उर्वश्यसि"
(यजु० ५।२)-"तू उर्वशी है।" अब वह घी की थाली को उत्तरारणि (ऊपर की लकड़ी) से
छूता है, यह मन्त्र कहकर - "आयुरसि" (यजु० ५।२) - "तू आयु है।" और उसको (अधरारणि
के ऊपर) रख देता है यह कहकर - "पुरूरवाऽसि" (यजु० ५।२) - "तू पुरूरवा है।" उर्वशी
अप्सरा थी और 'पुरूरवा' उसका पति था, और उनके जोड़े से जो लड़का उत्पन्न हुआ वह
'आयु' था। इसी प्रकार वह यज्ञ को जोड़े से उत्पन्न करता है। अब वह (होता से) कहता है कि
मथी जानेवाली आग से प्रार्थना कर ॥२२॥
अब वह आग का मंथन करता है यह पढ़कर- "गायत्रेण त्वा छन्दसा मन्थानि त्रैष्टुभेन
त्वा छन्दसा मन्थानि जागतेन त्वा छन्दसा मन्थानि' (यजु० ५।२)--"तुझे गायत्री छन्द से मथता
हूँ, त्रिष्टुभ् छन्द से मथता हूँ, जगती छन्द से मथता हूँ।" अग्नि को छन्दों से मथता है, या मथ
जाती हुई अग्नि के लिए मन्त्र पढ़ता है। इस प्रकार वह छन्दों को यज्ञ से संयुक्त कर देता है जैसे
किरणें उस सूर्य से संयुक्त होती हैं। फिर कहता है 'इस उत्पन्न हुए के लिए मन्त्र पढ़ो।' जब
उसको 'आहवनीय' पर डालता है तो कहता है, 'डाले हुए के लिए मन्त्र पढ़ो' ॥२३॥
वह अग्नि को इस मन्त्र से (वेदी में) डालता है - "भवतं नः समनसौ सचेतसावरेपसौ।
सा यज्ञ॒ꣳ हि॒ꣳसिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः" यजु० ५।३)- "हमारे लिए तुम
एक मनवाली, एक बुद्धिवाली और पापरहित हो जाओ। यज्ञ को हानि न पहुँचाओ। यज्ञपति को
हानि न पहुँचाओ। हे दोनों जातवेद अग्नियो ! आज हमारे लिए कल्याणकारी हो जाओ।"
दोनों की शान्ति के लिए वह ऐसा कहता है जिससे एक-दूसरे को हानि न पहुँचा सकें ॥२४॥
अब स्रुवा से घी लेकर इस मन्त्र से अग्नि में छोड़ता है - "अग्नावग्निश्चरति प्रविष्टऽ-
ऋषीणां पुत्रोऽअभिशस्तिपावा। स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्यं॒ सदमप्रयुच्छन्त्स्वाहा"
(यजु० ५।४)-"ऋषियों का पुत्र पाप से बचानेवाले अग्नि (आहवनीय अग्नि) में प्रविष्ट होकर
चलता है। वह अग्नि हमारे लिए सुखकर होकर अच्छे प्रकार यज्ञ करे, देवताओं के लिए हवि
को कभी वंचित न करते हुए।" आहुति के लिए अग्नि को उत्पन्न किया और आहुति से ही
उसको प्रसन्न किया। इसलिए उसमें यह आहुति देता है ॥२५॥
अन्त में इसमें इडा आती है। इसके पीछे अनुयाज नहीं होते। आतिथ्य यज्ञ का सिर है।
सिर पूर्वार्ध होता है। उसको यज्ञ का पूर्वार्द्ध करके संस्कृत करता है। यदि वह अनुयाज को करता
तो सिर की जगह पैर कर देता। इसलिए अन्त में इडा आती है और अनुयाज नहीं होता ॥२६॥
अध्याय ४ - ब्राह्मण २
जब देवताओं ने आतिथ्य कर लिया तो उनमें झगड़ा हो गया। वे चार भागों में बँट गये
और एक-दूसरे की महत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। कहते हैं कि अग्नि वसुओं के साथ हुआ,
सोम रुद्रों के, वरुण आदित्यों के, इन्द्र मरुतों के और बृहस्पति विश्वेदेवों के, परन्तु ये जो चार
भागों में बँटे वे 'विश्वेदेव' ही थे। जब वे अलग-अलग हो गये तो असुर राक्षस उनके बीच में
आ घुसे ॥१॥
उनको मालूम हो गया- 'अरे हम पापी हो गये, असुर राक्षस हमारे बीच में आ घुसे हैं,
शत्रु अवश्य हमको विध्वंस कर देंगे' आओ, हम अपने में से एक की महत्ता स्वीकार कर लें!' तब

४०० शतपथ ब्राह्मण
॒ऽरिति त॒ऽइन्द्र॑स्य श्रि॒याऽश्र॑तिष्ठन्त॒ तस्मा॑दा॒हुरिन्द्र॑ः सर्वा॒ देवता॒ इन्द्र॑ज्येष्ठा दे॒वा
इति ॥२॥ त॒स्मादु॑ ह॒ न स्वा॒ ऋती॑येरन् । य॒ एषां॑ पर॒स्तरा॑मिव॒ भव॑ति॒ स ए॑-
नाननु॒व्य॑वेति॒ ते प्रि॒यं द्वि॑षतां कुर्वन्ति द्वि॒षद्भ्यो॑ रध्यन्ति॒ तस्मा॒न्नऽती॑येर॒न्स यो
है॒वं वि॒द्वान्नऽती॒यिते॒ऽप्रियं॑ द्विष॒तां क॑रोति॒ न द्वि॒षद्भ्यो॑ रध्यति॒ तस्मा॒न्नऽती॑यित
॥३॥ ते॒ होचु॑ः । ह॒न्तेदं॒ तथा॑ क॒रवाम॒है यथा॑ न इ॒दमाप्र॒दिव॑मे॒वाऽन॑र्यमस॒दिति॑
॥४॥ ॥ शतम् १७०० ॥ ॥ ते दे॒वाः । जुष्टा॑स्त॒नूः प्रि॒याणि॒ धामा॑नि सा॒र्धं सम॑व-
ददिरे॒ ते हो॑चुरे॒

कां० ३, अ० ४, ब्रा० २; कं० २-१० शतपथब्राह्मण / ४०१
उन्होंने इन्द्र की श्रेष्ठता मान ली, इसलिए इन्द्र ही सर्व-देवता है। इन्द्र ही को देवों ने श्रेष्ठ माना
है ॥२॥
इसलिए आपस में झगड़ना नहीं चाहिए। क्योंकि इनका कोई (शत्रु) दूर भी होता है
तो इनमें घुस आता है, और शत्रु को जो प्रिय होता है वे उसी को करने लगते हैं, और शत्रु
उनका विध्वंस कर देता है। इसलिए झगड़ा नहीं करना चाहिए। जिसको इसका ज्ञान है वह
झगड़ता नहीं और वही करता है जो शत्रु को अप्रिय होता है, और शत्रु उसका नाश नहीं कर
सकता; इसलिए झगड़ा नहीं करना चाहिए ॥३॥
तब उन्होंने कहा कि ऐसी बात करनी चाहिए कि यह हमारी मैत्री अजर-अमर हो जाय
और कभी नष्ट न हो ॥४॥ [शतम् १७००]
उन दोनों ने अपने प्रिय शरीरों और धामों को एकत्र कर लिया अर्थात् अपनी शक्तियों
को संयुक्त किया और कहने लगे कि हमारी इस सन्धि का हममें से जो कोई उल्लङ्घन करेगा
वही नाश को प्राप्त हो जायेगा। इसका उपद्रष्टा (गवाह) कौन है? 'बलवान् तनून्पात् ।'
यह जो बहता है अर्थात् वायु, वही बलवान् तनून्पात् है। यही प्रजाओं का उपद्रष्टा (गवाह) है
क्योंकि यह प्राण और उदान होकर घुसता है ॥५॥
इसीलिए कहा है- 'देव मनुष्यों के मन की बात जानते हैं।' जो संकल्प मन में उठता
है वह प्राण तक आता है, प्राण से वायु तक, वायु देवताओं को बता देता है कि मनुष्य के मन
में क्या है ॥६॥
यही बात है जो ऋषि ने कही थी-'जो मन में संकल्प होता है वह वायु को पहुँच जाता
है, वायु देवताओं से कह देता है कि इस पुरुष के मन में यह है।' (प्रतीत होता है कि यहाँ वायु
का अर्थ है वात-संस्थान या Nervous System और देवों का इन्द्रियाँ। मन के संकल्प
Nervous System के द्वारा इन्द्रियों तक आते हैं यह एक स्पष्ट बात है) ॥७॥
देवों ने अपने प्यारे शरीरों और धामों को (शक्तियों को) एकत्र कर लिया और उन्होंने
कहा कि हममें से जो इस सन्धि का उल्लङ्घन करेगा वह हममें से निकल जायगा और उसका
नाश हो जायगा। और अब भी देव इसका उल्लङ्घन नहीं करते। क्योंकि अगर वे उसका
उल्लङ्घन करें तो उनकी क्या दशा हो ! वे झूठे पड़ जायें। देव एक ही व्रत पर चलते हैं, वह
है सत्य। इसी से उनकी विजय होती है और कोई उनको जीत नहीं सकता। जो इस रहस्य को
जानकर सत्य बोलता है उसकी जीत होती है, उसको कोई पराजित नहीं कर सकता। अब
तनूनप्त्र यही व्रत है ॥८॥
देवों ने अपने प्यारे शरीर और धामों (शक्तियों) को संयुक्त कर लिया। घी की
आहुतियों को ग्रहण करके ही वे अपने शरीरों और धामों को संयुक्त करते हैं। ऐसा न चाहिए
कि हर किसी के साथ अपनी शक्तियाँ जोड़ दी जायें, क्योंकि दूसरे का उन पर साझा हो जाता
है। परन्तु जिसके साथ सन्धि करे उसका उल्लङ्घन न करे, क्योंकि कहा है कि 'जिसके साथ
तनून्पात् सन्धि हो जाय उसके साथ द्रोह न करना चाहिए' ॥९॥
अब पहले इस मन्त्र से आज्य ग्रहण करता है- "आपतये त्वा परिपतये गृह्णामि” (यजु०
५।५)- "मैं तुझको उसके लिए लेता हूँ जो आगे को बहता है, जो चारों ओर बहता है
(अर्थात् वायु) ।" यह जो बहनेवाला वायु है वही 'आपतित' और 'परिपतित' अर्थात् आगे को

अध्याय-४, ब्राह्मण-३

४०२ शतपथ ब्राह्मण
तत्त्वे॒तस्मा॑ऽउ हि गृह्णा॑ति॒ तस्मा॑दाहा॒पत॑ये त्वा॒ परि॑पतये गृह्णामीति ॥१०॥ त॒नू-
नप्त्रे॑ शाक्व॒रेति॑ । यो वाऽअ॒यं पव॑तऽए॒ष तनू॒नप्ता शाक्व॑र॒ ए॒तस्मा॑ऽउ हि गृ॒-
ह्णाति॒ तस्मा॑दाह त॒नूनप्त्रे॑ शाक्व॒रेति॑ ॥११॥ शक्वान॒ऽओजि॑ष्ठायेति॑ । ए॒ष वै
शक्वो॑जि॒ष्ठ ए॒तस्मा॑ऽउ हि गृह्णा॑ति॒ तस्मा॑दाह शक्वान॒ऽओजि॑ष्ठायेति॑ ॥१२॥ अथा॑-
तः सम॑वमृशन्त्येव॑ । ए॒तद् देवा भूयः॒ समा॑मिर॒ऽइत्थं नः सोऽमु॒थास॒द्यो न ए॒त-
द॑तिक्रामा॒दिति॒ तथोऽए॒वैत॒ऽएतत्स॑ममन्त॒ऽइत्थं नः सोऽमु॒थास॒द्यो न ए॒तद॑तिक्रा-
मा॒दिति॑ ॥१३॥ ते सम॑वमृशन्ति । अना॑धृष्टमस्यनाधृ॒ष्यं दे॒वाना॒मोज॑ इत्यनाधृ॒ष्टा
हि दे॒वा आस॒न्नना॑धृष्याः सह॒ सत्तः समा॑नं वदन्तः समा॑नं दधाना दे॒वाना॒मोज॒
इति दे॒वानां वै जुष्टास्तन्वः॑ प्रि॒याणि॒ धामा॑न्यनभिशस्त्यभिशस्तिपा अनभिशस्ते-
न्य॒मिति॒ सर्वा॑ऽउ हि दे॒वा अ॑भिशस्तीं स्ती॒र्णा अ॑ञ्जसा स॒त्यमु॑पगेष॒मिति स॒त्यं वदा-
नि॒ मेद॒मतिक्र॑मिष॒मित्ये॑वैत॒दाह॒ स्वि॒ते मा धा॒ इति॑ स्वि॒ते हि तद्दे॒वा आ॒त्मान-
मद॑धत य॒त्सत्य॑मवद॒न्यत्स॒त्यम॑कुर्वं॒स्तस्मा॑दाह स्वि॒ते मा धा॒ इति॑ ॥१४॥ अथ या-
स्तद्दे॒वाः । जु॒ष्टास्त॒नूः प्रि॒याणि॒ धामा॑नि सार्धं॒ सम॑वददिरे॒ तद्दि॒न्द्रे संन्य॑दध॒तैष
वाऽइ॒न्द्रो य ए॒ष तप॑ति॒ न ह वाऽए॒षोऽग्रे॑ तताप॒ यथा॒ हैवे॒दमन्य॒त्कृष्ण॑मेव॒ꣳ
हैवा॑स तेनै॒वैतद्वीर्ये॑ण तपति॒ तस्मा॑द्यदि ब॒ह्वो दी॒क्षेरन्गृहपतयऽएव व्रतमभ्यु-
त्सिच्य॑ प्रयच्छेयुः स हि तेषामिन्द्रभाजनं भवति॒ यद्यु दक्षिणावता दी॒क्षेत यज॑मा-
नायै॒व व्रतम॒भ्युत्सिच्य॑ प्रय॒च्छेयु॒रिद॒ꣳ ह्यङ्ग॒रिन्द्रो॑ यज॑मान॒ इति॑ ॥१५॥ अथ या-
स्तद्दे॒वाः । जुष्टा॑स्त॒नूः प्रि॒याणि॒ धामा॑नि सार्धं॒ सम॑वददिरे॒ तत्सार्धं॒ संन॑प्त्रे तत्सा-
मभवत्तस्मादाहुः स॒त्यꣳ साम दे॒वꣳ सामेति॑ ॥१६॥ ब्राह्मणम् ॥३ [४. २]॥ ॥
आतिथ्येन॒ वै दे॒वा इ॒ष्ट्वा । तात्त्समद॑विन्दन्त तानून॒त्रैः सम॑शाम्यं॒स्तऽए॒तस्य॑
प्राय॑श्चित्तिमीह॒न्यदन्योऽन्यं॑ पापमवद॒न्नाह पुरा॑वभृथा॒त्तु दी॒क्षामवा॒कल्प॑यं॒स्तऽए-
तामवा॑न्तरां दी॒क्षाम॑पश्यन् ॥१॥ ते॒ऽग्निनैव त्वचं विपु॑ल्याऽङ्कयत । तपो॒ वाऽअ-

कां० ३, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १०-१६ व १-२ शतपथब्राह्मण / ४०३
चलता है, चारों ओर चलता है। इसीलिए कहा कि 'आपतये त्वा' आदि ॥१०॥
“तनूनप्त्रे शाक्वराय” (यजु० ५।५)-“बलवान् तनूनप्तृ के लिए।” 'तनूनप्तृ शाक्वर'
से तात्पर्य है वायु। यह आज्य उसी के लिए ग्रहण करता है, इसलिए कहा 'तनूनप्त्रे' इति ॥११॥
“शक्वनेऽओजिष्ठाय” (यजु० ५।५)-“शक्तिवाले और ओज के लिए।” वस्तुतः वही
(वायु) शक्तिवाला और ओजवाला है। उसी के लिए वह ग्रहण करता है, इसलिए कहता है-
'शक्वने' इति ॥१२॥
अब वे इसको छूते हैं। देवतागण इस बात पर एकमत हो गये थे कि जो हममें से इसका
उल्लङ्घन करेगा उसकी यह गति होगी। इसी प्रकार यह होता और यजमान भी इस बात पर
एकमत हो जाते हैं कि जो कोई हममें से इसका उल्लङ्घन करेगा उसकी ऐसी गति होगी ॥१३॥
वे इस मन्त्र को बोलकर छूते हैं-“अनाधृष्ट मस्यनाधृष्यं देवानामोजः” (यजु० ५।५)-
“तू अजेय है (कोई तुझको जीत नहीं सकता) क्योंकि देवताओं का ओज अजेय होता है।”
क्योंकि देवता-गण जब एक मिलकर बोलते और एक-साथ रहते हैं तो अजेय होते हैं, कोई उन-
पर आक्रमण नहीं कर सकता। 'देवों के ओज' का अर्थ है उनके प्यारे शरीर और धाम अर्थात्
शक्तियाँ। अब कहा-“अनभिशस्त्यभिशस्तिपा ऽअनभिशस्तेन्यम्” (यजु० ५।५)-“जिन पर
शाप नहीं लगा, जो शाप से रक्षा करते हैं और जिनपर शाप नहीं लग सकता।” क्योंकि सब देव
शाप को पार कर जाते हैं। “अञ्जसा सत्यमुपगेषम्” (यजु० ५।५)-“सीधा सच को प्राप्त हो
जाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि सत्य ही बोलूँ और व्रत का उल्लङ्घन न करूँ। अब कहा-“स्वित्ते
मा धाः” (यजु० ५।५)-“मुझे कल्याण में स्थापित कर।” क्योंकि निश्चय ही देवों ने अपने को
कल्याण में स्थापित किया जब उन्होंने सत्य बोला और जो सत्य था उसी को किया। इसीलिए
कहा-‘स्वित्ते मा धाः’ ॥१४॥
देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों को इकट्ठा किया था उनको उन्होंने इन्द्र में स्थापित
कर दिया। निश्चय करके इन्द्र वही है जो वह तपता है. (अर्थात् सूर्य)। यह पहले तपता
(चमकता) नहीं था। यह ऐसा ही काला (अन्धकारमय) था जैसे अन्य सब। यह वही (देवों
का दिया हुआ) पराक्रम है जिससे वह चमकता है। इसलिए यदि बहुत-से दीक्षित होते हों तो
इस (तानूनप्त्र आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को ही देना चाहिए, क्योंकि गृहपति ही इन्द्र
के तुल्य है; और यदि दक्षिणा के साथ दीक्षा हो तो इस (आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को
ही देना चाहिए क्योंकि कहा भी है कि 'यजमान ही इन्द्र है' ॥१५॥
देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों (शक्तियों) को इकट्ठा किया वह सब मिलाया
गया और वह साम हो गया। इसीलिए कहा है 'साम सत्य है, साम देवज (देवों से उत्पन्न हुआ)
है' ॥१६॥
अध्याय ४-ब्राह्मण ३
जब देव आतिथ्य-इष्टि कर चुके तो उनमें झगड़ा हो गया। इसको उन्होंने तानूनप्त्र
द्वारा शान्त किया और इच्छा करने लगे कि यह जो हमने एक-दूसरे की बुराई की है, उसका
प्रायश्चित्त होना चाहिए। अवभृथ स्नान से पहले उन्होंने कोई और प्रायश्चित्त रखा नहीं था।
इसलिए उन्होंने अवान्तरा-दीक्षा निकाली ॥१॥
अग्नि के द्वारा उन्होंने त्वचा से शरीर को ढक लिया। अग्नि का अर्थ है 'तप' और दीक्षा

४०४ शतपथ ब्राह्मण
ग्निस्त॒पो दी॒क्षा त॒दवान्तरां दी॒क्षामुपायंस्तद्यदवान्तरां दी॒क्षामुपायंस्तस्मादवान्तरदी-
क्षा संतरा॒मङ्गुलीराचन्त संतरां मेखलां पर्य॒स्तामेवैनामेतत्सतं पर्य॒स्यन्त तथो
ऽहैवैष एतद्यद॒तः प्राचीनमव्र॒त्यं वा करोत्यव्र॒त्यं वा वद॑ति तस्यै॒वैतत्प्रायश्चित्तिं
कुरुते ॥२॥ सोऽग्निनेव॒ त्वचं विपल्या॒ङ्ग्यते । तपो वाऽअ॒ग्निस्तपो दी॒क्षा त॒दवा-
न्तरां दी॒क्षामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संतरां मेखलां पर्य॒स्तामेवैनामेतत्सतं पर्य्-
स्यते प्र॒जाम् हैव तद्देवा उपा॑यन् ॥३॥ तेऽग्निनेव त्वच॒ विपल्या॒ङ्ग्यन्त । अ॒ग्निर्वै
मिथुन॒स्य क॒र्ता प्रजनयिता तत्प्र॒जामुपायंत्संतरा॒मङ्गुलीराचन्त संतरां मेखलां तत्प्र-
जामात्म॑न्नकुर्वत तथोऽहैवैष एतत्प्र॒जामेवो॑पैति ॥४॥ सोऽग्निनेव॒ त्वचं विपल्य-
ङ्ग्यते । अ॒ग्निर्वै मिथुनस्य कर्ता प्रजनयिता तत्प्र॒जामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संत-
रां मेखलां तत्प्र॒जामात्मन्कुरुते ॥५॥ दे॒वानाम् ह स्म दीक्षितानाम् । यः समि-
न्धारो वा स्वाध्यायं वा विमृ॒जते त॒द्ध स्मैतरस्यैवेतरꣳ रूपेणेतरस्येतरमसुररक्ष-
सानि जिघाꣳसन्ति ते ह पापं वदत उपसमे॑युरिति वै मां त्वम॒चिकीर्षीरिति मा-
जिघाꣳसीरित्यग्नि॒र्हैव तथा नान्यमुवादाग्नि॑स्तथा नान्यः ॥६॥ ते होचुः । अ॒पीत्थं
त्वाम॒ग्नेऽवादिषू॒रिति नैवा॒हमन्यं न मामन्य इति ॥७॥ तेऽविदुः । अ॒यं वै नो
वि॒रक्षस्तमोऽ॒ग्न्येव रूपम॑साम॒ तेन रक्षाꣳस्यतिमोक्ष्यामहे तेन स्वर्गं लोकꣳ सम-
श्रविष्यामह॒ऽइति तेऽग्ने॒रेव रूपम॑भवंस्तेन रक्षाꣳस्यत्य॑मुच्यन्त तेन स्वर्गं लोकꣳ
समाश्रुवत तथोऽहैवैष एतदग्ने॒रेव रूपं भवति तेन रक्षाꣳस्यतिमुच्यते तेन स्वर्गं
लोकꣳ समश्नुते स वै समिधमेवाभ्यादधदवान्तरदीक्षामुपैति ॥८॥ स समिधमभ्या-
दधाति । अग्ने व्रतपा॒स्त्वे व्रतपा इत्य॒ग्निर्हि दे॒वानां व्रतपतिस्तस्मादाहाग्ने व्रतपा-
स्त्वे व्रतपा॒ इति या तव तनूरियꣳ सा मयि यो मम तनू॒रेषा सा त्वयि । सह
नौ व्रतपते व्रतानीति तद॒ग्निना त्वचं विपल्या॒ङ्ग्यतेऽनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्य-
तामनु तप॒स्तप॑स्पतिरिति त॒दवान्तरां दीक्षामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संतरां मे-

का० ३, अ० ४, ब्रा० ३, कं० २-६ शतपथब्राह्मण / ४०५
'तप' है। इस प्रकार उन्होंने अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त किया; और चूंकि अवान्तरा-दीक्षा
को प्राप्त किया इसलिये अवान्तरा-दीक्षा की जाती है। उन्होंने अँगुलियों को कड़ा करके मोड़
लिया (मुट्ठी बाँध ली) और मेखला को कस लिया, जैसा कि पहले था। इसी प्रकार वह भी
प्रायश्चित्त करता है, उस सबके लिए जो व्रत के विरुद्ध उसने किया हो या कहा हो ॥२॥
उन्होंने अग्नि के द्वारा त्वचा को शरीर के चारों ओर लपेटा। अग्नि तप है। दीक्षा तप
है। इस प्रकार वह अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त करता है। अँगुलियों को भीतर की ओर मोड़ता है
और मेखला को कसता है जैसे पहले था। देवों ने इसके द्वारा प्रजा की प्राप्ति की थी ॥३॥
अग्नि के द्वारा उन्होंने शरीर पर त्वचा लपेटी। अग्नि मिथुन (जोड़े) का कर्त्ता या
जनक है। इससे उनको सन्तान की प्राप्ति हुई। उन्होंने अपनी मुट्ठी बाँध ली और मेखला कस
ली और अपने लिए सन्तान उत्पन्न की। इसी प्रकार यजमान भी सन्तान की प्राप्ति करता
है ॥४॥
अग्नि के द्वारा वह त्वचा को शरीर पर लपेटता है। अग्नि मिथुन (स्त्री-पुरुष के प्रसंग)
का कर्त्ता और जाननेवाला है। वह मुट्ठी को बाँधता और मेखला को कसता है। इस प्रकार
सन्तान को प्राप्त करता है ॥५॥
जब देव दीक्षित हो गये तो उनमें जो कोई समिधा लाता या स्वाध्याय का मन्त्र पढ़ता
उसका ही वह-वह रूप धारण करके असुर राक्षस उसको मारते। और देवता-गण आपस में कहते
कि तुमने मेरा अहित किया, तुमने मुझे मारा। केवल अग्नि ने किसी से ऐसा नहीं कहा, न किसी
ने अग्नि से कहा ॥६॥
उन्होंने पूछा—'हे अग्नि, क्या तुझसे भी उन्होंने ऐसा कहा ?' उसने उत्तर दिया कि 'न
मैंने किसी से ऐसा कहा, न किसी ने मुझसे ऐसा कहा' ॥७॥
उन्होंने जान लिया कि यही हमारे बीच में ऐसा है जो राक्षसों को मार सकता है। हमको
इसी का रूप धारण करना चाहिए। इससे हम राक्षसों से बच सकेंगे और स्वर्ग को प्राप्त कर
सकेंगे। उन्होंने अग्नि का रूप धारण कर लिया और राक्षसों से बच गये और स्वर्ग प्राप्त कर
लिया। इसी प्रकार यह भी अग्नि का रूप धारण करता, राक्षसों से बचता और स्वर्ग की प्राप्ति
करता है। वह समिधा को (आहवनीय अग्नि पर) रखकर अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त करता
है ॥८॥
वह यह मन्त्र पढ़कर समिधा रखता है—"अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाः” (यजु० ५।६)—"हे
अग्नि, व्रत के पालनेवाले, तुझ पर, हे व्रत के पालनेवाले !" अग्नि देवों का व्रतपति है, इसलिए
कहा—"अग्ने व्रतपा' इत्यादि। "या तव तनूरियं सा मयि यो मम तनूरेषा सा त्वयि । सह नौ
व्रतपते व्रतानि" (यजु० ५।६)—"जो तेरा शरीर है, वह मेरा हो। जो मेरा शरीर है, वह तेरा
हो। हे व्रतपते ! हम दोनों के व्रत एक-से हों।" इस प्रकार वह अग्नि के द्वारा अपने को त्वचा से
ढकता है। "अनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्पतिः" (यजु० ५।६)—"दीक्षा-पति मेरी
दीक्षा को स्वीकार करे और तप का पति मेरे तप को स्वीकार करे।" इस प्रकार वह अवान्तरा-

!
Yes! 'यै' + 'क' = 'यैक' (looks like 'धिक' because the top matras of 'यै' combine with 'क').
And before that: 'ꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रायैकधनविदऽइतीन्द्रो वै य-'!
Wait, in line 21, let's transcribe exactly what is printed:
It has: "तदस्याꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रायैकधनविदऽइतीन्द्रो वै य-"
Wait, does it have double underline under 'तदस्या'?
Under 'तदस्या': there is an anudatta under 'स्या': "तदस्या॒"? No, under 'स्या' there is an underline (anudatta). Under 'ꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रा' there is an anudatta under 'न्द्रा': 'न्द्रा॒'!
Under 'यक' there is double horizontal line (pluta / svarita / anudatta): 'यै॒'?
Under 'वि': 'वि॒'.

Line 22:
ज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रा॒यैत्येकधनविद॒ऽइति शतꣳ-शतं ह स्म वाऽए॒ष दे-
Let's check svaras:
"ज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रा॒

कां० ३, अ० ४, ब्रा० ३, कं० ९-१८ शतपथब्राह्मण / ४०७
दीक्षा को करता है। मुट्ठी को कड़ा बाँधता हैऔर मेखला को कसता है जैसे वह पहले था ॥९॥
अब वे उसका मदन्ती जल (गरम जलों) से सत्कार करते हैं। अग्नि तप है, मदन्ती
जल तप हैं। इसलिए मदन्ती जलों से सत्कार करता है ॥१०॥
मदन्ती जलों को छूकर वे सोम राजा को सम्पुष्ट करते हैं। वे मदन्ती जलों को छूकर
सोम राजा को क्यों सम्पुष्ट करते हैं ? इसलिए कि घी वज्र है और सोम वीर्य। मदन्ती जलों को
छूकर वे सोम राजा को इसलिए सम्पुष्ट करते हैं कि कहीं वज्ररूपी घी से वीर्यरूपी सोम को
हानि न पहुँचे ॥११॥
कुछ लोग कहते हैं कि पहले सोम को सम्पुष्ट करना चाहिए जिसके लिए आतिथ्य किया
जाता है, फिर अवान्तर दीक्षा, फिर तानूनप्त्र। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। यज्ञ का कर्म
ऐसा ही था। उसमें झगड़ा हो गया। पहले पुरानी शान्ति मिली, फिर अवान्तरा दीक्षा, फिर
सम्पुष्टि ॥१२॥
वे उसकी सम्पुष्टि क्यों करते हैं ? सोम देव है। सोम द्यौलोक में है। सोम वृत्र था। जो
पहाड़ और पत्थर थे, वे उसके शरीर थे, क्योंकि उसपर उशान औषध उगती है। उद्दालक के
पुत्र श्वेतकेतु ने कहा—'वे इसको लाते और निचोड़ते हैं और दीक्षा, उपसद, तनूनप्त्र और
सम्पुष्टि द्वारा वे इसका सोम बनाते हैं' ॥१३॥
कहते हैं कि यह मक्खियों का शहद है। यज्ञ ही मक्खियों का शहद है; बनानेवाली
मक्खियाँ ऋत्विज हैं। जैसे मक्खियाँ मधु की पुष्टि करती हैं उसी प्रकार ऋत्विज यज्ञ की पुष्टि
करते हैं ॥१४॥
यज्ञ के द्वारा ही देवों ने वह विजय पाई जो उनको प्राप्त है। उन्होंने सोचा कि यह कैसे
हो कि मनुष्य हमारे इस स्थान तक न चढ़ सके ? उन्होंने यज्ञ के रस को इस प्रकार चूस लिया
जैसे शहद की मक्खियाँ शहद को चूस लेती हैं और यज्ञ को यूप के द्वारा बिखेरकर अन्तर्धान हो
गये। यूप को यूप इसलिए कहते हैं कि इसके द्वारा यज्ञ को बिखेरा गया ॥१५॥
ऋषियों ने इसको सुन लिया। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। इसी प्रकार वह भी यज्ञ
को इकट्ठा करता है जो दीक्षित होता है। वाणी ही यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ का जो भाग चूस लिया
गया था उसकी पूर्ति कर देता है ॥१६॥
वे छः होकर [अर्थात् ब्रह्मा, उद्गाता, होता, अध्वर्यु, आग्नीध्र और यजमान] (सोम
की) पुष्टि करते हैं। छः ऋतुएँ बनकर वे इसकी पुष्टि करते हैं ॥१७॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर पुष्टि करते हैं—"अँ॒शुरँ॒शुष्टे देव सोमाप्यायताम्" (यजु०
५।७)—"हे देव सोम, तेरा अंशु-अंशु (प्रत्येक डण्ठल) पुष्ट हो।" ऐसा कहकर वे सोम का प्रत्येक
डंठल पुष्ट करते हैं।" 'इन्द्रायैकधनविदे" (यजु० ५।७)—"एक-धन प्राप्त करनेवाले इन्द्र के
लिए।" (या तो इसका अर्थ यह है कि सोम-मात्र जो धन है उसको लेनेवाला, या उस घड़े का
नाम भी 'एक-धन' है जिसमें सोम मिलाने के लिए जल होता है, उसको प्राप्त करनेवाला)। इन्द्र
ही यज्ञ का देवता है, इसलिए कहा 'एक-धन इन्द्र के लिए।' क्योंकि देवों के प्रति एक-एक डेण्ठल
सौ-सौ या दस-दस 'एक-धन' घोड़ों को भर देता है। "आ तुभ्यमिन्द्रः प्यायताम् त्वमिन्द्राय

अध्याय-४, ब्राह्मण-४

वानप्रत्येकै॒कमे॒वाᳪ॒शुरेक॑धनाना॒माप्या॑यते दश॑-दश वा तुभ्य॒मिन्द्रः॒ प्याय॑ता॒मा त्वमि॒-
न्द्रा॑य प्याय॒स्वेतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ सा यै॒व य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तामे॒वैतदाप्या॑यय-
त्या॒ त्वमिन्द्राय प्याय॒स्वेति॒ तदे॒तस्मिन्नाप्या॑यनं दधात्याप्या॑यया॒स्मान्त्सखी॒न्त्सन्त्या मे॒-
धयेति॒ स यत्स॒नोति॒ तत्तदा॑ह॒ यत्सन्त्ये॑त्यथ॒ यदनु॑ब्रूते॒ तडु॒ तदा॑ह॒ यन्मे॒धयेति स्व॒-
स्ति ते॑ देव सोम सुत्यामशी॒येत्येका॒ वाऽए॒तेषामा॒शीर्भवत्यृत्विजां॑ च॒ यज॑मानस्य
च य॒ज्ञस्योदृचं॑ गहेमेति य॒ज्ञस्योदृचं॑ गछानी॒त्येवैतदा॑ह ॥ १८॥ अथ॒ प्रस्त॑रे॒ निह्व॑-
वते । उ॒त्तरत॒उपचा॑रो॒ वै य॒ज्ञोऽथै॒तद्दक्षिणेनान्वित्याप्या॑ययन्त्य॒भिर्वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञं
पृ॒ष्ठतः कुर्वन्ति॒ तन्मिथ्या॑कुर्वन्ति दे॒वेभ्य॒ आव्र॑श्च्यन्ते य॒ज्ञो वै प्र॒स्तर॒स्तद्य॒ज्ञं पुन॒रार॑-
भन्ते॒ तस्यो॒ हैषा प्राय॑श्चित्तिस्तथो॒ हैषामेतन्मिथ्या॑कृतं भवति॒ न दे॒वेभ्य॒ आव्रि॑-
श्च्यन्ते॒ तस्मा॒त्प्रस्त॑रे॒ निह्व॑वते ॥ १९॥ तदाहुः । ऋ॒क्ते निह्नुवी॒राᳪ॒शनक्ताᳪ॒ऽइत्य॑नृ-
क्ते ह्येव नि॒ह्नुवी॑र॒न्ननु॒प्रकरण॒ᳪ ह्ये॑वा॒क्तस्य॑ ॥ २०॥ ते निह्व॑वते । दृष्टा रायः प्रेषे
भगा॒यऽऋ॒तमृ॑तवा॒दिभ्य॒ इति॑ स॒त्यᳪ॑ सत्यवा॒दिभ्य॒ इत्ये॒वैतदा॑ह नमो॒ द्यावा॑पृथि॒-
वीभ्या॒मिति॒ तदा॑भ्यां॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ नि॒ह्व॑वते ययो॒रिद॒ᳪ सर्व॒मधि॑ ॥ २१॥ अथा-
तृ॒ समु॑ह्य॒ प्रस्त॑रम् । अ॒ग्नीन्म॒द्वत्त्याऽऽहु॑ति॒ मुद॑तीत्य॒ग्नीदाह॒ ताभि॑रे॒हीत्युप॑र्युप॒-
र्य॒ग्निमति॑हरति॒ स यन्नानु॒प्रह॑रत्येतेन॒ ह्येत ऊर्ध्वान्यहानि॑ प्रचरि॒ष्यन्भव॑त्यथ॒ यदु॑-
पर्युप॒र्य्यग्निमति॑हरति॒ तद्देवा॒स्यानु॑प्रहृतभा॒जनं॑ भवति तम॒ग्नीधे प्रय॑छति तम॒ग्नीन्नि॒द-
धाति ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [४. ३.] ॥ ॥
ग्री॒वा वै य॒ज्ञस्योप॒सदः॒ शिरः॑ प्र॒वर्ग्यः॑ । तस्मा॒द्यदि॑ प्र॒वर्ग्यवा॒न्भव॑ति प्र॒वर्ग्ये॑ण
प्र॒चर्या॒थोपसद्भिः॑ प्रचरन्ति॒ तद्ग्री॒वाः प्रति॑दधति ॥ १॥ तद्याः पूर्वा॒ह्नेऽनु॑वा॒क्या भ॑व-
न्ति । ता अ॒परा॒ह्ने या॒ज्या या या॒ज्यास्ता अनु॑वा॒क्यास्तद्व्यति॑षजति॒ तस्मा॑दि॒मानि॑
ग्री॒वाणां॑ प॒र्वाणि॒ व्यति॑षक्तानी॒मान्यस्थी॑नि ॥ २॥ दे॒वाश्च॒ वाऽअ॑सु॒राश्च॑ । उ॒भये॑
प्राजाप॒त्याः पस्पृ॑धिरे॒ ततो॒ऽसुरा ए॒षु लो॒केषु पु॒रश्च॑क्रिरे॒ऽयस्मयी॑मि॒वास्मिँल्लो॒के

का० ३, अ० ४, ब्रा० ३-४; कं० १८-२२ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४०६
ध्यायस्व” (यजु० ५।७)-"इन्द्र तेरे लिए पुष्ट हो और तू इन्द्र के लिए पुष्ट हो।" इन्द्र यज्ञ का
देवता है। इस प्रकार वह इस यज्ञ के देवता की पुष्टि करता है। 'इन्द्र के लिए तू पुष्ट हो' ऐसा
कह उसमें पुष्टि का निर्धारण करता है। "आप्याययास्मान्त्सखीन्त्सन्ध्या मेधया" (यजु० ५।७)-
“हम मित्रों को लाभ और बुद्धि से भरपूर कर।" जो उसको लाभ मिलता है उसके लिए वह
कहता है 'सन्ध्या' (लाभ से) और जो वह पाठ करता है उसके लिए कहता है 'मेधया' (बुद्धि
से)। "स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय" (यजु० ५।७)-"हे देव सोम, तेरे लिए स्वस्ति हो और
मैं सोम भोग को खाऊं।" यजमान और ऋत्विज का एक ही आशीर्वाद होता है अर्थात् यज्ञ के
अन्त को पा जावें। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि मैं यज्ञ के अन्त को प्राप्त कर लूं ॥१८॥
अब वे प्रस्तर पर प्रायश्चित्त करते हैं। यज्ञ में उत्तर की ओर उपस्थित रहना चाहिए
था, परन्तु सोम की पुष्टि करने के लिए दक्षिण की ओर जाना पड़ा। अग्नि ही यज्ञ है, और
यज्ञ की ओर पीठ कर लेनी पड़ी। यह मिथ्याचार हो गया और देवों से वियोग हो गया। प्रस्तर
भी यज्ञ का ही भाग है। इसलिए प्रस्तर को छूकर फिर यज्ञ की प्राप्ति होती है। यही उस
मिथ्याचार का प्रायश्चित्त है। इस प्रकार मिथ्याचार का निवारण हो जाता है और देवों से
वियोग नहीं होता। इसलिए प्रस्तर पर प्रायश्चित्त किया जाता है ॥१९॥
इस पर प्रश्न उठता है 'अक्त (घृत-युक्त) प्रस्तर पर या अनक्त (जिस पर घृत न लगा
हो) प्रस्तर पर ?' उत्तर यह है कि अनक्त पर ही, क्योंकि अक्त को तो अग्नि के समर्पित किया
जाता है ॥२०॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर प्रायश्चित्त करते हैं— "एष्टा रायः प्रेषे भगायऽऋतमृतवा-
दिभ्यः" (यजु० ५।७) - "इच्छित धन शक्ति के लिए मिले, ऋतवादियों के लिए ऋत।" इसका
अर्थ यह है कि सत्यवादियों के लिए सत्य । "नमो द्यावापृथिवीभ्याम्” (यजु० ५।७) - "द्यौ और
पृथिवी के लिए नमस्कार ।" इस प्रकार वे द्यौ और पृथिवी के लिए प्रायश्चित्त करते हैं जिन पर
सबकी स्थिति है ॥२१॥
अब प्रस्तर को उठाकर वह कहता है— 'अग्नीध्र, क्या जल खौल गया ?' अग्नीध्र कहता
है—'हाँ, खौल गया।' 'इसको यहाँ ले आओ।' वह (प्रस्तर को) अग्नि के पास ले आता है।
वह प्रस्तर को आग में इसलिए नहीं डालता कि अगले दिनों में उससे काम लेना है; और आग के
ऊपर इसलिए ले आता है कि वह अग्नि में डालने के लगभग बराबर हो जाय। वह इस अग्नीध्र
को दे देता है और अग्नीध्र इसको (सुरक्षित) रख देता है ॥२२॥
अध्याय ४—ब्राह्मण ४
उपसद यज्ञ की गर्दन है। प्रवर्ग्य सिर है। इसलिए यदि यज्ञ प्रबर्ग्य के साथ किया जाता
है तो प्रबर्ग्य के पीछे उपसद करते हैं। इससे गर्दन अपने स्थान पर आ जाती है ॥१॥
पूर्वाह्न में अनुवाक्य होते हैं और अपराह्न में याज्य । जो याज्य हैं वही अनुवाक्य हैं।
इस प्रकार वह जोड़ों को मिला देता है जैसे गर्दन की हड्डियाँ और जोड़ मिले होते हैं ॥२॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान लड़ पड़े। तब असुरों ने इन तीनों लोकों में
अपने लिए किले (पुर) बनाये—लोहे का इस लोक में, चाँदी का अन्तरिक्ष में और सोने का

र॒जताम॒न्तरि॑क्षे हरि॑णीं दि॒वि ॥ ३ ॥ तद्वै देवा॒ अस्पृ॑णवत । तऽए॒ताभिरुप॒सद्भि॒रु-
पासी॑दंस्तद्युदुपासी॑दंस्तस्मादुप॒सदो॒ नाम॑ ते पुरः प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तस्मा-
दा॒ह्युरूपस॒दा पुरं॑ जयतीति॒ यदु॒होपा॑सते तेने॒मां मानुषीं॒ पुरं॑ जयति ॥ ४ ॥ ए॒ता-
भि॒र्वै दे॒वा उप॒सद्भिः॑ । पुरः॑ प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तन्ना॑ष्ट्रो॒त्रा-
स्मा॒ऽअ॒स्मिँल्लो॒के कश्च॒न पुरः॑ कुरुत॒ऽइमा॑ने॒वैतँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒कान्प्रज॑यति
तस्मादुप॒सद्भि॑र्यजते ॥ ५ ॥ ता वाऽआज्य॑हविषो भवन्ति । व॒ज्रो वाऽआज्यं॒नेते॑न
वै दे॒वा वज्रे॑णा॒ज्येन पुरः॑ प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तेन॒ वज्रे॑णा-
ऽज्येने॒माँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒कान्प्रज॑यति तस्मा॒दाज्य॑हविषो भवन्ति ॥ ६ ॥ स वा
ऽअ॒ष्टौ कृत्वो॑ जुह्वां गृह्णाति । च॒तुरु॑पभृत्यथो॒ऽइत॑रथा॒ऽअथ॒तुरेव कृत्वो॑ जुह्वां गृ-
ह्णीयाद॒ष्टौ कृत्व॒ उप॒भृतीति॑ ॥ ७ ॥ स वाऽअ॒ष्टावेव कृत्वो॑ जुह्वां गृह्णाति । चतु॒रु-
पभृति॒ तद्व॑ज्रमभिभा॒रं करोति तेन॒ वज्रे॑णाभिभा॒रेणे॒माँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒का-
न्प्रज॑यति ॥ ८ ॥ अ॒ग्नीषोमौ॒ वै दे॒वाना॒ꣳ सयुजौ॑ । ताभ्या॒ꣳ सार्धं गृह्णाति विप्लव
ऽए॒काकिने॒ऽन्यत॑रमेवा॒धार॒माघा॑रयति य॒ꣳ स्रुवे॑ण प्रति॒क्राम॑ति वा॒ऽउत्तर॒माघा॑र-
माघा॒र्याभि॑जित्या॒ऽअभि॑जयान्यीति तस्माद॒न्यत॑रमेवा॒धार॒माघा॑रयति य॒ꣳ स्रुवे॑ण ॥ ९ ॥
अथाश्राव्य॑ न होता॑रं प्रवृणीते । सीद॒ होत॒रित्ये॒वाहो॑पविशति होता होतृष-
दन॒ऽउप॑विश्य प्रसौति प्रसूतॊऽध्व॒र्युः स्रुचा॒वाद॑त्ते ॥ १० ॥ स आहातिक्रामन्न॒ग्नयेऽनु॑-
ब्रूहीति॑ । आश्रा॒व्याहा॒ग्निं यजेति॑ वषट्कृते जुहोति ॥ ११ ॥ अथाहा॑ सोमा॒यानु॑ब्रू-
हीति॑ । आश्रा॒व्याह॒ सोमं॑ यजेति॒ वषट्कृते जुहोति ॥ १२ ॥ अथ यदु॒पभृत्या॒ज्यं
भव॑ति । तत्समानयमान आह विष्णवे॒ऽनु॑ब्रूहीत्याश्रा॒व्याह॒ विष्णुं॑ यजेति॒ वषट्-
कृते जुहोति ॥ १३ ॥ स यत्समानत्र तिष्ठ॑ञ्जु॒होति॑ । न य॒थेदं प्रच॑रत्संचरत्यभि-
जित्या॒ऽअभि॑जयानीत्यथ यदे॒ता दे॒वता॒ यज॑ति व॒ज्रमे॒वैतत्संस्करोत्य॒ग्निमनीकं॒ सो-
मं॒ शल्यं॒ विष्णुं॑ कुल्मलं॒ ॥ १४ ॥ संवत्सरो हि वज्रः॑ । अ॒ग्निर्वा॒ऽग्रः॑ सोमो रा-

का० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ३-१५ शतपथब्राह्मण / ४११
द्यौलोक में ॥३॥
अब देवों की जीत हुई। देवों ने इन किलों को उपसदों के द्वारा घेरा (उपासीदन्);
उपासीदन् से 'उपसद' नाम पड़ा। उन्होंने किलों को तोड़ डाला और लोकों को जीत लिया।
इसलिए कहते हैं कि 'उपसदों के द्वारा किले जीते जाते हैं।' वस्तुतः घेरा डालकर ही मनुष्य के
किले जीते जाते हैं ॥४॥
देवों ने इन उपसदों के द्वारा ही किलों को तोड़ा और लोकों को जीत लिया। (यजमान
भी) ऐसा ही करता है। यह सच है कि कोई उसके विरुद्ध अपने किले नहीं बनाता। वह इन्हीं
लोकों को भेद देता है। वह इनको जीत लेता है। इसीलिए उपसदों के द्वारा यज्ञ करता है ॥५॥
ये आहुतियां घृत की होती हैं। घी वज्र है। इस वज्र-घी से देवों ने किलों को तोड़कर
इन लोकों पर विजय पाई। इसी प्रकार यह यजमान वज्र-घी द्वारा इन लोकों का भेदन करता
है, इन लोकों को जीतता है। इसलिए ये घी की आहुतियां दी जाती हैं ॥६॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत् में। कुछ उलटा भी करते हैं
अर्थात् चार बार जुहू में और आठ बार उपभृत् में ॥७॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत में। इससे वह वज्र के आगे के
भाग को भारी कर देता है। वज्र के इस भारी भाग से इन लोकों को तोड़ देता और इन पर
विजय प्राप्त कर लेता है ॥८॥
देवताओं में अग्नि और सोम का जोड़ा है। इनके लिए एक-साथ लेता है। विष्णु के
लिए अकेली। एक ही आघार देता है जो स्रुवा में भरी जाती है, क्योंकि जब पीछे की आघार दे
देता है तो चल देता है यह कहकर कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इसलिए स्रुवा से एक ही आघार
देता है ॥९॥
श्रौषट् कहने के पीछे होता का वरण नहीं करता। इतना ही कहता है कि 'हे होता,
बैठ।' होता अपने स्थान पर बैठ जाता है। अब वह अध्वर्यु को प्रेरणा करता है और अध्वर्यु दो
चमचे भर लेता है ॥१०॥
(वेदी के दक्षिण की ओर) जाते हुए वह (होता से) कहता है 'अग्नि को आवाहन
कर।' और श्रौषट् कहकर कहता है 'अग्नि की स्तुति कर।' और वषट्कार के पीछे आहुति दे
देता है ॥११॥
अब कहता है—'सोम का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है—'सोम की
स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे आहुति दे देता है ॥१२॥
अब उपभृत में जो घी होता है उसको (जुहू के बचे घी में) मिलाकर कहता है—'विष्णु
का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है 'विष्णु की स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे
आहुति दे देता है ॥१३॥
वह एक ही स्थान पर खड़ा रहता है। और जैसा चलना-फिरना चाहिए, चलता-फिरता
नहीं। इसका कारण यह है कि वह सोचता है कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इन देवताओं के लिए
आहुति इसलिए देता है कि वज्र बना सकूं। अग्नि को वज्र का 'अनीक' या सिरा बनाता है,
सोम को शल्य और विष्णु को कुल्मल (ये वज्र के भाग हैं) ॥१४॥
संवत्सर ही वज्र है। अग्नि दिन है और सोम रात तथा बीच का भाग विष्णु। इस