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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-२

दे॒ङ्ङत्य॑तरा वा॒ऽए॒तदा॑हव॒नीयं॑ च गा॑र्हप॒त्यं चास्ते॒ तडु॑ ताभ्यां॒ निष्कृ॑ते॒ मा मो॒
दोषि॒ष्टं मा मा॑ हिंसिष्ट॒मिति॒ तथा॒ हौनमेतौ न हि॑सतः ॥ २५॥ अ॒था॒ग्निमीद्ध॑मा-
णो जपति । विश्वे॑ दे॒वाः शास्त॒न मा॒ यथे॒ह होता॑ वृ॒तो मन॑वै य॒न्निष॒द्य । प्र मे॑
ब्रूत भा॒गधे॑यं यथा॑ वो॒ येन॑ प॒था ह॒व्यमा वो॒ वहा॑नीति यथा येभ्यः पन्था॑ स्या-
त्तान्ब्रूया॒द्दनु॑ मा शास्त॒ यथा॑ व आ॒हरि॑ष्यामि॒ यथा॑ वः परि॒वेक्ष्यामीत्ये॒वमे॒वैतद्दे॒-
वेषु॒ प्रशास॑नमिच्छते॒ऽनु॑ मा शास्त॒ यथा॑ वो॒ऽनु॒श्या॒ वष॑ट्कुर्या॒मनु॑श्या ह॒व्यं वहे॒-
यमिति॒ तस्मा॑दे॒वं ज॑पति ॥ २६॥ ब्राह्मणम् ॥ २ [५.१.] ॥ ॥
अ॒ग्निर्होता॑ वेत्व॒ग्नेर्होत्र॒मिति॑ । अ॒ग्निरिद॒ꣳ होता॑ वेत्वित्ये॒वैतदा॒हाग्नेर्होत्र॒मिति॑
तस्यो॒ हि होत्रं॑ वेत्तु॒ प्रावि॒त्रमिति॑ य॒ज्ञो वै प्रावि॒त्रं वेत्तु॑ य॒ज्ञमित्ये॒वैतदाह॒ साधु॑
ते यजमान देव॒तेति॒ साधु॑ ते यजमान दे॒वता॒ यस्य॑ ते॒ऽग्निर्होतेत्ये॒वैतदाह॒ घृतव॑-
तीमध्व॒र्युः स्रुच॑मा॒स्य॑स्वेति॒ तद॑ध्व॒र्यु प्रस्तौ॑ति॒ स यद्येका॒मिवा॒ह ॥ १॥ य॒जमा॑न ए॒व
जुहू॒मन्व्१॒॑ । यो॒ऽस्मा॒ऽअ॑राती॒यति॒ स उ॑प॒भृत॒मन्व्१॒॑ स यद्व्यु॒ऽइव॑ ब्रूयाद्यजमानाय द्वि-
षन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं प्रत्यु॒द्यामि॑नं कुर्याद्वृत्तै॒व जुहू॒मन्वा॒द्य उप॒भृत॒मन्व्१॒॑ स यद्व्यु॒ऽइव॑ ब्रूया-
द्वृद्ध॒ऽश्राद्यं॑ प्रत्यु॒द्यामि॑नं कुर्या॒त्तस्मा॑देका॒मिवै॒वाह ॥ २॥ दे॒वयु॑वं वि॒श्ववा॑रा॒मिति॑ ।
उपस्तौत्ये॒वैन॑ामेतन्मह॒यत्ये॒व यदा॑ह दे॒वयु॑वं वि॒श्ववा॑रा॒मिती॒डाम॑हे दे॒वाꣳऽईडे॒-
न्यान्नम॑स्याम नम॒स्यान्य॒ज्ञाम य॒ज्ञिया॒निती॒डाम॑हे तान्दे॒वान्य॒ऽईडे॑न्या नम॒स्या॑म ता-
न्ये नम॑स्या य॒ज्ञाम य॒ज्ञिया॒निति मनु॑ष्या वा॒ऽईडे॑न्याः पि॒तरो॒ नम॑स्या दे॒वा य॒ज्ञि-
याः ॥ ३॥ या वै प्र॒जा य॒ज्ञेऽन॑न्वाभक्ताः । प॒राभू॑ता॒ वै ता ए॒वमे॒वैतद्या इ॒माः प्र॒जा
अप॑राभूता॒स्ता य॒ज्ञेऽन्वा॑

कां० १, अ० ५, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ९५
वह आहवनीय और गार्हपत्य अग्नि के बीच में बैठता है। ऐसा करने से वह दोनों को प्रसन्न
करता है, और जब वह कहता है कि 'मुझे न जलाओ, मुझे न सताओ', तो वे उसको नहीं
सतातीं ॥२५॥
अब आहवनीय अग्नि की ओर देखकर जप करता है—"विश्वे देवाः शास्त न मा यथेह
होता वृत्तो मन वै यन्निषद्य । प्र मे ब्रूते भागधेयं यथा वो येन पथा हव्यमा वो वहानि"—'हे सब
देवताओ, मुझे बताओ कि होता की हैसियत से मैं किस-किस चीज का ध्यान रखूं ? मेरे भागधेय
अर्थात् कर्तव्य को कहो कि मैं किस रास्ते से आप तक आपके हवि को ले जाऊं ?" जैसे कोई किसी
के लिए भोजन पकावे और कहे, 'मुझे आज्ञा दो कि मैं कैसे इसको तुम तक लाऊं, मैं किस प्रकार
परोसूं ?' बस इसी प्रकार वह देवताओं के प्रशासन (आज्ञा) को चाहता है, अर्थात् 'मुझे बताइये
कि मैं किस प्रकार आप तक वषट्कार पहुँचाऊँ या कैसे आप तक हव्य ले जाऊँ ।' इसीलिए ऐसा
जपता है ॥२६॥
अध्याय ५—ब्राह्मण २
अब वह कहता है—"अग्निर्होता वेत्वग्नेर्होत्रम्"—"होता अग्नि, अग्नि के होत्र को जाने ।"
इसका तात्पर्य यह है कि 'होता अग्नि इसको जाने'। 'अग्नि का होत्र' इसलिये कहा कि वह मोक्ष के
इस साधन (प्रावित्र) को जाने । यज्ञ ही मोक्ष का साधन है । 'यज्ञ को जाने' का तात्पर्य है कि 'हे
यजमान, देवता तेरे अनुकूल हैं' । इसका तात्पर्य है कि 'हे यजमान, जो अग्नि देवता तेरा होता
है वह तेरे अनुकूल है।' अब वह कहता है—"घृतवतीमध्वर्यो स्रुचमास्यस्व ।" अर्थात् "हे अध्वर्यु,
तू घी से भरे चमसे को ले ।" इस कथन से अध्वर्यु को प्रेरणा करता है। एक ही स्रुक् अर्थात्
चमसा क्यों कहा ? इसलिए कि—॥१॥
जुहू के पीछे यजमान ही होता है, और जो उसका अनिष्ट चाहता है वह उपभृत् के
पीछे । अब यदि दो चमसों का कथन करता तो यजमान के विरुद्ध अनिष्ट शत्रु को उद्यत कर
देता । जुहू के पीछे खानेवाला है, और जिसको खाते हैं वह उपभृत् के पीछे है। अब यदि दोनों
का कथन करता तो खानेवाले के विरुद्ध खाद्य पदार्थ को उद्यत कर देता । इसलिए एक ही चमसे
का वर्णन किया ॥२॥
अब कहता है—"देवयुवं विश्ववाराम्", अर्थात् (वह चमसा) कैसा है ?—"देवताओं के
लिए अर्पित और सम्पूर्ण समृद्धियों का रखनेवाला ।" 'देवों के लिए अर्पण और समृद्धियों से
पूरित' कहकर वह उसकी स्तुति करता है अर्थात् उसको बड़ा बनाता है। अब कहता है—"ईडामहै
देवान् । ईडेन्यान्"—"हम स्तुति के योग्य देवों की स्तुति करें"—"नमस्याम नमस्यान्"—"हम
नमस्कार के याज्यों को नमस्कार करें ।" "यजाम यज्ञियान्"—"पूजा के योग्यों की पूजा करें ।"
इसका अर्थ यह हुआ कि हम स्तुति के योग्य देवताओं की स्तुति करें। नमस्कार के योग्यों को
नमस्कार करें। पूजा के योग्यों की पूजा करें। स्तुति के योग्य मनुष्य हैं, नमस्कार के योग्य पितर
और पूजा के योग्य देवता ॥३॥
जो प्रजा यज्ञ में भाग नहीं लेती वह पराभूत अर्थात् दलित या पतित है। इसलिए जो
पतित नहीं हैं उनको यज्ञ में शामिल करता है। मनुष्यों के पीछे पशु हैं, और देवों के पीछे पक्षी,
ओषधि और वनस्पति है। इस प्रकार जो कुछ है उस सब को यज्ञ में शामिल किया जाता है ॥४॥
ये सब नौ व्याहृतियां होती हैं। पुरुष में नौ ही प्राण होते हैं। इनको उसमें धारण कराता
है। इसलिए व्याहृतियां नौ हैं ॥५॥
यज्ञ देवताओं से भाग गया। देवता उसको बुलाने लगे, 'सुनो, लौटो !' यज्ञ ने कहा,

६६ शतपथ ब्राह्मण
आवर्तस्वेति सो॒ऽस्तु तथेत्ये॑व दे॒वानु॒पाव॑वर्त तेनो॒पावृ॑त्तेन दे॒वा अ॑यजन्त॒ तेने॑ष्ट्वे-
तद॑भव॒न्यदि॒दं दे॒वाः ॥६॥ स यदा॒श्राव॑यति । य॒ज्ञमे॒वैतद॒नुमन्त्रयत॒ऽआ नः॑ शृण्व॒
न आव॑र्तस्वे॒त्यथ॒ यत्प्र॒त्याश्रा॒वय॑ति य॒ज्ञ ए॒वैतद॒पाव॑र्तते॒ऽस्तु तथेति॒ तेनो॒पावृ॑त्ते-
न रेत॑सा भू॒तेन॒ऽर्त्विजः॑ संप्र॒दायं॑ चरन्ति यज॑मानेन परो॒ऽक्षं यथा॑ पूर्णपा॒त्रेण संप्र-
दा॒यं च॑रेयु॒रेवम॒नेन॒ऽर्त्विजः॑ संप्र॒दायं॑ च॒रन्ति तद्व॒चिवै॒तत्सं॒प्रदायं॒ चरन्ति वाग्वि य॒ज्ञो
वागु॒ हि रेत॒स्तदे॒तन्वैतत्सं॒प्रदायं॒ चर॑न्ति ॥७॥ सो॒ऽनुब्रू॒हीत्ये॒वोक्त्वाध्व॒र्युः । नाप॑-
व्याहरे॒न्नोऽए॒व होता॑पव्याहरेदा॒श्राव॑यत्यध्व॒र्युस्तद॒ग्नीधं॑ य॒ज्ञ उपाव॑र्तते ॥८॥ सो
ऽग्नीन्नाप॑व्याहरेत् । आ प्र॒त्याश्रा॑वणात्प्रत्या॒श्राव॑यत्यग्नीत्तत्पु॒नर॑ध्व॒र्युं य॒ज्ञ उपाव॑र्त-
ते ॥९॥ ॥ काण्डस्यार्द्धम् ॥४११॥ ॥ सो॒ऽध्वर्यु॑र्नाप॑व्याहरेत् । आ यजे॑ति वक्तो॒र्ध-
र्तेत्ये॒वाध्व॒र्युर्होत्रे॑ य॒ज्ञं संप्र॑यच्छति ॥१०॥ स होता॒ नाप॑व्याहरेत् । आ वषट्का॒रात्तं
वषट्का॒रेणा॒ग्नावे॒व योनौ॒ रेतो॑ भू॒तं सिञ्च॑त्य॒ग्निर्वै योनि॑र्य॒ज्ञस्य॒ स ततः॑ प्र॒जायत॒
ऽइति नु ह॒विर्य॒ज्ञेऽथ सौम्ये॒ऽध्वरे॑ ॥११॥ स वै ग्रहं॑ गृही॒त्वाध्व॒र्युः । नाप॑व्याहरे॒-
दोपा॑करणादु॒पाव॑र्तध॒मित्ये॒वाध्व॒र्यु रुद्गातृभ्यो॑ य॒ज्ञं संप्र॑यच्छति ॥१२॥ त॒ऽउद्गाता॒रो
नाप॑व्याहरे॒युः । ओत्त॑माया तृ॒षोत्त॒मेत्ये॒वोद्गाता॒रो होत्रे॑ य॒ज्ञं संप्र॑यच्छन्ति ॥१३॥
स होता॒ नाप॑व्याहरेत् । आ वषट्का॒रात्तं वषट्का॒रेणा॒ग्नावे॒व योनौ॒ रेतो॑ भू॒तं
सिञ्च॑त्य॒ग्निर्वै योनि॑र्य॒ज्ञस्य॒ स ततः॑ प्र॒जायते ॥१४॥ स यह् सो॒ऽपव्या॒हरे॑त् । यं॑
य॒ज्ञ उपाव॑र्तते॒ यथा॑ पूर्णपा॒त्रं परा॒सिञ्चे॑दे॒वं तत् स यज॑मानं परा॒सिञ्चे॒त्स यत्र॒ है-
व॒म्विदः॒ संवि॑दाना य॒ज्ञेन चर॑न्ति॒ सर्व॑मेव॒ तत्र॒ कल्प॑ते॒ न मु॑ह्यति॒ तस्मा॑दे॒वमेव॑
य॒ज्ञो भ॑र्त॒व्यः ॥१५॥ ता वा॒ऽएताः॑ । पञ्च॒ व्याहृत॑यो भवन्त्यो श्राव॒यास्तु॒ श्रौष॒-
डग्न ये॒ यजा॑महे वौष॒डिति पाङ्क्तो॑ य॒ज्ञः पाङ्क्तः॑ प॒शुः पञ्च॒ऽर्तवः॑ संवत्स॒रस्यैषिका॑
य॒ज्ञस्य॒ मा॒त्रेषा सम्प॑त् ॥१६॥ तासां॑ स॒प्तद॒शाक्ष॑राणि । स॒प्तद॒शो वै प्र॒जाप॑तिः
प्र॒जाप॑तिर्य॒ज्ञ ए॒षैका॑ य॒ज्ञस्य॒ मा॒त्रेषा सम्प॑त् ॥१७॥ ओ श्राव॑येति॒ वै दे॒वाः । पु-

कां० १, अ० ५, ब्रा० २, क० ६-१८ शतपथब्राह्मण / ६७
'अच्छा', और वह लौट आया। वह जो लौट आया उससे देवों ने यज्ञ किया। जिससे वह यज्ञ
किया उसी के कारण वे देव हुए ॥६॥
जब वह (अध्वर्यु) (अग्नीध्र को) बुलाता है तो मानो यज्ञ को बुलाता है 'सुनो, लौटो',
और जब (अग्नीध्र) उत्तर देता है तो मानो यज्ञ ही 'अच्छा' कहकर लौटता है। इस प्रकार उस
लौटे हुए यज्ञ से बीज के समान ऋत्विज लोग परोक्ष रीति से यजमान तक सम्प्रदाय चलाते हैं।
जैसे लोग एक भरे हुए पात्र को एक से दूसरे को देते हैं, इसी प्रकार ऋत्विज लोग सम्प्रदाय चलाते
हैं (अर्थात् यज्ञ की प्रथा को एक-दूसरे तक पहुँचाते हैं)। वाणी के द्वारा सम्प्रदाय चलता है।
वाणी ही यज्ञ है। वाणी ही बीज है। इसीलिए वाणी द्वारा सम्प्रदाय चलता है ॥७॥
जब (अध्वर्यु ने होता से कहा) कि 'अनुब्रूहि'—'बोलो', तो इसके पीछे न तो अध्वर्यु
ही कुछ अपशब्द कहे और न होता ही अपशब्द कहे। अध्वर्यु कहता है इस प्रकार अग्नीध्र तक
यज्ञ को ले जाता है ॥८॥
अग्नीध्र उत्तर देने के समय तक कुछ अपशब्द न कहे। अग्नीध्र उत्तर देता है। इस प्रकार
यज्ञ अध्वर्यु तक पहुँचता है ॥६॥
अध्वर्यु उस समय तक कुछ अपशब्द न कहे जब तक (नीचे का शब्द) न बोले 'यज'—
'यज्ञ करो'। 'यज' शब्द कहने से अध्वर्यु यज्ञ को होता तक ले जाता है ॥१०॥
होता उस समय तक अपशब्द न बोले जब तक वषट्कार न कहे। वषट्कार से वह यज्ञ
को अग्नि में सींचता है जैसे योनि में वीर्य सींचा जाता है, क्योंकि अग्नि यज्ञ की योनि है। यज्ञ
अग्नि से ही उत्पन्न होता है। अब हविर्यज्ञ और सोम-यज्ञ—में॥११॥
(सोम को) लेने के पश्चात् उपाकरण तक अध्वर्यु कोई अपशब्द न कहे। 'उपावर्त्तध्वम्'—
'निकट आइये।' ऐसा कहकर अध्वर्यु उद्गाताओं के लिए यज्ञ को देता है ॥१२॥
उत्तम अर्थात् सबसे पिछली ऋचा बोलने तक उद्गाता लोगों को कोई अपशब्द नहीं
बोलने चाहिएँ। 'एषोत्तमा'—'यह अन्तिम ऋचा है।' ऐसा कहकर उद्गाता लोग यज्ञ को होता
को देते हैं ॥१३॥
होता वषट्कार तक कोई अपशब्द न बोले। वषट्कार से अग्नि में उसी प्रकार सिंचन
किया जाता है जैसे योनि में वीर्य का। अग्नि यज्ञ की योनि है, क्योंकि वह वहीं से उत्पन्न होता
हैं ॥१४॥
यदि जिसके पास यज्ञ लौटता है वह अपशब्द कह दे तो वह उसी प्रकार यज्ञ को बरबाद
कर देता है जैसे (जल से) पूरे भरे हुए पात्र को (नीचे फेंक देने से जल बरबाद जाता है)। जहाँ
ऋत्विज लोग परस्पर एक-दूसरे को समझते हुए यज्ञ करते हैं वहाँ सब काम ठीक होता है, कोई
गलती नहीं होती। इसलिए यज्ञ का इसी प्रकार भरण करना चाहिए ॥१५॥
ये पाँच व्याहृतियाँ होती हैं—(१) ओ ! श्रावय, 'सुनाओ या पुकारो।' (२) अस्तु
श्रौषट्, 'वह सुने।' (३) यज, 'समिधा को प्रज्वलित करो।' (४) ये यजामहे, 'हम यज्ञ करते
हैं।' (५) वौषट्, 'ले जावे।' पांच प्रकार का यज्ञ होता है, पांच प्रकार का पशु, वर्ष की पांच
ऋतुएं भी होती हैं। यह यज्ञ की मात्रा है। यह उसकी सम्पत् या पूर्णता है ॥१६॥
इनमें सत्रह अक्षर होते हैं। प्रजापति सत्रह प्रकार का है। प्रजापति ही यज्ञ है। यह यज्ञ
की मात्रा है। यह यज्ञ की पूर्णता है ॥१७॥
'ओ श्रावय' से देव पूर्व की वायु को चलाते हैं। 'अस्तु श्रौषट्' से बादलों को लाते हैं,