शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 427, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ० ४, ब्रा० ३-४; कं० १८-२२ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४०६
ध्यायस्व” (यजु० ५।७)-"इन्द्र तेरे लिए पुष्ट हो और तू इन्द्र के लिए पुष्ट हो।" इन्द्र यज्ञ का
देवता है। इस प्रकार वह इस यज्ञ के देवता की पुष्टि करता है। 'इन्द्र के लिए तू पुष्ट हो' ऐसा
कह उसमें पुष्टि का निर्धारण करता है। "आप्याययास्मान्त्सखीन्त्सन्ध्या मेधया" (यजु० ५।७)-
“हम मित्रों को लाभ और बुद्धि से भरपूर कर।" जो उसको लाभ मिलता है उसके लिए वह
कहता है 'सन्ध्या' (लाभ से) और जो वह पाठ करता है उसके लिए कहता है 'मेधया' (बुद्धि
से)। "स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय" (यजु० ५।७)-"हे देव सोम, तेरे लिए स्वस्ति हो और
मैं सोम भोग को खाऊं।" यजमान और ऋत्विज का एक ही आशीर्वाद होता है अर्थात् यज्ञ के
अन्त को पा जावें। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि मैं यज्ञ के अन्त को प्राप्त कर लूं ॥१८॥
अब वे प्रस्तर पर प्रायश्चित्त करते हैं। यज्ञ में उत्तर की ओर उपस्थित रहना चाहिए
था, परन्तु सोम की पुष्टि करने के लिए दक्षिण की ओर जाना पड़ा। अग्नि ही यज्ञ है, और
यज्ञ की ओर पीठ कर लेनी पड़ी। यह मिथ्याचार हो गया और देवों से वियोग हो गया। प्रस्तर
भी यज्ञ का ही भाग है। इसलिए प्रस्तर को छूकर फिर यज्ञ की प्राप्ति होती है। यही उस
मिथ्याचार का प्रायश्चित्त है। इस प्रकार मिथ्याचार का निवारण हो जाता है और देवों से
वियोग नहीं होता। इसलिए प्रस्तर पर प्रायश्चित्त किया जाता है ॥१९॥
इस पर प्रश्न उठता है 'अक्त (घृत-युक्त) प्रस्तर पर या अनक्त (जिस पर घृत न लगा
हो) प्रस्तर पर ?' उत्तर यह है कि अनक्त पर ही, क्योंकि अक्त को तो अग्नि के समर्पित किया
जाता है ॥२०॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर प्रायश्चित्त करते हैं— "एष्टा रायः प्रेषे भगायऽऋतमृतवा-
दिभ्यः" (यजु० ५।७) - "इच्छित धन शक्ति के लिए मिले, ऋतवादियों के लिए ऋत।" इसका
अर्थ यह है कि सत्यवादियों के लिए सत्य । "नमो द्यावापृथिवीभ्याम्” (यजु० ५।७) - "द्यौ और
पृथिवी के लिए नमस्कार ।" इस प्रकार वे द्यौ और पृथिवी के लिए प्रायश्चित्त करते हैं जिन पर
सबकी स्थिति है ॥२१॥
अब प्रस्तर को उठाकर वह कहता है— 'अग्नीध्र, क्या जल खौल गया ?' अग्नीध्र कहता
है—'हाँ, खौल गया।' 'इसको यहाँ ले आओ।' वह (प्रस्तर को) अग्नि के पास ले आता है।
वह प्रस्तर को आग में इसलिए नहीं डालता कि अगले दिनों में उससे काम लेना है; और आग के
ऊपर इसलिए ले आता है कि वह अग्नि में डालने के लगभग बराबर हो जाय। वह इस अग्नीध्र
को दे देता है और अग्नीध्र इसको (सुरक्षित) रख देता है ॥२२॥
अध्याय ४—ब्राह्मण ४
उपसद यज्ञ की गर्दन है। प्रवर्ग्य सिर है। इसलिए यदि यज्ञ प्रबर्ग्य के साथ किया जाता
है तो प्रबर्ग्य के पीछे उपसद करते हैं। इससे गर्दन अपने स्थान पर आ जाती है ॥१॥
पूर्वाह्न में अनुवाक्य होते हैं और अपराह्न में याज्य । जो याज्य हैं वही अनुवाक्य हैं।
इस प्रकार वह जोड़ों को मिला देता है जैसे गर्दन की हड्डियाँ और जोड़ मिले होते हैं ॥२॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान लड़ पड़े। तब असुरों ने इन तीनों लोकों में
अपने लिए किले (पुर) बनाये—लोहे का इस लोक में, चाँदी का अन्तरिक्ष में और सोने का