शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-१
४३६ शतपथ ब्राह्मण
जिह्वा॒ ह्यैवाष्यैषा तद्य॒त्सर्व॒रोहितं भवति लोहिनीव॒ हीयं जिह्वा तन्नि॒दधाति
वैष्ण॒वमसी॑ति वैष्ण॒वꣳ ह्ये॒तत् ॥२३॥ अथ ग्राव्णा उपाव॒हरति । दन्ता॒ ह्यैवास्य ग्रा-
वाणस्तद्यद्ग्रावभिरभिषु॒ण्वन्ति यथा॒ दद्भिः प्स्यादेवं तत्तान्नि॒दधाति वैष्ण॒वा स्थेति
वैष्ण॒वा ह्ये॒त ऽएत॒द्यज्ञस्य॒ शिरः॒ सꣳस्कृ॒तम् ॥२४॥ ब्राह्मणम् ॥४ [५.४] ॥ ॥ पञ्च-
मोऽध्यायः [२०] ॥ ॥
उद॒रमेवास्य सदः॑ । तस्मात्स॒दसि भक्षयन्ति यद्धीदं किं चाश्न॒त्युद॒रऽए॒वैदꣳ सर्वं॒
प्रति॒तिष्ठत्यथ॒ यदस्मिन्विश्वे॑ दे॒वा अ॒सीदंस्तस्मात्स॒दो नाम तऽउ॒ऽए॒वास्मिन्नेते ब्रा-
ह्मणा वि॒श्वगो॑त्राः सीदन्त्यैन्द्रं देवतया ॥१॥ तन्मध्य॒ऽऔदुम्बरीं मिनोति । अन्नं॒
वाऽऊर्गौदुम्बर उद॒रमेवास्य॒ सद॒स्तन्मध्य॒तोऽन्नाद्यं दधाति तस्मान्मध्य॒ऽऔदु॒म्बरीं
मिनोति ॥२॥ अथ य ऽएष मध्यमः शङ्कुर्भव॑ति । वेदे॒रर्धनार्थे तस्मात्प्राङु प्रक्राम-
ति षट्प्रक्रमान्दक्षिणा सप्तममपक्रामति सम्यदः कामाय तदव॒टं प॑रिलि॒खति ॥३॥
सोऽभिमाद॑त्ते । दे॒वस्य त्वा सवितुः प्र॒सवे॒ऽश्विनो॒र्बाहुभ्यां पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यामाद॒दे
नार्य॑सीति समा॒न ऽए॒तस्य यजुषो बन्धु॒र्योषो वाऽए॒षा यद॒भ्रिस्तस्मादाह॒ नार्य॑सी-
ति ॥४॥ अथाव॒टं प॑रिलि॒खति । इ॒दम॒हꣳ रक्ष॑सां ग्रीवा अपिकृन्ता॒मीति॒ वज्रो
वाऽअभ्रिर्व॑ज्रेणैवैतन्नाष्ट्राणाꣳ रक्ष॑सां ग्रीवा अपिकृन्तति ॥५॥ अथ खनति । प्रा-
ञ्चमुत्कर॒मुत्कि॑रति यज॑मानेन संमायौदु॒म्बरीं परिवासयति तामग्रेण प्राचीं निद॒-
धात्येतावन्मात्राणि बर्हीꣳष्युपरिष्टादधिनि॒दधाति ॥६॥ अथ प्लवमत्या॒ प्रोक्ष॑ण्यो
भवन्ति । आपो॒ ह वाऽअ॒ोषधीनाꣳ र॒सस्तस्मादोषधयः केवल्यः खादिता न॒ धि-
न्वन्त्योषधय उ ह्यापाꣳ र॒सस्तस्मादापः पीताः केव॑ल्यो न धिन्वन्ति य॒द्वैवोभय्यः॒
सꣳसृष्टा भवन्त्येव धिन्वन्ति तर्हि हि स॒रसा भवन्ति सर॒साभिः प्रोक्षा॒णीति ॥७॥
देवाश्च वाऽअसु॑राश्च । उ॒भये प्राजापत्याः प॒स्पृधिरे ततो दे॒वेभ्यः॒ सर्वा॒ ऽओष॑धय
ईयुर्यथा ह्वे॒वेभ्यो॒ नेयुः ॥८॥ तद्धे देवा अशृण्वत । तऽए॒तैः सर्वाः सपत्नानामो-
कां० ३, अ० ५-६, ब्रा० ४-१, कं० २३-२४ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४३७
है, क्योंकि यह विष्णु की जिह्वा है। वह बिल्कुल लाल इसलिए रंगा जाता है कि जीभ का रंग
लाल होता है। यह पढ़कर नीचे रख देता है—'वैष्णवमसि' (यजु० ५।२५)। 'तू विष्णु की है।'
यह विष्णु का तो है ही ॥२३॥
अब सोम निचोड़ने के पत्थर लाता है (पाँच पत्थर)। ये पत्थर विष्णु के दाँतों के तुल्य
हैं। इसलिए जब सोम को पीसते हैं तो मानो दाँतों से पीसते हैं। यह कहकर रख देता है—'वैष्णवा
स्थ' (यजु० ५।२५) —"विष्णु के होकर रहो।" क्योंकि विष्णु के तो हैं ही। अब यज्ञ का सिर पूरा
हो गया ॥२४॥
अध्याय ६—ब्राह्मण १
सदस् इस यज्ञ का पेट है। इसलिए सदस् में ही खाते हैं। क्योंकि इस संसार में जो कुछ
ख या जाता है वह पेट में ही रक्खा जाता है। इसको सदस् इसलिए कहते हैं कि इसमें सब देव
बैठे (असीदन्)। इसी प्रकार सब गोत्रों के ब्राह्मण इसी में बैठते हैं। इसका देवता इन्द्र है ॥१॥
इसके मध्य में वह उदुम्बर की लकड़ी रखता है। उदुम्बर अन्न या शक्ति है। सदस् इस
यज्ञ का पेट है। इसलिए उस पेट के बीच में वह उदुम्बर की लकड़ी रखता है ॥२॥
वेदी के पिछले आधे भाग के बीच में जो खूंटी होती है उससे पूर्व की ओर छः पग चलता
है। इससे हटकर दाहिनी ओर सातवाँ पग भरता है, कामना की पूर्ति के लिए। वहाँ एक गड्ढे
का चिह्न बना देता है ॥३॥
इस मन्त्र को पढ़कर खुरपी (अभ्रि) लेता है— "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां
पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि" (यजु० ५।२२)—"सविता देव की प्रेरणा पर अश्विनी की भुजाओं
और पूषा के हाथों से मैं तुझको लेता हूँ। तू नारी है।" इस यजुः का भी यही तात्पर्य है जो पहले
बता दिया गया। खुरपी (अभ्रि) तो स्त्रीलिङ्ग है ही। इसलिए वह उसको कहता है कि 'तू
नारी है' ॥४॥
अब वह इस मन्त्रांश से गड्ढे का चिह्न बनाता है— "इदमहँ रक्षसां ग्रीवाऽअपि-
कृन्तामि" (यजु० ५।२२)—"मैं इससे राक्षसों की गर्दन काटता हूँ।" यह खुरपी वज्र है। वज्र से
ही दुष्ट राक्षसों की गर्दन काटता है ॥५॥
अब खोदता है। मिट्टी पूर्व को डालता है। यजमान के कद के बराबर नापकर उदुम्बर
की लकड़ी को चारों ओर से चिकनाता है और गड्ढे के आगे इस प्रकार रखता है कि उसका
अग्रभाग पूर्व की ओर रहे। उतने ही बड़े कुशों को उसके ऊपर रखता है ॥६॥
अब प्रोक्षणी के जलों में जौ (यव) होते हैं। ओषधियों का रस जल है। इसलिए यदि
ओषधियाँ ही खाई जायें तो तृप्ति नहीं करतीं। जलों का रस ओषधियाँ हैं, इसलिए केवल जल
ही पिया जाय तो तृप्ति नहीं होती। जब दोनों मिल जाते हैं तो तृप्ति करते हैं, क्योंकि तब वे
रसवाले हो जाते हैं। वह सोचता है कि सरस जल का सिंचन करूँ ॥७॥
प्रजापति की सन्तान देव और असुरों में झगड़ा हुआ। देवों से सब ओषधियां चली गईं।
केवल जौ (यव) नहीं गये ॥८॥
अब देव जीत गये। जौ ने शत्रुओं की सब ओषधियों को खींच लिया (अयुवत्) ।
४३८ शतपथ ब्राह्मण
ष्षीरयुवन् यद्यु॑वन् तस्मा॒द्यवा॒ नाम॑ ॥९॥ ते॒ होचुः । क्व॒ तद्यः सर्वा॑सामोष॑-
धीनाꣳ रस॒स्तं यवे॑षु दधा॒नेति॒ स यः सर्वा॑सामोषधीनाꣳ रस॒ आसी॒तं यवे॑ष्वदधुस्त-
स्माद्य॒त्रान्या॒ ओष॑धयो म्लाय॑न्ति॒ तदेते मोद॑माना वर्धन्त॒ऽएवꣳ ह्ये॑षु रस॒मद॑धुस्त-
थो॒ऽएवैष॒ एतैः सर्वैः स॒प्ताना॒मोष॑धीर्युङ्क्त॒ तस्माद्यवमय्यः प्रोक्ष॑ण्यो भवन्ति ॥१०॥
स य॒वाना॒वप॑ति । यवो॑ऽसि यव॒यास्मद्द्वेषो॑ यव॒याराती॒रिति॒ नात्र॑ तिरो॒हितमि॑-
वास्त्यथ प्रोक्षत्येको वै प्रोक्षणस्य बन्धुर्मेध्यायैवैतत्करोति ॥११॥ स प्रोक्ष॑ति ।
दि॒वे त्वान्तरि॑क्षाय वा पृथिव्यै॒ वेती॑माने॒वैतल्लो॒कानूर्जा॒ रसेन॒ भाजय॒त्येषु॑ लो॒के-
ष्वू॒र्द्धꣳ रसं॑ दधाति ॥१२॥ अथ याः प्रो॒क्षण्यः प॑रिशि॒ष्यन्ते॑ । ता अ॒वटे॒ऽवन॑यति
शुन्ध॑न्तां लोकाः पितृ॒षद॑ना॒ इति पितृ॑देव॒त्यो वै कूपः॑ खा॒तस्तन्मै॒वैतन्मे॒ध्यं करो-
ति ॥१३॥ अथ ब॒र्हिषि॑ । प्राची॒नाग्रा॑णि चोदीची॒नाग्रा॑णि चावस्तृ॒णाति॑ पितृ-
षद॑नमसी॒ति पितृ॑देव॒त्य वा॒ऽअस्याऽऽहु॒तद्वति॒ यन्नि॑खातं॒ सा यथानिखातौषधिषु
मिता स्या॑दे॒वमे॒तास्वोष॑धिषु मिता भ॑वति ॥१४॥ तामुद्धू॒यति॑ । उद्दिवꣳ स्तभाना-
न्तरि॑क्षं पृण दृꣳहस्व पृथिव्यामिती॑माने॒वैतल्लो॒कानूर्जा॒ रसेन॒ भाजय॒त्येषु॑ लो॒केषू-
र्द्धꣳ रसं॑ दधाति ॥१५॥ अथ मिनोति । द्युतानस्त्वा मारुतो मिनोत्विति यो वा
ऽअ॒यं पव॑त॒ऽएष॒ द्युता॒नो मारु॒तस्तेनै॑नैतेन मिनोति मित्रावरुणौ ध्रुवेण धर्म-
णेति प्रा॑णोदानौ वै मित्रावरुणौ तेनैनां प्रा॑णोदानाभ्यां मिनोति ॥१६॥ अथ
पर्यू॑हति । ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्यूहामीति बह्वी वै यजुःप्रा-
शीस्तद्ब्रह्म च क्षत्रं चाशास्तऽउभे वीर्ये रायस्पोषवनीति भूमा वै रायस्पोषस्तद्भू-
मानमाशास्ते ॥१७॥ अथ पर्यु॑षति । ब्रह्म॑ दृꣳह क्ष॒त्रं दृꣳहायु॑र्दृꣳह प्र॒जां दृꣳहे-
त्याशीरेवैषैतस्य कर्मण आशिषमेवैतदाशास्ते समम्भूमि पर्यूषणं करोति गर्तस्य
वाऽउपरिभूम्यथैवं देवत्रा तथा ह्यगर्तमिद्भवति ॥१८॥ अथाप उपनिनयति । यत्र
वा॒ऽअस्यै॑ खनन्तः॑ क्रू॒रीकु॒र्वन्त्यप॑घ्नन्ति शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयति॒ तद॒द्भिः
कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ६-१६ शतपथब्राह्मण / ४३६
इसीलिए उनका 'यव' (जौ) नाम पड़ा ॥६॥
उन्होंने कहा कि सब ओषधियों में जो रस है उस सब को हम जौ में रख दें। इसलिए
जो रस सब ओषधियों में था उसको उन्होंने जौ में रख दिया। इसलिए जब ओषधियाँ सूख जाती
हैं तो जौ हरे-भरे रहते हैं क्योंकि देवों ने इनमें इस प्रकार रस भर दिया है। इसी प्रकार यजमान
भी इन्हीं जौ के द्वारा शत्रु के सब अन्नों को खींच लेता है। इसीलिए प्रोक्षणी पात्र के जलों में
जौ रहते हैं ॥१०॥
वह इस (गड्ढे) में जौ को डाल देता है इस मंत्रांश को पढ़कर-“यवोऽसि यवयास्मद्-
द्वेषो यवयारातीः" (यजु० ५।२६)-"तू जौ है तो हमसे शत्रु को हटा दे (यवय) और बुरी
बातों को हटा दे (यवय) ।" यह सब स्पष्ट है। अब जल-सिंचन करता है। जल-सिंचन का एक
ही प्रयोजन है अर्थात् यज्ञ की पवित्रता ॥११॥
वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है - "दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा" (यजु०
५।२६)-"तुझको द्यौलोक के लिए, अन्तरिक्ष के लिए और पृथिवी के लिए।" इस प्रकार वह इन
लोकों को शक्ति और रस से पूर्ण करता है। शक्ति और रस को इन लोकों में स्थापित करता
है ॥१२॥
अब जो जल प्रोक्षणी में बच रहता है उसको सूराख में डाल देता है यह कहकर, "शुन्धन्तां-
ल्लोकाः पितृषदनाः" (यजु० ५।२६)-"जहाँ पितृ रहते हैं वे लोक शुद्ध हों।" यह जो गड्ढा
खोदा जाता है वह पितरों का है। इसको वह यज्ञ के लिए शुद्ध करता है ॥१३॥
अब वह उनमें कुश बिछा देता है। इस प्रकार कि उनके अग्रभाग पूर्व की ओर रहें और
उत्तर की ओर, यह कहकर- "पितृषदनमसि" (यजु० ५।२६)-"तू पितरों की बैठक है।" क्योंकि
इसका जितना भाग खोदा जाता है वह पितरों का होता है। मानो वह खोदा नहीं गया, वृक्षों
के साथ मिल गया। इस प्रकार वह वृक्षों के समान हो जाता है ॥१४॥
अब वह इसको इस मन्त्र से उठाता है- "उद्दिव ँस्तभानान्तरिक्षं पृण दृ ँहस्व पृथिव्याम्"
(यजु० ५।२७)-"द्यौलोक को उठा, अन्तरिक्ष को भर और पृथिवी को दृढ़ कर ।" इस प्रकार
वह इन लोकों को शक्ति और रस से युक्त करता है और इन लोकों में शक्ति और रस स्थापित
करता है ॥१५॥
अब वह उसको (गड्ढे में) गाड़ देता है, यह मन्त्र पढ़कर- "द्युतानस्त्वा मारुतो मिनोतु"
(यजु० ५।२७)-"मरुत् का पुत्र द्युतान तुझको गाड़े।" यह जो हवा चलती है उसी को 'मारुत
द्युतान' कहते हैं। उसी से वह गाड़ता है- "मित्रावरुणौ ध्रुवेण धर्मणा" (यजु० ५।२७)-"मित्र
और वरुण के दृढ़ धर्म के द्वारा।" प्राण और उदान का नाम मित्र-वरुण है। प्राण और उदान से
इसको गाड़ता है ॥१६॥
अब वह चारों ओर मिट्टी इकट्ठी करता है इस मन्त्रांश से- "ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि
रायस्पोषवनि पर्यूहामि" (यजु० ५।२७)-"मैं तुझको घेरता हूँ, हे ब्रह्मत्व के प्राप्त करनेवाले,
क्षत्रियत्व के प्राप्त करनेवाले, धन के प्राप्त करनेवाले !" यजुओं में आशीर्वाद बहुत हैं। इससे
वह ब्रह्मत्व और क्षत्रियत्व के लिए आशीर्वाद देता है। 'रायस्पोषवनि' से पुष्कलता से प्रयोजन
है। उसी पुष्कलता के लिए आशीर्वाद देता है ॥१७॥
अब वह इस मन्त्रांश को पढ़कर मिट्टी को दबा-दबाकर मजबूत करता है- "ब्रह्म दृ ँह
क्षत्रं दृ ँह्यायुर्दृ ँह प्रजां दृ ँह" (यजु० ५।२७)- "ब्रह्मत्व को दृढ़ कर, क्षत्रियत्व को दृढ़ कर
आयु को दृढ़ कर, प्रजा को दृढ़ कर ।" यही इस कर्म का आशीर्वाद है। वह इससे यही आशीर्वाद
देता है। वह इतना दबाता है कि मिट्टी भूमि के बराबर हो जाती है। या गड्ढे की भूमि कुछ
ऊँची होती है। यह ऊँचाई देवतापन हो जाती है; इसका तात्पर्य यह है कि यह गड्ढा असाधारण
हो जाता है ॥१८॥
अब वह उस पर पानी छिड़कता है। जहाँ कहीं भूमि में गड्ढा खोदते हैं तो उसमें धान
उत्पन्न कर देते हैं। जल शान्तिदायक है। जल से शान्ति देता है। इसलिए जल से सींचता
४४० शतपथ ब्राह्मण
सं॒दधा॑ति॒ तस्मा॑दप॒ उप॑निनयति ॥१९॥ अथै॑वम॒भिपद्य॑ वाचयति । ध्रु॒वासि॑ ध्रु॒वो
ऽयं यज॑मानो॒ऽस्मिन्ना॒यत॑ने प्र॒जया॑ भूया॒दिति॑ प॒शुभि॒रिति॒ वैवं यं कामं॒ काम॑यते॒
सो॒ऽस्मै॒ कामः॒ समृ॑ध्यते ॥२०॥ अथ स्रु॒वेणोप॑हत्या॒ज्यम् । विष्ट॒पम॒भि जु॑होति
घृ॒तेन॒ द्यावा॑पृथि॒वी पूर्ये॑थामि॒ति तदि॒मे द्यावा॑पृथि॒वी ऽऊ॒र्जा रसे॑न॒ भ्राञ्जय॑त्यनयो-
र्ऋ॒र्द्धं रसं॑ दधाति ते र॒सव॑त्या॒ऽउप॑जीवनीये इ॒माः प्र॒जा उ॑प॒जीव॑न्ति ॥२१॥ अथ
ह॒दि॒र्धिनि॒दधा॑ति । इन्द्र॑स्य ह॒दिरसीत्येन्द्र॑ हि॒ सदो॒ विश्व॑जनस्य छा॒येति॒ विश्व॑-
गोत्रा ह्य॒स्मिन्ब्राह्मणा आ॒सते॒ तदु॑भयतश्छ॒दिषो॒ऽउप॑दधात्युत्त॑रत॒स्त्रीणि॑ प॒रस्त्रीणि॑
ता॒नि न॒व भव॑न्ति त्रि॒वृद्धै य॒ज्ञो नव॑ वै त्रिवृत्स॒मान्नव भव॑न्ति ॥२२॥ तदु॑दीची-
न॒वश॑ सदो॑ भवति । प्राचीनव॒श हविर्धान॑मेत॒द्धै दे॒वानां॑ निष्केव॒ल्यं॒ यद्ध-
वि॒र्धानं॒ तस्मा॒त्तत्र॒ नाश्ना॑ति॒ न भ॒क्षय॑ति निष्केव॒ल्यꣳ ह्ये॒तद्दे॒वानाꣳ स यो ह॒ त-
त्राश्नी॒याद्वा॑ भ॒क्षये॑द्वा मू॒र्द्धा ह्वास्य॒ विप॑ते॒द्यैते मिथो घ॒द्यामी॒ध्रं च॒ सद॑श्च॒ तस्मा॒त्तयो-
र॒श्नन्ति॒ तस्मा॑द्भवयन्ति मिथ्ये॒ ह्येते॒ऽउदी॑ची वै मनु॒ष्याणां॒ दिक्कस्मा॒दुदी॑चीनव॒शꣳ
सदो॑ भवति ॥२३॥ तत्प॑रिश्रयति । परि॑ त्वा गिर्वणो॒ गिर॑ इ॒मा भ॑वन्तु वि॒श्वतः॑ ।
वृ॒द्धा॒युमनु॒ वृद्ध॑यो जु॒ष्टा भ॑वन्तु जु॒ष्टय॒ऽइतीन्द्रो॑ वै गिर्वा विशो॒ गिरो॒ विशैवैत-
त्क्षत्रं॒ परि॑बृꣳहति॒ तदि॒दं क्ष॒त्रमु॑भयतो वि॒शा परि॑बृꣳहम् ॥२४॥ अथ लस्यू॒जन्या॒
स्यन्द्यया॑ प्र॒सीव्य॑ति । इन्द्र॑स्य स्यूरसीत्यथ॒ ग्रन्थिं क॑रोतीन्द्र॑स्य ध्रु॒वोऽसीति॒ नेद्य-
वपद्याता॒ऽइति॒ प्रकृ॑ते॒ कर्म॑न्विष्याति॒ तथो॒ ह्वाय॑र्गुर्वा यज॑मानं वा ग्राहो॒ न वि॑-
न्दति तन्नि॒ष्ठित॑म॒भिमृशत्यैन्द्रमसीत्येन्द्र॑ हि॒ सदः॑ ॥२५॥ अथ हवि॒र्धानयोः । ज-
घनार्धꣳ सम॒न्वीक्ष्योत्त॑रेणाग्नी॒ध्रं मि॑नोति तस्या॒र्धम॒न्तर्वे॑दि स्याद॒र्धं ब॒हिर्वे॒द्यथो॒ऽअ-
पि भूयो॒ऽर्द्धाद॒न्तर्वे॑दि स्यात्कनीयो ब॒हिर्वे॒द्यथो॒ऽअपि॒ सर्व॑मेवा॒न्तर्वे॑दि स्यात्तन्नि-
ष्ठितमभिमृशति वै॒श्व॒देवमसीति द्वये॑नै॒तद्वैश्वदे॒वं यद॒स्मिन्पूर्वेद्युर्विश्वे॑ दे॒वा व॑सती-
वरी॒षूप॒वस॑न्ति॒ तेन॑ वैश्वदे॒वम् ॥२६॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॑न्वानाः । ते॒ऽसुररक्षसे-
कां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० १६-२७ शतपथब्राह्मण / ४४१
है ॥१६॥
इसको छुआकर (यजमान से) कहलवाता है- "ध्रुवोऽसि ध्रुवोऽयं यजमानोऽस्मिन्नायतने
प्रजया भूयात्' (यजु० ५।२८) - "तू दृढ़ है। यह यजमान इस घर में प्रजा के साथ दृढ़ हो।"
“पशुभिः" (यजु० ५।२८) - "पशुओं के साथ।" अर्थात् जैसी-जैसी कामना हो उसी की पूर्ति
होती है ॥२०॥
अब स्रुवा में घी लेकर विष्ट (अर्थात् त्रिशूल के समान सिरे) पर डालता है, इस
मन्त्रांश से- "घृतेन द्यावापृथिवी पूर्यथाम्” (यजु० ५।२८) - "द्यौ और पृथिवी घी से भर जायें।"
इस प्रकार द्यौ और पृथिवी को ऊर्ज और रस से भर देता है। उनमें ऊर्ज और रस स्थापित
कर देता है। यह सब प्रजा ऊर्ज और रसयुक्त द्यावा-पृथिवी पर ही निवास करती हैं ॥२१॥
अब चटाई (छदि) बिछाता है, यह पढ़कर- "इन्द्रस्य छदिरसि" (यजु० ५।२८) - "तू
इन्द्र की चटाई है।" क्योंकि सदस् इन्द्र का है। "विश्वजनस्य छाया" (यजु० ५।२८) - "सब मनुष्यों
के लिए आश्रय है।" क्योंकि इसमें सब गोत्रों के ब्राह्मण बैठते हैं। इसमें दो चटाइयाँ और जोड़ता
है। फिर उनके उत्तर में तीन चटाइयाँ और उनके उत्तर में तीन और चटाइयाँ। इस प्रकार नौ
हो जाती हैं। यह त्रिवृत् (तीन भागों वाला) होता है। नौ भी त्रिवृत् होता है। इसलिए नौ
चटाइयाँ होती हैं ॥२२॥
सदस् का बांस (दक्षिण से) उत्तर को होता है, हविर्धान का पूर्व से पश्चिम को। हविर्धान
पूरा-पूरा देवताओं का होता है, इसलिए वहाँ न खाते हैं न पीते हैं। अगर कोई उसमें खाय या
पिये तो उसका सिर गिर जायगा। आग्नीध्र और सदस् दोनों में मिश्रित हैं (अर्थात् देव और
मनुष्य दोनों में उनकी गिनती है)। इसलिए इनके साथ खाना-पीना होता है, क्योंकि इन दोनों
की दोनों में गिनती है। मनुष्यों की दिशा उत्तर है, इसलिए सदस् का बांस उत्तर की ओर होता
है ॥२३॥
इस मन्त्र को पढ़कर उसको घेरते हैं- "परि त्वा गिर्वणो गिरऽइमा भवन्तु विश्वतः।
वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः" (यजु० ५।२६, ऋ० १।१०।१२) -- "हे स्तुतियों को
पसन्द करनेवाले ! स्तुतियां चारों ओर से तुझको घेर लें। वृद्धियाँ (उन्नतियाँ) बहुत आयुवाली
हों। शक्तियां शक्तिवाली हों।" 'गिर्वा' का अर्थ है इन्द्र और 'गिरः' का जनसाधारण (विश)।
इस प्रकार वह क्षत्रिय को जन-साधारण (विश) से घेरता है। इसलिए जन-साधारण से दोनों
ओर क्षत्रिय घिरा रहता है ॥२४॥
अब वह सुई-डोरे से सीता है, यह मन्त्रांश पढ़कर - "इन्द्रस्य स्यूरसि" (यजु० ५।३०) -
“तू इन्द्र की सुई है।" फिर गाँठ देता है इस मन्त्रांश को पढ़कर - "इन्द्रस्य ध्रुवोऽसि" (यजु०
५।३०) - "तू इन्द्र का ध्रुव है।" कहीं खुल न जाय। कार्य समाप्त होने पर खोल देता है। इस
प्रकार अध्वर्यु या यजमान रोग-ग्रसित नहीं होते। कार्य की समाप्ति पर वह सदस् को छूता
है, इस मन्त्रांश को पढ़कर - "ऐन्द्रमसि" (यजु० ५।३०) - "तू इन्द्र का है।" क्योंकि सदस् इन्द्र
का ही होता है ॥२५॥
हविर्धानों में से पिछले को देखकर उत्तर की ओर आग्नीध्र शाला बनाता है। इसका
आधा वेदी के भीतर होना चाहिए और आधा बाहर, या आधे से अधिक भीतर हो और आधे
से कम बाहर, या सब भीतर ही हो। जब पूरा हो जाय तो इस मन्त्रांश से उसको छुए - "वैश्व-
देवमसि" (यजु० ५।३०) - "तू सब देवों का है।" यह सब देवों का है ही, क्योंकि इससे पूर्व के
दिन 'विश्वेदेवा' 'वसतीवरी' जलों के पास इसी में बैठते हैं (उप+वास करते हैं) ॥२६॥
एक बार यज्ञ करते हुए देवों को भय हुआ कि असुर राक्षस आक्रमण न करें। असुर