शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-१०
६५४ शतपथ ब्राह्मण
धार॒यन्त॑ ए॒वोपा॑सते॒ऽथ ग्र॒हान्गृ॑ह्णात्यथ॒ यदा॒ ग्र॒हान्गृ॒ह्णात्यथ॒ यत्रै॑वैतस्य कालस्त-
देनग्ं हिंकृत्य॑ सादयति ॥ १॥ तदाहुः । न॒ व्यूहे॒दङ्गान्प्रा॒णा वै ग्र॒हा नेत्प्रा॒णा-
न्मो॒ह॒यानीति॒ मोह्ये॑ड प्रा॒णान्यद्व्यू॒हेत्तस्मान्न॒ व्यूहे॑त् ॥१०॥ तदु॒ व्यूहे॑दे॒व । अ॒-
ङ्गानि॒ वै ग्र॒हाः कामं वा॒ऽङ्गाम॒न्यङ्गानि॒ व्यत्यास॒ग्ं शेते॒ तस्मा॑डु॒ व्यूहे॑दे॒व ॥११॥
तदु॒ नैव॒ व्यूहे॑त् । प्रा॒णा वै ग्र॒हा नेत्प्रा॒णान्मो॒ह॒यानीति॒ मोह्ये॑ड प्रा॒णान्यद्व्यू॒-
हे॒त्तस्मान्न॒ व्यूहे॑त् ॥१२॥ किं नु तत्रा॑ध्र्व॒र्योः । यदुद्गाता च॒ होता॑ च॒ छन्दा॑ग्ंसि
व्यूह॑त ए॒तद्वा॒ऽअध्व॒र्युर्व्यूह॑ति ग्र॒हान्यदैन्द्रवायवा॒ग्रान्प्रातःसव॒ने गृह्णा॑ति शुक्राग्रा-
न्माध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽआग्रयणाग्रांस्तृतीयसवने॑ ॥१३॥ ब्राह्मणम् ॥१ [५. १.] ॥
यदि॒ सोमम॑पह॒रेयुः॑ । वि॒धाव॑ते॒षते॑ति ब्रूयात्स॒ यदि॑ वि॒न्दन्ति॒ किमा॒द्रियेर॒न्यद्यु॑
न वि॒न्दन्ति॒ तत्र प्राय॑श्चित्तिः क्रियते ॥१॥ द्वयानि॒ वै फाल्गु॒नानि॑ । लो॒हितपु-
ष्पाणि चारु॑णपुष्पाणि च स॒ यान्यरु॑णपुष्पाणि फाल्गु॒नानि॒ तान्य॑भिषुणुयादे॒ष
वै सो॑मस्य॒ न्यङ्गो॒ यदरु॑णपुष्पाणि फाल्गु॒नानि तस्मादरु॑णपुष्पाण्य॒भिषु॑णुयात् ॥२॥
यद्य॑रु॒णपु॑ष्पाणि॒ न वि॒न्देयुः॑ । श्ये॒नहृत॑मभिषुणुयाद्यत्र॒ वै गाय॒त्री सो॑मम॒हापत-
त्तस्या॑ऽआच्छु॒रन्त्यै॒ सोम॒स्या॑ऽशुरप॑तत्तच्छ्ये॒नहृ॑तमभवत्तस्माच्छ्ये॒नहृ॑तमभिषुणुयात् ॥३॥
यदि॑ श्ये॒नहृतं॒ न वि॒न्देयुः॑ । आदा॒रान॑भिषुणुयाद्यत्र॒ वै य॒ज्ञस्य॒ शिरो॑ऽछिद्यत॒ तस्य॒
यो र॑सो व्य॒प्रुष्य॒त्तत॑ आदा॒राः सम॑भवंस्तस्मादादा॒रान॑भिषुणुयात् ॥४॥ यद्यादा॒रान्न॒
वि॒न्देयुः॑ । अ॒रुण॑दूर्वा अ॒भिषु॑णुयादे॒ष वै सो॑मस्य॒ न्यङ्गो॒ यदरु॑णदूर्वास्तस्मादरु॑ण-
दूर्वा॑ अ॒भिषु॑णुयात् ॥५॥ यद्य॑रु॒णदूर्वा॒ न वि॒न्देयुः॑ । अ॒पि याने॒व कांश्च॒ हरि॑ता-
न्कु॒शान॑भिषुणुयात्तत्राप्येकमिव गां दद्यादथावभृथा॒दुदे॑त्य पुनर्दी॒क्षेत पुनर्य॒ज्ञो
ह्ये॑व॒ तत्र॒ प्राय॑श्चित्ति॒रिति॒ नु सोमाप॑हृतानाम् ॥६॥ अथ कलशदि॒राम् । यदि॑
क॒लशो॑ दी॒र्येता॑नुलिप्स॒धमि॑ति ब्रूयात्स॒ यद्यनु॑ल॒भेरन्प्रसृ॑तमात्रं वाऽञ्जलिमात्रं वा
तद॒न्यैरे॑कध॒नैर॒भ्युन्नीय॑ यथाप्रभा॒वं प्र॑चरेयु॒र्यद्यु॒ नानु॑ल॒भेरन्नाग्रयणा॑त्स्र्ये॒व प्रस्कन्द्या-
कां० ४, अ० ५, ब्रा० ६-१०, कं० ६-१३ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६५५
जाय। यदि रख देगा तो अवश्य ही प्राणों में विक्षोभ उत्पन्न कर देगा। उसको लिये-लिये बैठे
रहते हैं और अध्वर्यु अन्य ग्रहों को लेता रहता है। जब पारी आती है तो उस-उस ग्रह को हिंकार
बोलकर रख देता है ॥६॥
कुछ लोग कहते हैं कि ग्रहों का क्रम नहीं बदलना चाहिए। ग्रह प्राण हैं। कहीं ऐसा न
हो कि प्राणों का क्रम बदल जाय। जब इनके ग्रहों का क्रम बदलेगा तो प्राणों में अवश्य ही
विक्षोभ होगा। इसलिए ग्रहों के क्रम को न बदले ॥१०॥
परन्तु उसको बदल देना चाहिए, क्योंकि ग्रह अंग हैं और सोते में इच्छा होती है कि
अंगों को एक ओर से दूसरी ओर को फेरा जाय। इसलिए क्रम को बदल देना उचित है ॥११॥
उनको कभी न बदलें। ग्रह प्राण हैं। कहीं प्राणों में गड़बड़ न हो जाय। क्योंकि जब वह
ग्रहों को बदलेगा तो अवश्य ही प्राणों में गड़बड़ होगी। इसलिए न बदलना चाहिए ॥१२॥
अच्छा, जब उद्गाता और होता छन्दों के क्रम को बदलें तो अध्वर्यु क्या करे? प्रातः-
सवन में वह ऐन्द्रवायव ग्रह को लेता है, दोपहर के सवन में शुक्र ग्रह को और तीसरे सवन में
आग्रयण ग्रह को। इस प्रकार अध्वर्यु ग्रहों के क्रम को बदल देता है ॥१३॥
सोमापहरणादि
अध्याय ५—ब्राह्मण १०
यदि सोम चोरी जाय तो कहना चाहिए कि 'दौड़ो और तलाश करो।' यदि मिल जाय
तो अच्छा ही है। परन्तु यदि न मिले तो इस प्रकार इसका प्रायश्चित्त हो जाता है ॥१॥
फाल्गुन वृक्ष दो प्रकार का होता है—लोहित-पुष्प और अरुण-पुष्प। जो अरुण-पुष्प
फाल्गुन हों उनको निचोड़े, क्योंकि जो अरुण-पुष्प के फाल्गुन हैं वे सोम के समान होते हैं।
इसलिए उन्हीं फाल्गुनों को पीसना चाहिए जिनके अरुण-पुष्प हों ॥२॥
यदि अरुण फूलवाले न मिलें तो श्येनहृत वृक्ष को निचोड़ना चाहिए। जब गायत्री सोम
को लेने के लिए उड़ी और ला रही थी तो सोम की एक डाली उससे गिर पड़ी, वही श्येनहृत
वृक्ष बन गई। इसीलिए श्येनहृत वृक्ष को निचोड़ना चाहिए ॥३॥
यदि श्येनहृत भी न मिले तो आदार वृक्ष को लेना चाहिए। जब यज्ञ का शिर काटा
गया तो उससे जो रस बहा उससे आदार वृक्ष उगा। इसलिए आदार वृक्ष को निचोड़ना
चाहिए ॥४॥
यदि आदार वृक्ष न मिले तो अरुण दूर्वा को पीसे। अरुण दूर्वा सोम के सदृश होती है।
इसलिए अरुण दूर्वा को पीसना चाहिए ॥५॥
यदि अरुण दूर्वा न मिले तो कैसे ही हरित कुशों को पीस डाले। परन्तु एक गाय भी
दान करे और अवभृथ स्नान के पीछे दीक्षा भी ले। सोम के चोरी जाने का यही प्रायश्चित्त है
कि यह दूसरा यज्ञ रचा जाय ॥६॥
जिनका कलश टूट जाय उनका क्या कहना? जब कलश टूट जाय तो कहना चाहिए कि
'इसे पकड़ो।' यदि मुट्ठी-भर या पसों-भर सोम मिल जाय तो एक-धन पात्र से पानी मिलाकर
यथाशक्ति काम निकालना चाहिए। परन्तु यदि कुछ भी न मिल सके तो आग्रयण में से कुछ
लेकर दूसरे एक-धन पात्रों में से पानी मिलाकर यथाशक्ति काम निकालना चाहिए। यदि