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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-६

माः॑ प्र॒जा अनु॑ प्र॒जाय॑न्ते समा॒नमु॑पा॒ꣳ॒श्वन्त॑र्या॒मयोः॑ शु॒क्रपा॒त्रमृ॑तुपा॒त्रमा॑ग्रय॒णपा॒त्रमु॑-
क्थ्यपा॒त्रं प॒ञ्च वाऽऋ॒तवः॑ सं॑वत्स॒रस्य॑ सं॑वत्स॒रः प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाप॑तिर्य॒ज्ञो यद्यु॒ ष-
डे॒वर्त्तवः॑ सं॑वत्स॒रस्येत्या॑दित्यपा॒त्रमे॒वैते॑षा॒ꣳ ष॒ष्ठम् ॥ १२॥ एक॒ꣳ ह्वेव तत्पा॒-
त्रम् । यदि॒माः प्र॒जा अनु॑ प्र॒जाय॑न्त॒ऽउपा॒ꣳ॒शुपा॒त्रमे॒व प्रा॒णो ह्यु॑पा॒ꣳ॒शुः प्रा॒णो हि
प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाप॑तिꣳ ह्ये॒वे॒दꣳ सर्व्व॒मनु॑ ॥ १३॥ ब्राह्म॒णम् ॥ ६ [५. ५.] ॥
ए॒ष वै प्र॒जाप॑तिः । य ए॒ष य॒ज्ञस्ताय॑ते॒ यस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाता ऋ॒त्वेवाप्ये॒-
तर्ह्यनु॑ प्र॒जाय॑न्ते॒ स आ॒श्वि॒नं ग्र॒हं गृ॑ही॒त्वाव॑का॒शान॑वका॒शय॑ति ॥ १॥ स उपा॒ꣳ॒-
शुमे॒व प्र॑थमम॑वका॒शय॑ति । प्रा॒णाय॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्यथो॑पा॒ꣳ॒शुसव॑नं
व्या॒नाय॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्य॑था॒न्तर्या॒ममु॑दा॒नाय॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वे॒-
त्यथै॑न्द्रवा॒यवं॑ वा॒चे मे॑ वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्यथ॑ मैत्रावरु॒णं क्रतु॑द॒क्षाभ्यां॑ मे व-
र्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्यथा॑श्वि॒नꣳ श्रोत्रा॑य मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्यथ॑ शु॒क्राम॒-
न्थिनौ॑ चक्षु॑र्भ्यां मे वर्चो॒दसौ॒ वर्च॑से पवेथामिति॑ ॥ २॥ अथा॑ग्रय॒णम् । आ॒त्मने॑
मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्यथो॒क्थ्यमो॑जसे मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्यथ॑ ध्रु॒वमायु॑षे
मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्वेत्या॑म्भृ॒णौ विश्वा॑भ्यो मे प्र॒जाभ्यो॑ वर्चो॒दसौ॒ वर्च॑से प-
वेथा॒मिति॑ वैश्वदे॒वौ वा॒ऽअम्भृ॑णा॒वतो॒ हि दे॒वेभ्य॒ उन्न॑य॒न्तो म॑नु॒ष्येभ्यो॒ऽतः पि॑-
तृभ्य॒स्तस्मा॑द्वैश्वदे॒वाव॑म्भृ॒णौ ॥ ३॥ अथ द्रो॑णकल॒शम् । को॑ऽसि कत॒मो॑ऽसीति॑
प्र॒जाप॑ति॒र्वै कः कस्या॑सि॒ को ना॑मासीति प्र॒जाप॑ति॒र्वै को नाम॒ यस्य॑ ते॒ नामाम॑-
न्महीति॑ म॒नु॒ते॒ ह्य॑स्य॒ नाम॒ यं त्वा॒ सोमे॑नाती॒तृपा॒मेति॑ त॒र्पय॑ति॒ ह्येनꣳ॒ सोमे॑न॒ स
आ॒श्वि॒नं ग्र॒हं गृ॑ही॒त्वान्व॑ङ्गमा॒शिष॒माशा॑स्ते सुप्र॒जाः प्र॒जाभिः॑ स्या॒मिति॒ तत्प्र॒जामा॑-
शा॑स्ते सु॒वीरो॑ वी॒रैरि॑ति॒ तद्वी॒रानाशा॑स्ते सु॒पोषः॒ पोषै॒रिति॒ तत्पुष्टि॒माशा॑स्ते
॥ ४॥ तान्वै॑ न स॒र्व्वमि॑वावका॒शये॑त् । यो न्वे॑व ज्ञा॒तस्तम॑वका॒शये॒द्यो वा॑स्य प्रि॒-
यः स्या॒द्यो वा॑नूचा॒नो॑ऽनू॒क्तेनै॑ना॒न्प्राप्नु॑या॒त्स आ॒श्वि॒नं ग्र॒हं गृ॑ही॒त्वा कृ॒त्स्नं य॒ज्ञं

कां० ४, अ० ५, ब्रा० ५-६, कं० १२-१३ व १-५ शतपथब्राह्मण / ६४५
एक हुआ, शुक्र पात्र, ऋतु पात्र, आग्रयण पात्र, उक्थ्य पात्र । साल की पाँच ऋतुएं होती हैं ।
वर्ष प्रजापति है, प्रजापति यज्ञ है। अगर कहें कि संवत्सर में छः ऋतुएं होती हैं तो छठा आदित्य
ग्रह भी तो है ।।१२।।
वस्तुतः एक ही पात्र है जिसके पीछे प्रजाएँ लाई जाती हैं, अर्थात् उपांशु पात्र । उपांशु
प्राण है, प्रजापति प्राण है, और इस संसार में प्रत्येक वस्तु प्रजापति के पीछे है ।।१३।।
ग्रहावेक्षणम्
अध्याय ५-ब्राह्मण ६
यह जो यज्ञ किया जाता है यही प्रजापति है, इसी से प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं और इसी से
आज तक उत्पन्न होती हैं। आश्विन ग्रह को लेने के पश्चात् वह अवकाश कृत्य को करता है
(अर्थात् ग्रहों को देखना) ॥१॥
पहले उपांशु ग्रह का अवकाशन करता है, इस मन्त्र से—"प्राणाय मे वर्चोदा वर्चसे
पवस्व" (यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के दाता, मेरे प्राण के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।"
उपांशु सवन को इस मन्त्र से—"व्यानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) - "व्यान
के लिए, हे वर्चस् के लिए दाता, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" फिर अन्तर्याम को इस मन्त्र से—
"उदानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) – “हे वर्चस् के देनेवाले, उदान के लिए,
वर्चस् के लिए पवित्र हो।" फिर ऐन्द्रवायव को इस मन्त्र से-"वाचे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व"
(यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के देनेवाले, वाणी के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब मैत्रा-
वरुण को इस मन्त्र से - "ऋतुदक्षाभ्यां मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के
देनेवाले, विचार और क्रिया दोनों के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब आश्विन को-
"श्रोत्राय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) - "हे वर्चस् के देनेवाले, श्रोत्र के लिए, वर्चस्
के लिए पवित्र हो।" अब शुक्र और मन्थिन् ग्रहों को इस मन्त्र से - "चक्षुर्भ्यां मे वर्चोदसौ वर्चसे
पवेथाम्” (यजु० ७।२७) - "हे वर्चस् के देनेवाले, तुम दोनों आँखों के लिए, वर्चस् के लिए
पवित्र हो" ॥२॥
अब आग्रयण को इस मन्त्र से - "आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) –
"हे वर्चस् के दाता, मेरे आत्मा के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब उक्थ्य को इस मन्त्र से-
"ओजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) - "मेरे ओज के लिए, हे वर्चस् के दाता, वर्चस्
के लिए पवित्र हो।" अब ध्रुव को- "आयुषे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व" (यजु० ७।२८) - "हे वर्चस्
के दाता, मेरी आयु के लिए, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" अब आम्भृण अर्थात् पूतभृत् और आध-
वनीय को- "विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्" (यजु० ७।२८) - "मेरी सब
प्रजाओं के लिए, हे वर्चस् के देनेवालो, वर्चस् के लिए पवित्र हो।" ये दो पात्र विश्वेदेवों के हैं।
क्योंकि इन्हीं में से सोम निकाला गया है— मनुष्य के लिए भी और पितरों के लिए भी, इसलिए
ये दो पात्र विश्वेदेवों के हैं ॥३॥
अब द्रोण कलश को - "कोऽसि कतमोऽसि" (यजु० ७।२६) – 'कः' प्रजापति है।
"कस्यासि को नामासि" (यजु० ७।२६) - 'को' नाम प्रजापति का है। "यस्य ते नामामन्महि"
(यजु० ७।२६) - "जिस तेरे नाम का हम चिन्तन करते हैं।" वस्तुतः वह उसके नाम का चिन्तन
करता है। "यं त्वा सोमेनातीतृपाम" (यजु० ७।२६) - "जिस तुझको मैंने सोम से तृप्त किया।"
वह इनको सोम से तृप्त करता है। आश्विन ग्रह को लेकर एक-एक अंग को आशीर्वाद कहता
है— "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याम" (यजु० ७।२६) – 'सन्तानों से युक्त होऊँ।" इस प्रकार वह
सन्तान के लिए प्रार्थना करता है। "सुवीरो वीरैः" (यजु० ७।२६) – "वीरों के द्वारा सुवीर
होऊँ।" इस प्रकार वीरोंके लिए प्रार्थना करता है। "सुपोषः पोषैः" (यजु० ७।२६) - "सम्पुष्टि-
दायक पदार्थों द्वारा सुपोष होऊँ।" इस प्रकार पुष्टि के लिए प्रार्थना करता हूँ ॥४॥
सबसे अवकाशन न कराये। केवल उसी से जो ज्ञात हो, या जो अपना प्रिय हो, या
जिसने वेद-पाठ द्वारा अपने को ऋचाओं से युक्त किया हो। आश्विन ग्रह को लेकर वह सब यज्ञ