शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-४
५६० शतपथ ब्राह्मण
षैष ते॒ योनि॑र्म॒हेन्द्रा॑य॒ त्वेति॑ सादयति महेन्द्रा॑य ह्ये॒नं गृ॒ह्णाति॑ ॥ १८ ॥ अथोपा-
कृत्यै॒तां वाचं॑ वदति । अ॒भिषोतारो॒ऽभिषु॑णु॒तोलू॑खलान्नु॒द्वाद॑यता॒शीरा॑शिरं॒ विन॑य
सौ॒म्यस्य॑ वि॒त्तादि॑ति ते वै तृतीयसवनायैवाभिषोतारोऽभिषुण्वन्ति तृतीयसवना-
यो॑लूखलान्नु॒द्वाद॑यन्ति तृतीयसवना॒याशीरा॑शिरं॒ विन॑यन्ति तृतीयसवनाय सौम्यं
च॒रुग्ं॑ श्रपयन्त्ये॒ते वै शु॑क्रमती र॒सव॑ती॒ सव॑ने॒ यत्प्रा॑तः॒सवनं॑ च माध्यन्दिनं॑ च स-
वन॒मथैत॒न्निऋ॑तिशुक्रं॒ यत्तृतीयसवनं॒ तद्देवैतस्मान्माध्यन्दिनात्स॒वनान्निर्मि॒मीते॒ तथो
हा॒स्यैतच्छुक्रव॒द्रसव॑त्तृतीयसवनं॑ भवति॒ तस्मादे॒तामत्र॒ वाचं॑ वदति ॥ १९ ॥ ब्राह्म-
णम् ॥ ७ [३. ३.] ॥ द्वितीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १३१ ॥ ॥
घ्नन्ति॒ वाऽए॒तद्य॒ज्ञम् । यदे॑नं त॒न्वते॒ यन्त्वे॑व॒ राजानम॒भिषु॑ण्व॒न्ति तत्त्ं॑ घ्नन्ति॒
यत्पशुं॑ सं॒ज्ञपय॑न्ति वि॒शास॑ति तत्त्ं॒ प्रत्युलू॑खलमुसला॒भ्यां दृषदुप॒लाभ्याग्ं॑ ह॒-
विर्य॒ज्ञं घ्नन्ति॑ ॥ १ ॥ स ए॒ष य॒ज्ञो ह॒तो न द॑द॒भे । तं दे॒वा द॑क्षिणाभि॒रद॑क्षयंस्त-
द्यदेनं॒ दक्षि॑णाभि॒रद॑क्षयं॒स्तस्माद्दक्षि॑णा नाम॒ तय्द्येवात्र॑ य॒ज्ञस्य॒ ह॒तस्य॒ व्यथ॑ते॒ त-
द्दे॒वास्तैतद्दक्षि॑णाभि॒र्दक्ष॑यन्त्यथ॒ समृ॑द्ध ए॒व य॒ज्ञो भ॑वति॒ तस्माद्दक्षि॑णा ददाति ॥ २॥
तद्वै षड्द्वादशेत्येव हविर्यज्ञे ददति । न ह त्वे॑वाशतदक्षिणाः सौम्योऽध्वरः स्यादेष
वै प्र॒त्यक्षं॑ य॒ज्ञो यत्प्र॒जाप॑तिः पुरु॑षो वै प्र॒जाप॑तेर्नेदि॑ष्ठग्ं॒ सोऽयग्ं शतायुः श॒त-
तेजाः श॒तवी॑र्य्यस्तग्ं श॒तेनै॒व दक्ष॑यति॒ नाशतेन॒ तस्मान्नाशतदक्षिणः सौम्योऽध्वरः
स्यान्नो हैवाशतदक्षिणेन यजमानस्यऽर्त्विक्स्यान्निदस्यान्निर्भूरिसानि धिमिहे हनि-
ष्यन्नेव न दत्तयिष्यन्तीति ॥ ३॥ द्वया वै देवा देवाः । अहैव देवा अथ ये ब्रा-
ह्मणाः शुश्रुवाग्ंसोऽनूचानास्ते मनुष्यदेवास्तेषां द्वेधाविभक्त एव यज्ञ आहुतय
एव देवानां दक्षिणा मनुष्यदेवानां ब्राह्मणानाग्ं शुश्रुषुषामनूचानानामाहुतिभि-
रेव देवान्प्रीणाति दक्षिणाभिर्मनुष्यदेवान्ब्राह्मणाञ्छुश्रुवुषोऽनूचानांस्तऽएनमु-
भये देवाः प्रीताः स्वर्गं लोकमभिवहन्ति ॥ ४॥ ता वाऽएताः । ऋत्विजामेव द-
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १८-१९ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६१
त्वा'' (यजु० ७।३६, ऋ० ६।१६।१)—"बड़ा इन्द्र ! नेता के समान, मनुष्य की कामनाओ
की पूर्ति करनेवाला, दुहरे यज्ञोंवाला, अपार बलों के साथ, हमारे सामने बढ़ा वीर्य अर्थात्
पराक्रम से, उस (यशवाला), पृथुः (विस्तृत) यजमानों द्वारा पूज्य हुआ।" यह पढ़कर नीचे
रख देता है— "एष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा" (यजु० ७।३६)— "यह तेरा घर है। महेन्द्र के लिए
तुझको" ॥१८॥
उपाकरण करके यह वचन बोलता है, 'निचोड़नेवाला, निचोड़ो। मूसलों को जोर से
चलाओ (सोम पीसने के लिए) आग्नीध्र, दही को देख, सोम की ख़बर रख।' ये निचोड़नेवाले
तीसरे सवन के लिए निचोड़ते हैं। तीसरे सवन के लिए ही मूसली चलाते हैं। तीसरे सवन के
लिए ही आग्नीध्र दही को बिलोता है। तीसरे सवन के लिए ही सोम के चरु को पकाता है। ये
जो दो सवन थे अर्थात् प्रातः और दोपहर के, ये तो शुक्र और रसवाले थे। परन्तु तीसरा सवन
शुक्र-रहित हो जाता है। इसलिए दोपहर के संवन से इसको बनाता है। इस प्रकार यह तीसरा
सवन शुक्र और रसवाला हो जाता है। इसीलिए इस वाणी को इस समय बोलता है ॥१९॥
दाक्षिणहोमो दक्षिणादानञ्च
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
अब इस यज्ञ का वध करते हैं। जब यज्ञ में सोम राजा को कुचलते हैं तो मानो उसका
वध करते हैं। जैसे पशु को काटते हैं तो उसका वध करते हैं, इसी प्रकार ओखली और मूसल से
या दो पाटों से यज्ञ की हवि का वध किया जाता है ॥१॥
जब इस यज्ञ का वध हो गया तो उसकी शक्ति जाती रही, तब देवों ने दक्षिणाओं द्वारा
पूरा किया। यह यज्ञ दक्षिणाओं द्वारा दक्ष हो गया। इसलिए इसका नाम दक्षिणा पड़ा (दक्ष
बनानेवाली)। यहाँ यज्ञ के वध होने से जो कुछ कमी आ जाती है उसकी वह दक्षिणाओं से
पूर्ति कर देता है। यज्ञ पूर्ण हो जाता है। इसलिए वह दक्षिणा देता है ॥२॥
हविर्यज्ञ में छः या बारह गायें दक्षिणा में दी जाती हैं। परन्तु सोम यज्ञ में सौ से कम
नहीं। यह जो प्रजापति है वह प्रत्यक्ष यज्ञ है। पुरुष प्रजापति का निकटतम है। इसकी सौ वर्ष
की आयु, सौ गुना तेज और सौ गुना पराक्रम होता है। सौ से ही वह इसको शक्ति-सम्पन्न
करता है, सौ से कम से नहीं। इसलिए सोम यज्ञ में सौ गायों की दक्षिणा देनी चाहिए, और न
किसी को ऐसे यज्ञ में ऋत्विक् बनना चाहिए जहाँ सौ से कम गायें दक्षिणा में दी जायें, कि
कहीं मैं ऐसी क्रिया का साक्षी न हो जाऊँ जहाँ यज्ञ का वध तो किया जाता है परन्तु उसकी पूर्ति
नहीं की जाती ॥३॥
देव दो प्रकार के हैं—एक तो देव और दूसरे मनुष्य-देव, जो ब्राह्मण, वेदशास्त्र पढ़े
हुए। इसलिए यज्ञ भी दो भागों में विभक्त है। देवों की आहुतियां हैं और मनुष्यदेवों की
अर्थात् उन ब्राह्मणों की जो वेद-शास्त्र पढ़े हुए हैं दक्षिणा है। आहुतियों से देवों को प्रसन्न किया
जाता है और मनुष्य-देव अर्थात् वेदशास्त्र पढ़े हुए ब्राह्मणों को दक्षिणाओं से। इस प्रकार दोनों
देव प्रसन्न होकर यजमान को स्वर्गलोक में ले जाते हैं ॥४॥
यह दक्षिणा केवल ऋत्विजों की ही होती है। यह जो ऋक्, यजुः और साम और
५६२ शतपथ ब्राह्मण
क्षिणा॒ अन्यं॒ वाऽए॒तऽए॒तस्या॒त्मानग्ं॒ सं॒स्कुर्वन्त्ये॒तं य॒ज्ञमृ॒ङ्मयं॑ य॒जुर्म॒यग्ं॒ साम॑मय-
मा॒हुति॑मयग्ं॒ सो॒ऽस्यामु॒ष्मिंल्लो॒केऽन्ना॒त्मा॑ भवति॒ तद्ये माऽजी॑जन॒न्नेति॒ तस्मा॑दृ॒त्विग्भ्य॑
ए॒व दक्षि॑णा दद्या॒न्नानृ॑त्वि॒ग्भ्यः ॥५॥ अथ प्रति॒परे॑त्य गा॒र्हप॑त्यम् । दा॒क्षि॒णानि॑
जु॒हो॒ति॒ स दशा॑ल्होमी॒ये वास॑सि॒ हिर॑ण्यं प्र॒बध्या॑व॒धाय॑ जुहोति देवलो॒के मेऽप्य॑-
स॒दिति॒ वै य॑जते॒ यो यज॑ते॒ सो॒ऽस्यैष य॒ज्ञो दे॑वलो॒कमे॒वाभि॒प्रेति॒ तद॒नूची॒ दक्षि॑णा
यां ददा॑ति॒ सैति॒ दक्षि॑णाम॒न्वार॑भ्य॒ यज॑मानः ॥६॥ चत॑स्रो॒ वै दक्षि॑णाः । हिर॑ण्यं
गौर्वासो॒ऽश्वो॒ न वै तद॑वकल्पते॒ यदश्व॑स्य पा॒दम॑वद॒ध्याद्यद्वा॒ गोः पा॒दम॑वद॒ध्यात्-
स्माद्दशा॑ल्होमी॒ये वास॑सि॒ हिर॑ण्यं प्र॒बध्या॑व॒धाय॑ जुहोति ॥७॥ सौ॒रीभ्या॒मृग्भ्यां॑ जु-
होति । तम॑सा॒ वाऽअसौ॑ लो॒कोऽन्त॑र्हितः॒ स ए॒तेन॒ ज्योति॑षा॒ तमो॒ऽपह॑त्य
स्व॒र्गं लो॒कमुप॑संक्रामति॒ तस्मात्सौ॒रीभ्या॒मृग्भ्यां॑ जुहोति ॥८॥ स जु॑होति । उदु॒
त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑ । दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्यग्ं॒ स्वाहेत्ये॑तया गाय॒त्र्या
गाय॒त्री वाऽइ॒यं पृ॑थि॒वी सेयं प्रति॑ष्ठा॒ तद॒स्यामे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति ॥९॥
अथ द्वि॒तीयां॑ जुहोति । चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः । आप्रा॒
द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्षग्ं॒ सूर्य॑ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च॒ स्वाहेत्ये॑तया त्रि॒ष्टुभा॑ लो॒-
कमे॒वैत॒योप॒प्रेति॑ ॥१०॥ अथा॒ग्नीध्रे॑ । द्वे वैकां॑ वा जुहोति॒ तद्यद॑त्रावा॒ग्नीध्रे॒ द्वे वै-
कां वा जु॒होत्य॒ग्निर्वे प॒शूना॒मीष्टे॒ तऽए॑नम॒भितः॒ परि॑णिविशन्ते॒ तमे॒तयाऽऽहु॑त्या प्री-
णाति॒ सो॒ऽस्मै प्री॒तोऽनु॑मन्यते॒ तेना॑नुम॒तां द॑दाति ॥११॥ स जु॑होति । अग्ने॒ नय॑
सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्य॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भू-
यिष्ठां॑ ते॒ नम॑उक्तिं विधेम॒ स्वाहेत्यथ॒ यद्यश्वं॑ यु॒क्तं वाऽयु॑क्तं वा दा॒स्यन्त्स्या॒दथ॑ द्वि-
तीयां॑ जुहुया॒द्यद्यु॒ न नाद्रि॑येत ॥१२॥ स जु॑होति । अ॒यं नो॒ऽअ॒ग्निरु॒र्वरि॑वस्कृणो-
त्वयं॒ मृधः॑ पु॒र ए॑तु प्रभि॒न्दन् । अ॒यं वाजा॑ञ्जयतु॒ वाज॑साताव॒यग्ं॒ शत्रू॑ञ्जयतु॒ जर्हृ॑-
षा॒णः स्वाहेति॒ वाज॑सा॒ ह्यश्वः॑ ॥१३॥ अथ॒ हिर॑ण्यमा॒दाय॒ शाला॑म॒भ्येति॑ । दक्षि॑-
कॉ० ४, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / ५६३
आहुतिमय यज्ञ है, यह यजमान का मानो एक नया आत्मा बनाया जाता है। यह इसका परलोक
में आत्मा होता है। इस आत्मा को इन्हीं ऋत्विजों ने बनाया है। इसलिए यह दक्षिणा ऋत्विजों
की ही होनी चाहिए, उनकी नहीं जो ऋत्विज न हों ॥५॥
गार्हपत्य के पास जाकर दक्षिणा की आहुति देता है। झालरदार कपड़े में सोने का
टुकड़ा बाँधकर और उसे चमसे में रखकर आहुति देता है यह कहकर कि 'देवलोक में मेरा
स्थान हो।' जो कोई यज्ञ करता है वह इसलिए करता है कि यह यज्ञ देवलोक को जाता है। और
जो दक्षिणा देता है वह भी देवलोक को जाती है। और दक्षिणा से लगा हुआ यजमान भी
जाता है ॥६॥
चार प्रकार की दक्षिणा होती है-सोना, गौ, कपड़ा और घोड़ा। यह उचित नहीं है कि
घोड़े के पैर को चमसे में रख दे या गौ के पैर को। इसलिए झालरदार कपड़े में सोना बाँधकर
रखता है और उसकी आहुति देता है ॥७॥
सूर्य की दो ऋचाओं से आहुति देता है। सूर्य की दो ऋचाओं से आहुति इसलिए देता
है कि वह (पर) लोक अन्धकार से छिप गया है। वह ज्योति से अन्धकार को हटाकर स्वर्ग-
लोक को जाता है ॥८॥
इस आहुति के मन्त्र ये हैं, “उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय
सूर्य्यं॒ स्वाहा" (यजु० ७।४१, ऋ० १।५०।१) - “ये प्रकाश की किरणें उस सूर्य्य जातवेद
देव सूर्य्य तक ले जाती हैं, सर्वत्र विश्व को दिखाने के लिए।" इस गायत्री से। यह पृथिवी
गायत्री है। यह पृथिवी प्रतिष्ठा है। इसी प्रतिष्ठा में वह प्रतिष्ठित होता है ॥६॥
दूसरी आहुति का मन्त्र यह है, “चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आप्रा द्यावापृथिवी ऽ अन्तरिक्षं॒ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा" (यजु० ७।४२)-
"विचित्र (आश्चर्य-युक्त) देवों अर्थात् प्रकाशों का अनीक अर्थात् समूह उदय होता है। यह मित्र,
वरुण और अग्नि की आंख है अर्थात् इसी से सब प्रकाश को लेते हैं। यह सूर्य द्यौ, पृथिवी और
अन्तरिक्ष में फैल जाता है। यह जंगम और स्थावर जगत् का आत्मा है। यह त्रिष्टुभ् है। इसके
द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त करता है ॥१०॥
अब अग्नीध्र में एक या दो आहुति देता है। अग्नीध्र में एक या दो आहुतियाँ इसलिए
देता है कि अग्नि पशुओं पर राज करता है। ये पशु उसको चारों ओर से घेर लेते हैं। उस
अग्नि को इस आहुति से प्रसन्न करता है। वह अग्नि इससे प्रसन्न होकर अनुमति देता है।
अनुमति से वह (गाय की) दक्षिणा देता है ॥११॥
आहुति का मन्त्र यह है, "अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि
विद्वान्। युयोध्यस्मज् जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽउक्तिं विधेम स्वाहा" (यजु० ७।४३, ऋ०
१।१८६।१) - "हे अग्नि ! धन के लिए हमको ठीक मार्ग पर ले चल। हे देव, तू सब कर्मों को
जानता है। हमको पाप से बचा कि हम तेरी बहुत-बहुत स्तुति कर सकें।" अब यदि युक्त (सजे
हुए) या अयुक्त (बेसजे) घोड़े को देना चाहे तो एक और आहुति पढ़े, अन्यथा नहीं ॥१२॥
वह आहुति का मन्त्र यह है, "अयं नो ऽ अग्निव॑रिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्।
अयं वाजान् जयतु वाजसातवयँ॒ शत्रून् जयतु जहृ॑षाणोः स्वाहा" (यजु० ७।४४)- "यह अग्नि
होम को धन (वरिवः = धनं) दे। यह युद्धों का भेद न करते हुए आगे बढ़े। यह अन्नों को जीते।
यह जोश में आकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे।" घोड़ा विजय प्राप्त करनेवाला है ॥१३॥
अब सोने को लेकर शाला में जाता है। वेदी के दक्षिण की ओर दक्षिण की गौएँ खड़ी
५६४ शतपथ ब्राह्मण
णेन॒ वेदिं॒ दक्षि॑णा उप॒तिष्ठ॑न्ते सोऽग्रे॑ण शालां॒ तिष्ठ॑न्नभिम॒न्त्रय॑ते रूपे॑ण वो रू॒प-
म॒भ्यागा॒मिति॑ न ह वाऽअ॒ग्रे पश॑वो दा॒नाय॑ चक्षमि॒रे तेऽप॑निधाय॒ स्वानि॑ रू॒पा-
णि श॒रीरैः प्रत्यु॒पाति॑ष्ठन्त॒ ताने॒तद्देवाः स्वैरे॒व रूपै॒र्यज्ञस्यार्धाद॒पाय॑ꣳस्ते॒ स्वानि॑ रू॒-
पाणि॑ जाना॒ना अ॒भ्यवा॑यंस्ते रा॒तमन॑सोऽलं दा॒नाया॑भवंस्त॒थोऽए॒वैना॑ने॒ष ए॒तत्स्वै॑-
रे॒व रूपै॒र्यज्ञस्यार्धादुपै॑ति॒ ते स्वानि॑ रू॒पाणि॑ जाना॒ना अ॒भ्यवा॑यन्ति॒ ते रा॒तमन॑सो
ऽलं दा॒नाय॑ भवन्ति ॥ १४॥ तुथो॑ वो वि॒श्ववे॑दा वि॒भज॒त्विति॑ । ब्रह्म॒ वै तुथस्त॑-
दे॒ना ब्रह्म॑णा वि॒भज॑ति ब्रह्म॒ वै दक्षि॑णीयं चाद॑क्षिणीयं च वेद॒ तथो॒ हास्यै॑ता
दक्षि॑णीयायै॒व दत्ता भव॑न्ति॒ नाद॑क्षिणीयाय ॥ १५॥ ऋ॒तस्य॑ प॒था प्रेतेति॑ । यो वै
दे॒वानां॒ पन्थाः स ऋ॒तस्य॒ पन्था॑ति चन्द्र॒दक्षि॑णा इति॒ तदे॒तेन॒ ज्योति॑षा यन्ति
॥ १६॥ अथ॒ सदो॒ऽभ्ये॑ति । वि॒ स्वः प॑श्य॒ व्य१॒॑न्तरि॑क्षम॒ति वि ब्रूया दक्षि॑णाया लो॒-
कं ख्ये॑षमि॒त्येवैतदा॑ह ॥ १७॥ अथ॒ सदः॒ प्रेक्ष॑ते । यत॑स्व सद॒स्यैरि॑ति॒ मा वा स-
दस्॑या अ॑ति॒रिक्तेत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १८॥ अथ हिर॑ण्यमादा॒याग्नीध्रम॒भ्ये॑ति । ब्राह्म॒णम॒-
द्य वि॑देयं पितृ॒मन्तं॑ पैतृम॒त्यमिति॒ यो वै ज्ञातो ज्ञा॑तकुलीनः॒ स पि॑तृमा॒न्पैतृ॑म॒त्यो
यां वै ज्ञाता॑यापि कतिपयै॒र्द्दक्षि॑णा ददा॑ति॒ ताभि॑र्म॒र्द्धयत्यृषि॑मार्षेय॒मिति॒ यो वै
ज्ञातो॒ऽनूचा॑नः॒ स ऋषि॑रार्षेयः सुधातुदक्षि॑ण॒मिति॒ स हि सु॑धातुदक्षि॑णः ॥ १९ ॥
अथै॑वमुपसृ॒द्य । अग्नीध्रे हिर॑ण्यं ददात्यस्मद्राता दे॒वत्रा ग॑च्छ॒तेति॒ यां वै रा॒तम॑ना
अ॑विचिकित्स॒न्दक्षि॑णां ददा॑ति तया म॒र्द्धय॑ति दे॒वत्रा ग॑च्छ॒तेति॑ देवलो॒के मेऽप्य॑-
सदिति॒ वै यज॑ते यो यज॑ते॒ तद्देवलो॒कऽए॒वैन॑मेतद॒पिवि॑नं करोति प्रदा॒तार॒मावि॑-
शतेति॒ मामा॑विशति॒त्येवैतदा॑ह तथो॒ हास्मादेताः पराच्यो न प्रणाश्य॑न्ति तद्यद॒ग्नी-
ध्रे प्रथ॑माय॒ दक्षि॑णां ददा॑त्य॒तो हि विश्वे॑ दे॒वा अ॒मृत॑त्वम॒पाज॑यंस्तस्माद॒ग्नीध्रे॑ प्रथ॒-
माय॒ दक्षि॑णां ददा॑ति ॥ २०॥ अथै॑वमे॒वोप॑सृद्य । आत्रेयाय॒ हिर॑ण्यं ददाति यत्र
वाऽअ॒दः प्रा॑तरनुवाक॒मन्वा॒हुस्तद॑ स्मैतत्पु॒रा शꣳस॒त्यत्र॑िर्वाऽऋषीणाꣳ होता॑सा-
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ४, क० १४-२१ शतपथब्राह्मण / ५९५
रहती हैं। वह शाला के आगे खड़े होकर उनको सम्बोधन करता है, "रूपेण वो रूपमभ्यागाम्"
(यजु० ७।४५) — "तुम्हारे रूप से मुझे रूप मिला।" पहले-पहल पशु दान में दान दिये जाने के
लिए राजी नहीं हुए। वे अपने रूपों को अलग रखकर केवल (नंगे) शरीरों के द्वारा खड़े हो
गये। देव यज्ञ से उन पशुओं के अपने रूपों को ले गए। उन्होंने अपने इन रूपों को पहचाना
और दान के लिए राजी हो गये। यह यजमान भी इसी प्रकार यज्ञ के सामने से पशुओं के निज
रूपों को ले जाता है और वे अपने रूपों को पहचानकर दान में दिये जाने के लिए राजी हो जाते
हैं ॥१४॥
"तुथो वो विश्ववेदा विभजतु" (यजु० ७।४५) — "सबको जाननेवाला तुथ (ब्राह्मण)
तुमको बाँटे।" 'तुथ' है ब्राह्मण। इस प्रकार वह ब्राह्मण के द्वारा बँटवाता है। ब्राह्मण जानता
है कि कौन दक्षिणा के योग्य है, कौन नहीं। इस प्रकार ये गायें भी उसी को दी जाती हैं जो
दक्षिणा के योग्य है। उसको नहीं जो दक्षिणा के योग्य न हो ॥१५॥
"ऋतस्य पथा प्रेत" (यजु० ७।४५) — "ऋत के मार्ग से चलो।" जो देवों के मार्ग से
चलता है वह ऋत के मार्ग से चलता है। "चन्द्र (चन्द्र = स्वर्ण) दक्षिणावाली।" ये गायें यजमान
के दिये स्वर्ण की ज्योति से चलती हैं ॥१६॥
अब वह सदस् में जाता है, "वि स्वः पश्य व्यन्तरिक्षं" (यजु० ७।४५) — "स्वर्ग और
अन्तरिक्ष को देख।" अर्थात् तुझ दक्षिणा के द्वारा मैं स्वर्ग को प्राप्त करूँ — यह उसका उद्देश्य
है ॥१७॥
अब सदस् को देखता है, "यतस्व सदस्यैः" (यजु० ७।४५) — "सदस्यों के साथ यत्न
कर।" अर्थात् 'सदस्य तुझसे आगे न बढ़ जाय' ऐसा कहता है ॥१८॥
अब सोने को लेकर आग्नीध्र (अग्निशाला) के पास जाता है, "ब्राह्मणमद्य विदेयं
पितुमन्तं पैतृमत्यम्" (यजु० ७।४६) — "आज मैं पिता और पितामह वाले ब्राह्मण को प्राप्त
करूँ।" जो अच्छे कुल का ब्राह्मण है उसी का नाम पितुमान और पैतृमत्य है। ऐसे घोड़ों को भी
दक्षिणा देता है; उसको बहुत बड़ी विजय प्राप्त होती है। "ऋषिमार्षेयम्" (यजु० ७।४६) —
"जो वेद पढ़ा हुआ है वह ऋषि और आर्षे है।" "सुधातु दक्षिणम्" (यजु० ७।४६) — "अच्छी
दक्षिणावाला।" क्योंकि इसको अच्छी दक्षिणा दी गई है ॥१९॥
अब अग्नीध् के समीप (आदरपूर्वक) बैठकर (उपसद्य) उसे स्वर्ण देता है। "अस्मद्राता
देवत्रा गच्छत" (यजु० ७।४६) — "हमारे द्वारा दिया हुआ तू देवलोक को जावे।" जो
दक्षिणा उदार मन से बिना संकोच के दी जाती है उसका फल बड़ा होता है। 'देवलोक को
जावे' का तात्पर्य यह है कि मेरे लिए देवलोक में स्थान कर दे। जो कोई यज्ञ करता है इस
आश्रय से करता है कि देवलोक को पाऊँ। इस प्रकार वह इसके लिए देवलोक में स्थान कर देता
है। "प्रदातारमाविशत" (यजु० ७।४६) — "दाता में प्रवेश करो।" अर्थात् मुझमें प्रवेश करो।
इस प्रकार उन गायों से वह वंचित नहीं होता। अग्नीध् को दक्षिणा पहले दिये जाने का तात्पर्य
यह है कि देवों ने इसी के द्वारा अमृतत्व को पाया था। इसलिए अग्नीध् को दक्षिणा पहले देता
है ॥२०॥
अब इसी प्रकार जाकर आत्रेय (अत्रि-वंशज एक पुरुष) को स्वर्ण देता है। पहले एक
बार जब वह प्रातरनुवाक को बोल रहे थे तो सामने स्तोत्र भी कह रहे थे। ऋषियों का होता
५६६ शतपथ ब्राह्मण
यैतत्सद॒ोऽसुर॒तमसम॑भिपुप्लुवे तऽऋषयो॒ऽत्रिम॑ब्रुवन्ने॒हि प्रत्य॑ङ्किदं तमो॒ऽपह॒न्हीति॑
स ए॒तत्तमो॒ऽपावह॒न्नयं वै ज्योति॒र्य इदं तमो॒ऽपाबधी॒दिति॒ तस्मा॑दे॒तज्ज्योति॒र्हि-
र॒ण्यं दक्षि॑णामनय॒न्ज्योति॒र्हि हिर॑ण्यं तद्यै स तत्तेज॑सा वी॒र्येणा॒ऽविस्तमो॒ऽपज॒घा-
ना॑थि॒ष ए॒तेनैवैतज्ज्योति॑षा तमो॒ऽपह॑न्ति॒ तस्मा॑दात्रे॒याय॒ हिर॑ण्यं दधाति ॥ २१॥
अथ ब्रह्म॑णे । ब्रह्मा हि यज्ञं दक्षि॑णतो॒ऽभिगोपा॑यत्यथोग्दा॒त्रेऽथ॒ होत्रे॒ऽथा॑ध्व॒र्यु-
भ्यांᳵ हविर्धाने॒ऽस्यासीना॑भ्यामथ पुन॒रेत्य॒ प्रस्तोत्रे॒ऽथ मैत्रावरु॑णाय॒ ब्राह्मणा-
च्छं॑सिने॒ऽथ पोत्रे॒ऽथ नेष्ट्रे॒ऽथाच्छावाका॑याथोन्ने॒त्रेऽथ॒ ग्रावस्तुते॒ऽथ सुब्रह्मण्या॑यै
प्रतिह॒र्त्रेऽउ॑त्तमाय ददाति प्रतिहर्ता वा॒ऽए॒ष सो॒ऽस्माऽए॒तदन्तः प्रतिहर॑ति त॒-
थो हास्मादे॒ताः पराच्यो न प्रण॑श्यन्ति ॥ २२॥ अथैन्द्रा॑य म॒रुत्व॑ते॒ऽनुब्रूहीति॑ ।
यत्र॒ वै प्र॒जाप॑तये॒ ददौ॒ तदे॒न्द्र ई॒क्षां चक्रे॒ सर्वं वा॒ऽअयमि॒दं दास्य॑ति॒ नास्मभ्यं॒
किं च॒न परिशि॑क्ष्यतीति॒ स ए॒तं वज्र॑मुदय॑च्छदिन्द्राय म॒रुत्व॑ते॒ऽनुब्रूहीत्य॑दानाय॒ ततो॒
नाद॑दात्स ए॒षोऽप्ये॑त॒र्हि तथै॑व वज्र उद्य॑म्यत॒ऽइन्द्राय म॒रुत्व॑ते॒ऽनुब्रूहीत्य॑दानाय
ततो॒ न द॑दाति ॥ २३॥ च॒तस्रो वै दक्षि॑णाः । हिर॑ण्यमायु॑रे॒वैते॒नात्मन्त्धाय॑त
ऽआयु॒र्हि हिर॑ण्यं तद॒ग्र्यऽआ॑ग्नीध्रं कुर्वते॒ऽददा॑त्तस्माद्य॒तर्त्व्य॑ग्नीधे॒ हिर॑ण्यं दीयते
॥ २४॥ अथ गौः । प्रा॒णमे॒वैतया॒त्मन्त्धाय॑ते प्रा॒णो हि गौ॒रन्नं॑ हि गौ॒रन्नं॑ हि
प्राणास्ताᳵ रु॒द्राय॒ होत्रे॒ऽददा॑त् ॥ २५॥ अथ वासः । त्वच॑मे॒वैते॒नात्मन्त्धाय॑ते त्व-
ग्धि वास॑स्तद्वृह॒स्पत॑य॒ऽउद्गात्रे॒ऽददा॑त् ॥ २६॥ अथाश्वः । वज्रो वा॒ऽअश्वो वज्र॑मे॒-
वैतत्पुरोगां कुरुते यमलोके ने॒ऽव्यथ॑द॒दिति॒ वै यज॑ते यो यज॑ते तद्यमलोक॒ऽए॒वै-
नमेतद॑पिविनं करोति तं य॒माय॒ ब्रह्म॑णे॒ऽददा॑त् ॥ २७॥ स हिर॑ण्यं प्रत्ये॑ति । अ॒-
ग्नये त्वा मह्यं॒ वरु॑णो ददा॒त्वित्य॒ग्नये ह्ये॑तद्वरु॑णो॒ऽददा॒त्सोऽमृत॑त्वमशीया॒युर्दात्र॒ऽए-
धि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे॒ऽइति॑ ॥ २८॥ अथ गां प्रत्ये॑ति । रु॒द्राय त्वा मह्यं॒ वरु॑-
णो ददा॒त्विति रु॒द्राय ह्ये॑तां वरु॑णो॒ऽददा॒त्सोऽमृत॑त्वमशीय प्रा॒णो दा॒त्र॒ऽएधि॑ वयो
कां ४, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / ५६७
अत्रि था। उस समय सदस् में असुरों का अन्धकार छा गया। ऋषियों ने अत्रि से कहा, 'यहाँ
लौट आओ और अन्धकार को निकाल दो।' उसने इस अन्धकार को भगा दिया। उन्होंने यह
समझकर कि यह ज्योति है, इसने अन्धकार दूर कर दिया, उसके लिए चमकीली सोने की दक्षिणा
दी। स्वर्ण ज्योति है। उस ऋषि ने अपने तेज और पराक्रम से अन्धकार को दूर कर दिया। यह
भी इसी ज्योति से अन्धकार को दूर करता है। इसलिए यहाँ अत्रि को स्वर्ण देता है ॥२१॥
अब ब्रह्मा को (दक्षिणा देता है)। ब्रह्मा यज्ञ की दक्षिण की ओर से रक्षा करता है।
इसके बाद उद्गाता को, फिर होता को, फिर दोनों अध्वर्युओं को जो हविर्धान में बैठे हों। फिर
लौटकर प्रस्तोता को, फिर मैत्रावरुण को, फिर ब्राह्मणाच्छंसी को, फिर पोता को, फिर नेष्टा
को, फिर अच्छावाक को, फिर उन्नेता को, फिर ग्रावस्तोता को, फिर सुब्रह्मण्य को और सबसे
पीछे प्रतिहर्ता को दक्षिणा देता है। प्रतिहर्ता इसके लिए गौवों को पकड़े रहता है। वे भागकर
जाने नहीं पातीं ॥२२॥
अब (अध्वर्यु मैत्रावरुण से) कहता है कि 'इन्द्र मरुत्वत के लिए अनुवाक पढ़ो।' जब
पहले प्रजापति दक्षिणा दे रहा था तो इन्द्र ने सोचा कि यह तो सब दे डालेगा। हमारे लिए कुछ
भी न छोड़ेगा। उसने 'इन्द्र-मरुत्वत के लिए अनुवाक पढ़ो' इस वचनरूपी वज्र को उठाया कि
वह दान देना बन्द कर दे। उसने दान बन्द कर दिया। यहाँ यह भी 'इन्द्र-मरुत्वंत के लिए
अनुवाक पढ़ो' यह वज्र उठाता है, दान देना बन्द करने के लिए। वह दान देना बन्द कर देता
है ॥२३॥
चार तरह की दक्षिणा होती है। (१) सोना—यह आयु है। इससे वह अपने जीवन की
रक्षा करता है। सोना आयु है। (प्रजापति ने) यह सोना अग्नि को दिया था जो अग्नीध् (अग्नि
प्रज्वलित करनेवाले) का काम कर रही थी। इसीलिए यह भी अग्नीध् को सोना देता
है ॥२४॥
अब (२) गौ—इससे प्राणी की रक्षा होती है। गौ प्राण है, अन्न गौ है, अन्न प्राण है।
इसको रुद्र या होता को देता है ॥२५॥
अब (३) कपड़ा—इससे अपनी खाल की रक्षा करता है। कपड़ा खाल है। उसको गाने-
वाले बृहस्पति को देता है ॥२६॥
अब (४) घोड़ा—घोड़ा वज्र है, वज्र को वह इस प्रकार अपना अगुआ बनाता है। जो
यज्ञ करता है वह इस आशा से करता है कि यमलोक में मुझे स्थान मिलेगा। इस प्रकार वह
इसको यमलोक का हिस्सेदार कर देता है। इस (घोड़े) को वह यम या ब्रह्मा को देता है ॥२७॥
अध्वर्यु सोने को इस मन्त्र से लेता है, "अग्नये त्वा मह्यं वरुणो ददातु" (यजु० ७।४७) –
"वरुण तुझे अग्नि के लिए मेरे लिए देवे।" वरुण ने अग्नि को ही तो दिया था। "सोऽमृतत्त्व-
मशीयायुर्दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे" (यजु० ७।४७) — "मैं अमृतत्व को प्राप्त करूँ।"
दाता के लिए आयु दे। मुझे लेनेवाले के लिए सुख दे" ॥२८॥
अब गाय को इस मन्त्र से लेता है, "रुद्राय त्वा मह्यं वरुणो ददातु" (यजु० ७।४७) –
"वरुण तुझे रुद्र के लिए मुझे दे।" इसको वरुण ने रुद्र के लिए दिया था। "सोऽमृतत्त्वमशीय
प्राणो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे" (यजु० ७।४७)— "मुझे अमृतत्व मिले। दाता को प्राण