शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-७, ब्राह्मण-३
४६८ शतपथ ब्राह्मण
डे॒त्त य॒त्सँस्थापये॒त्प्रजा॑ये ह्या॒त्मियात्प्र॒जामुत्सृजति॒ तस्मा॒न्न सँ॑स्थापये॒त्पर्य॑ग्नि-
कृतमे॒वोत्सृ॑जेत् ॥ ८॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [७.२] ॥ ॥
प॒शुश्च॑ वै यूप॑श्च । न वाऽऋ॒ते यूपा॒त्पशु॑मालभन्ते कदा॑ चन तद्यत्तथा न ह
वाऽए॒तस्मा॒ऽग्रे पशव॒श्चन्नमिरे यद॒न्नम॑भविष्य॒न्येद॒न्नं भूता य॒था ह्ये॒वायं द्विपा-
त्पुरुष उच्छ्रित एवँ ह्ये॑व द्विपाद् उ॒च्छ्रिताश्रि॒शुः ॥ १॥ त॒तो देवा ए॒तं वज्रं॑ ददृशुः ।
यद्यूपं॒ तमु॑च्छिश्रियु॒स्तस्मा॒दीषा प्रावे॑पन्त ततश्चतुष्पादा अभ्रवँस्ततोऽन्नमभव॒न्येद-
मन्नं॑ भूता ए॒तस्मै हि वाऽए॒तेऽतिष्ठन्त॒ तस्माद्यूप॒ऽएव पशू॒मालभन्ते॒ नर्ते यूपा-
त्कदा॑ चन ॥२॥ अथोपाकृत्य प॒शुम् । अ॒ग्निं मथि॒त्वा नियु॑नक्ति तद्यत्तथा न ह
वाऽए॒तस्मा॒ऽग्रे पशव॒श्चन्नमिरे यद्धवि॒रभविष्य॒न्येनानिद॒ हविर्भूतानग्नौ जुहु-
ति तांन्द्रेवा उ॑प॒निरु॑ध्रुवँस्त॒ऽउपनिरुद्धा नोपावेयुः ॥३॥ ते होचुः । न वाऽइ॒मे
ऽस्य धामं॑ विदुर्यद॒ग्नौ हविर्जुह्वति॒ नैतां प्रतिष्ठा॑मुप॒रुध्ये॑व पशून॒ग्निं मथि॒त्वाग्राव॒ग्निं
जुहुवाम ते वेदिष्य॒न्त्येष वै किल हवि॒षो धाम॑ ए॒षा प्रतिष्ठा॒ग्नौ वै किल ह॒वि-
र्जुह्व॒तीति॒ ततो॒ऽभ्यवैष्यन्ति॒ ततो रातमनस आ॒लम्भाय॑ भविष्यन्तीति ॥४॥ त
ऽउ॒परुध्ये॑व पशून् । अ॒ग्निं मथि॒त्वाग्राव॒ग्निमजुहुवु॒स्तेऽविदु॒रेष वै किल हवि॒षो
धाम॑ ए॒षा प्रतिष्ठा॒ग्नौ वै किल ह॒विर्जुह्व॒तीति॒ ततो॒ऽभ्यवायँस्ततो रातमनस आ-
लम्भाया॑भवन् ॥५॥ तथो॒ऽएवैष ए॒तत् । उप॒रुध्ये॑व पशुम॒ग्निं मथि॒त्वाग्राव॒ग्निं जु-
होति॒ स वेदैष वै किल हवि॒षो धाम॑ ए॒षा प्रतिष्ठा॒ग्नौ वै किल ह॒विर्जुह्व॒तीति
ततो॒ऽभ्यवै॑ति ततो रातमना आलम्भाय॑ भवति तस्मादुपाकृत्य प॒शुम॒ग्निं मथि॒त्वा
नियु॑नक्ति ॥६॥ तदाहुः । नोपाकुर्यान्ना॒ग्निं मन्येद्रशनामेवा॒दाया॒ङ्गेसोप॒रेत्याभि-
धाय नियुञ्ज्यादिति॒ तडु तथा न कुर्याद्यथार्धमं तिरश्च्या चिकीर्षेदे॒वं तत्तस्मादे-
तद्देवानुपरीयात् ॥७॥ अथ तृणा॒मादायोपाकरोति । द्वितीयवान्निरुषण्डाऽइति द्वि-
तीयवान्हि वी॒र्यवान् ॥८॥ स तृणामादत्ते । उपावी॑रसीत्युप हि द्वितीयोऽवति
कां० ३, अ० ७, ब्रा० २-३, कं० ८ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४६६
प्रकार वह सन्तान को स्वतन्त्र कर देता है। इसलिए इसकी बलि न दे। इसको अग्नि के चारों
ओर फिराकर ही छोड़ दे ॥८॥
अध्याय ७-ब्राह्मण ३
पशु भी और यूप भी। बिना यूप के पशु कभी नहीं मारा जाता। ऐसा इसलिए होता है
कि पहले पशुओं ने अन्न अर्थात् खाद्य-पदार्थ बनना स्वीकार नहीं किया, जैसा अब कर लिया;
क्योंकि जैसा आजकल मनुष्य दो पैरों पर और खड़ा चलता है उसी प्रकार पशु भी दो पैरों पर
और खड़े-खड़े चलते थे ॥१॥
तब देवों ने उस वज्र को देखा जिसका नाम यूप है। उन्होंने उस यूप को स्थापित
किया। उसके डर से पशु सिकुड़ गये और अन्न बन गये, जैसा कि अब हो गये हैं क्योंकि उन्होंने
मान लिया है। इसीलिए पशु को यूप पर ही मारते हैं; बिना यूप के कभी नहीं मारते ॥२॥
पशु को लाकर, अग्नि को मथकर पशु को यूप से बाँधते हैं। ऐसा क्यों करते हैं? पहले
पशुओं ने यह बात स्वीकार नहीं की कि वे हवि बन जायें, जैसे वे अब हवि बन गये हैं और
अग्नि में बलि दिये जाते हैं। उनको देवों ने वश में किया। इस प्रकार वश में होकर भी वे न
माने ॥३॥
उन्होंने कहा, 'यह पशु इस नियम (याम) को नहीं जानते कि अग्नि में आहुति दी जाती
हैं न इस (अग्निरूपी) प्रतिष्ठा को मानते हैं। पशुओं को लाकर और आग को मथकर अग्नि
में अग्नि की आहुति दें। तब वे जान लेंगे कि हवि का नियम यह है और अग्नि की यह प्रतिष्ठा
है। अग्नि में ही आहुति दी जाती है। तब वे मान जायेंगे और मारे जाने के लिए तैयार हो
जायेंगे ॥४॥
तब पशुओं को लाकर, आग में मथकर उन्होंने अग्नि में अग्नि की आहुति दी। तब
पशुओं ने जाना कि हवि का यह नियम है, अग्नि की यह प्रतिष्ठा है और अग्नि में ही हवि की
आहुति दी जाती है। तब वे पशु मान गये और बलि के लिए तैयार हो गये। ॥५॥
इसी प्रकार यह भी पशुओं को लाकर, अग्नि को मथकर, अग्नि में अग्नि की आहुति
देता है। वह (पशु) जान लेता है कि हवि का नियम क्या है, अग्नि की प्रतिष्ठा क्या है। अग्नि में
ही हवि की आहुति दी जाती है। इसलिए वह मान जाता है और बलि के लिए तैयार हो जाता
है। इसीलिए पशु को लाकर और अग्नि को मथकर वह पशु को (यूप से) बाँधता है ॥६॥
इसके विषय में कहते हैं कि न तो पशु को लाये और न अग्नि को मथे। केवल रस्सी को
लेकर और सीधा जाकर रस्सी को डालकर पशु को बाँध ले। परन्तु ऐसा न करना चाहिए।
यह बात ऐसी ही होगी जैसे कोई चुपके-चुपके नियम का उल्लंघन करे। इसलिए उसको वहाँ
जाना ही चाहिए ॥७॥
वह तृण को लेकर पशु को लाता है। यह सोचकर कि दूसरे को साथ लेकर मैं पशु को
ले आऊँगा, क्योंकि जिसका कोई साथी होता है वह शक्तिवाला होता है ॥८॥
इस मन्त्रांश को पढ़कर तृण लेता है-“उपावीरसि" (यजु० ६।७)-"तू समीप रक्षा