शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-२
६५८ शतपथ ब्राह्मण
दे॒वता॑भ्यस्त॒दन्य॒था ततः॑ करोति॒ यथा॑ चान्याभ्यो॑ दे॒वता॑भ्योऽथ॒ षड्ऋ॒तिति॒ तद्दे॒-
वास्या॑भिषु॒तं भवतीति॑ ॥ ९॥ तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यः॑ । अ॒भ्ये॑व॒ षुण्णु॒यान्न सोम॒
इन्द्र॑मसुतो ममाद॒ नाब्र॑ह्माणो मघ॒वान॑ꣳ सु॒तास॒ इत्यृ॑षिणा॒भ्यनू॑क्तं॒ न वाऽअन्य-
स्मै॒ कस्मै॑ चन॒ दे॒वता॑यै सकृद॒भिषु॑णोति॒ तद॒न्यथा॑ ततः॑ करोति॒ यथा॑ चान्याभ्यो॒
दे॒वता॑भ्यस्तस्माद॒भ्ये॑व॒ षुणुया॒दिति॑ ॥ १०॥ तस्य॒ द्वाद॑श प्रथम॒गर्भाः॑ । प॒ष्ठौ॒ह्यो
दक्षि॑णा॒ द्वाद॑श॒ वै मासाः॑ संवत्सर॒स्य सं॑वत्स॒रः प्र॒जाप॑तिः प्रजा॒पति॑र॒ग्निस्तदे॑नं
प्र॒जाप॑तिं करोति ॥ ११॥ ॥ शतम् २८०० ॥ ॥ तासां॒ द्वाद॑श॒ गर्भाः॑ । ताश्चतु॑र्विꣳशति-
श्चतु॑र्विꣳशति॒र्वै सं॑वत्सर॒स्यार्ध॑मासाः॒ संव॑त्सरः प्रजाप॑तिः प्र॒जाप॑ति॒र॒ग्निस्तदे॑नं प्र-
जाप॑तिं करोति ॥ १२॥ तदु॑ ह कौकूस्तः॑ । चतु॑र्विꣳशतिमे॒वैताः॑ प्रथम॒गर्भाः॑ प॒ष्ठौ-
हीर्दक्षि॑णा ददावृष॒भं प॑ञ्चवि॒ꣳश॒ꣳ हिर॑ण्यमे॒तदु॑ ह स॒ ददौ॑ ॥ १३॥ स वा॒ऽए॒ष
न सर्व॑स्येव ग्रही॒तव्यः॑ । आत्मा॒ ह्या॑स्यै॒ष यो॒ न्वे॑व॒ ज्ञातस्त॒स्य ग्र॑हीत॒व्यो यो॑ वा-
ऽस्य प्रि॒यः स्याद्यो॑ वा॒नूचा॒नोऽनू॒क्तेनै॑नं प्राप्नु॒यात् ॥ १४॥ स॒त्रे ग्र॑हीत॒व्यः॑ । सर्वं॒
वै स॒त्रꣳ सर्व॑मे॒ष सर्व॑वेद॒से ग्र॑हीत॒व्यः सर्वं॒ वै सर्व॑वेद॒सꣳ सर्व॑मे॒ष वि॒श्वजि॑ति
सर्व॑पृष्ठे ग्रही॒तव्यः॒ सर्वं॒ वै वि॒श्वजि॑त्स॒र्वपृ॑ष्ठः॒ सर्व॑मे॒ष वाज॑पेये राजसू॒ये ग्र॑हीत॒व्यः॒
सर्वꣳ॑ हि तत्स॒त्रे ग्र॑हीत॒व्यः सर्वं॒ वै स॒त्रꣳ सर्व॑मे॒ष ए॒तानि॒ ग्रह॑णानि ॥ १५॥
ब्राह्मणम् ॥ ३ [६. १.] ॥ ॥
ए॒तं वा॒ऽए॒ते गृ॒ह्वन्ति॑ । षड्भि॑र्मा॒सैरे॒ष त॑पति॒ ये सं॑वत्स॒रमास॑ते॒ तदु॒च्यत
ऽए॒व साम॑तो यथै॒तस्य रू॒पं क्रिय॒तऽउ॒च्यत॒ऽऋक्तो॒ऽथैत॑दे॒व यजु॑ष्टः पुरश्चरणातो य-
देत॑द् गृ॒ह्वन्त्ये॒तेनो॑ऽए॒वैनं॑ गृह्वन्ति॒ ॥ १॥ अथातो गृ॒ह्णात्ये॑व । उ॒दु त्यं जा॒तवे॑दसं
दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑ । दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् । उपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ सूर्या॑य त्वा भ्रा-
जा॒यैष ते॒ योनिः॒ सूर्या॑य त्वा भ्राजा॒येति॑ ॥ २॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [६. २.] ॥ ॥
अथातः पशुबन्धनस्यैव । पञ्चैकादशिन्यैवेयात्स आग्नियं प्रथमं पशुमालभतेऽथ
कां० ४, अ० ६, ब्रा० १-२-३, कं० ६-१५ व १-२ एवं १ शतपथब्राह्मण / ६५६
क्योंकि अन्य देवताओं के लिए पीसते हैं। इस प्रकार वह जैसा अन्य देवताओं के लिए करता है उससे
कुछ भिन्न इसके लिए करता है। यह जो बटने का ऊपर उठाना है वही पीसने के तुल्य है ॥६॥
इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि पीसना अवश्य चाहिए। ऋषि का कहना है कि “न
सोम इन्द्रमसुतो ममाद नाब्रह्माणो मघवानं सुतासः” (ऋ० ७।२६।१)—“बिना पिसे सोम ने
इन्द्र को तृप्त नहीं किया, न पिसे सोम ने बिना स्तुति के।” किसी अन्य देवता के लिए एक बार
से अधिक नहीं पीसा जाता। इस प्रकार जैसा अन्य देवताओं के लिए किया जाता है इससे भिन्न
इसके लिए। इसलिए पीसना अवश्य चाहिए ॥१०॥
इसकी दक्षिणा है बारह गर्भिणी गायें जो पहलौटीं हों। वर्ष के बारह मास होते हैं।
संवत्सर प्रजापति है। प्रजापति अंशु है। इस प्रकार वह यजमान को प्रजापति बना देता है ॥११॥
उनके बारह गर्भ भी तो होते हैं। इस प्रकार चौबीस हुए। संवत्सर में चौबीस अर्ध-मास
होते हैं। संवत्सर प्रजापति है। अंशु प्रजापति है। इस प्रकार यजमान को प्रजापति बना देता
है ॥१२॥
कौकस्त ने चौबीस प्रथम गर्भागार्यें अपने पहलौटी बच्चों के साथ दी थीं और पच्चीसवां
सांड़ और सोना। इतना ही दिया था ॥१३॥
यह ग्रह सबके लिए नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि यह यज्ञ का आत्मा है ! या तो उसके
लिए निकाले जिससे जान-पहचान हो या, जो अध्वर्यु का मित्र हो, या जो वेदाध्ययन के द्वारा
इसका अधिकारी बन गया हो ॥१४॥
हजार-गाय-दान-वाले यज्ञ में इसको निकालना चाहिए। सहस्र का अर्थ है सम्पूर्ण। यह
ग्रह भी सम्पूर्ण है। सर्ववेदस् यज्ञ में इसको निकालना चाहिए (सर्ववेद वह यज्ञ है जिसमें सम्पूर्ण
सम्पत्ति दान कर दी जाती है)। सर्ववेद सब-कुछ है और यह ग्रह भी सब-कुछ है। सर्वपृष्ठ
विश्वजित् में इसको निकालना चाहिए। विश्वजित् सर्वपृष्ठ सब-कुछ है, और यह ग्रह भी सब-
कुछ है। वाजपेय और राजसूय यज्ञ में इसको निकालना चाहिए, क्योंकि वह सब-कुछ है। सत्र
में निकालना चाहिए, क्योंकि सत्र सब-कुछ है और यह सब ग्रह निकालने की क्रिया में भी सब-
कुछ है ॥१५॥
अतिग्राह्यग्रहग्रहणम्
अध्याय ६—ब्राह्मण २
जो सालभर तक यज्ञ में बैठते हैं वे छः महीनों के द्वारा उसको प्राप्त होते हैं। जो वह
चमकता है (अर्थात् सूर्य), ऐसा साम के अनुसार है। यह सूर्य का रूप हो जाता है ऐसा ऋक् का
विधान है। यजुः के अनुसार भी यही है कि पुरश्चरण करके जो इस ग्रह को लेते हैं वे भी इसी
सूर्य को प्राप्त होते हैं ॥१॥
उसको इस मन्त्र से लेता है-‘उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्।
उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय’ (यजु० ८।४१, ऋ०
१।५०।१)—“उस सब के ज्ञाता देव सूर्य की ओर यह केतु ले जाते हैं, जिससे सब संसार की
वस्तुओं को देखा जा सके। तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे सूर्य के लिए, तेज के लिए। यह
तेरी योनि है। सूर्य के लिए तुझको, प्रकाश के लिए तुझको ॥२॥
पश्वयनस्तोमायने
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
पशु-अयन (पशु-याग) का यह नियम है। ग्यारह पशुओं से ही यज्ञ करे। अग्नि के लिए