शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-४
८२ शतपथ ब्राह्मण
वाऽए॒तदा॒त्मनो॒ऽग्रावा॑धाः श्रोत्रे॑णा॒त्मन्नार्त्ति॒मारि॑ष्यसि बधि॒रो भवि॑ष्यसीति॒ त-
था॒ हैव॒ स्यात् ॥१४॥ यदि॑ पञ्च॒म्यामनु॑व्याह॒रेत् । तं प्रति॑ ब्रूयाद्वाचं वाऽए॒तदा॒-
त्मनो॒ऽग्रावा॑धा वा॒चात्मन्नार्त्ति॒मारि॑ष्यसि मूको भवि॑० - - स्यात् ॥१५॥ यदि॑ ष-
ष्ठ्यामनु॑व्याह॒रेत् । तं प्रति॑ ब्रूयान्मनो॒ वाऽए॒तदा॒त्मनो॒ऽग्रावा॑धा॒ मन॑सा॒त्मन आ-
र्त्ति॒मारि॑ष्यसि॒ मनो॑मुषि॒गृही॑तो मोमु॒द्यश्च॑रिष्यतीति तथा॒ हैव स्यात् ॥१६॥ यदि॑
स॒प्तम्यां॑० - । - ॰याच्चक्षुर्वाऽए॒तदा॒त्मनो॒ऽग्रावा॑धा॒श्चक्षु॑षा॒त्मन्नार्त्ति॒मारि॑ष्य॒न्ध्यो॑ भ-
वि॑० - - स्यात् ॥१७॥ यद्य॒ष्टम्यां॑० - । - ॰यान्मूर्द्धं वाऽए॒तत्प्रा॒णामा॒त्मनो॒ऽग्रावा॑धा
मूर्द्ध्न प्राणे॑ना॒त्मन्नार्त्ति॒मारि॑ष्य॒स्युद्द्माय॑ मरि॒ष्यसी॑ति तथा॒ हैव॒ स्यात् ॥१८॥
यदि॑ नव॒म्यां॑० - । - ॰याच्छिश्नं॒ वाऽए॒तदा॒त्मनो॒ऽग्रावा॑धाः शि॒श्नेना॒त्मन्नार्त्ति॒मारि॑-
ष्यसि क्लीबो भवि॑० - - स्यात् ॥१९॥ यदि॑ दश॒म्याम॑नु॑० - । - ॰यादवाचं॒ वाऽए॒त-
त्प्रा॒णामा॒त्मनो॒ऽग्रावा॑धा अवा॑चा प्राणे॑ना॒त्मन्नार्त्ति॒मारि॑ष्य॒स्यपिन॑द्धो मरि॒ष्यसी॑-
ति तथा॒ हैव॒ स्यात् ॥२०॥ यद्येकादश्या॑म्० - । - ॰यात्स॒र्व्वं वाऽए॒तदा॒त्मान॑मग्रावा॑-
धाः सर्व्वे॑णा॒त्मनार्त्ति॒मारि॑ष्यसि॒ क्षिप्रेऽमुं लो॒कमे॑ष्यसीति तथा॒ हैव॒ स्यात् ॥२१॥
स यथा॒ हैवा॒ग्निꣳ सामि॑धेनीभिः स॒मिद्धमाप॒द्यार्त्ति॒न्त्येत्येवꣳ हैव॒ ब्राह्मणꣳ सा-
मि॑धेनीर्विदाꣳसꣳ समनु॑ब्रुव॒न्तमनु॑व्याहृत्य॒ार्त्ति॒न्त्येति॑ ॥२२॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥५[४.३.]॥
तं वाऽए॒तम॒ग्निꣳ स॑मेन्धिषत । स॒मिद्धे॑ दे॒वेभ्यो॑ जुहु॒वामेति॒ तस्मि॑न्ने॒तेऽए॒व प्र-
थमे॒ऽआहु॑ती जुहोति मन॑से चैव॒ वाचे॑ च मनश्च॒ हैव॒ वाक्क यु॒क्तौ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं
वहतः ॥१॥ स यदुपाꣳशु क्रियते । तन्मनो॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं व॑हत्यथ यद्वाचा निरु-
क्तं क्रियते॒ तद्वाग्दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं व॑हत्येतद्द्वाऽइ॒दं द्वयं क्रियते तदे॒तेऽए॒वैतत्सं॑तर्पयति
तृप्ते॒ प्रीते॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं व॑हात॒ इति॑ ॥२॥ स्रुवेण तमाघारयति । यं मनस॒ऽआधा॑-
रयति॒ वृषा॒ हि मनो॒ वृषा॒ हि स्रुवः ॥३॥ स्रुचा तमाघारयति । यं वाच॒ऽआधा॑-
रयति॒ योषा॒ हि वाग्योषा॒ हि स्रुक् ॥४॥ तूष्णीं तमाघारयति । यं मनस॒ऽआधा॑-
कां० १, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ८३
अपने कान को आग में डाल दिया । तुझे अपने कान से पीड़ा होगी, तू बहरा हो जायगा और
ऐसा ही होगा भी ॥१४॥
और अगर पाँचवीं सामिधेनी के पढ़ते समय कोई बुरा कहे तो उसके प्रति कहना चाहिए
कि तूने अपनी वाणी को आग में डाल दिया । तुझे अपनी वाणी से पीड़ा होगी, तू बहरा हो
जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥१५॥
और अगर छठी सामिधेनी के समय कोई बुरा कहे तो उसके प्रति कहना चाहिए कि तूने
अपने मन को अग्नि में डाल दिया । यह मन तुझे पीड़ा देगा । तू इस प्रकार फिरेगा मानो किसी
ने तेरा मन चुरा लिया है या तेरा मन विक्षिप्त हो गया है, और ऐसा ही होगा भी ॥१६॥
अगर सातवीं सामिधेनी के समय कोई बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपनी
आँख आग में डाल दी । तुझे इस आँख से पीड़ा होगी, तू अन्धा हो जायगा और ऐसा ही होगा
भी ॥१७॥
अगर आठवीं सामिधेनी पढ़ते समय बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपने मध्य
प्राण को आग में डाल दिया । तुझे इस मध्य प्राण से पीड़ा होगी । तू इससे मर जायगा और
ऐसा ही होगा भी ॥१८॥
अगर नवीं सामिधेनी को पढ़ते समय बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपने
शिश्न को आग में डाल दिया । तुझे इससे पीड़ा होगी, तू नपुंसक हो जायगा और ऐसा ही होगा
भी ॥१९॥
अगर दसवीं सामिधेनी को पढ़ते समय बुरा कहे तो उससे कहना चाहिए कि तूने अपने
निचले प्राण को अग्नि में डाल दिया । इस अपने निचले प्राण से तुझे पीड़ा होगी, तू कब्ज से मर
जायगा और ऐसा ही होगा भी ॥२०॥
अगर ग्यारहवीं सामिधेनी को पढ़ते समय बुरा कहे तो उसको कहना चाहिए कि तूने
अपना शरीर आग में डाल दिया । तुझे इस अपने शरीर से पीड़ा होगी, इससे तू शीघ्र ही उस
लोक को चला जाएगा और ऐसा ही होगा भी ॥२१॥
जिस-जिस प्रकार सामिधेनियों से जलाई हुई अग्नि के पास जाकरजो कोई पीड़ा उठाता
है, उसी प्रकार की पीड़ा उस-उस पुरुष को होती है जो सामिधेनियों को समझकर पढ़नेवाले
ब्राह्मण को बुरा कहता है ॥२२॥
अध्याय ४—ब्राह्मण ४
इस अग्नि को इन्होंने प्रज्वलित किया कि इस प्रज्वलित अग्नि में देवों के लिए आहुतियाँ
दें । पहले इसमें दो आहुतियाँ देते हैं—एक मन के लिए और दूसरी वाणी के लिए, क्योंकि मन
और वाणी दोनों मिलकर देवों के लिए यज्ञ को ले जाते हैं ॥१॥
यह जो चुपके-चुपके (धीमी आवाज से) किया जाता है, इस यज्ञ को मन देवों को ले
जाता है, और जो वाणी से स्पष्ट करके किया जाता है उस यज्ञ को वाणी देवों तक ले जाती है।
इस प्रकार दुहरी क्रियाएँ होती हैं। वह इन दोनों को तृप्त करता है जिससे ये दोनों (मन और
वाणी) तृप्त और प्रसन्न होकर यज्ञ को देवों तक ले जायँ ॥२॥
जो आहुति मन के लिए देता है वह स्रुवा से देता है, क्योंकि मन पुरुष है और स्रुवा भी
पुरुष है। (मन नपुंसक लिंग है। समझ में नहीं आता कि मन को पुरुष क्यों कहा) ॥३॥
जो आहुति वाणी के लिए देता है वह स्रुक् से देता है, क्योंकि वाणी स्त्री है और स्रुक्
भी स्त्री है ॥४॥
जो आहुति मन के लिए देता है वह चुपके से देता है और 'स्वाहा' भी नहीं बोलता । मन
ऱ्यति॒ न स्वाहेति॑ चना॒निरु॑क्तं॒ हि मनो॑ऽनिरु॒क्तं ह्ये॑तद्यत्तूष्णीम् ॥ ५ ॥ म॒न्त्रेण॑
तमा॒धार॑यति । यं वा॒चोऽश्रा॒धार॑यति नि॒रुक्ता॒ हि वाङ्निरु॑क्तो॒ हि म॒न्त्रः ॥ ६ ॥ आ-
सी॒नस्तमा॒धार॑यति । यं मन॑स॒ऽआ॒धार॑यति ति॒ष्ठंस्तं यं वा॒चि मन॑श्च ह॒ वै वाक्च॑
यु॒जौ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं व॑हतो यतरो॒ वै यु॒जोर्ह्रसी॑यान्भवत्युपव॒हं वै तस्मै॑ कुर्वन्ति
वाग्वै मन॑सो ह्रसी॑यस्य॒परिमिततरमिव॒ हि मनः॑ परिमिततरेव॒ हि वाक्तद्वाच॑
ऽए॒वैतदुपव॒हं क॑रोति॒ ते सयुजौ॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं व॑हत॒स्तस्मा॑त्ति॒ष्ठन्वाच॒ऽश्रा॒धार॑य-
ति ॥ ७ ॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॑न्वा॒नाः । ते᳭सु॒ररक्ष॒सेभ्य॒ आस॒ङ्गाद्बिभ॑यां चक्रुस्त॒द्य-
तद्दक्षिणतः॒ प्रत्यु॒द्द्रश्यम॒नुच्छ्रितमिव॒ हि वी॒र्यं॒ तस्मा॒द्दक्षिणतस्ति॒ष्ठन्ना॒धार॑यति स य-
दुभयत॒ आ॒धार॑यति॒ तस्मा॑दि॒दं मन॑श्च वा॒क्च समा॑नमेव॒ सन्नाने॑व॒ शिरो॑ ह॒ वै य॒ज्ञ-
स्यैतयोर॒न्यत॑र् आ॒धार॑योर्मू॒लमन्यत॑र्ः ॥ ८ ॥ स्रुवेण॒ तमा॒धार॑यति । यो मूलं॑ य॒ज्ञ-
स्य स्रुचा॒ तमा॒धार॑यति॒ यः शिरो॑ य॒ज्ञस्य॑ ॥ ९ ॥ तूष्णीं तमा॒धार॑यति । यो मूलं॑ य॒-
ज्ञस्य तूष्णी॑मिव॒ हीदं मूलं॒ नो ह्यत्र॑ वाग्वद॑ति ॥ १० ॥ म॒न्त्रेण॒ तमा॒धार॑यति । यः
शिरो॑ य॒ज्ञस्य वाग्धि म॒न्त्रः शीर्ष्णो॒ हीयमधि॑ वाग्वद॑ति ॥ ११ ॥ आसी॒नस्तमा॒धार॑-
यति । यो मूलं॑ य॒ज्ञस्य निष्षण्ण॑मिव॒ हीदं मूलं॑ ति॒ष्ठंस्तमा॒धार॑यति॒ यः शिरो॑ य॒ज्ञ-
स्य तिष्ठ॑तीव॒ हीदं शिरः॑ ॥ १२ ॥ स स्रुवे॑ण पू॒र्वमा॒धार॒माधा॒र्याह॑ । अ॒ग्निमग्नीत्स-
म्मृड्ढीति॒ यथा॑ धु॒रम॒ध्युह्ये॒देवं तद्यत्पूर्व॑मा॒धार॒माधा॒रय॑त्य॒युङ्क्त॒ हि धुरं॑ यु॒ञ्जन्ति॑ ॥ १३ ॥
अथ॒ सम्मा॑र्ष्टि । यु॒नक्त्ये॒वैनमेतद्युक्तो दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं व॑हा॒दिति॒ तस्मा॑त्स॒म्मा॑र्ष्टि परि-
क्रा॒मꣳ सम्मा॑र्ष्टि॒ परि॑क्रामꣳ हि यो॒ग्यं॑ यु॒ञ्जन्ति॑ त्रि॒भिः सम्मा॑र्ष्टि त्रि॒वृद्धि य॒ज्ञः ॥ १४ ॥
स सम्मा॑र्ष्टि । अग्रे॑ वाजिञ्छि॒द्रं वा॑ सरिष्य॒न्तं त्वा॑ वा॒जिजितं॑ सम्मा॒र्मीति॑ य॒ज्ञं
वा व॑क्ष्य॒न्तं य॒ज्ञियं॑ सम्मा॒र्मीत्ये॒वैतदा॒हाथो॑परि॒ष्टात्तूष्णीं त्रिस्तद्यथा॑ यु॒क्त्वा प्र॒ति-
त्प्रेहि॑ व॒हेत्ये॒वमे॒वैतत्क॒शयोप॑क्षि॒पति॒ प्रेहि॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं व॑हेति॒ तस्मा॑दुपरि॒ष्टा-
त्तूष्णीं॑ त्रिस्तद्यदेतदुत्तरे॑ण॒ कर्म॑ क्रि॒यते॒ तस्मा॑दि॒दं मन॑श्च वा॒क्च समा॑नमेव॒ सन्ना-
कां० १, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ५-१५ शतपथब्राह्मण / ८५
स्पष्ट नहीं है। और जो कृत्य चुपके से किया जाता है वह भी स्पष्ट नहीं होता ॥५॥
और जो आहुति वाणी के लिए देता है उसे मन्त्र पढ़कर देता है, क्योंकि वाणी स्पष्ट है
और मन्त्र भी स्पष्ट है ॥६॥
जो आहुति मन के लिए देता है वह बैठकर देता है, और जो वाणी के लिए देता है वह
खड़े-खड़े। मन और वाणी दोनों मिलकर ही देवों के लिए यज्ञ ले जाते हैं। बैलों के जोड़े में से
अगर एक बैल छोटा होता है तो उसके कन्धे पर 'उपवह' अर्थात् गद्दी रख देते हैं (जिससे जुए के
दोनों बैल बराबर हो जायें)। वाणी तो मन से छोटी है ही। मन बड़ा अपरिमित है, वाणी बहुत
परिमित है। वाणी के लिए खड़े होकर आहुति देने का तात्पर्य यह है कि वाणी को एक 'उपवह'
अर्थात् गद्दी दे दी जिससे वे दोनों बराबर होकर यज्ञ को देवों तक ले जायें ॥७॥
जब देवों ने यज्ञ रचा तो असुर राक्षसों के विघ्न से डरने लगे। इसलिए वे (वेदि के)
दक्षिण की ओर सीधे खड़े हो गये। सीधे खड़े होने से बल आता है, इसलिए दक्षिण की ओर
खड़े होकर आहुति देता है। और जो दोनों ओर आहुति देता है इससे वह जुड़े हुए मन और
वाणी को अलग-अलग कर देता है। दोनों आहुतियों में से एक यज्ञ का सिर है, दूसरी यज्ञ का
मूल है ॥८॥
उस आहुति को जो यज्ञ का मूल है स्रुवा से देता है। और जो यज्ञ का शिर है उसे स्रुक्
से देता है ॥६॥
जो आहुति यज्ञ का मूल है उसे चुपके (बिना बोले) देता है, क्योंकि मूल (जड़) मौन-सी
होती है क्योंकि इसको वाणी नहीं बोलती ॥१०॥
जो आहुति यज्ञ का शिर है उसको मन्त्र पढ़कर देता है, क्योंकि वाणी ही मन्त्र है और
शिर से ही यह वाणी बोलती है ॥११॥
जो आहुति यज्ञ का मूल है उसे बैठकर ही देता है, क्योंकि मूल (जड़) बैठी-सी ही होती
है। जो आहुति यज्ञ का शिर है उसे खड़े होकर ही देता है। शिर खड़ा-सा होता है ॥१२॥
स्रुवा से पहली आहुति को देकर कहता है—'अग्निमग्नीत् सम्मृड्ढि'—'हे अग्नीत्, आग
को साफ कर दो।' जैसे धुरे को जुआ पर रखते हैं ऐसे ही वह पहली आहुति देता है, क्योंकि धुरा
रखकर ही बैलों को जुए से बाँधते हैं ॥१३॥
(अग्नीध्र) आग को साफ करता है (ऊपर से राख को अलग कर देता है) मानो वह
जुए को बाँधता है जिससे वह बँधकर यज्ञ को देवों के लिए ले जाय। इसीलिए साफ करता है।
साफ करने में वह आग को घुमाता अर्थात् कुरेदता है, क्योंकि जब बैलों को जुए से बाँधते हैं तो
घुमाकर ले जाते हैं। तीन बार कुरेदता है क्योंकि यज्ञ तिहरा है ॥१४॥
कुरेदने में वह यह मन्त्र पढ़ता है—"अग्ने वाजजिद् वाजं त्वा सरिष्यतं वाजजित्७
सम्मार्ज्म'" (यजुर्वेद २।७)—"हे अन्न जीतनेवाली आग ! तुझ अन्न को जीतनेवाली को, जो
अन्न तक जा रही है मैं कुरेद रहा हूँ।" इसका तात्पर्य है कि मैं उस आग को कुरेद रहा हूँ जो यज्ञ
को ले जा रही है और जो यज्ञ के योग्य है। चुपके-चुपके तीन बार कुरेदता है। जैसे बैलों को
जोड़कर हाँकते हैं, 'चलो, ले चलो।' इसी प्रकार इसको भी (अर्थात् आग को भी) हाँकते हैं,
'चलो, देवों के लिए यज्ञ ले चलो।' इसलिए तीन बार चुपके-चुपके कुरेदता है। और जैसे दो
आहुतियों को बीच में कुरेदने का काम करने से दोनों आहुतियाँ एक-दूसरे से अलग हो जाती हैं,
इसी तरह से मन और वाणी मिले होकर भी एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं ॥१५॥