शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-७, ब्राह्मण-३
नामैतद्यत्स॒मेक॒ इति॒ यथा॑ च॒ हि वाऽअ॒न्यवा य॑वेतीवाथ॒ येनैतेषाग्ँ होता भव॑ति
तद्यावि॒होत्र॑मित्याचक्ष॑ते ॥ २६॥ ब्राह्मणम् ॥५[७.२.]॥ ॥ पञ्चमः प्रपाठकः ॥
॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥
य॒ज्ञेन॒ वै देवाः॑ । दि॒वमुपोद॑क्रामन्नथ योऽयं दे॒वः प॑शूनामीष्टे॒ स इ॒हाही॑यत
तस्माद्वास्तव्य॒ इत्या॒हुर्वास्तौ॒ हि तद॒ही॑यत ॥ १॥ स॒ येनैव॒ देवा॑ दि॒वमुपोद॑क्रा-
मन् । तेनोऽए॒वार्च॑न्तः श्राम्यन्तश्चेरुर॒थ योऽयं दे॒वः प॑शूनामीष्टे॒ य इ॒हाही॑यत
॥२॥ स॒ ऐक्षत । अ॒हास्य॒ हार्त्ये॒म्यु मा॑ य॒ज्ञादिति॒ सोऽनू॒त्थक्राम॒ स आ॒यतयोत्त-
र॒त उ॒पोत्से॒दे स ए॒ष स्विष्टकृतः कालः॑ ॥३॥ ते देवा॑ अब्रुवन् । मा विस्रंक्षी-
रिति॒ ते वै मा य॒ज्ञान्मान्त॒र्गाताहु॑तिं मे कल्पयतेति॒ तथेति॑ स समबृहत्स॒ नास्य॑त्त
न॒ कं च॒नाहिनत् ॥४॥ ते देवा॑ अब्रुवन् । याव॑न्ति नो ह॒वीग्ँषि गृहीता॒न्यभू-
व॒न्त्सर्वेषां तेषाग्ँ हुतमुपजानीत॒ यथास्माऽआहु॑तिं कल्पयामेति॑ ॥५॥ तेऽध्व॒र्युम-
ब्रुवन् । यथा॒पूर्वग्ँ॑ ह॒वीग्ष्य॑भिघा॒र्यैकस्मा॒ऽअवदानाय पुन॒राप्या॑ययायातयामानि
कुरु॒ तत॒ एकैकमवदा॒नमव॒द्येति॑ ॥६॥ सोऽध्व॒र्युः॑ । यथा॒पूर्वग्ँ॑ ह॒वीग्ष्य॑भ्य॒घारय॑दे-
कस्मा॒ऽअवदानाय पुन॒राप्याययदयातयामान्यकरोत्तत॒ एकैकमवदान॒मवा॑द्यत्तस्मा-
द्वास्तव्य॒ इत्या॒हुर्वास्तु॒ हि तद्य॒ज्ञस्य॒ यद्धुतेषु॑ ह॒विःषु तस्मा॒द्यस्यै॒ कस्यै॑ च दे॒व-
ता॑यै ह॒विर्गृ॒ह्यते सर्वत्रैव स्विष्ट॒कृदन्वा॑भक्तः सर्व॑त्र ह्येवैनं देवा॒ अन्वा॑भजन् ॥७॥
तद्वाऽअ॒ग्नय॒ऽइति॑ क्रियते । अ॒ग्निर्वै स दे॒वस्तस्यैतानि॒ नामा॑नि श॒र्व इति॒ यथा॑
प्राच्या॑ आचक्ष॑ते भ॒व इति॒ यथा॑ बाहीकाः पशूनां॑ प॒ती रु॒द्रोऽग्निरिति॒ तान्यस्या-
शान्ता॒न्येवेतरा॑णि॒ नामा॒न्यग्निरित्येव शा॑न्ततमं॒ तस्माद॒ग्नय॒ऽइति॑ क्रियते॒ स्विष्टकृ॒-
त॒ऽइति॑ ॥८॥ ते होचुः । यद॒द्य्यमुत्र॒ स॒त्यम॒द॑न्महि॒ तन्नः॑ स्विष्टं॑ कु॒र्विति॒ तद्देभ्यः॑
स्विष्टम॑करोत्त्तस्मात्स्विष्टकृत्त॒ऽइति॑ ॥९॥ सोऽनुवाक्यामनू॒च्य संप्रेष्य॑ति । ये त्था-
ग्रिग्ँ स्विष्टकृ॑तम॒याऽड्भिर॒ग्नेः प्रि॒या धामा॒नीति॒ तद॒ग्नेर्यमाज्य॑भागमा॒ह्वाथाट्ठ्सो॑मस्य
का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / १४१
है। यवा और अयवा, जिसको 'यवा' भी कहते हैं, इससे ही 'होता' सम्बन्धित होता है,
इसलिये उसको 'याविहोत्र' कहते हैं ॥२६॥
अध्याय ७—ब्राह्मण ३
यज्ञ से ही देवों ने द्यौलोक को प्राप्त किया। जो देव पशुओं का अधिष्ठाता था वह यहीं
रह गया, इसलिए उसको 'वास्तव्य' कहा, क्योंकि वह वहाँ 'वास्तु' अर्थात् वेदि में रह
गया ॥१॥
जिस यज्ञ के द्वारा देव द्यौलोक को चढ़े थे, उसी यज्ञ से वे पूजा और परिश्रम करते रहे।
अब जो पशुओं का अधिष्ठाता देव था और जो यहीं रह गया था—॥२॥
उसने देखा 'अरे ! मैं यहाँ रह गया, ये मुझे यज्ञ से निकाले दे रहे हैं !' वह उनके पीछे-
पीछे चढ़ा और अपने (शस्त्र को) उठाकर उत्तर की ओर चला। यह स्विष्टकृत् आहुति का
समय था ॥३॥
वे देव बोले—' (शस्त्र) मत मार।' (उन्होंने कहा) 'मुझे यज्ञ से बहिष्कृत न करो।
मेरे लिए आहुति दो।' देवों ने कहा—'अच्छा।' उसने शस्त्र हटा लिया; न मारा, न किसी को
सताया ॥४॥
ये देव बोले—'जितनी हवियां हमारे लिए ली गईं, वे सब दी जा चुकीं। अब सोचो
जिससे इसके लिए एक आहुति दे सकें' ॥५॥
उन्होंने अध्वर्यु से कहा—'पूर्व की भांति हवियों के ऊपर घी छोड़ो (अभिधारय)।
एक अवदान (भाग) के लिए फिर पूरा करो। और फिर एक-एक भाग अलग-अलग कर
दो' ॥६॥
अध्वर्यु ने पूर्व की भाँति हवियों पर घी छोड़ा, एक भाग के लिए फिर पूरा किया और
तैयार करके एक-एक भाग को अलग किया। इसलिये उस रुद्र को वास्तव्य कहा, क्योंकि यज्ञ में
दी हुई आहुतियों की हवि में से जो कुछ बच रहता है उसको 'वास्तु' कहते हैं। इसलिये जिस
किसी देवता के लिए 'हवि' दी जाती है, सब जगह 'स्विष्टकृत्' (अर्थात् अग्नि) को पीछे से
आहुति देते हैं, क्योंकि सर्वत्र ही देवों ने अग्नि को पीछे से भाग दिया ॥७॥
वह अग्नि के लिए ही दी जाती है। अग्नि ही वह देव है। उसके ये नाम हैं—'शर्व'
पूर्व के लोग कहते हैं, 'भव' बाहीक लोग कहते हैं, 'पशुओं का पति', 'रुद्र', 'अग्नि'। उसमें
और नाम अशान्त अर्थात् अशुभ हैं। केवल 'अग्नि' एक नाम ही शान्त या शुभ है, इसलिये यह
आहुति 'अग्नि' (स्विष्टकृत्) के लिए दी जाती है ॥८॥
उन्होंने कहा—'जो आहुति हमने तुझ दूर ठहरे हुए को दी, उसे तू हमारे लिए स्विष्ट
(हितकर) बना दे।' उसने उनके लिए उस आहुति को शुभ कर दिया, इसलिये उसका नाम
'स्विष्टकृत्' हुआ ॥९॥
वह (होता) अनुवाक्य को बोलकर देखता है कि किन्हों ने अग्नि स्विष्टकृत् को लिया।
'अग्नि, अग्नि के प्रिय धामों को दे।' इससे अग्नि के आज्य भाग का तात्पर्य है 'सोम के प्रिय धामों
प्रि॒या धामा॑नीति॒ तत्सौ॑म्य॒माज्य॑भागमा॒हाया॑ऽग्नेः प्रि॒या धामा॑नीति॒ तद्य॑ ए॒ष उ॒भ-
य॒त्राच्यु॑त॒ आग्ने॒यः पु॒रोडाशो॑ भव॒ति तमा॑ह ॥ १०॥ अथ॒ यथा॑दैवतम् । अया॒डिद॑-
वा॒नामाज्य॑पानां प्रि॒या धामा॑नीति॒ तत्प्र॑याजा॒ननु॑याजा॒नाह॑ प्रयाजा॒ननु॑याजा॒ वै देवा॑
आज्य॑पा॒ यद्यद॑ग्नेर्होतुः प्रि॒या धामा॑नीति॒ तद॒ग्नि॑ होता॑रमाह॒ तद॑स्मा॒ऽए॒तां देवा॑
आहु॑तिं कल्पयित्वा॒थैनैतद्यू॒तः स॒मशा॑म्यन्प्रि॒यऽए॒नं धाम॑न्नुपा॒ह्वयन्त॒ तस्मा॑दे॒वꣳ सं-
प॑श्यति ॥ ११॥ तद्वैके॑ । दे॒वतां॑ पू॒र्वी कु॑र्वन्त्यथा॒घा॒रम॑ग्नेरया॒ट्सोम॑स्याया॒डिति॒ तदु॑
तथा॒ न कु॑र्याद्विलोम ह॒ ते य॒ज्ञे कु॑र्वन्ति॒ ये दे॒वतां॑ पू॒र्वी कु॑र्वन्त्यथा॒घा॒रादि॒द्ध ह्य॑
प्र॒थम॒मभिव्या॑हरन्नथा॒घा॒रमे॒वाभि॑व्याहरति॒ तस्मा॑दघा॒रमे॒व पू॒र्वं कु॑र्यात् ॥ १२॥
यक्ष॒त्त्वं म॑हि॒मान॒मिति॑ । यत्र॒ वाऽअ॒दो दे॒वता॒ आवा॑हयति॒ तदपि॒ स्वं म॑हि॒मा-
न॒मावा॑हयति॒ तद॑तः प्रा॒ङ्ङिव॒ किं चन स्वाय॑ महि॒म्नऽइ॑ति क्रियते॒ तद॑त्र॒ तं प्रीणा॑-
ति तथो॒ हास्यैषो॒ऽमोघा॒यावा॑हितो भवति॒ तस्मा॑दाह यक्ष॒त्त्वं म॑हि॒मान॒मिति॑
॥ १३॥ आ यज॑ता॒मेड्या॒ इष॒ इति॑ । प्र॒जा वाऽइष॒स्ता ए॒वैतद्याज॑युकाः करोति॒ ता
इ॒माः प्र॒जा यज॑माना॒ अर्च॑न्त्यः श्रा॒म्यन्त्यश्चर॑न्ति ॥ १४॥ सोऽअ॑ध्व॒रा जा॒तवे॑दा जुष॒-
ताꣳ ह॒विरिति॑ । तय्य॒द्वैवैतत्समृ॑द्धिमा॒शास्ते॒ यदि॒ देवा॑ ह॒विर्जुष॑न्ते॒ तेन॒ हि म-
ङ्क्ष्यति॒ तस्मा॑दाह जुष॒ताꣳ ह॒विरिति॑ ॥ १५॥ तय्य॒देते॒ऽअत्र॑ । याज्यानुवाक्ये॑
ऽअ॑वकॢप्ततमे भवतस्तृतीयसवनं वै स्विष्टकृद्वैश्वदेवं वै तृतीयसवनं पिप्रीहि॑ दे॒-
वांशा॒ऽउश॑तो यविष्ठेति तदनुवाक्यायै वैश्वदेवमग्ने॒ यद॒द्य विशो॒ऽअ॑ध्व॒रस्य॑ होत॒-
रिति तय्याज्यायै वैश्वदेवं तय्य॒देते॒ऽए॒वꣳरू॑पे भवतस्तेनो॒ऽए॒ते तृतीयसवनस्य रूपं
तस्मा॒द्वाऽए॒ते॒ऽअत्र॑ याज्यानुवाक्ये॒ऽअ॑वकॢप्ततमे भवतः ॥ १६॥ ते वै त्रि॒ष्टुभौ भ॑-
वतः । वास्तु॒ वाऽए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ यत्स्वि॑ष्ट॒कृद्वीर्यं॑ वै वा॒स्त्विन्द्रि॒यं वीर्यं॑ त्रि॒ष्टुबिन्द्रि॒-
य॑मे॒वैतद्वीर्यं॑ वा॒स्तौ स्वि॑ष्ट॒कृति॑ दधाति॒ तस्मात्ति॒ष्टुभौ भ॑वतः ॥ १७॥ उ॒तोऽअनु॑-
ष्टुभावे॒व भ॑वतः । वा॒स्त्वनु॑ष्टुब्वा॒स्तु स्वि॑ष्ट॒कृदास्तावे॒वैतदा॑स्तु दधाति॒ पेसुकं॑ वै
का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १०-१८ शतपथब्राह्मण / १४३
को दे।' इससे सोम आज्य का तात्पर्य है। 'अग्नि के प्रिय धामों को दे'—इससे जो अग्नि का
पुरोडाश है उससे तात्पर्य है ॥१०॥
अब देवताओं के लिए—'वह आज्य पीनेवाले देवों के लिए प्रिय धामों को देवे।' इससे
प्रयाज और अनुयाज से तात्पर्य है, क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य पान करनेवाले देव
हैं। 'वह होता अग्नि के प्रिय धामों का यज्ञ करे।' यहाँ अग्नि का होता के रूप में तात्पर्य है।
क्योंकि जब देवों ने उसके लिए अलग आहुति विचार कर ली, उन्होंने उसको इसके द्वारा शान्त
किया, और उसको उसके प्रिय धाम (पदार्थ) के लिए बुलाया। इसी प्रयोजन से वह इस प्रकार
सोचता है ॥११॥
कुछ लोग अयाट्कार से पहले देवताओं का नाम लेते हैं। इस प्रकार—'अग्नेः अयाट्'
(अग्नि का [भाग] देवें)। 'सोमस्य अयाट्' (सोम का [भाग] देवें)। परन्तु ऐसा नहीं करना
चाहिए, क्योंकि जो 'अयाट्' से पहले देवता का नाम लेते हैं, वे यज्ञ का क्रम बिगाड़ देते हैं।
क्योंकि 'अयाट्' पहले कहकर ही यज्ञ में जो पहले कहना चाहिए वह कहा जाता है, इसलिये
पहले अयाट्कार ही कहना चाहिए॥१२॥
अब होता अग्नि को सम्बोधन करके कहता है- "यज्ञत् स्वं महिमानम्"- 'अपनी महिमा
के लिए यज्ञ करे।" जहाँ इस प्रकार अग्नि के द्वारा देवताओं का आवाहन करता है वह (अग्नि
की) निज महिमा का भी आवाहन करता है। इससे पहले उसकी निज महिमा के लिए कुछ नहीं
किया गया, इसलिये इस प्रकार उसको प्रसन्न करता है। इसलिये (अग्नि की स्थापना) विद्या
निवारण के लिए होती है। इसलिये कहा- 'अपनी महिमा के लिए यज्ञ करे' ॥१३॥
अब कहता है- "आ यजतामेज्या इषः"- "यज्ञ के योग्य अन्न का यज्ञ किया जाय।"
इष (अन्न) का अर्थ है यहाँ 'प्रजा' से। इस प्रकार प्रजाओं को यज्ञ करने के प्रति उत्साही बनाता
है। ये प्रजा के लोग यज्ञ, पूजा और श्रम करते रहते हैं। ('प्रजा' का अर्थ उत्पन्न हुए प्राणी
आदि) ॥१४॥
अब कहता है- "अध्वरा जातवेदा जुषताꣳ हविः"- "हानि न पहुँचानेवाले और सब
उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाले (देव) पवित्र हवि को करें।" इस प्रकार वह यज्ञ की समृद्धि
को चाहता है। क्योंकि यदि देवों ने हवि ले ली तो मानो उसकी बड़ी सफलता हो गई, इसलिये
कहता है- 'हवि को ले' ॥१५॥
यहाँ 'याज्य' और 'अनुवाक्य' बहुत-कुछ एक-से हो जाते हैं। स्विष्टकृत् तृतीय सवन
(सायंकाल का यज्ञ) है। तृतीय सवन विश्वे देवों का होता है। "पिप्रीहि देवाँ उशतो यविष्ठ।"—
"हे सबसे युवा ! तुम इच्छुक देवों को प्रसन्न करो।" यह अंश अनुवाक्य का वैश्वदेव के लिए है।
"अग्ने यदद्य विशोऽध्वरस्य होतः"- "हे यज्ञ के होता अग्नि ! जो तुम आज लोगों के पास
(आओ)।" याज्य का यह भाग वैश्व देवों के लिए है। चूंकि इन दोनों का ऐसा रूप है इसलिये
यह तृतीय सवन का रूप है। इसीलिये इस स्थान पर याज्य और अनुवाक्य बहुत-कुछ एक-से हो
जाते हैं ॥१६॥
ये दोनों त्रिष्टुभ् के होते हैं। यज्ञ में जो स्विष्टकृत् है वह वास्तु के समान है। वास्तु
वीर्यहीन अर्थात् निर्बल होती है। त्रिष्टुभ् वीर्यवान् है। इस प्रकार स्विष्टकृत् में वीर्य (बल)
धारण कराता है। इसीलिये ये दोनों त्रिष्टुभ् हैं ॥१७॥
या वे दोनों अनुष्टुभ् होते हैं। अनुष्टुभ् वास्तु है। स्विष्टकृत् वास्तु है। इस प्रकार वास्तु
तिभिः स॒म॑सृजे॒तैत॑स्य गृ॒हाः प॒शव॒
उ॒पमूर्य॑माणा ई॑यु॒स्तस्मा॑द॒भ्यर्ध॒ऽइवे॑तराभ्य॒ आहु॑तिभ्यो जुहोति ॥ २१ ॥ ए॒ष वै य॒-
ज्ञः । येन॒ तद्दे॑वा दि॒वमुपोद॑क्राम॒न्नेष आ॑हवनी॒योऽथ॒ य इ॒हाही॑यत॒ स गार्हप-
त्य॒स्तस्मा॑दे॒तं गार्हपत्यात्प्राञ्च॒मुद्ध॑रन्ति ॥ २२ ॥ तं वाऽअ॒ष्टासु॒ विक्र॑मेष्वाद॒धीत॑ ।
अ॒ष्टाक्ष॑रा॒ वै गा॑य॒त्री गा॑य॒त्र्यैवैतद्दि॒वमुपोत्क्रा॑मति ॥ २३ ॥ एका॑दशस्वाद॒धीत॑ । ए॒-
काद॑शाक्षरा॒ वै त्रि॒ष्टुप्त्रिष्टुभैवैतद्दि॒वमुपोत्क्रा॑मति ॥ २४ ॥ द्वाद॑शस्वाद॒धीत॑ । द्वाद॑-
शाक्षरा वै जग॑ती॒ जग॑त्यैवैत
कां० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १८-२८ शतपथब्राह्मण / १४५
में वास्तु रखता है। उसका घर फूलता-फलता है, उसकी सन्तान और पशु फूलते-फलते हैं, जो
इस रहस्य को समझता है और जिसके (अनुवाक्य तथा याज्य) अनुष्टुभ् होते हैं ॥१८॥
भाल्लबेय ने अनुवाक्य को अनुष्टुभ् छन्द में किया और याज्य को त्रिष्टुभ् में, जिससे
दोनों का फल मिल जाय । वह रथ से गिर गया और बाहु टूट गये। उसने सोचा--'कोई काम
मुझसे ऐसा हुआ है जिसके कारण यह गति हुई ।' इसपर उसने समझा कि 'मैंने यज्ञ के क्रम को
विलोम (उलटा) कर दिया।' इसलिये यज्ञ के क्रम को विलोम नहीं करना चाहिए । (याज्य
और अनुवाक्य) एक ही छन्द में होना चाहिए चाहे अनुष्टुभ् में या त्रिष्टुभ् में ॥१९॥
वह (स्विष्टकृत् के लिए हवियों को) उत्तरी भाग में से काटता है और (कुण्ड के)
उत्तरी भाग में आहुति देता है। इस देव की यही दिशा है। इसलिये वह उत्तरी भाग में से काटता
है और उत्तरी भाग में आहुति देता है। इसी दिशा में वह उत्पन्न हुआ और इसी दिशा में शान्त
किया गया। इसलिये उत्तरी भाग से काटकर उत्तरी भाग में आहुति देता है ॥२०॥
वह इन आहुतियों के इसी ओर (सामने ही) आहुति देता है और आहुतियों के पश्चात्
ही प्रजाएं होती हैं। स्विष्टकृत् रुद्र की शक्ति (रुद्रियः) है। यदि वह (स्विष्टकृत् आहुति को)
अन्य आहुतियों से मिला दे तो मानो वह पशु पर रुद्र की शक्ति को लाये और उसके घर और पशु
नष्ट हो जायें। इसलिए स्विष्टकृत् (आहुति) को अन्य आहुतियों के इधर ही देता है ॥२१॥
यह वही यज्ञ था जिससे देव द्यौलोक को चढ़ गये, अर्थात् यह आहवनीय अग्नि। जो
पीछे वहां रह गई वह गार्हपत्य अग्नि है। इसलिये वे इस (आहवनीय अग्नि) को गार्हपत्य अग्नि
से लेते हैं जिससे वह उसकी पूर्व की ओर रहे (उसका प्राथम्य हो) ॥२२॥
उस (आहवनीय अग्नि) को (गार्हपत्य अग्नि से) आठ पग की दूरी पर रक्खे। आठ
अक्षर की गायत्री होती है। इस प्रकार वह गायत्री के द्वारा द्यौ को चढ़ता है ॥२३॥
या वह ग्यारह पग पर रक्खे। ग्यारह अक्षर का त्रिष्टुभ् होता है। इस प्रकार वह
त्रिष्टुभ् के द्वारा द्यौ लोक को चढ़ता है ॥२४॥
या बारह पगों की दूरी पर रक्खे। बारह अक्षर की जगती होती है। जगती के द्वारा ही
वह द्यौलोक को चढ़ता है। यहाँ कोई मात्रा निश्चित नहीं है। जहाँ मन चाहे वहीं रख दे। थोड़ा
ही पूर्व की ओर भी रक्खे तो उससे भी द्यौलोक को चढ़ सकता है ॥२५॥
कुछ लोग कहते हैं कि आहवनीय पर ही हवियों को पकावे, क्योंकि इसी से देव द्यौलोक
को चढ़े थे और इसी से ये पूजा और श्रम करते रहे। उसी में हम हवियों को पकावें, उसी में
यज्ञ करें। यदि गार्हपत्य पर पकावेंगे तो अपस्खल होगा (अनुचित होगा)। यह आहवनीय यज्ञ है।
इस प्रकार यज्ञ में यज्ञ को करते हैं ॥२६॥
परन्तु गार्हपत्य पर भी पकाते हैं। (उनकी युक्ति यह है कि) यह तो आहवनीय है। यह
इस काम के लिए तो है नहीं कि उस पर बिना पकाया हुआ पकाया जाय। यह तो इसलिए है कि
उस पर पकाये हुए की आहुति दी जाय। इसलिए (हमारी सम्मति में) जहाँ इच्छा हो वहाँ
पकावे ॥२७॥
यज्ञ ने कहा 'मुझे नंगेपन से डर लगता है।' (उससे पूछा गया कि) 'तेरे लिए अ-नंगापन